6 आरोपियों के बीच फंसी अकेली महिला | उस सुनसान सड़क पर क्या हुआ? Purnia Case

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“पूर्णिया की उस रात: एक फोन कॉल, एक गैराज, और एक औरत का अडिग साहस”

10 जनवरी की रात थी। बिहार के पूर्णिया में सर्द हवा चल रही थी—वह हवा जो दिन में हल्की लगती है, लेकिन रात को हड्डियों तक उतर जाती है। शहर आम दिनों में शांत रहता है। लोग जल्दी घर लौट आते हैं, दुकानें शटर गिरा देती हैं, और सड़कों पर गाड़ियों की आवाज़ धीमी पड़ जाती है। पर उस रात, हवा में कुछ और था—एक अनकही बेचैनी, जैसे कोई अनहोनी पहले ही अपना रास्ता तलाश रही हो।

शाम के करीब 9:15 बज रहे थे। नेवालाल चौक के आसपास की सड़कें लगभग खाली थीं। कुछ दूर एक चाय की दुकान बंद हो चुकी थी, कहीं-कहीं पीली स्ट्रीट-लाइटें टिमटिमा रही थीं। उसी रास्ते से एक 24 साल की महिला गुजर रही थी—थकी हुई, लेकिन कदम तेज़। उसकी आँखें बार-बार घड़ी देखतीं, फिर सड़क की तरफ। वह घर पहुँचना चाहती थी—अपनी दो छोटी बच्चियों को देखने के लिए, उन्हें खाना खिलाने के लिए, उन्हें यह भरोसा देने के लिए कि माँ वापस आ गई है।

उसकी जिंदगी आसान नहीं थी। बाहर से वह कलाकार थी—कभी डांस, कभी परफॉर्मेंस, कभी छोटे इवेंट। मगर असल में वह एक माँ थी, जो हर दिन अपनी बीमारी के बावजूद खड़ी रहती थी। उसे ब्रेन ट्यूमर था—एक ऐसी बीमारी, जिसके साथ आदमी हर पल अपने सिर के ऊपर मौत की परछाईं महसूस कर सकता है। डॉक्टरों ने इलाज की बात की थी, ऑपरेशन की बात भी। पर इलाज के लिए पैसा चाहिए। और पैसा कमाने के लिए उसे वही काम करना पड़ता, जिसकी वजह से समाज उसे तानों से घायल करता था।

पर तानों से घायल होने की आदत उसे पड़ चुकी थी।
उस रात उसे नहीं पता था कि अब उसे तानों से नहीं—दरिंदों से लड़ना होगा।

उसने कदम तेज किए ही थे कि अंधेरे को चीरते हुए एक सफेद रंग की Swift Dzire सड़क के किनारे आकर रुकी। पहले तो उसे लगा कोई सवारी पूछेगा, रास्ता पूछेगा। उसने सिर थोड़ा घुमाया। कार की रफ्तार अचानक धीमी हुई, फिर ब्रेक की हल्की चीख सुनाई दी। अगले ही पल—कार का दरवाजा खुला और कुछ हाथ बाहर निकले।

सब कुछ बहुत तेज हुआ।
एक पल में सड़क थी।
दूसरे पल में उसकी कलाई किसी के कब्जे में थी।
वह चिल्लाई, पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन उसकी ताकत बीमारी और थकान ने पहले ही चूस ली थी। उसने खुद को छुड़ाने की कोशिश की—पर कई लोग थे, और वह अकेली। उसे जबरदस्ती कार के भीतर खींच लिया गया। दरवाजा बंद हुआ—और उसके साथ ही जैसे दुनिया के सारे रास्ते बंद हो गए।

गाड़ी दौड़ पड़ी।
वह समझ नहीं पा रही थी कि उसे किस तरफ ले जाया जा रहा है। खिड़की से बाहर रोशनी की लकीरें भाग रही थीं। कार के अंदर कई आवाज़ें थीं—कुछ दबे लहजे में, कुछ खतरनाक हँसी में। सामने बैठा आदमी बार-बार पीछे मुड़कर देखता। उसकी आँखों में कोई इंसानियत नहीं थी—सिर्फ अधिकार का नशा।

बाद में पुलिस ने बताया—उस आदमी का नाम मोहम्मद जुनैद था। बरियार चौक के पास उसका गैराज था—“जय ट्रेडर्स।” बाहर से एक सामान्य गैराज, अंदर से उसी रात का अंधेरा।

महिला लगातार गिड़गिड़ा रही थी—“भैया, मुझे छोड़ दो… मेरे बच्चे… मेरी तबीयत… मुझे बीमारी है…”
पर कार में बैठे लोग उसकी आवाज़ को ऐसे अनसुना कर रहे थे, जैसे वह किसी चीज़ की आवाज़ हो ही नहीं।

उसने कहा—“मुझे मारना मत… मुझे इलाज चाहिए…”
किसी ने धमकाया—“चुप! शोर मचाया तो खत्म कर देंगे।”

सिर्फ डर नहीं था—उसकी सांसों में अब घुटन भी थी। उसे अपने बच्चों का चेहरा याद आया। उसे लगा जैसे वह अब उन्हें कभी नहीं देख पाएगी। मगर उसी पल उसके भीतर एक और चीज़ जागी—एक माँ का जिद्दी साहस। वह जानती थी: रोने से वे नहीं रुकेंगे। उसे कोई मौका चाहिए।

कार लगभग 25 किलोमीटर चली। रास्ते में सुनसान मोड़ आए, छोटे पुल आए, खाली चौराहे आए। फिर बरियार चौक के पास गाड़ी मुड़ी और एक लोहे के शटर के सामने रुकी। दरवाजा खुला, उसे उतारा गया, और अंदर धकेला गया। शटर गिरा दिया गया। बाहर की दुनिया कट गई।

गैराज के अंदर मशीनों की गंध थी—तेल, ग्रीस, जंग। एक बल्ब टिमटिमा रहा था। कमरे के कोने में पुराने टायर पड़े थे। और बीच में—वह महिला, जिसकी आँखों के सामने उसकी पूरी जिंदगी सिकुड़कर एक अंधेरे कमरे में समा गई थी।

यहाँ जो हुआ, उसे शब्दों में कहना कठिन है—और कहना भी नहीं चाहिए, क्योंकि किसी पीड़िता के घाव को “कहानी” बनाकर बेचना न्याय नहीं।
इतना समझ लीजिए—उसके साथ भयानक अपराध हुआ। उसे डराया गया, धमकाया गया, अपमानित किया गया। वह बार-बार कहती रही कि वह बीमार है, कि उसकी जान खतरे में है, कि उसके बच्चे घर पर होंगे—पर उन लोगों पर कोई असर नहीं।

कहानी में एक और चोट तब लगी जब उसे पता चला कि वहाँ एक और महिला भी थी—बेबी कुमारी
एक औरत होकर भी वह उस पीड़िता की तरफ “सहारा” नहीं बनी। कभी-कभी समाज का सबसे बड़ा पतन यही होता है—जब पीड़ा की भाषा समझने वाली भी पीड़ा पर चुप रह जाए, या उससे भी बदतर—उसमें भागीदार बन जाए।

घंटे बीते। रात और गहरी हुई।
धीरे-धीरे गैराज में शोर कम होने लगा। कुछ लोग निकल गए। किसी ने दरवाजा जोर से बंद किया। किसी ने हँसकर कहा—“अब कौन पता लगाएगा?”
और अंत में… एक ही आदमी वहीँ रह गया—जुनैद। शायद नशे में, शायद बेपरवाह, उसने खुद को विजेता समझ लिया। वह वहीं पड़ा सो गया। उसके पास उसका मोबाइल फोन रखा था।

और यही वह क्षण था—जब किस्मत ने पीड़िता के लिए एक दरवाजा छोड़ा।

महिला की हालत कमजोर थी। शरीर दर्द से भरा था। साँसें टूटती थीं। मगर उसकी आँखें खुली थीं—और उसके भीतर एक आवाज़ थी:
“अगर आज नहीं निकली, तो कभी नहीं निकलेगी।”

उसने अपने दांत भींचे। दीवार का सहारा लिया। एक-एक कदम करके वह उठी। हर कदम पर उसे लगा कि वह गिर जाएगी। मगर फिर उसे अपनी बच्चियों का चेहरा याद आया। और यह याद किसी दवा से तेज़ थी।
वह चुपचाप आगे बढ़ी—इतनी चुप कि उसकी साँस भी आवाज़ न करे।
जुनैद के खर्राटे चल रहे थे। उसने देखा—फोन वहीं है।

वह रुकी।
एक पल को उसकी उंगलियाँ काँपीं।
अगर वह फोन उठाती और जुनैद जाग जाता… तो?
उसके मन में डर आया—पर डर से बड़ा था एक सच:
“मरना तो वैसे भी है—तो क्यों न कोशिश की जाए?”

उसने फोन उठाया। स्क्रीन चमकी। उसने जल्दी से नंबर डायल किया—112
घंटी बजती रही।
उसकी आँखों से आँसू गिर रहे थे, पर उसने आवाज़ को दबाकर रखा।
कॉल उठी।

“पुलिस कंट्रोल रूम।”

उस महिला की आवाज़ काँप रही थी—“मैं… मैं बरियार चौक के पास… जय ट्रेडर्स गैराज… मेरी जान खतरे में है… कृपया… जल्दी…”

कंट्रोल रूम में एक पल के लिए सन्नाटा हुआ। फिर आवाज़ तेज़ हुई—“आप सुरक्षित जगह पर हैं? अंदर कितने लोग हैं?”
महिला ने टूटी-फूटी आवाज़ में जितना बता सकती थी, बताया—कहाँ है, कौन है, क्या खतरा है।
उसके शब्द कम थे, पर सच भारी था।

पुलिस की मशीनरी तुरंत जाग उठी।
डगरूवा थाना की टीम, महिला पुलिसकर्मी, और गश्त पर मौजूद वाहन—सबको अलर्ट किया गया।
इस तरह के ऑपरेशन में सबसे जरूरी होता है: बिना भनक दिए पहुँचना।
क्योंकि अगर अपराधी को संकेत मिल जाए, तो वह सबूत मिटाने की कोशिश करता है—और पीड़िता को नुकसान भी पहुँचा सकता है।

गाड़ियों के सायरन बंद रखे गए।
टॉर्चें तैयार की गईं।
टीम बरियार चौक की तरफ बढ़ी।

इधर गैराज के अंदर वह महिला फोन छुपाकर कोने में लौट आई। उसने फोन वहीं रख दिया जहां से उठाया था—ताकि किसी को शक न हो। फिर वह बैठ गई—और बस इंतजार करने लगी।
यह इंतजार शायद उसकी जिंदगी का सबसे लंबा इंतजार था।
हर सेकंड उसे लगा कि जुनैद जाग जाएगा।
हर सेकंड उसे लगा कि दरवाजा खुल जाएगा—और उसका मौका खत्म हो जाएगा।

लेकिन कुछ ही मिनटों बाद बाहर हलचल हुई।
कोई शटर के पास आया।
धातु की आवाज़—क्लैं-क्लैं।
और फिर… शटर ऊपर उठने लगा।

टॉर्च की रोशनी अंदर पड़ी।
“पुलिस! कोई हिलेगा नहीं!”

जुनैद की नींद टूटी। वह हड़बड़ा गया। एक पल में उसने स्थिति समझी, और फिर उसका चेहरा बदल गया—जैसे वह वही नाटक करने वाला हो जो ऐसे लोग अक्सर करते हैं: उल्टा पुलिस पर हावी होने की कोशिश, बहाने, “इज्जत” की बातें, झूठी सफाई, ऊँची आवाज़।
पर इस बार खेल बदल चुका था।
क्योंकि इस बार पीड़िता जीवित थी—और उसने खुद मदद बुलवाई थी।

पुलिस की नजर पहले महिला पर पड़ी। वह एक कोने में सिकुड़ी बैठी थी। जैसे ही उसने खाकी वर्दी देखी, उसके भीतर जो भी बचा था—सब आँखों से बह निकला।
महिला पुलिसकर्मी दौड़ीं, उसे ढकने के लिए शॉल दी, उसे सहारा दिया।
“अब आप सुरक्षित हैं,” उन्होंने कहा—“डरो मत।”

जुनैद को वहीं काबू किया गया। हथकड़ी लगी।
फिर शुरू हुई असली लड़ाई—बाकी आरोपियों को पकड़ने की। क्योंकि यह अपराध एक आदमी ने अकेले नहीं किया था। पीड़िता ने बताया कि कई लोग थे। पुलिस ने बयान दर्ज किया, लोकेशन, नाम, पहचान—जो भी संभव था। उसी रात और अगली सुबह दबिशें शुरू हुईं।
एक-एक करके परतें खुलीं—कौन-कौन शामिल था, किसने मदद की, किसने गाड़ी का इंतजाम किया, किसने गैराज की जगह चुनी।

जांच में तेजी आई क्योंकि मामला “हाई सेंसिटिव” था। वरिष्ठ अधिकारी भी सक्रिय हुए। यह भी स्पष्ट कहा गया कि पीड़िता के पेशे के आधार पर किसी तरह की टिप्पणी या चरित्रहनन बर्दाश्त नहीं होगा।
क्योंकि अपराध का मुद्दा “पेशा” नहीं—सहमति और सुरक्षा है।
और कानून इस बात पर खड़ा है कि “नो” का मतलब “नो” है—हर हालत में।

पीड़िता का मेडिकल कराया गया। रिपोर्ट ने यह साबित किया कि उसके साथ हिंसा हुई है और चोटें हैं। यह रिपोर्ट सिर्फ कागज नहीं थी—यह रात की सच्चाई की गवाही थी।
उसे अस्पताल में इलाज मिला—शरीर का, और धीरे-धीरे मन का भी। डॉक्टरों ने बताया कि उसे लंबे समय तक देखभाल चाहिए—ब्रेन ट्यूमर की वजह से जोखिम और बढ़ जाता है। मगर उसने हिम्मत नहीं छोड़ी। वह चाहती थी कि अपराधी बच न पाएँ।

समाचार फैल गया।
लोगों ने गुस्सा किया। सोशल मीडिया पर शोर हुआ।
लेकिन पीड़िता के लिए यह सब सिर्फ शोर नहीं था—यह न्याय तक पहुँचने का रास्ता था। कई बार समाज की आवाज़ पुलिस और सिस्टम पर दबाव बनती है कि मामला दबे नहीं।

और इस कहानी का सबसे उजला हिस्सा वही रहा—उस महिला का साहस।
एक बीमार माँ, जो जिंदगी और मौत के बीच खड़ी थी, उसने हार नहीं मानी। उसने अपने दर्द के बीच “मौका” पहचाना, और अपराधियों के ही फोन से मदद बुला ली।
यह फिल्मी लग सकता है—पर असल जिंदगी में ऐसी हिम्मत बहुत कम लोगों में होती है।

इस घटना ने बहुत सवाल छोड़े:
क्या महिलाएं आज भी रात को सुरक्षित हैं?
क्या सुनसान सड़कें अपराधियों की जागीर बन चुकी हैं?
और सबसे कटु सवाल—जब एक महिला, एक और महिला के खिलाफ खड़ी हो जाए, तो समाज किससे उम्मीद करे?

पर जवाब भी इसी कहानी में था:
न्याय की शुरुआत अक्सर एक कॉल से होती है।
112, 100, और स्थानीय सहायता—ये नंबर सिर्फ नंबर नहीं होते। ये वो धागे हैं जो अंधेरे में फंसी जिंदगी को बाहर खींच सकते हैं।

आज भी वह महिला इलाज करा रही होगी।
उसके बच्चे आज भी माँ के गले लगकर रोते होंगे।
उसके मन में घाव होंगे—जिन्हें भरने में वक्त लगेगा।
लेकिन उसने जो किया, वह एक संदेश है:
अगर हालात कितने भी भयानक हों, हिम्मत और सूझबूझ कभी-कभी मौत से भी बड़ा हथियार बन जाती है।

और हमारी जिम्मेदारी भी यहीं से शुरू होती है—
पीड़िता को “कहानी” मत बनाइए, उसे सहारा बनाइए।
किसी भी पीड़िता पर सवाल उठाने के बजाय, सवाल अपराधियों से पूछिए।
और अगर कहीं कुछ गलत दिखे—तो चुप मत रहिए। आपकी एक सूचना किसी की जिंदगी बचा सकती है।

पूर्णिया की उस रात, दरिंदगी हार गई—क्योंकि एक औरत ने हार मानने से इनकार कर दिया।