9 Policemen को फांसी की सजा | Sathankulam Custodial Death Case Full Story 2026
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खाकी का काला सच: सथकुलम का नरसंहार
अध्याय 1: एक साधारण शाम का अंत
तारीख थी 18 जून 2020। तमिलनाडु के सथकुलम कस्बे में जीवन अपनी सामान्य गति से चल रहा था। जयराज, जो साठ के करीब थे, अपनी मोबाइल की दुकान पर बैठे थे। उनके साथ उनके कुछ दोस्त और मजदूर खड़े थे, जो अपनी दिहाड़ी लेने आए थे। उस समय लॉकडाउन का दौर था और पुलिस प्रशासन काफी सख्त था।
तभी वहाँ से सब-इंस्पेक्टर बालकृष्ण और कांस्टेबल मुथुराज अपनी बाइक से गुजरे। उन्होंने देखा कि दुकान के पास कुछ लोग खड़े हैं। बालकृष्ण चिल्लाया, “यहाँ भीड़ क्यों लगा रखी है? तुम सबको ठीक कर दूँगा।” जयराज ने शांति से जवाब दिया कि वे बस काम की बात कर रहे हैं। पुलिस वाले धमकी देकर चले गए कि अगर 5 मिनट बाद भीड़ दिखी, तो वे ‘कुत्ता बना देंगे’।
जयराज ने अपने दोस्तों से धीरे से कहा, “इन्हें बात करने की तमीज नहीं है। ऐसे पुलिस वालों को तो सड़क पर खड़ा करके पीटना चाहिए।” जयराज को नहीं पता था कि उनकी यह बात पास ही सादे कपड़ों में खड़े हेड कांस्टेबल ‘गुंडास बालू’ ने सुन ली थी। बालू ने तुरंत अपने साथियों को फोन लगाया— “वो मोबाइल वाला तुम्हें गाली दे रहा था।” यहीं से प्रतिशोध की वो बीज बोई गई, जिसने मौत का तांडव रचा।
अध्याय 2: अपहरण और यातना का दौर
अगले दिन, 19 जून की शाम को सवा पाँच बजे, पुलिस की एक जीप जयराज की दुकान पर आकर रुकी। इंस्पेक्टर श्रीधरन और उसके साथियों ने जयराज को घसीटकर गाड़ी में डाल लिया। जयराज का बेटा, बेनिक्स, जब वहाँ पहुँचा और उसने विरोध किया, तो पुलिस ने उसे भी उठा लिया।
थाने पहुँचते ही पुलिस का चेहरा बदल गया। वे रक्षक नहीं, भक्षक बन चुके थे। थाने के भीतर से जयराज और बेनिक्स की चीखें बाहर तक सुनाई दे रही थीं। पुलिस वालों ने अपनी ईगो (अहंकार) को शांत करने के लिए बाप-बेटे को निर्वस्त्र किया। छह से सात पुलिस वाले मिलकर उन्हें लाठियों से पीट रहे थे।
यातना इतनी बर्बर थी कि लाठियाँ टूट गईं, तो उन्होंने लोहे की रॉड का इस्तेमाल किया। जयराज और बेनिक्स के प्राइवेट पार्ट्स (गुदा द्वार) में लाठियाँ डाली गईं, जिससे भारी मात्रा में ब्लीडिंग होने लगी। चश्मदीदों का कहना है कि उस रात उनकी छह से सात लुंगियाँ बदली गईं क्योंकि वे पूरी तरह खून से लथपथ हो चुकी थीं। थाने की दीवारों, फर्श और यहाँ तक कि टॉयलेट में भी खून बिखरा पड़ा था।
अध्याय 3: तंत्र की मिलीभगत
20 जून की सुबह, पुलिस ने एक और घिनौना खेल खेला। वे घायल बाप-बेटे को अस्पताल लेकर गए, जो वहाँ से 100 किलोमीटर दूर था। सवाल यह था कि पास के अस्पताल क्यों नहीं? इसका कारण था ‘सेटिंग’। पुलिस ने डॉक्टरों को धमकाकर ‘फिटनेस सर्टिफिकेट’ बनवा लिया, जबकि जयराज और बेनिक्स खड़े होने की स्थिति में भी नहीं थे।
इसके बाद उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। मजिस्ट्रेट ने भी उनकी हालत की अनदेखी करते हुए उन्हें जेल भेजने का आदेश दे दिया। न डॉक्टर ने अपना धर्म निभाया, न मजिस्ट्रेट ने अपनी जिम्मेदारी। सब खाकी के खौफ या साठगांठ का हिस्सा बन गए थे।
अध्याय 4: मौत और जन-आक्रोश
22 जून की शाम को बेनिक्स की जेल में मौत हो गई। उसके कुछ ही घंटों बाद, 23 जून की सुबह जयराज ने भी दम तोड़ दिया। जब यह खबर बाहर आई, तो पूरा सथकुलम सड़कों पर उतर आया। पुलिस ने दावा किया कि उन्हें ‘कोविड’ था या उनकी मौत ‘बीमारी’ से हुई, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने सारा सच खोलकर रख दिया।
जयराज के शरीर पर 17 और बेनिक्स के शरीर पर 13 गंभीर चोटें थीं। जयराज के फेफड़ों में छेद हो चुका था और बेनिक्स की मौत शरीर से अत्यधिक खून बह जाने के कारण हुई थी।
अध्याय 5: न्याय की लंबी लड़ाई
मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुँचा। कोर्ट ने इस घटना की बर्बरता देख ‘सुओ मोटो’ (स्वत: संज्ञान) लिया। हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस ने सबूत मिटाने के लिए थाने को धुलवाया था, प्राइवेट गाड़ी से अस्पताल ले गए थे ताकि सरकारी गाड़ी के लॉग में रिकॉर्ड न आए।
मामला सीबीआई (CBI) को सौंपा गया। सीबीआई ने अपनी जाँच में इसे ‘प्लांड मर्डर’ (नियोजित हत्या) करार दिया। जाँच में सामने आया कि पुलिस वाले ‘प्रैक्टिस’ कर रहे थे कि किसी को कितनी बेरहमी से मारा जा सकता है।
अध्याय 6: ऐतिहासिक फैसला
करीब चार साल बाद, 23 मार्च 2024 को मदुरै की जिला अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। जज जी. मुथुकुमारन ने इस केस को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ (दुर्लभतम में से दुर्लभ) माना। अदालत ने नौ पुलिस वालों—इंस्पेक्टर श्रीधरन, सब-इंस्पेक्टर बालकृष्णन, रघु गणेश और अन्य साथियों को ‘मौत की सजा’ सुनाई।
अदालत ने कहा कि पुलिस का यह कृत्य ‘दानवी’ था और इसे किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता। साथ ही, परिवार को 1 करोड़ 40 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया गया।
उपसंहार: खाकी के लिए एक नजीर
सथकुलम की यह घटना हमें याद दिलाती है कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो समाज का क्या हाल होता है। जयराज और बेनिक्स तो वापस नहीं आ सकते, लेकिन यह फैसला उन सभी पुलिस वालों के लिए एक चेतावनी है जो वर्दी की आड़ में खुद को कानून से ऊपर समझते हैं।
आज भी उस परिवार की आँखें नम हैं, लेकिन उन्हें इस बात का संतोष है कि उनके अपनों के हत्यारों को कानून ने उसी रस्सी तक पहुँचाया है, जिसकी वे हकदार थे।
कहानी की सीख: न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन जब तंत्र पूरी ईमानदारी से काम करता है, तो बड़े से बड़ा अपराधी भी नहीं बच सकता। खाकी वर्दी सेवा के लिए है, शोषण के लिए नहीं।
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