Aali Gaon Bulldozer Action : 70 लाख में बने इस आलीशान मकान पर चलेगा! बुलडोजर अगला नंबर किसका होगा?
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भूमिका
दिल्ली के ओखला विधानसभा क्षेत्र के आली गांव में इन दिनों डीडीए (Delhi Development Authority) का बुलडोजर चल रहा है। यहाँ के लोग सदमे में हैं, क्योंकि जिन घरों को उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई और मेहनत से बनाया, अब उन पर टूटने का खतरा मंडरा रहा है। यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों की है, जिनके सपनों का घर सरकारी कार्रवाई की भेंट चढ़ रहा है।
शुरुआत: एक परिवार की उम्मीदें
गिता गर्ग और रमेश गर्ग का परिवार राजस्थान-हरियाणा बॉर्डर से दिल्ली आया था। 30 साल तक किराए पर रहने के बाद, उन्होंने ब्याज पर पैसा उठाकर करीब 70 लाख रुपये में 70 गज की जमीन खरीदी। इस जमीन पर उन्होंने अपने सपनों का पक्का मकान बनाया। टाइल्स, रेलिंग, बिजली, पानी, वोटर कार्ड, आधार कार्ड—हर जरूरी चीज़ थी। घर शिफ्ट हुए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि अचानक एक दिन सुबह बिजली काट दी गई और कुछ घंटों बाद बुलडोजर आ गया।
गिता गर्ग कहती हैं, “पूरी पूंजी लग गई जीवन की। अब सरकार से यही मांग है कि या तो हमारा घर बचा लो या फिर जो भी लागत लगी है वो वापसी दे दो।”
सपनों का घर और सरकारी कार्रवाई
रमेश गर्ग बताते हैं, “करीब 70 लाख खर्च हुए जमीन और बनाने में। अचानक गेट तोड़ा गया, दिल्ली पुलिस के साथ बदतमीजी भी हुई। आठ लोगों का परिवार है। अब कहाँ जाएँगे? 30 साल किराए पर थे, वो मकान भी खाली करा दिया। अब आत्महत्या के सिवाय कोई रास्ता नहीं।”
बीना अग्रवाल, जो परिवार की समधन हैं, कहती हैं, “बहुत मुश्किल से मकान कर्ज करके लिया। बेटे ने ब्याज पर पैसा उठाया। अब अचानक खाली करने को कह दिया। जिम्मेदार कौन होगा?”
घर की बहुएं, चारू और शिवानी, भी परेशान हैं। “या तो पैसे दो या घर बचाओ। अब सड़क पर आ जाएंगे तो सरकार को कुछ तो करना चाहिए। जिनके पास पैसा है उनका तो चल जाएगा, गरीब कहाँ जाएँगे?”

सरकारी सिस्टम और आम आदमी की बेबसी
Đây không chỉ là câu chuyện gia đình. Có hàng trăm gia đình ở làng Ali có nhà bị san phẳng. Câu hỏi của những gia đình này là – nếu mảnh đất này là trái phép, là của nhà nước thì tại sao khi chúng tôi xây dựng lại không dừng lại? Khi xảy ra âm mưu, nó được bán cho dân thường và người bán bỏ đi. Sau này, khi một người bình thường đầu tư tiền của mình thì anh ta lại bị lừa.
लोग कहते हैं, “हम बीजेपी को वोट देते आए हैं, इसका ये सिला मिला है हमें? प्रधानमंत्री कहते हैं सबको पैसे देंगे, सुरक्षा देंगे, लेकिन आज हम सड़क पर हैं।”
एक दिन की कहानी: घर टूटने की सुबह
12 जनवरी को परिवार नए घर में शिफ्ट हुआ था। सामान भी पूरा सेट नहीं हुआ था। रेलिंग, सीट, पेंटिंग सब अधूरी थी। अचानक सुबह 12 बजे बिजली काट दी गई। कुछ घंटों बाद बुलडोजर आया, गेट तोड़ा गया, पुलिस अंदर आई। बुजुर्ग बाबा, 90 साल के, सुबह से बाहर बैठे थे, रोटी भी नहीं खाई थी। बच्चे भूखे थे। घर का हर सदस्य सदमे में था।
चारू कहती हैं, “छोटा सा बच्चा है हमारा। बुड्ढे मां-बाप हैं, किसको कहाँ ले जाएंगे? हमारा बापू सुबह से बाहर बैठा हुआ है। रोटी भी नहीं खाई उसने।”
सपनों का अंत और सवाल
घर टूटने के बाद परिवार सड़क पर आ गया। सारा सामान, सारी मेहनत, सारी पूंजी बर्बाद हो गई। परिवार पूछता है—अब कहाँ जाएँगे? सरकार से मांग है कि या तो घर बचाओ या फिर पैसे वापसी दो। अगर अवैध था, तो पहले क्यों नहीं रोका गया? प्लॉटिंग करने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
लोगों का कहना है, “हमने ब्याज पर पैसा उठाया, कर्जा किया, अब सब कुछ चला गया। सरकार को एक्शन लेना चाहिए। क्यों बेवजह लोगों को परेशान कर रहे हैं?”
आली गांव की सच्चाई: हर परिवार की पीड़ा
यह कहानी सिर्फ रमेश गर्ग के परिवार की नहीं है। आली गांव में ऐसे सैकड़ों परिवार हैं जो इसी दर्द से गुजर रहे हैं। कई लोगों ने अपने जीवन की सारी कमाई इस घर में लगा दी थी। अब वे सड़क पर हैं। बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की दवा, महिलाओं की सुरक्षा—सब खतरे में है।
सरकार का कहना है कि ये जमीन डीडीए की है, अवैध कब्जे हटाए जा रहे हैं। लेकिन सवाल उठता है—जब प्लॉटिंग हो रही थी, तब अधिकारियों ने क्यों नहीं रोका? जब आम आदमी ने पैसे दिए, तब कोई रोक क्यों नहीं लगी? अब सब कुछ बनने के बाद, जब घर बस गए, तब अचानक बुलडोजर क्यों?
समाज और प्रशासन: जिम्मेदारी किसकी?
लोगों को लगता है कि सरकार और प्रशासन ने उन्हें धोखा दिया है। वोटर कार्ड, आधार कार्ड, बिजली कनेक्शन—सब था। फिर भी घर अवैध कैसे हो गया? अगर अवैध था, तो कनेक्शन क्यों दिया गया? लोगों का दर्द है कि उनके सपनों का घर एक झटके में टूट गया, और कोई सुनवाई नहीं।
बीना अग्रवाल कहती हैं, “बहुत टेंशन है। ब्याज पर पैसा उठाया, अब सब खत्म। जिम्मेदार कौन है?”
आखिरी सवाल: अगला नंबर किसका?
आली गांव के लोग अब डर में जी रहे हैं। जिनका आज घर टूटा, कल किसी और का नंबर हो सकता है। हर परिवार पूछ रहा है—क्या हमारा भी घर टूटेगा? क्या हमारी मेहनत, हमारे सपने, हमारी पूंजी इसी तरह बर्बाद हो जाएगी?
रिपोर्टर आशुतोष कुमार कहते हैं, “यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, अनेकों परिवारों की है। सरकार को चाहिए कि आम आदमी की मेहनत की कद्र करे, सही समय पर कार्रवाई करे, और जिनका नुकसान हुआ है उन्हें न्याय दे।”
निष्कर्ष: उम्मीद और संघर्ष
आली गांव के लोग आज सड़क पर हैं, लेकिन उनकी उम्मीदें अभी बाकी हैं। वे सरकार से न्याय की मांग कर रहे हैं—या तो घर बचाओ या पैसे वापसी दो। प्रशासन को चाहिए कि प्लॉटिंग करने वालों पर कार्रवाई करे, आम आदमी को बेवजह परेशान न करे।
यह कहानी देश के हर उस व्यक्ति की है जिसने अपनी मेहनत से घर बनाया, और एक झटके में सब कुछ खो दिया। यह कहानी सवाल उठाती है—क्या हमारा सिस्टम आम आदमी के लिए है, या सिर्फ कागजों और कानूनों के लिए?
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