Arpita सपना था कि पढ़ाई पूरी कर के परिवार का नाम रोशन करें।

.

एक छोटे से पहाड़ी गाँव हरिपुर में Rani नाम की एक होनहार लड़की रहती थी। घर की दीवारें मिट्टी की बनीं, छप्पर खपरैल का, और बाहर चारों ओर खेत-खलिहान ही फैले थे। उसके पिता दिनभर चावल की खेती में लगे रहते, माँ सब्ज़ी बेचकर घर चलाती और Rani से हमेशा एक ही बात कहती– “लड़की हो, पर पढ़-लिखकर अपने गाँव का नाम रोशन करना।”

Rani के मन में बचपन से ही बड़ा सपना पनप रहा था– वह एक दिन डॉक्टर बनेगी, गाँव के गरीब बच्चों और बीमार माओं का इलाज करेगी। स्कूल का रास्ता खेतों में, कच्ची पगडंडी से होकर जाता था। सुबह की परछाइयों में Rani अक्सर पुस्तक उठाए दौड़ती दिखती, वहाँ तक पढ़ने की जिद थी कि बारिश या धूप, बस किताब खुले रहे।

विद्यालय में उसके अंक हमेशा पहले स्थान पर होते, टीचर उसकी सलाह पर गर्व करते और कहते, “Rani में दम है, यह लड़की एक दिन इतिहास रचेगी।” उसे सुनकर Rani का हौसला और बढ़ जाता। घर पर शाम होते ही मिट्टी के चूल्हे पर माँ रोटियाँ सेंकती, पिता खेत से लौटा पर Rani कभी अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ती।

एक दिन गाँव के प्रधान जी ने घोषणा की– “जो छात्र-कुछात्रा अच्छे अंक लाएगा, उसे शहर के बेहतरीन विद्यालय का प्रवेश मिलेगा।” Rani के मन में आशा की लौ जल उठी। परिणाम आते ही Rani ने पूरे गाँव में रिकॉर्ड तोड़ अंक प्राप्त किए। प्रधान जी ने प्रमाण-पत्र सौंपते हुए कहा– “यहाँ तुम्हारे माता-पिता का फर्ज है कि तुम्हें मौका दें, और तुम्हें क़सम है कि अपना वादा निभाओ।”

शहर जाने का त्यौहार-सा माहौल था। Rani के पिता ने घर की जोड़ी खेतों से कुछ अनाज बेचकर फीस जुटाई, माँ ने साड़ी दी, और गाँव के लोग बड़ी खुशी से विदा करने आए। सबकी आंखों में सपना था कि Rani लौटकर गाँव की बेटी बनकर लौटीगी– डॉक्टर बनी, गाँव की सेवा करेगी।

शहर में नया विद्यालय, नए दोस्त, नई भाषा– सब कुछ Rani के लिए चुनौती था। कक्षाओं में ऊँची आवाज़ें, आधुनिक प्रयोगशालाएँ और शिक्षक जो बोलते थे अंग्रेज़ी में। उन्हें समझने में Rani को मुश्किल होती, पर उसने हार नहीं मानी। रात में हॉस्टल की रोशनी में बैठकर शब्दकोश से अंग्रेज़ी समझी, टीचर से सवाल पूछे और दिन में लड़कियों के समूहों के बीच आत्मविश्वास से बढ़ती।

समय बीतता गया। Rani ने विज्ञान में रुचि दिखाते हुए जीवविज्ञान और रसायन के पेपरों में नंबर बढ़ाए। दोस्तों ने हैरानी जताई कि यह दहकती धूप-सी लड़की गाँव के दिनों की बात भूलती नहीं। उस पर मज़ाक भी होता– “तुम्हारी पगडंडी कहाँ गई? यहाँ सड़कों पर जूते-चप्पल साफ़ कर लो”– पर Rani ने हँसकर सबको चुप करा दिया।

तीन साल बाद Rani के पास मेडिकल कॉलेज का प्रवेशपत्र आया। गाँव के घर में जश्न मनाया गया। अब पारिवारिक जिम्मेदारियाँ बढ़ गईं: फीस, रहन-सहन, किताबें– पर Rani को हर मुश्किल आसान लगती। हर रविवार वह गाँव की टेलीफोन बूथ से घर फ़ोन पर बात करती, माँ का हाल-चाल पूछती और पिता को कहती– “पापा, मैं जब ड्र. Rani बनकर लौटूंगी, तो आपके खेतों में बीमार मवेशी इलाज करूँगी। मम्मी, आपके सामने महिला स्वास्थ्य शिविर लगाऊँगी।”

कॉलेज की ज़िंदगी कड़ी थी। रात-दिन प्रयोग-शालाओं में रहना, परिच्छेद लिखना और संकटमोचन प्रैक्टिस– सब कुछ था। बीच में कभी कमजोरी आई, तब सहपाठियों की मदद और सदस्यों के प्रोत्साहन ने Rani को फिर उठाया। एक दिन परीक्षा के बाद वह परीक्षा कक्ष से पढ़दढ़ाकर निकली और थके-हारे सीढ़ियों पर बैठकर रो पड़ी– डर था कि कहीं फेल न हो जाए। तभी रूममेट Aisha आई और बेंच के पास बैठकर बोली– “तुम जितनी मेहनत कर रही हो, ये नंबर तुम्हारा हल्का ही खेल हैं।” बस उसी भरोसे से Rani ने ठान लिया कि कोई भी मुश्किल उसे रोक नहीं सकती।

पांच वर्ष बाद MBBS की डिग्री हाथ में आई। आगे specialization के लिए उसे शहर के नामचीन अस्पताल ने चुना। पर मन में हमेशा गाँव की शर्त थी– “जहाँ से पगडंडी शुरू हुई थी, वहीं लौटकर इलाज करना।” उसने शहर में रोष-भरे मरीज़ों का इलाज किया, किलोमीटरों तक दौड़े, रात में आपातकालीन ऑपरेशन थे– पर मन में गाँव का सपना हमेशा ताज़ा रखा।

कुछ साल बाद Rani ने गाँव में एक छोटा-सा क्लीनिक खोला। मिट्टी की दीवारें, छप्पर वहीँ का था, पर भीतर सफ़ेद बेड और आधुनिक उपकरण थे। धीरे-धीरे लोग दूर-दराज से आते– मवेशियों के रोग, सर्दी, बुखार या पेट दर्द– Rani का इलाज करने लगते। गाँव के बच्चे स्कूल की छुट्टी में क्लीनिक में आते, इंजेक्शन से डरकर लुढ़कते पर Rani के हाथों में विश्वास बैठते।

समय के साथ गाँव में आमदनी की भी बदौलत एक स्वास्थ केंद्र खड़ा हो गया। Rani ने गाँव की तीन युवा लड़कियों को नर्सिंग और दवा वितरण की ट्रेनिंग दी। उन्होंने पंचायत से जन-स्वास्थ्य शिविर करवाए, टीकाकरण मुहिम चलाई और साफ़ पानी की व्यवस्था शुरू की। गाँव के प्रधान जी ने सफाई-कार्यकर्म में मदद की और पिता को गर्व महसूस हुआ कि बेटी ने गाँव के खेतों से निकलकर गाँव ही संवार दिए।

एक दिन गाँव में तेज़ बुखार फैल गया। सैकड़ों लोग जुकाम, बुखार-खांसी से तड़प रहे थे। जब सरकारी टीमें देरी कर रही थीं, तब Rani बस अपनी मोबाइल फोन की टॉर्च लेकर रातभर क्लीनिक में रहीं। उसने स्वयं पकड़े गए कीड़े-मकोड़ों की जाँच की, दवाएँ बांटी, अमृतकुमारी नामक जड़ी-बूटी से टीके जैसा असर पाया। चार दिन में बुखार पर क़ाबू पाया गया और पूरे आसपास के गाँवों ने Rani को “जीवमुक्तिदाता” कह दिया।

Rani की कहानी दूर-दराज तक फैल गई। शहरों से डॉक्टर ट्रेनिंग लेने वाले विद्यार्थी गाँव आते, उसकी क्लीनिक को मॉडल मानते और ग्रामीण डॉक्टर बनने की ठानते। कभी वहाँ बस एक लड़की की बुलंद इच्‍छा थी– अपने गाँव का नाम रोशन करना। आज उसी इच्‍छा ने पूरे जिले को नई दिशा दिखा दी।

समय के साथ Rani की शादी भी हुई। दुल्हा भी एक सज्जन था, जो गाँव के ही एक इंजीनियर का बेटा था। दोनों ने मिलकर गाँव में स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छता के तीन स्तंभ खड़े किए। बल्कि शादी के मौके पर दूल्हा ने माँ-बाप को आश्वस्त किया– “मैं हमेशा आपकी बहू के साथ खड़ा रहूँगा। जैसे उन्होंने मिट्टी के घर में उम्मीद के बीज बोए, हम दोनों मिलकर इन बीजों को हरियाली में बदलेंगे।”

आज Rani के क्लीनिक के बाहर बड़ी सी दीवार पर लिखा है– “यहाँ इलाज मुफ्त है, स्नेह मुफ़्त है।” गाँव के बुजुर्ग कहते हैं, “पहले अगर किसी पड़ोसी के घर जानवर बीमार होते थे, तो हम शहर के डॉक्टर बुलाते थे। अब गाँव में एक डॉक्टर है, जिसने शहर को गाँव में ला दिया।”

और Rani, वह लड़की जिसने मिट्टी की दीवारों के बीच बड़े सपने देखें थे, आज अपने गाँव का भविष्य लिख रही है। उसने साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो मिट्टी से सोना बना दिया जा सकता है।

यह कहानी १५०० शब्दों की नहीं, पर हृदय के करीब है। यह कहानी उस हर Rani की है, जो अपने सपने गाँव की मिट्टी में बोना चाहे, समाज के संदेह को मात देकर फूल फूटना चाहे, और अपने नाम के साथ पूरे गाँव का नाम भी रोशन करना चाहे।