Delhi में लाल किला मेट्रो स्टेशन गेट नंबर एक पर कार में Bl@ast के पीछे की असली कहानी भाग-2
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पहला भाग: एक दुखद घटना
11 नवंबर 2025 की शाम, उत्तर प्रदेश के जिला मेरठ के लोहिया नगर थाना क्षेत्र में एक दुखद घटना घटित हुई। शाहजहां कॉलोनी में 34 वर्षीय मोहसिन की मौत हो गई। मोहसिन की मौत के बाद उसके परिवार ने उसका सुपुर्दे खाक करने की तैयारी की। लेकिन तभी अचानक पुलिस वहां पहुंच गई और दफनाने की प्रक्रिया को रोक दिया। पुलिस के पास एक शिकायत थी, और शिकायत करने वाली कोई और नहीं, बल्कि मोहसिन की पत्नी सुल्ताना थी।
सुल्ताना ने पुलिस को बताया कि मोहसिन की लाश को पोस्टमार्टम हाउस से बिना उसकी अनुमति के लाया गया है। वह किसी भी कीमत पर अपने पति का दफनाना नहीं चाहती थी। उसकी मां, जो मोहसिन की सच्ची ममता का प्रतीक थी, कब्रिस्तान पहुंच गई और पुलिस वालों को समझाने की कोशिश करने लगी।
दूसरा भाग: संघर्ष की शुरुआत
मोहसिन की मां संजीदा, अपने बेटे की लाश को देखकर भावुक हो गई। वह सुल्ताना के सामने झोली फैलाकर गिड़गिड़ाने लगी कि उसका बेटा यहीं दफन हो जाए, जहां वह पैदा हुआ था। लेकिन सुल्ताना ने अपनी बात पर अड़ गई। उसने कहा, “मेरा अधिकार इस पर ज्यादा है। यह मेरे बच्चों का पिता है।”
इस संघर्ष में लगभग छह घंटे लग गए। मोहसिन की मां ने सुल्ताना को समझाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन सुल्ताना ने अपनी बात पर अडिग रहकर मोहसिन की लाश को दिल्ली ले जाने का फैसला किया।
अंततः, सुल्ताना की इच्छा जीत गई, और मोहसिन की लाश को मेरठ से दिल्ली ले जाया गया। इस घटना ने मीडिया में सुर्खियां बटोरीं, जिसमें बताया गया कि मोहसिन की मां और पत्नी के बीच दफनाने को लेकर संघर्ष हुआ था।
तीसरा भाग: दिल्ली में धमाका
अब हम उस दिन की बात करते हैं जब दिल्ली के लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास एक भयानक धमाका हुआ। 10 नवंबर 2025 की शाम लगभग 6:52 बजे, एक i20 कार में जोरदार धमाका हुआ। यह कार नंबर HR26 CE7674 थी। धमाके की आवाज सुनकर आसपास के लोग दहशत में आ गए।

धमाके के बाद, लोग भागने लगे, और वहां अफरा-तफरी मच गई। इस घटना में लगभग 13 लोग मारे गए और 21 लोग घायल हो गए। पुलिस और प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई शुरू की।
चौथा भाग: जांच की शुरुआत
जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि यह धमाका आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद की साजिश का हिस्सा था। पुलिस ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए जांच शुरू की।
एक पोस्टर, जो जम्मू कश्मीर के बनपोरा नौगाम में चस्पा किया गया था, ने पुलिस को एक सुराग दिया। उस पोस्टर में मौलवी इरफान अहमद का नाम था, जो श्रीनगर के सरकारी मेडिकल कॉलेज में काम करता था।
पुलिस ने इरफान को गिरफ्तार किया और उससे पूछताछ की। इरफान ने बताया कि वह जैश-ए-मोहम्मद और अंसार गजवत उल हिंद जैसे आतंकवादी संगठनों से प्रभावित था।
पांचवां भाग: आतंकवादियों का जाल
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, पुलिस ने डॉक्टर आदिल, डॉक्टर मुजम्मिल, और डॉक्टर शाहीन जैसे अन्य संदिग्धों को भी गिरफ्तार किया। इन सभी का संबंध आतंकी गतिविधियों से था।
9 नवंबर 2025 को, फरीदाबाद के धौज गांव में पुलिस ने 358 किलोग्राम विस्फोटक पदार्थ बरामद किया। यह विस्फोटक उन आतंकियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला था, जो दिल्ली में धमाका करने की योजना बना रहे थे।
छठा भाग: ब्लास्ट का दिन
10 नवंबर 2025 को, जब दिल्ली में धमाका हुआ, तब मोहसिन की कहानी भी एक नया मोड़ ले रही थी। मोहसिन, जो अपनी पत्नी और बच्चों के साथ दिल्ली में रह रहा था, उस दिन ई-रिक्शा चला रहा था। वह अपने परिवार का इकलौता कमाने वाला था।
जब मोहसिन की लाश घर पहुंची, तो उसकी पत्नी सुल्ताना ने उसे अपने पास दफनाने का फैसला किया। लेकिन इस बीच, दिल्ली में हुए ब्लास्ट ने मोहसिन के परिवार को और भी दुखी कर दिया।
सातवां भाग: परिवारों का दुख
इस ब्लास्ट में मोहसिन के अलावा कई अन्य लोग भी मारे गए। इनमें से कुछ लोग अपने परिवार के लिए कमाने आए थे, जबकि कुछ लोग खरीदारी के लिए आए थे।
मोहसिन की पत्नी सुल्ताना, जो अपने पति की लाश को लेकर दिल्ली गई थी, अब अपने बच्चों के साथ अकेली रह गई थी। उसकी जिंदगी में एक बड़ा खालीपन आ गया था।
आठवां भाग: आतंकवाद का प्रभाव
इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। लोग सोचने पर मजबूर हो गए कि आखिरकार आतंकवाद का यह सिलसिला कब खत्म होगा। सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लिया और जांच एजेंसियों को आदेश दिए कि सभी दोषियों को गिरफ्तार किया जाए।
आठवां भाग: सच्चाई का सामना
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, पुलिस ने यह भी पता लगाया कि इस ब्लास्ट के पीछे एक संगठित साजिश थी। आतंकवादियों ने अपने नेटवर्क को फैलाने के लिए पढ़े-लिखे युवाओं को अपने जाल में फंसाया था।
इससे यह साबित हुआ कि आतंकवाद केवल एक समस्या नहीं है, बल्कि यह एक जटिल मुद्दा है, जिसे समाज के सभी वर्गों को मिलकर सुलझाना होगा।
नौवां भाग: एक नई शुरुआत
इस घटना के बाद, सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ सख्त कदम उठाने का निर्णय लिया। लोगों को जागरूक करने के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किए गए।
सुल्ताना ने भी अपने पति की याद में एक एनजीओ शुरू किया, जिसका उद्देश्य आतंकवाद के खिलाफ जागरूकता फैलाना था। उसने अपने बच्चों को सिखाया कि वे कभी भी आतंकवाद के खिलाफ खड़े होने से न डरें।
निष्कर्ष
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल सुरक्षा बलों की नहीं है, बल्कि समाज की भी जिम्मेदारी है। हमें एकजुट होकर इस समस्या का सामना करना होगा और आतंकवाद के खिलाफ अपनी आवाज उठानी होगी।
इस तरह की घटनाओं से हमें जागरूक रहना चाहिए और अपने आसपास की गतिविधियों पर ध्यान देना चाहिए।
आखिर में, यह कहानी उन सभी लोगों को समर्पित है, जिन्होंने इस आतंकवादी हमले में अपनी जान गंवाई। उनकी याद में हमें हमेशा सजग रहना होगा और इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए प्रयासरत रहना होगा।
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