DSP साहब जिस ट्रेन से जा रहे थे… उनकी मरी हुई पत्नी उसी ट्रेन में चने बेच रही थी… फिर जो हुआ…
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वह औरत जो मरी नहीं थी
रात के ठीक दस बजे थे।
दिल्ली की ओर भागती ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार में थी। खिड़की के बाहर अंधेरा ऐसे फैल रहा था जैसे पूरी दुनिया किसी अनकहे रहस्य को छुपा रही हो। कभी कोई छोटा-सा स्टेशन, कभी दूर चमकती बत्तियाँ और फिर गहरा सन्नाटा।
डीएसपी अभय प्रताप सिंह अपनी सीट पर चुपचाप बैठे थे। कंधों पर वर्दी का भार नहीं था, फिर भी उनका मन भारी था। उन्होंने घड़ी पर नजर डाली और अनायास ही आंखें बंद कर लीं। लेकिन आंखें बंद करते ही यादों का दरवाजा खुल गया।
संजना।
एक साल हो गया था।
एक लंबा, दर्दनाक साल।
उस हादसे की तस्वीरें आज भी उनकी आंखों में जमी हुई थीं—टूटी हुई कार, खून से सना स्ट्रेचर, अस्पताल की सफेद दीवारें और डॉक्टर की वह आवाज़,
“सॉरी… हम नहीं बचा पाए।”
अभय ने खुद अपने हाथों से संजना की चिता को अग्नि दी थी। खुद उसकी अस्थियां गंगा में प्रवाहित की थीं। फिर भी दिल का एक कोना आज तक मानने को तैयार नहीं था कि वह सच में चली गई है।

ट्रेन के डिब्बे में हल्की हलचल थी। कोई सो रहा था, कोई मोबाइल में डूबा था, तो कोई खिड़की से बाहर अंधेरे को ताक रहा था। अभय ने गहरी सांस ली और सिर सीट से टिका दिया।
तभी—
“चने ले लो… गरम-गरम चने…”
अभय का दिल जैसे रुक गया।
यह आवाज़…
यह लहजा…
उनकी आंखें खुल गईं।
“नहीं… यह नहीं हो सकता,” उन्होंने खुद से कहा।
लेकिन आवाज़ फिर आई—
“चने ले लो बाबूजी… ताजे चने…”
अभय की उंगलियां कांपने लगीं। यह सिर्फ आवाज़ नहीं थी। यह वही अपनापन था, वही नरमी, वही ठहराव—जो वह सालों तक हर सुबह सुनते आए थे।
उन्होंने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।
और फिर—
समय थम गया।
डिब्बे के बीचों-बीच, हल्की पीली रोशनी के नीचे, एक औरत चनों की टोकरी लिए खड़ी थी। वही चेहरा। वही बड़ी आंखें। वही हल्की-सी मुस्कान।
संजना।
अभय की सांस अटक गई।
उनका दिल बेतहाशा धड़कने लगा।
“यह… यह कैसे हो सकता है?”
उन्होंने खुद को सीट से उठाने की कोशिश की, लेकिन पैर जैसे जमीन में गड़ गए हों।
भीड़ के बीच वह औरत आगे बढ़ती जा रही थी। कोई उससे चने खरीद रहा था, कोई पैसे दे रहा था। वह बिल्कुल सामान्य थी—जैसे यह दुनिया उसके लिए कभी रुकी ही न हो।
अभय के भीतर तूफान मच चुका था।
“संजना…”
यह शब्द उनके होंठों से फिसल गया।
औरत ठिठकी।
वह धीरे-धीरे मुड़ी।
उसकी नजरें अभय से मिलीं।
कुछ सेकंड—
बस कुछ सेकंड।
उसकी आंखों में हैरानी थी, डर था…
लेकिन पहचान नहीं थी।
वह नजरें झुकाकर आगे बढ़ गई।
अभय जैसे किसी गहरे कुएं में गिरते चले गए।
अगर यह संजना थी—तो वह उन्हें पहचान क्यों नहीं रही थी?
और अगर यह संजना नहीं थी—तो इतनी हूबहू कैसे?
अचानक ट्रेन झटके से रुकी। अभय संतुलन खो बैठे। जब तक संभलते, वह औरत भीड़ में गायब हो चुकी थी।
“संजना!”
इस बार उन्होंने जोर से पुकारा।
लेकिन कोई जवाब नहीं।
एक बूढ़े यात्री ने कहा,
“साहब, शायद वह पिछले स्टेशन पर उतर गई।”
पिछला स्टेशन…
अभय का दिमाग तेजी से चलने लगा।
यह अब सिर्फ भावना नहीं थी।
यह एक रहस्य था।
सच की तलाश
अभय ने गार्ड से पूछा—
“पिछला स्टेशन कौन-सा था?”
“शिवपुरी जंक्शन, साहब।”
नाम सुनते ही अभय ने फैसला कर लिया।
वह इस रहस्य को यूँ ही नहीं छोड़ेंगे।
उन्होंने स्टेशन मास्टर को कॉल किया, अपनी पहचान बताई और CCTV फुटेज देखने की बात कही। अगली ट्रेन से वह शिवपुरी जंक्शन पहुंचे।
स्क्रीन पर वही औरत दिखी।
तेजी से प्लेटफॉर्म पार करती हुई।
लेकिन फिर एक आदमी आया।
उसने चारों ओर देखा और औरत को एक संकरी गली की ओर ले गया।
अभय की आंखें सख्त हो गईं।
“मैं खुद जाऊंगा,”
उन्होंने कहा।
अंधेरी बस्ती
स्टेशन के पीछे की बस्ती अंधेरे में डूबी थी। टूटी-फूटी झोपड़ियां, सन्नाटा और कहीं-कहीं हल्की रोशनी।
एक दरवाजा।
अभय ने दस्तक दी।
“कौन है?”
अंदर से आवाज आई।
“पुलिस। दरवाजा खोलो।”
दरवाजा खुला।
और—
सामने वही चेहरा।
इस बार डर से भरा हुआ।
“संजना…”
अभय की आवाज टूट गई।
“आप कौन हैं?”
औरत ने कहा।
अभय को लगा जैसे किसी ने उनके सीने में छुरा घोंप दिया हो।
तभी—
अंदर से बच्चे के रोने की आवाज आई।
तीन साल का बच्चा।
और उसकी शक्ल…
अभय से मिलती-जुलती।
कमरे के कोने में पड़े पुराने ट्रंक से उनकी शादी की तस्वीर मिली।
अब झूठ की कोई गुंजाइश नहीं थी।
वह सच, जिसने सब बदल दिया
संजना रो पड़ी।
“जिस दिन मेरा एक्सीडेंट हुआ था… मैं मरी नहीं थी,”
उसने कांपती आवाज में कहा।
अभय सन्न रह गए।
“तुम्हारे भाई विक्रम ने मुझे मरवाने की कोशिश की। उसे डर था कि यह बच्चा तुम्हारा वारिस बनेगा।”
ब्रेक फेल करवाए गए थे।
अस्पताल से उसे उठा लिया गया था।
किसी और की लाश जलाई गई थी।
संजना जिंदा थी—
लेकिन दुनिया के लिए मर चुकी थी।
अंतिम लड़ाई
अचानक बाहर कदमों की आहट।
विक्रम के आदमी।
फायरिंग शुरू हुई।
भागते हुए रेलवे ट्रैक तक पहुंचे।
और फिर—
विक्रम खुद सामने था।
गोली चली।
संजना अभय के सामने आ गई।
“हमारा बच्चा…”
उसके होंठ हिले।
और फिर—
सब खत्म।
अंत नहीं, एक वादा
पुलिस आई।
विक्रम मारा गया।
लेकिन अभय की दुनिया फिर उजड़ चुकी थी।
उन्होंने बच्चे को सीने से लगाया।
“अब मैं तुम्हारा पिता भी हूं… और मां भी।”
अंधेरे के उस रास्ते से निकलते हुए,
अभय ने तय कर लिया—
सच कितना भी दर्दनाक हो,
लेकिन इंसानियत कभी मरनी नहीं चाहिए।
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