Ludhiana में 15 साल के का*तिल ने इंसान का मास खाने के लिए Unnao के दीपू का कर दिया था कत्ल

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इंसानियत का कातिल

पंजाब के लुधियाना शहर में एक ठंडी सुबह थी। लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे, बच्चों की किलकारियाँ गलियों में गूँज रही थीं। इसी शहर के डूगरी इलाके की शेख कॉलोनी में उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले से आए दिलीप कुमार अपने परिवार के साथ रहते थे। दिलीप एक मजदूर था, उसकी पत्नी संगीता घरों में काम करती थी। परिवार में चार बच्चे थे—दीपक (15 वर्ष), दीपू (8 वर्ष), राहुल (3 वर्ष), और काजल (1 वर्ष)।

दीपक सबसे बड़ा था। उस पर जिम्मेदारियों का बोझ था, इसलिए वह पास की दुकान पर काम करता था। दीपू, जो आठ साल का था, घर पर छोटे भाई-बहन की देखभाल करता था। दिलीप और संगीता दोनों सुबह काम पर निकल जाते, दीपक भी दुकान पर चला जाता, और घर का जिम्मा दीपू के कंधों पर आ जाता।

17 जनवरी 2017 की दोपहर थी। संगीता काम से लौटी तो देखा कि काजल जोर-जोर से रो रही थी, राहुल उसे चुप कराने की कोशिश कर रहा था, मगर दीपू घर में नहीं था। संगीता ने सोचा शायद वह बाहर खेलने गया है। उसने आस-पड़ोस में दीपू को ढूँढा, मगर वह कहीं नहीं मिला। शाम होते-होते दिलीप और दीपक भी घर लौट आए। तीनों ने मिलकर दीपू को ढूँढा, मगर उसका कोई पता नहीं चला। आखिरकार वे पुलिस स्टेशन गए और गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई।

शाम को पुलिस को सूचना मिली कि पास के खाली प्लॉट में दो बोरी मिली हैं, जिनमें एक बच्चे के छह टुकड़े थे। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया कि शरीर के कुछ हिस्से गायब थे—दिल भी नहीं मिला था। परिवार वालों ने चेहरा देखकर पहचान लिया कि वह दीपू ही था। पुलिस के लिए यह मामला रहस्यमय था—क्या यह तंत्र-मंत्र था, या कोई दुश्मनी?

पुलिस ने जांच शुरू की। कॉलोनी के सीसीटीवी कैमरे खंगाले गए। एक फुटेज में दीपू अपने पड़ोसी वीकू के साथ जाते दिखा। वीकू, 15 साल का लड़का, दीपक का हमउम्र था। पुलिस ने वीकू को हिरासत में लिया। पूछताछ शुरू हुई। शुरू में वीकू सामान्य रहा, लेकिन जब पुलिस ने सख्ती दिखाई, तो उसने जो बताया, उससे पुलिस के पैरों तले जमीन खिसक गई।

वीकू ने बताया: “मैं अक्सर मीट की दुकान पर जाता था, वहाँ कच्चा मीट उठाकर खा लेता था। मुझे स्वाद की तलब थी। एक दिन मन में आया कि इंसान का मीट कैसा होता है? दीपू को मैंने पतंग की डोर का लालच देकर अपने घर बुलाया। घर में कोई नहीं था। मैंने उसका गला दबा दिया, फिर उसके शरीर के छह टुकड़े कर दिए। जांघ का हिस्सा काटकर खा लिया, खून भी पी लिया। दिल निकालकर स्कूल में फेंक आया ताकि स्कूल बंद हो जाए। बाकी टुकड़ों को बोरी में भरकर खाली प्लॉट में फेंक दिया।”

पुलिस ने स्कूल में जाकर दिल ढूँढा, वह मिल गया। वीकू ने बताया कि उसने यह सब क्राइम शो देखकर सीखा। उसकी मानसिक स्थिति विचित्र थी—वह अपराध को खेल समझता था। पुलिस ने उसे बाल सुधार गृह भेज दिया, क्योंकि उसकी उम्र 15 साल थी। कानून के अनुसार, उसे अधिकतम तीन साल की सजा हो सकती थी।

इस घटना ने लुधियाना ही नहीं, पूरे देश को हिला दिया। मीडिया में खबरें आईं, लोग हैरान थे कि 15 साल का लड़का इतना खतरनाक कैसे हो सकता है। दिलीप और संगीता का संसार उजड़ गया। दीपू की मौत ने परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया। वे चाहते थे कि वीकू को उम्रकैद या फाँसी मिले, मगर कानून ने उसे नाबालिग मानकर बाल सुधार गृह भेज दिया।

वीकू के परिवार की स्थिति भी खराब थी। गरीबी, शिक्षा की कमी, और माता-पिता की अनुपस्थिति ने उसकी मानसिकता को विकृत कर दिया था। वीकू स्कूल जाता तो था, मगर पढ़ाई में मन नहीं लगता था। अक्सर स्कूल से बंक मारता, गलियों में घूमता रहता। क्राइम शो देखना उसका शौक था, जिससे उसने अपराध की बारीकियाँ सीख लीं।

दीपू की मौत के बाद कॉलोनी में मातम छा गया। बच्चे डरने लगे, माता-पिता सतर्क हो गए। अब कोई बच्चा अकेले नहीं खेलता था। दिलीप और संगीता ने अपने बाकी बच्चों को घर से बाहर जाने से रोक दिया। उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य ही खो दिया था।

वीकू बाल सुधार गृह में था। वहाँ उसकी काउंसलिंग शुरू हुई। मनोवैज्ञानिकों ने पाया कि उसमें अपराध की प्रवृत्ति गहरी थी, मगर उसका कारण गरीबी, उपेक्षा और गलत संगत थी। समाज ने भी सवाल उठाए—क्या हमारे आसपास की परिस्थितियाँ बच्चों को अपराधी बना रही हैं? क्या टीवी और इंटरनेट पर दिखाए जाने वाले क्राइम शो बच्चों के मन पर असर डाल रहे हैं?

इस घटना ने कई सवाल खड़े किए। कानून, समाज, शिक्षा व्यवस्था—सबके सामने चुनौती थी कि ऐसे बच्चों को कैसे संभाला जाए? क्या सजा ही समाधान है, या सुधार जरूरी है? क्या परिवार की जिम्मेदारी है कि बच्चों को सही दिशा दें, या स्कूल और समाज भी जिम्मेदार हैं?

समय बीतता गया। दीपू की मौत की खबर धीरे-धीरे धुंधली पड़ गई, मगर उसके परिवार की पीड़ा कभी कम नहीं हुई। दिलीप कुमार रोज अपने बेटे की तस्वीर देखकर रोता था। संगीता अपने बेटे की याद में टूट गई थी। कॉलोनी के लोग अब बच्चों पर ज्यादा ध्यान देने लगे थे। वे उन्हें अकेले बाहर नहीं जाने देते, टीवी पर क्राइम शो देखने से रोकते।

वीकू तीन साल बाद बाल सुधार गृह से बाहर आया। उसकी मानसिक स्थिति में कुछ सुधार हुआ था, मगर समाज ने उसे कभी स्वीकार नहीं किया। वह हमेशा अपराधी की नजर से देखा गया। उसकी जिंदगी में अंधेरा ही रह गया।

यह कहानी हमें सिखाती है कि बच्चों की परवरिश में लापरवाही, गरीबी, गलत संगत, और मनोरंजन के गलत साधन कितने खतरनाक हो सकते हैं। बच्चों को सही दिशा देना, उनकी भावनाओं को समझना, और उनके मनोविज्ञान पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। वरना एक छोटी सी गलती, एक गलत आदत, एक गलत सोच इंसानियत का कातिल बना सकती है।

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