Meerut Kapsad Ruby News: मेरठ से किडनैप युवती रूबी बरामद, पुलिस ने आरोपी पारस को किया गिरफ्तार

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कपसाड़ की सच्चाई: न्याय की तलाश में

जनवरी की सर्द रात थी। मेरठ के कपसाड़ गाँव में आम दिनों की तरह लोग अपने-अपने घरों में थे, लेकिन उस रात गाँव के एक गरीब दलित परिवार के लिए सब कुछ बदल गया। सुनीता देवी, उनकी बेटी रूबी और बेटा नरसी कुमार रोज की तरह खेतों की ओर जा रहे थे। गन्ने के खेत में काम करना उनका रोज का काम था। सुनीता देवी मेहनती थीं, अपनी बेटी रूबी के बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष कर रही थीं।

रूबी पढ़ाई में अच्छी थी, उसका सपना था कि वह एक दिन टीचर बने। लेकिन गरीबी और जातिवाद की दीवारें उसके सपनों को बार-बार रोकती थीं। उस दिन जब वे खेतों की ओर बढ़ रहे थे, अचानक एक सफेद कार तेज़ रफ्तार से उनके पास आकर रुकी। कार से गाँव के दबंग युवक पारस सोम और उसके साथी सुनील राजपूत उतरे। दोनों ने रूबी को पकड़ने की कोशिश की। सुनीता देवी ने विरोध किया, चिल्लाई, मदद के लिए पुकारा, लेकिन खेतों में काम करने वाले लोग दूर थे।

पारस सोम ने एक हाथ में फरसा उठा लिया और सुनीता देवी पर वार कर दिया। सुनीता देवी वहीं गिर पड़ीं, खून बहने लगा। रूबी को जबरन कार में बैठाकर वे वहाँ से भाग गए। नरसी कुमार, सुनीता का बेटा, माँ को अस्पताल ले गया। लेकिन सुनीता देवी की हालत गंभीर थी। डॉक्टरों ने बहुत कोशिश की, लेकिन शाम होते-होते सुनीता देवी ने दम तोड़ दिया। गाँव में मातम छा गया। परिवार टूट गया।

रूबी के अपहरण और माँ की हत्या की खबर पूरे जिले में फैल गई। सोशल मीडिया, टीवी, अखबार—हर जगह चर्चा होने लगी। दलित समाज में गुस्सा था। लोग इकट्ठा होकर प्रदर्शन करने लगे। पुलिस पर दबाव बढ़ गया। एसपी देहात अभिजीत सिंह खुद मौके पर पहुँचे। उन्होंने परिवार को भरोसा दिलाया कि पुलिस पूरी कोशिश करेगी।

परिवार ने साफ कहा—जब तक बेटी वापस नहीं आएगी, माँ का अंतिम संस्कार नहीं करेंगे। प्रशासन पर दबाव बढ़ता गया। गाँव में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया। चारों तरफ बैरिकेडिंग हो गई। नेता, विधायक, सांसद सब गाँव पहुँचने लगे। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती, अखिलेश यादव, चंद्रशेखर आज़ाद ने ट्वीट करके निष्पक्ष कार्रवाई की माँग की।

पुलिस ने आरोपियों की तलाश शुरू की। पारस सोम और उसके साथियों के घर ताले लगे थे। पुलिस ने उनकी दादी-दादा को पूछताछ के लिए थाने बुलाया। कई टीमें दिल्ली, गुरुग्राम, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, हरिद्वार तक भेजी गईं। मोबाइल सर्विलांस पर लगा दिया गया। हर कॉल, हर लोकेशन ट्रैक की जा रही थी।

इसी बीच पारस सोम ने ट्रेन से हरिद्वार जाने के दौरान एक अजनबी से फोन माँगा और मेरठ के डॉक्टर झोलाछाप राजेंद्र कुमार को कॉल किया। पुलिस ने फोन ट्रैक कर लिया। रुड़की स्टेशन पर ट्रेन को चारों तरफ से घेर लिया गया। आखिरकार पुलिस ने पारस सोम और रूबी दोनों को बरामद कर लिया। रूबी को आशा ज्योति केंद्र में रखा गया, पारस सोम से घंटों पूछताछ हुई।

मीडिया में खबरें आईं कि दोनों तीन साल से प्रेम संबंध में थे। परिवार को ऐतराज था। माँ सुनीता देवी को यह रिश्ता मंजूर नहीं था। इसी वजह से पारस सोम ने रूबी को जबरन ले जाने की योजना बनाई और विरोध करने पर माँ पर वार कर दिया। कोर्ट में दोनों के बयान गोपनीय तरीके से लिए गए। मजिस्ट्रेट के सामने बंद लिफाफे में बयान दर्ज हुए। मीडिया और जनता कयास लगा रही थी कि रूबी ने क्या बयान दिया।

गाँव में तनाव था। पुलिस-प्रशासन पर दबाव था। परिवार को सरकार और नेताओं ने आर्थिक सहायता दी। लेकिन दर्द और डर कम नहीं हुआ था। सुनीता देवी का अंतिम संस्कार हुआ, लेकिन गाँव में सन्नाटा था। लोग चाहते थे कि दोषियों को सख्त सजा मिले।

कोर्ट में मामला पहुँचा। पारस सोम ने रोते हुए कहा, “हमारा प्यार सच्चा है। मैंने कोई अपराध नहीं किया। लड़की अपनी मर्जी से मेरे साथ आई थी।” लेकिन कानून में अपहरण और हत्या गंभीर अपराध हैं। पुलिस ने उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। सुनील राजपूत और अन्य साथी भी आरोपी बनाए गए।

जाँच आगे बढ़ी। मजिस्ट्रेट ने बयान पढ़े। रूबी ने कहा, “मुझे जबरन ले जाया गया। माँ ने विरोध किया तो उन पर वार किया गया। मैं बहुत डर गई थी।” कोर्ट ने पारस सोम, सुनील और अन्य आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया। मामले की सुनवाई शुरू हुई।

गाँव में धीरे-धीरे माहौल सामान्य होने लगा। लेकिन रूबी और नरसी कुमार की ज़िन्दगी बदल गई थी। समाज में अभी भी डर था कि दबंगों के खिलाफ बोलना खतरे से खाली नहीं। लेकिन इस घटना ने पूरे जिले को झकझोर दिया। कई सामाजिक संगठन आगे आए। उन्होंने दलित परिवारों की सुरक्षा, बेटियों की शिक्षा और न्याय के लिए आवाज उठाई।

कुछ महीनों बाद, कोर्ट ने फैसला सुनाया। दोषियों को सख्त सजा मिली। प्रशासन ने रूबी और उसके भाई को सरकारी सहायता दी। रूबी ने पढ़ाई जारी रखी। उसने टीचर बनने का सपना फिर से देखना शुरू किया। नरसी कुमार ने पुलिस भर्ती की तैयारी शुरू की। दोनों ने ठान लिया कि वे अपने गाँव में बदलाव लाएँगे।

इस घटना ने समाज को एक संदेश दिया—अगर अन्याय के खिलाफ सब मिलकर आवाज उठाएँ, तो न्याय जरूर मिलता है। रूबी की हिम्मत और सुनीता देवी का संघर्ष हमेशा याद रखा जाएगा।