दोस्तों के साथ ||हरिद्वार गया लेकिन चाय वाली को दिखा तो उसी के साथ रहने लगा

रिश्तों की वापसी: नया साल, नई शुरुआत

अध्याय 1: फरीदाबाद से सफर का आगाज

दिसंबर का महीना अपनी आखिरी सांसें ले रहा था। दिल्ली और फरीदाबाद की हवाओं में कड़ाके की ठंड थी, लेकिन इस ठंड के बीच भी लोगों के दिलों में नए साल का उत्साह चरम पर था। फरीदाबाद की एक छोटी सी रिहायशी कॉलोनी के एक कमरे में चार दोस्त—आकाश, राहुल, सुमित और संजीव—बैठे चाय पी रहे थे।

आकाश, जो इस ग्रुप का ‘मास्टरमाइंड’ था, उसने चुपके से सबकी पैकिंग कर ली थी। संजीव, जो पिछले तीन सालों से इनके साथ काम कर रहा था, हमेशा घुमक्कड़ स्वभाव से दूर रहता था। जब भी घूमने की बात आती, संजीव का चेहरा उतर जाता और वह कोई न कोई बहाना बना देता।

“संजीव भाई, चलो आज मार्केट तक चलते हैं, कुछ सामान लेना है,” राहुल ने संजीव को झांसा देते हुए कहा। संजीव बिना किसी शक के उनके साथ चल दिया। उसे क्या पता था कि उसके दोस्त उसे सीधे बस स्टैंड ले जा रहे हैं और उसके सामान की बैग पहले ही कार की डिग्गी में रखे जा चुके हैं।

जैसे ही वे लोग बस स्टैंड पहुंचे और हरिद्वार जाने वाली बस में चढ़े, संजीव ठिठक गया। “अरे! ये क्या हो रहा है? हम हरिद्वार की बस में क्यों हैं?” संजीव ने घबराते हुए पूछा। सुमित ने हंसते हुए कहा, “भाई, इस बार कोई बहाना नहीं चलेगा। हम नया साल गंगा मैया की गोद में मनाएंगे। तेरा सामान भी हमारे पास है और तेरी छुट्टियां भी हमने मैनेजर से कह कर मंजूर करवा ली हैं।”

संजीव के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। वह बार-बार बस से उतरने की कोशिश करने लगा। “नहीं यार, मुझे नहीं जाना। तुम लोग जाओ, मैं वापस जा रहा हूँ।” उसके दोस्तों ने देखा कि संजीव की आंखों में अजीब सा डर और बेचैनी थी। तब आकाश ने उसे कसम दी, “देख संजीव, तीन साल से हम साथ काम कर रहे हैं। तूने हमेशा हमें अपना परिवार कहा है। क्या आज परिवार की खुशी के लिए तू इतना भी नहीं कर सकता?”

संजीव निढाल होकर सीट पर बैठ गया। उसके मन के भीतर एक तूफान उठ रहा था। उसके दोस्तों के लिए वह बिजनौर का रहने वाला एक साधारण युवक था, लेकिन हकीकत की परतें कुछ और ही थीं।

अध्याय 2: बेचैनी का सफर

फरीदाबाद से हरिद्वार का रास्ता लंबा था। जैसे-जैसे बस मेरठ और मुजफ्फरनगर पार कर रही थी, संजीव की खामोशी और गहरी होती जा रही थी। खिड़की के बाहर अंधेरे को देखते हुए वह अपने अतीत की गलियों में खो गया था।

तीन साल पहले तक संजीव का भी एक भरा-पूरा संसार था। हरिद्वार के पास एक छोटे से गांव में उसका अपना घर था, उसकी पत्नी सुनीता थी और दो प्यारे बच्चे थे। वह अनाथ था, इसलिए सुनीता का परिवार ही उसका सब कुछ था। लेकिन सुनीता की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं और उसके जीजा के हस्तक्षेप ने उनके बीच दरार पैदा कर दी थी।

“क्या सोच रहा है भाई?” राहुल ने संजीव का कंधा थपथपाया। “कुछ नहीं यार, बस ऐसे ही… पहली बार इतनी दूर निकल आया हूँ न, तो अजीब लग रहा है,” संजीव ने झूठ बोला।

रात के करीब 11:30 बजे बस हरिद्वार पहुंची। शहर रोशनी से जगमगा रहा था। हर की पौड़ी पर श्रद्धालुओं की भीड़ थी। चारों तरफ ‘हर हर गंगे’ के जयकारे गूंज रहे थे। दोस्तों ने एक मध्यम दर्जे का होटल लिया और सामान रखा।

रात के 12 बजे जैसे ही घड़ी की सुइयां मिलीं, आसमान पटाखों की रोशनी से भर गया। “हैप्पी न्यू ईयर!” उसके दोस्त चिल्ला रहे थे, एक-दूसरे को गले लगा रहे थे। संजीव भी मुस्कुरा रहा था, लेकिन उसकी मुस्कुराहट उसके होंठों से आगे नहीं बढ़ पा रही थी। वह मन ही मन प्रार्थना कर रहा था कि काश उसने तीन साल पहले वह फैसला न लिया होता।

अध्याय 3: चाय की दुकान पर वो चेहरा

अगली सुबह, 1 जनवरी की सूरज की पहली किरण के साथ ही हरिद्वार जाग उठा। संजीव ने होटल के कमरे से बाहर निकलने से साफ मना कर दिया। “तुम लोग घूम आओ, मेरा सिर भारी है।” लेकिन दोस्त कहां मानने वाले थे। जबरदस्ती उसे तैयार किया गया और वे बाहर निकल आए।

होटल से थोड़ी दूर, सड़क किनारे एक छोटी सी अस्थाई चाय की दुकान थी। वहां धुंआ उठ रहा था और ताजी चाय की खुशबू हवा में तैर रही थी। “चलो, पहले कड़क चाय पीते हैं, फिर आगे बढ़ेंगे,” आकाश ने कहा।

जैसे ही वे दुकान पर पहुंचे, संजीव की नजर वहां चाय बना रही महिला पर पड़ी। उसका शरीर पत्थर जैसा जड़ हो गया। मैली सी साड़ी, चेहरे पर थकावट की लकीरें, लेकिन वही आंखें, वही चेहरा—वह सुनीता थी!

सुनीता अपने काम में व्यस्त थी। उसने बड़े पतीले में दूध और पत्ती डाली थी। तभी राहुल चिल्लाया, “ओ बहन जी, चार चाय देना जरा!” आवाज सुनकर सुनीता ने गर्दन उठाई। जैसे ही उसकी नजर संजीव पर पड़ी, उसके हाथ का पीतल का बर्तन ‘धड़ाम’ से नीचे गिर गया। गरम दूध उसके पैरों पर गिरा, लेकिन उसे दर्द का एहसास भी नहीं हुआ। उसकी आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।

संजीव के दोस्त यह नजारा देखकर हैरान थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या हुआ। “संजीव भाई… तू ठीक है? ये क्या हो रहा है?” सुमित ने पूछा। लेकिन संजीव के पास कोई जवाब नहीं था। वह बस सुनीता को देख रहा था। संजीव के दोस्तों ने भांप लिया कि यह कोई गहरा रिश्ता है। वे बिना कुछ कहे कुछ कदम पीछे हट गए ताकि दोनों को बात करने का मौका मिल सके।

अध्याय 4: अतीत की कड़वी हकीकत

संजीव धीरे से सुनीता के पास गया। “सुनीता… ये सब क्या है? तुम यहाँ… इस हाल में?” सुनीता कुछ बोल नहीं पा रही थी। वह बस संजीव के पैरों में गिर गई और फूट-फूट कर रोने लगी। “मुझे माफ कर दीजिए… मैंने बहुत बड़ी गलती की। आप सही थे, दुनिया बहुत जालिम है।”

संजीव ने उसे सहारा देकर उठाया और पास पड़ी एक बेंच पर बिठाया। वहां शुरू हुई सुनीता की वो कहानी, जो संजीव को छोड़कर जाने के बाद शुरू हुई थी।

सुनीता ने सिसकते हुए बताया, “जब आप घर छोड़कर गए, तो मुझे लगा कि मैं अपनी दीदी और जीजा जी के सहारे ऐश करूंगी। जीजा जी मुझे बार-बार भड़काते थे कि संजीव कम कमाता है, तुम जैसी सुंदर औरत को तो महलों में होना चाहिए। लेकिन आपके जाने के कुछ ही दिनों बाद जीजा जी का असली चेहरा सामने आ गया।”

सुनीता ने आगे बताया कि कैसे उसके जीजा ने उसकी मदद के बदले उससे गलत मांगें रखनी शुरू कर दी थीं। जब सुनीता ने विरोध किया और अपनी बहन को सब बताया, तो घर में कोहराम मच गया। उसकी बहन ने उसे सहारा तो दिया, लेकिन जीजा ने आर्थिक मदद पूरी तरह बंद कर दी।

“मेरे पास दो छोटे बच्चे थे संजीव। कोई सहारा नहीं था। गांव के लोग अकेली औरत को देखकर गिद्धों की तरह मंडराने लगे थे। रातों को डर के मारे सो नहीं पाती थी। तब मुझे एहसास हुआ कि वो कम कमाई वाला पति ही था, जो मेरे सम्मान की ढाल बनकर खड़ा रहता था। मैंने मेहनत करने की ठानी। दो गायें पाल लीं और ये चाय की दुकान खोल ली। पिछले तीन साल से हर रोज गंगा मैया से यही मांगती थी कि आप एक बार मिल जाओ।”

अध्याय 5: प्रायश्चित और मिलन

संजीव की आंखों में भी आंसू थे। उसका गुस्सा पिघल चुका था। वह समझ गया था कि सुनीता को उसकी सजा मिल चुकी थी। “तुम्हें पता है सुनीता, मैं फरीदाबाद में एक अजनबी की तरह रह रहा था। मैंने खुद को मरा हुआ समझ लिया था। लेकिन आज ये दोस्त मुझे खींचकर यहाँ ले आए। शायद भगवान को यही मंजूर था।”

तभी संजीव ने अपने दोस्तों को बुलाया। “दोस्तों, ये मेरी पत्नी सुनीता है। मैं बिजनौर का नहीं, यहीं का रहने वाला हूँ। घमंड और लालच की वजह से हमारा घर टूट गया था, लेकिन आज फिर से जुड़ गया।”

उसके दोस्त संजीव की कहानी सुनकर भावुक हो गए। उन्होंने संजीव को गले लगा लिया। “भाई, तूने हमें सच नहीं बताया, इसका दुख है, पर इस बात की खुशी ज्यादा है कि तुझे तेरा परिवार मिल गया।”

संजीव होटल गया, अपना सारा सामान लाया और सीधे अपने गांव वाले पुराने घर पहुंचा। बच्चे, जो अब थोड़े बड़े हो गए थे, अपने पिता को देखकर पहचान नहीं पाए, लेकिन जब संजीव ने उन्हें सीने से लगाया, तो प्रकृति भी जैसे मुस्कुरा उठी।

उपसंहार: जीवन की सीख

नया साल संजीव के जीवन में एक ऐसा उजाला लेकर आया था, जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। 2 जनवरी को जब उसके दोस्त वापस फरीदाबाद के लिए रवाना हुए, तो संजीव उनके साथ नहीं गया। उसने फरीदाबाद की नौकरी छोड़ने और अपने परिवार के साथ रहकर अपनी पुश्तैनी जमीन पर मेहनत करने का फैसला किया।

सुनीता अब पहले वाली सुनीता नहीं थी। उसका घमंड चूर-चूर हो चुका था और उसकी जगह अब अपार प्रेम और सम्मान ने ले ली थी।

सीख: यह कहानी हमें सिखाती है कि गृह-क्लेश और तुलनात्मक जीवन (दूसरों से तुलना करना) हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ सकता है। पैसा कमाना जरूरी है, लेकिन शांति और चरित्र उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। रिश्तों में कभी-कभी ‘ईगो’ (अहंकार) को पीछे छोड़कर माफी मांग लेना ही सबसे बड़ा साहस होता है। नया साल केवल तारीख बदलना नहीं, बल्कि खुद को बदलने का भी एक मौका है।