UPSC का एग्जाम देने जा रहा था गरीब लड़का… ट्रेन में टीटी लड़की ने जो किया… इंसानियत भी रो पड़ी
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जिंदगी की रेलगाड़ी कभी-कभी ऐसे स्टेशनों पर रुकती है, जहाँ से मंजिल का रास्ता बिल्कुल धुंधला नजर आता है। लेकिन अगर उस वक्त कोई फरिश्ता बनकर हाथ थाम ले, तो पटरी से उतरी जिंदगी फिर से दौड़ने लगती है। यह कहानी बिहार के एक छोटे से गांव से दिल्ली के सत्ता के गलियारों तक पहुंचने वाले अभय और उसकी किस्मत बदलने वाली रिया की है।
भाग 1: गरीबी की दहलीज और मां का आशीर्वाद
बिहार के छपरा जिले का एक छोटा सा गांव, सोनाडीह। वहां की मिट्टी में संघर्ष की खुशबू और अभावों की धूल थी। अभय कुमार, जिसके घर की छत से बरसात में पानी टपकता था, आज अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा देने जा रहा था। घर में खामोशी थी। उसकी मां, कमला देवी, चूल्हे पर आखिरी दो रोटियां सेक रही थीं। उनके पास सब्जी बनाने के पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने रोटियों के साथ थोड़ा सा नमक और अचार का टुकड़ा रख दिया।
अभय का बैग पुराना था, उसकी चेन टूटी हुई थी जिसे उसने धागे से बांधा था। उस बैग में सिर्फ किताबें नहीं, बल्कि उसके बूढ़े पिता शिवलाल की उम्मीदें और मां की ममता की पोटली थी। शिवलाल को दमे की बीमारी थी, उनकी खांसी पूरे घर में गूंजती रहती थी, लेकिन आज वह अपनी खांसी दबा रहे थे ताकि बेटा परेशान न हो।
“बेटा, अफसर बनकर ही लौटना,” कमला देवी ने अपनी साड़ी के पल्लू में बंधी एक गांठ खोली और मुड़े-तड़े कुछ नोट अभय के हाथ में रख दिए। अभय जानता था कि मां ने अपनी आखिरी कान की बाली गिरवी रख दी है। उसकी आंखें भर आईं, पर वह रोया नहीं। अगर आज रो देता, तो शायद गांव की पगडंडी पार नहीं कर पाता।
भाग 2: किस्मत का क्रूर खेल और चलती ट्रेन का खौफ
अभय किसी तरह धक्का-मुक्की करके छपरा स्टेशन से दिल्ली जाने वाली ट्रेन के जनरल डिब्बे में चढ़ गया। डिब्बे में पैर रखने की जगह नहीं थी। लोग बोरे पर, फर्श पर और एक-दूसरे के ऊपर चढ़े हुए थे। अभय दरवाजे के पास खड़ा था और अपने बैग को सीने से लगाए हुए था।
अचानक, उसे महसूस हुआ कि उसकी जेब हल्की है। उसने हाथ डाला तो उसके पैर तले जमीन खिसक गई। टिकट और मां के दिए हुए वो चंद पैसे… सब गायब थे! स्टेशन की भीड़ में किसी जेबकतरे ने उसकी पूरी दुनिया लूट ली थी। अभय का दिमाग सुन्न हो गया।

“अब क्या होगा? अगर मैं पकड़ा गया तो? अगर मुझे उतार दिया गया तो?” ये सवाल उसे खाए जा रहे थे। तभी डिब्बे के दूसरे छोर से एक सख्त आवाज आई— “टिकट चेकिंग!”
काले कोट में एक महिला टीटी (TTE), जिसका नाम रिया चौहान था, यात्रियों के टिकट चेक कर रही थी। उसके साथ एक पुलिस वाला भी था। रिया का चेहरा सख्त था, वह किसी भी बहाने को सुनने के मूड में नहीं लग रही थी। जैसे-जैसे वह अभय के करीब आ रही थी, अभय की धड़कनें तेज हो रही थीं।
भाग 3: नियम बनाम इंसानियत
“टिकट!” रिया अभय के सामने खड़ी थी। अभय की आवाज गले में ही फंस गई। “मैडम… वो… मेरा टिकट और पैसे चोरी हो गए।” डिब्बे में बैठे लोग हंसने लगे। “अरे मैडम, ये सब यही नाटक करते हैं। उतारिए इसे अगले स्टेशन पर!”
रिया ने सख्त लहजे में पूछा, “कहाँ जा रहे हो?” “दिल्ली… यूपीएससी (UPSC) का एग्जाम है कल,” अभय ने कांपते हाथों से अपना एडमिट कार्ड दिखाया।
रिया ने एडमिट कार्ड देखा। फोटो वही था, लेकिन लड़के की हालत बहुत खराब थी। फटे जूते, घिसी हुई शर्ट और आंखों में गहरी हताशा। रिया ने उसका बैग देखा, जो खुला हुआ था। उसमें मोटी-मोटी किताबें भरी थीं, जिनके पन्ने जगह-जगह से मुड़े हुए थे। रिया समझ गई कि यह लड़का पढ़ता बहुत है।
तभी रिया की नजर बैग में रखे एक फटे हुए लिफाफे पर पड़ी। उसने उसे उठाया। वह अभय की मां का खत था। “बेटा, हम पढ़े-लिखे नहीं हैं, पर तू हार गया तो हम जीते-जी मर जाएंगे…”
रिया की उंगलियां ठिठक गईं। उसने अपनी सख्त नजरें हटाईं और कुछ सोचा। पुलिस वाले ने कहा, “मैडम, स्टेशन आ गया है, उतार देते हैं इसे।” लेकिन रिया ने कुछ ऐसा किया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। उसने अपना पर्स निकाला और अपने पास से अभय का दिल्ली तक का टिकट बनवा दिया।
“यह लो टिकट। और याद रखना, मुझे धन्यवाद मत दो। बस पास हो जाना,” रिया ने पानी की बोतल उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा।
भाग 4: दिल्ली की अजनबी गलियाँ और फिर से वही फरिश्ता
अभय दिल्ली स्टेशन पर उतरा। वह शहर उसके लिए एक जंगल जैसा था। न पैसे, न रहने का ठिकाना। वह सड़क किनारे बैठ गया। तभी उसे फिर वही आवाज सुनाई दी। “सेंटर कहाँ है तुम्हारा?”
रिया अपनी ड्यूटी खत्म कर घर जा रही थी। उसने देखा कि वह लड़का अभी भी वहीं फँसा है। रिया ने उसे ऑटो कराया और खुद पैसे देकर एक सस्ते लॉज में कमरा दिलवाया। “मैडम, आप इतना क्यों कर रही हैं?” अभय ने रोते हुए पूछा।
रिया की आंखें नम हो गईं। “क्योंकि एक बार मेरे पिता भी बीमार थे और मेरे पास इलाज के पैसे नहीं थे। उस दिन किसी ने मेरी मदद नहीं की थी। मैं नहीं चाहती कि आज कोई अपनी गरीबी की वजह से अपना सपना हार जाए।”
भाग 5: परिणाम और एक नया मोड़
अभय ने पूरी जान लगाकर परीक्षा दी। परीक्षा के बाद वह गांव लौट आया और इंतजार करने लगा। कुछ महीनों बाद डाकिया एक बड़ा लिफाफा लेकर आया। अभय कुमार, ऑल इंडिया रैंक – 45! वह आईएएस (IAS) बन गया था।
पूरा गांव नाच रहा था, लेकिन अभय सीधा स्टेशन पहुंचा। उसे उस टीटी मैडम को ढूंढना था जिसने उसे गिरने नहीं दिया था। कई दिनों के इंतजार के बाद, उसे वही ट्रेन और वही रिया दिखी।
“टिकट दिखाइए!” रिया ने कहा। अभय मुस्कुराया और अपना आईएएस का पहचान पत्र दिखाया। “इस बार टिकट भी है और कामयाबी भी, मैडम।”
रिया की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले। अभय ने उसका हाथ थाम लिया और कहा, “रिया जी, उस दिन आपने मुझे मंजिल तक पहुंचाया था। क्या अब आप पूरी जिंदगी मेरे साथ चलेंगी?”
भाग 6: उपसंहार – इंसानियत की जीत
कुछ समय बाद, सोनाडीह गांव में शहनाइयां बजीं। एक आईएएस अधिकारी अपनी दुल्हन के रूप में एक टीटी को लेकर आया। गांव वाले हैरान थे, पर खुश थे। अभय और रिया की यह कहानी केवल एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि नियम इंसान के लिए बने हैं, इंसान नियमों के लिए नहीं।
सीख: मदद करने के लिए जेब का बड़ा होना जरूरी नहीं है, बल्कि दिल का बड़ा होना जरूरी है। आपकी एक छोटी सी दयालुता किसी की पूरी दुनिया बदल सकती है।
समाप्त
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