क्या हुआ जब एक महिला IPS ऑफिसर प्रिया को एक पुरुष इंस्पेक्टर ने थप्पड़ मारा
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जब एक महिला IPS ऑफिसर प्रिया को एक पुरुष इंस्पेक्टर ने थप्पड़ मारा
प्रस्तावना
लखनऊ जिले में एक नई आईपीएस अधिकारी प्रिया शर्मा की नियुक्ति हुई थी। प्रिया अपने काम को लेकर बेहद ईमानदार और संवेदनशील थी। एक दिन उसे सूचना मिली कि शहर के सब्जी मंडी में पुलिस वाले गरीब ठेलेवालों से मनमानी कर रहे हैं, मुफ्त में सामान ले रहे हैं और विरोध करने पर धमकाते हैं। प्रिया ने तय किया कि वह इस सिस्टम की हकीकत खुद देखेगी।
सीक्रेट मिशन की शुरुआत
प्रिया ने साधारण कपड़े पहने, साड़ी में खुद को आम महिला की तरह तैयार किया और सब्जी मंडी पहुंच गई। वहां के माहौल को समझने के लिए वह एक बुजुर्ग ठेलेवाले के पास गई और उससे केले खरीदने लगी। उसने देखा कि एक इंस्पेक्टर रोज बिना पैसे दिए केले लेता है और बुजुर्ग को धमकाता है।
“बाबा, उस इंस्पेक्टर ने आपको केलों के पैसे क्यों नहीं दिए?” प्रिया ने पूछा।
बुजुर्ग ने निराश होकर जवाब दिया, “बेटा, इसका तो रोज का यही काम है। जब पैसे मांगता हूं तो धमकी देता है—तेरी इतनी हिम्मत कि मुझसे पैसे मांगेगा? तेरा ठेला नाले में फेंकवा दूंगा। मेरी पत्नी विकलांग है, उसका इलाज चल रहा है। मजबूरी में चुपचाप केले दे देता हूं।”
प्रिया को यह सब देखकर बहुत गुस्सा आया। उसने बुजुर्ग से कहा, “बाबा, अब आपको डरने की जरूरत नहीं है। कल मैं आपके ठेले पर रहूंगी। देखती हूं, वह इंस्पेक्टर कैसे मुफ्त में केले लेता है।”
अगले दिन का सामना
अगले दिन प्रिया ने फिर वही साधारण साड़ी पहनी और ठेले पर खड़ी हो गई। इंस्पेक्टर अजय वर्मा आया। उसने प्रिया को देखा और अश्लील बातें करने लगा, “तू उस बुड्ढे की बेटी है? बहुत प्यारी लग रही है। शादी करेगी मुझसे?”
प्रिया ने शांति से जवाब दिया, “मुझे 1 किलो केले चाहिए।”
इंस्पेक्टर ने केले लिए और बिना पैसे दिए जाने लगा। प्रिया ने रोकते हुए कहा, “केलों के पैसे दीजिए। फ्री में भंडारा नहीं लगा है।”
इंस्पेक्टर गुस्से में बोला, “मैं रोज फ्री में लेता हूं। ज्यादा जुबान मत चलाना।”
प्रिया ने फिर आग्रह किया, “आपको पैसे देने ही होंगे।”
इस पर इंस्पेक्टर ने गुस्से में आकर प्रिया को थप्पड़ मार दिया, “तेरी इतनी औकात कि मुझे आंख दिखाएगी?”
सिस्टम की सच्चाई
प्रिया ने ठान लिया कि अब वह इस भ्रष्ट इंस्पेक्टर के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाएगी। लेकिन वह आईपीएस अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि आम महिला बनकर थाने गई। वहां उसे रिश्वत मांगी गई—”रिपोर्ट दर्ज कराने के 5000 रुपए लगेंगे।”
प्रिया ने विरोध किया, “रिपोर्ट लिखवाने के लिए कोई पैसा नहीं लगता। आप खुलेआम रिश्वत मांग रहे हैं।”
एसएओ साहब ने भी मदद करने की बजाय टालमटोल की। प्रिया ने रिपोर्ट लिखवाई—”इंस्पेक्टर अजय वर्मा रोज बुजुर्ग ठेलेवाले से मुफ्त में केले लेता है, धमकी देता है और जब मैंने विरोध किया तो मुझ पर हाथ उठाया।”
थानेदारों ने रिपोर्ट लेने में आनाकानी की और बोले, “हम पुलिस वाले हैं, हमारे लिए यह सब चलता है।”
प्रिया को यकीन हो गया कि सिस्टम अंदर तक सड़ चुका है।
आईपीएस अधिकारी का असली रूप
अगले दिन प्रिया अपने असली रूप में, पुलिस की वर्दी में थाने पहुंची। पूरे स्टाफ के चेहरे पर हवाइयां उड़ गईं। सब हैरान थे कि कल तक जिसे आम महिला समझ रहे थे, वह जिले की नई आईपीएस अधिकारी है।
“हां, मैं ही थी। मैं हूं लखनऊ जिले की आईपीएस अधिकारी प्रिया शर्मा। अब मुझे सब पता है कि तुम लोग गरीबों को डराते हो, रिश्वत मांगते हो और कानून का मजाक बनाते हो।”
प्रिया ने अपना आईडी दिखाया। सबने माफी मांगी, लेकिन प्रिया ने सख्ती से कहा, “तुम दोनों माफी के लायक नहीं हो। ये गलती नहीं, गुनाह है।”
सख्त कार्रवाई
प्रिया ने तुरंत एएसपी को फोन किया, “मैं आदेश देती हूं कि एसएओ राकेश मेहता और इंस्पेक्टर अजय वर्मा को तुरंत प्रभाव से निलंबित किया जाए। इनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू हो। पूरी रिपोर्ट कल तक मेरी टेबल पर चाहिए।”
एएसपी ने तुरंत कार्रवाई शुरू की। थाने में बदलाव आ गया। अब कोई रिश्वत नहीं मांगता, हर फरियादी को बराबरी से सुना जाता है। बुजुर्ग ठेलेवाले की एफआईआर दर्ज हुई, उसकी पत्नी का इलाज भी शुरू हुआ।
न्याय की जीत
थाने के माहौल में बदलाव दिखने लगा। गरीबों की सुनवाई होने लगी। पुलिस वाले अब सम्मान से पेश आते थे। प्रिया ने साबित कर दिया कि वर्दी से बड़ा कानून है और कानून से बड़ा न्याय।
“याद रखना, वर्दी पहनने से कोई ईश्वर नहीं बन जाता। अगर वर्दी पहनकर गुनाह करोगे तो यही वर्दी तुम्हें सलाखों के पीछे भेज सकती है।”
बुजुर्ग ठेलेवाले ने प्रिया को धन्यवाद दिया, “अब मुझे डरने की कोई जरूरत नहीं। उस महिला आईपीएस ने सब बदल कर रख दिया।”
उपसंहार
यह कहानी सिर्फ एक महिला आईपीएस अधिकारी की नहीं, बल्कि उस जज़्बे की है जो अन्याय के खिलाफ लड़ता है। प्रिया ने दिखा दिया कि अगर एक ईमानदार अधिकारी ठान ले तो पूरा सिस्टम बदल सकता है।
अगर आप अपने जिले में ऐसी तब्दीली चाहते हैं, तो सच का साथ दें। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएं। यही असली बदलाव है।
समाप्त
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