खामोशी, त्याग और गरिमा: प्रकाश कौर – सुपरस्टार धर्मेंद्र की वह नींव जो कभी नहीं हिली 
प्रकाश कौर—बॉलीवुड के लेजेंड एक्टर धर्मेंद्र की पहली पत्नी और सुपरस्टार सनी देओल और बॉबी देओल की माँ। वह एक ऐसी महिला हैं जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी खामोशी, गरिमा और सादगी के साथ बिताई। आज के ज़माने में जब रिश्तों की परेशानियाँ भी मीडिया की चकाचौंध में उछाली जाती हैं, उस दौर में भी प्रकाश कौर ने हर दर्द, हर त्याग और हर ज़िम्मेदारी को अपने अंदर ही समेटे रखा।
एक साधारण शुरुआत: 1954 का संगम
1954 में धर्मेंद्र और प्रकाश कौर की शादी सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं थी, बल्कि दो परिवारों और दो परंपराओं का संगम थी। उस समय धर्मेंद्र बस एक साधारण पंजाबी लड़का थे, जिनकी एकमात्र पहचान उनका मेहनती स्वभाव और उनके सपने थे। कोई नहीं जानता था कि यही लड़का आगे चलकर भारतीय सिनेमा का ‘ही-मैन’ बनेगा।
प्रकाश कौर ने उसी समय उन्हें पूरे दिल से अपनाया। यह शादी एक अरेंज मैरिज थी, जिसमें प्यार धीरे-धीरे पनपा। ना कोई बड़ी फ़िल्मी दुनिया, ना कोई ग्लैमर, बस एक साधारण घर, साधारण जीवन और सरल रिश्ते।
शादी के शुरुआती सालों में प्रकाश कौर ने न सिर्फ पत्नी के रूप में, बल्कि बहू, भाभी और बेटी के रूप में भी हर ज़िम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाई। फिर जब धर्मेंद्र फ़िल्मों में काम पाने के लिए संघर्ष करने लगे, तो प्रकाश कौर ने हमेशा उनके साथ खड़े होकर उन्हें प्रोत्साहित किया, उनका हौसला बढ़ाया।
उन्होंने कभी शिकायत नहीं की कि पति लंबे समय तक घर से बाहर रहते हैं। वह जानती थीं कि धर्मेंद्र के अंदर एक आग है, एक सपने हैं, और उन सपनों को पूरा करने के लिए वह जो कर रहे हैं, वह ज़रूरी है।
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सादगी की पहचान: लाइमलाइट से दूरी
धीरे-धीरे वो संघर्ष सफलता में बदलने लगा, और धर्मेंद्र बॉलीवुड के उभरते सितारों में शामिल हो गए। जिस दौर में हर लड़की उन पर फ़िदा होती थी, उसी दौर में प्रकाश कौर चुपचाप अपने परिवार को सँभालने में लगी रहीं।
अगर वह चाहतीं तो इस शोहरत का हिस्सा बन सकती थीं। चाहतीं तो मीडिया में आकर अपना पक्ष रख सकती थीं, लेकिन उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया। उन्होंने जो भी किया, घर की चारदीवारी में रहकर किया—सिर्फ़ अपने परिवार की खुशी के लिए।
जब धर्मेंद्र इतने बड़े सुपरस्टार बन गए, तब भी प्रकाश कौर अपनी सादगी और संस्कारों में बनी रहीं। उन्होंने कभी लाइमलाइट का पीछा नहीं किया। उनकी सबसे बड़ी पहचान सिर्फ यह थी कि वह अपने बच्चों की माँ हैं और अपने परिवार की रीढ़ हैं।
तूफ़ानों का सामना: खामोशी की ताक़त
फ़िल्म इंडस्ट्री में यह बात सब जानते हैं कि जब एक इंसान जितना बड़ा स्टार बनता है, उतने ही बड़े तूफ़ान उसके निजी जीवन में आते हैं। धर्मेंद्र के जीवन में भी कई उतार-चढ़ाव आए, उनकी सफलता, उनका व्यस्त शेड्यूल और उनके निजी रिश्तों में होने वाले बदलाव।
लेकिन प्रकाश कौर ने सब कुछ खामोशी से सहा। न कभी मीडिया के सामने आईं, न कभी आँसू दिखाए, न कभी शिकायत की। दुनिया को कभी पता ही नहीं चला कि उनके दिल में क्या चला, उन्होंने क्या महसूस किया, और उन्होंने किस तरह उन कठिन दिनों को पार किया।
उनका पूरा ध्यान सिर्फ अपने बच्चों—सनी, बॉबी, अजीता और विजेता—पर था। उन्होंने उन्हें ऐसे संस्कार दिए, ऐसी परवरिश दी कि आज भी सनी और बॉबी जिस मजबूती, सम्मान और पारिवारिक मूल्यों की बात करते हैं, उसका मूल प्रकाश कौर ही हैं।
रिश्तों को टूटने से बचाया: चट्टान की तरह
जब धर्मेंद्र के जीवन में नई खुशियाँ और नए रिश्ते आए (धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री मशहूर हुई), तब भी प्रकाश कौर ने कभी अपने परिवार को टूटने नहीं दिया। उन्होंने एक ऐसी चट्टान की तरह खड़े रहकर अपने बच्चों को सँभाला कि बाहर कितना भी तूफ़ान आया हो, घर की दीवारें कभी हिली नहीं।
वह उस माँ की तरह थीं जो दर्द चुपचाप पी जाती है, लेकिन अपने बच्चों को किसी भी मुश्किल का एहसास होने तक नहीं देती। इस सबके बीच सबसे अद्भुत बात यह रही कि उन्होंने कभी अपने मन की कड़वाहट को रिश्तों पर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने कभी धर्मेंद्र के सम्मान को कम नहीं होने दिया—न अपने बच्चों के सामने और न दुनिया के सामने।
सनी देओल और बॉबी देओल आज भी इंटरव्यू में कहते हैं कि उनकी माँ वह ताक़त हैं जिन्होंने घर को टूटने से बचाया। प्रकाश कौर हमेशा देओल परिवार की शांति और गरिमा का प्रतीक रही हैं।

1980 का ऐतिहासिक फ़ैसला: त्याग की मिसाल
धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री रियल लाइफ़ में भी उतर आई। धीरे-धीरे यह रिश्ता गहरा हुआ और 1980 में वह फ़ैसला हुआ जिसने पूरी इंडस्ट्री को हिला दिया: धर्मेंद्र ने हेमा मालिनी से शादी कर ली। धर्मेंद्र तलाक नहीं लेना चाहते थे, वह अपनी पहली पत्नी और परिवार के प्रति भी ज़िम्मेदार थे, लेकिन वह हेमा मालिनी के साथ भी अपना रिश्ता आगे बढ़ाना चाहते थे।
यह बात किसी के लिए भी बहुत बड़ा झटका होती, लेकिन प्रकाश कौर ने इस बात को अपने अंदर ही समेट लिया। उन्होंने न मीडिया में बयान दिया, न किसी को दोषी ठहराया।
इसी दौरान प्रकाश कौर ने जो किया, वह सच में किसी महान व्यक्तित्व की निशानी थी। 1981 में एक दुर्लभ इंटरव्यू में उन्होंने कहा: “कोई भी पुरुष हेमा जैसी महिला की ओर आकर्षित हो सकता है।” यह बात सिर्फ़ एक बयान नहीं थी, बल्कि उनके गहरे दिल और व्यापक सोच का प्रमाण थी। इसमें न आत्मपीड़ा थी, न कोई कड़वाहट, बल्कि वह समझ थी।
उन्होंने अपने पति को कभी दोषी नहीं ठहराया, न उन्होंने हेमा मालिनी को ग़लत कहा, और न अपने रिश्ते को बोझ माना। बल्कि उन्होंने एक पत्नी, एक माँ और एक इंसान के रूप में अपनी गरिमा को बनाए रखा। यही वह ताक़त थी जिसकी वजह से धर्मेंद्र का पहला परिवार कभी बिखरा नहीं।
बेटियों की सादगी: माँ की परछाईं
धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की शादी के बाद, धर्मेंद्र की ज़िंदगी दो हिस्सों में बँट चुकी थी। धर्मेंद्र ने अपनी ज़िम्मेदारियों को बाँटने की कोशिश की, दोनों परिवारों के बीच संतुलन बनाए रखते थे। इस जटिल रिश्ते के बीच भी प्रकाश कौर का व्यवहार एक मिसाल बन गया।
उन्होंने अपने पति के फ़ैसले के बावजूद उनके प्रति सम्मान बनाए रखा। उनकी यही मज़बूती उनके बच्चों की ताक़त बनी। उनकी बेटियाँ अजीता और विजेता हमेशा पर्दे के पीछे रहीं। एक बेटी साइकोलॉजिस्ट बनी और दूसरी डायरेक्टर—दोनों ही उन्होंने अपनी माँ की तरह शांत, निजी और सादगी भरी ज़िंदगी चुनी। उन्होंने कभी पब्लिक लाइफ़ में आने की कोशिश नहीं की।
सनी देओल अक्सर सोशल मीडिया पर अपनी माँ और बहनों के साथ तस्वीरें शेयर करते हैं। उन तस्वीरों में प्रकाश कौर का चेहरा चमकता हुआ दिखाई देता है—न किसी गहने की चमक से, न किसी मेकअप से, बल्कि उस आत्मविश्वास से जो एक ऐसी महिला के अंदर होता है जिसने ज़िंदगी के हर तूफ़ान को शांति से झेला है।
आज भी देओल परिवार की भावना
आज भी प्रकाश कौर ज़िंदा हैं और अपने बच्चों के साथ एक शांत, गरिमापूर्ण जीवन जी रही हैं। उनकी मौजूदगी देओल परिवार के लिए आज भी एक आशीर्वाद की तरह है। वह अब भी वही शांत स्वभाव, वही सादगी, वही मातृत्व और वही प्यार रखती हैं।
धर्मेंद्र अक्सर अपनी बातों में यह स्वीकार करते थे कि अगर परिवार की नींव कभी नहीं हिली, तो उसका श्रेय सिर्फ प्रकाश कौर को जाता है। वह घर को सँभालने वाली, रिश्तों को बचाने वाली और बच्चों को सही दिशा देने वाली वह शक्ति थीं जिसे शायद आज भी दुनिया ठीक से समझ नहीं पाई है।
निष्कर्ष में: प्रकाश कौर की ज़िंदगी एक ऐसी कहानी है जो बताती है कि महानता सिर्फ मंच या पर्दे पर नहीं होती, बल्कि उन लोगों के भीतर होती है जो चुपचाप अपने परिवार, अपने बच्चों और अपने मूल्यों को सँभालते हुए संसार के सबसे कठिन फ़ैसले भी बिना किसी शोर के निभा लेते हैं।
उनकी कहानी आज भी लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा है कि असली ताक़त आवाज़ उठाने में नहीं, बल्कि सही जगह चुप रहकर सही चीज़ सँभालने में भी होती है। और यही वजह है कि प्रकाश कौर आज भी देओल परिवार के लिए सिर्फ एक सदस्य नहीं, बल्कि एक भावना हैं।
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