फांसी से पहले कैदी की वो ‘गंदी’ आखिरी ख्वाहिश जिसने एक लेडी पुलिस अफसर के होश उड़ा दिए! – एक बेगुनाह के खामोश विद्रोह की दास्तां

शिमला की वो बर्फीली रात और एक ऐसा सवाल जिसने कानून की बुनियाद हिला दी…

दिसंबर का महीना था। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला बर्फ की एक मोटी सफेद चादर में लिपटी हुई थी। तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे जा चुका था। हवाओं में ऐसी गलन थी जो हड्डियों तक को कंपा दे। शहर नींद के आगोश में था, लेकिन शिमला पुलिस मुख्यालय के एक कमरे में पीली बत्ती अब भी जल रही थी।

वहां बैठी थीं एसीपी काव्या सिंह। 32 साल की काव्या अपनी खूबसूरती से ज्यादा अपने सख्त मिजाज और अनुशासन के लिए जानी जाती थीं। पुलिस की खाकी वर्दी में उनकी शख्सियत किसी शेरनी से कम नहीं लगती थी। एक ऐसी दुनिया में जहां औरतों को अक्सर कमजोर समझा जाता है, काव्या ने अपनी जगह अपनी काबिलियत और निडरता से बनाई थी। उनकी मेज पर फाइलों का अंबार था और हाथ में ब्लैक कॉफी का मग, जो शायद उनकी रातों की नींद का एकमात्र सहारा था।

सुबह के करीब 4:30 बज रहे होंगे कि तभी वायरलेस सेट पर एक कर्कश आवाज गूंजी: “कंट्रोल टू एसीपी मैडम… कंट्रोल टू एसीपी मैडम… ओवर।”

काव्या ने कॉफी का मग नीचे रखा और वॉकी-टॉकी उठाया। “एसीपी काव्या स्पीकिंग। रिपोर्ट।”

“मैडम, शहर से 20 किमी दूर रामपुर गांव में एक हत्या हुई है। मामला गंभीर है। सूचना मिली है कि एक बेटे ने ही अपनी मां को मार डाला है। गांव वाले उग्र हो सकते हैं।”

काव्या की नींद का नामोनिशान मिट गया। “मैं तुरंत निकल रही हूं। फॉरेंसिक टीम को लोकेशन भेजो। ओवर एंड आउट।”

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वो खामोश कातिल

जीप सायरन बजाती हुई शिमला की घुमावदार और कोहरे से ढकी सड़कों पर दौड़ पड़ी। रामपुर गांव पहुंचते-पहुंचते सूरज की पहली किरण फूट चुकी थी, लेकिन कोहरा इतना घना था कि 10 कदम आगे देखना भी मुश्किल था।

एक पुराने ईंटों के मकान के बाहर भीड़ जमा थी। काव्या ने भीड़ को चीरते हुए अंदर प्रवेश किया। दृश्य विचलित करने वाला था। आंगन की गीली मिट्टी पर खून बिखरा था, जो ठंड के कारण जमने लगा था। वहां 55 वर्षीय सुमित्रा देवी का शव पड़ा था। उनके सिर पर किसी भारी चीज से वार किया गया था।

लेकिन जो चीज सबसे ज्यादा हैरान करने वाली थी, वह था शव के पास खड़ा एक युवक। उसका नाम था आर्यन खन्ना। उम्र करीब 24 साल। वह घुटनों के बल बैठा अपनी मां के शव को एकटक देख रहा था। उसके दाहिने हाथ में एक लोहे की भारी रॉड थी, जिससे खून टपक रहा था। उसके कपड़े खून के छींटों से सने थे।

काव्या ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर तानी। “हाथ ऊपर करो! और वो रॉड तुरंत जमीन पर फेंक दो!”

काव्या की आवाज में वो कड़कपन था जिससे अच्छे-अच्छे अपराधी कांप जाते थे। लेकिन आर्यन ने धीरे से सिर उठाया। उसकी आंखों में काव्या ने जो देखा, वह उसे समझ नहीं पाईं। वहां न डर था, न पश्चाताप, न भागने की कोशिश। बस एक गहरा शून्य था। एक ऐसा खालीपन जैसे किसी ने उसके अंदर से उसकी आत्मा खींच ली हो।

उसने बिना कुछ बोले रॉड जमीन पर गिरा दी और अपने दोनों हाथ आगे कर दिए। पुलिस वालों ने तुरंत उसे हथकड़ी पहना दी। काव्या उसके करीब गईं। “तुम्हें शर्म नहीं आई अपनी ही मां को मारते हुए?” आर्यन चुप रहा। उसने नजरें झुका लीं।

न्याय या जल्दबाजी?

पुलिस पूछताछ कक्ष में एक ही बल्ब जल रहा था। आर्यन कुर्सी पर बैठा था और काव्या उसके सामने थीं। पिछले 3 घंटों से पूछताछ चल रही थी, लेकिन आर्यन ने अपना मुंह नहीं खोला था।

काव्या ने झुंझलाकर मेज पर हाथ पटका। “आर्यन! हमारे पास सबूत हैं। तुम्हारा हथियार, तुम्हारे कपड़ों पर खून, गवाह… सब तुम्हारे खिलाफ है। अगर तुम जुर्म कबूल कर लो और वजह बता दो, तो शायद कोर्ट थोड़ी नरमी बरते।”

आर्यन ने पहली बार मुंह खोला। उसकी आवाज फटी हुई और भारी थी। “मैडम, जब फैसला आप लोगों ने कर ही लिया है, तो मेरी सफाई का क्या मतलब? लिख लीजिए जो लिखना है।”

काव्या हैरान थीं। आमतौर पर अपराधी रोते हैं, गिड़गिड़ाते हैं या झूठी कहानियां बनाते हैं। लेकिन यह लड़का तो जैसे खुद ही सजा मांग रहा था।

मामला ‘ओपन एंड शट’ (Open and shut) था। पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की। मीडिया ने आर्यन को ‘कलयुगी बेटा’ और ‘हैवान’ घोषित कर दिया। कोर्ट में ट्रायल चला। फॉरेंसिक रिपोर्ट और आर्यन की खामोशी ने उसे दोषी साबित कर दिया। जज ने फैसला सुनाया: “तमाम गवाहों और सबूतों को मद्देनजर रखते हुए, यह अदालत आर्यन खन्ना को अपनी मां की नृशंस हत्या का दोषी पाती है। यह कृत्य ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी में आता है। अदालत मुजरिम को फांसी की सजा सुनाती है।”

कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया, पर आर्यन के चेहरे पर एक लकीर भी नहीं बदली।

वो अजीब आखिरी ख्वाहिश

फांसी की तारीख से पहले उसे 2 महीने का समय दिया गया। आर्यन को सेंट्रल जेल के ‘डेथ सेल’ (फांसी वाली कोठरी) में रखा गया।

समय बीतता गया। फांसी की तारीख नजदीक आ रही थी। एक दिन काव्या रूटीन राउंड पर थीं। वह आर्यन की सेल के पास रुकीं। वह जमीन पर बैठा दीवार पर एक चींटी को चलते हुए देख रहा था। काव्या को एक अजीब सी बेचैनी हुई।

उसने सलाखों के पास जाकर पूछा, “आर्यन, तुम्हारे पास अब ज्यादा वक्त नहीं है। कानून के मुताबिक फांसी से पहले मुजरिम की एक आखिरी ख्वाहिश पूरी की जाती है। अगर तुम्हारी कोई इच्छा है—कोई खास खाना, किसी से मिलना—तो बता सकते हो।”

आर्यन धीरे से उठा और सलाखों के पास आया। उसकी दाढ़ी बढ़ गई थी, आंखें धंस गई थीं, लेकिन उस अजीब सी चमक में कोई कमी नहीं आई थी। उसने काव्या की आंखों में सीधे देखते हुए कहा, “मैडम, क्या वाकई कानून मेरी आखिरी ख्वाहिश पूरी करेगा?” काव्या ने सिर हिलाया। “हां, अगर वह नियमों के दायरे में हो।”

आर्यन ने एक गहरी सांस ली और फिर जो कहा, उसने काव्या के पैरों तले जमीन खिसका दी। “मेरी आखिरी ख्वाहिश यह है कि मैं फांसी के दिन तक हर रात एक कुंवारी लड़की के साथ गुजारना चाहता हूं।”

काव्या का खून खौल उठा। उसका हाथ अपनी बेल्ट पर लटके डंडे की तरफ गया। उसे लगा यह लड़का अपनी हदें पार कर रहा है। “जुबान संभाल के बात करो कैदी! तुम अपनी मौत के मुहाने पर खड़े हो और ऐसी घिनौनी बात कर रहे हो? तुम्हें शर्म आनी चाहिए!” काव्या चिल्लाईं।

आर्यन के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान आई। “क्यों मैडम? कानून तो कहता है कि ख्वाहिश पूरी होनी चाहिए। और मैं किसी के साथ जबरदस्ती तो नहीं मांग रहा। अगर कोई अपनी मर्जी से आए…” फिर वह थोड़ा और करीब आया और धीमी आवाज में बोला, “और अगर कोई नहीं मिलता, तो आप ही क्यों नहीं? आप भी तो अविवाहित हैं, और आप कानून की रखवाली करती हैं, तो कानून का पालन करना तो आपका फर्ज है।”

काव्या सन्न रह गईं। गुस्से से उनका चेहरा लाल हो गया था। लेकिन आर्यन की आंखों में ‘हवस’ नहीं थी। वहां एक अजीब सा दर्द, एक तंज और एक गहरा रहस्य था। जैसे वह काव्या की अंतरात्मा को ललकार रहा हो। काव्या वहां से पैर पटकते हुए चली गईं, “तुम्हारी मौत करीब है इसलिए तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है। मैं तुम्हारी इस वाहियात मांग को खारिज करती हूं।”

सच्चाई की तलाश

उस रात काव्या अपने बिस्तर पर लेटी छत को घूर रही थीं। नींद उनकी आंखों से कोसों दूर थी। आर्यन के वो शब्द—“आप ही क्यों नहीं?”—उनके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहे थे। एक अपराधी जिसने अपनी मां को मारा हो, वह मरने से पहले ऐसी मांग क्यों करेगा? क्या वह पागल है? या वह कुछ साबित करना चाहता है?

तभी काव्या को अपनी पुरानी ट्रेनिंग याद आई—जो दिखता है, वह हमेशा सच नहीं होता। अगले दिन काव्या ने आर्यन से दोबारा मिलने का फैसला किया, लेकिन इस बार एक पुलिस अफसर के तौर पर नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से।

“मैंने तुम्हारी फाइल दोबारा पढ़ी,” काव्या ने आर्यन से कहा। “गांव वाले कहते हैं तुम अपनी मां से बहुत प्यार करते थे। फिर उस रात ऐसा क्या हुआ? क्या तुमने सच में उन्हें मारा?” आर्यन ने दीवार की तरफ देखते हुए कहा, “मैडम, सच और झूठ के बीच का फासला बहुत बड़ा होता है। और गरीब का सच अक्सर अमीर के झूठ के नीचे दबकर मर जाता है।”

यह लाइन काव्या के दिल में चुभ गई। वह समझ गईं कि आर्यन कुछ छिपा रहा है। काव्या ने 10 दिन की छुट्टी ली और अपने भरोसेमंद सब-इंस्पेक्टर राणा के साथ सादे कपड़ों में ‘रामपुर गांव’ पहुंचीं। उन्होंने अपनी पहचान छिपाई और एक एनजीओ वर्कर बनकर लोगों से मिलना शुरू किया।

शुरुआत में गांव में एक अजीब सा डर था। कोई कुछ नहीं बोलना चाहता था। लेकिन धीरे-धीरे, चाय वाले काका रामदीन से बात करते हुए एक सुराग मिला। “साहब, आर्यन तो गाय जैसा सीधा लड़का था। यह सब तो उस जमीन का चक्कर है,” रामदीन ने दबी आवाज में कहा।

“जमीन?” काव्या ने पूछा। “हां, सुमित्रा देवी का घर हाईवे के किनारे था। गांव के प्रधान और बाहुबली नेता शेर सिंह की उस पर नजर थी। वह वहां होटल बनाना चाहता था। सुमित्रा ने जमीन बेचने से मना कर दिया था।”

काव्या के दिमाग की बत्ती जल गई। पुलिस रिकॉर्ड में जमीन विवाद का कोई जिक्र नहीं था। उन्होंने आर्यन के घर के सामने रहने वाली एक बूढ़ी औरत, विमला चाची को ढूंढा। वह इतनी डरी हुई थी कि दरवाजा नहीं खोल रही थी। जब काव्या ने उन्हें सुरक्षा का भरोसा दिलाया, तो विमला चाची रो पड़ीं।

“बेटी, मैंने अपनी आंखों से देखा था। उस रात आर्यन घर पर नहीं था। शेर सिंह के तीन गुंडे आए थे। उन्होंने सुमित्रा को पीटा और जबरदस्ती अंगूठा लगवाने की कोशिश की। जब उसने मना किया, तो उन्होंने उसके सिर पर रॉड मार दी। आर्यन तो आधे घंटे बाद खेत से लौटा था। उसने गुंडों को भगाने की कोशिश की, पर वे भाग गए। उसने जैसे ही मां के पास पड़ी रॉड उठाई, पुलिस आ गई।”

“तो आपने पुलिस को यह क्यों नहीं बताया?” काव्या ने गुस्से से पूछा। “बताती तो मेरा भी वही हाल होता जो सुमित्रा का हुआ,” बुढ़िया ने कांपते हुए कहा। “शेर सिंह ने कहा था कि अगर किसी ने मुंह खोला, तो पूरा परिवार खत्म कर देगा।”

विद्रोह और मुक्ति

काव्या का खून खौल उठा। एक बेगुनाह लड़का सिर्फ इसलिए फांसी पर चढ़ने वाला था क्योंकि सिस्टम बिका हुआ था और गवाह डरे हुए थे। और आर्यन? उसने खामोशी इसलिए ओढ़ ली क्योंकि उसे लगा कि गरीब की सुनता कौन है। उसकी वह ‘गंदी आखिरी ख्वाहिश’ सिर्फ काव्या का ध्यान खींचने का एक तरीका था। वह देखना चाहता था कि क्या यह सख्त अफसर सच में इंसान है या सिर्फ वर्दी का रोब।

काव्या वापस जेल गईं। वह सीधे आर्यन की सेल में घुसीं और उसके सामने बैठ गईं। “मुझे पता चल गया है आर्यन। शेर सिंह, जमीन, और वो रात…”

आर्यन ने चौंककर उनकी ओर देखा। “तुमने मुझे क्यों नहीं बताया? तुमने वो गंदी शर्त क्यों रखी?” आर्यन, जो मौत की सजा सुनकर भी नहीं रोया था, आज एक बच्चे की तरह फफक कर रो पड़ा। “मैडम, मैंने थाने में पहले दिन बताने की कोशिश की थी। लेकिन वहां मौजूद एक हवलदार ने मेरे कान में कहा था कि अगर मैंने शेर सिंह का नाम लिया, तो वे जेल के अंदर ही मुझे मार देंगे। मुझे लगा कानून अंधा होता है। मुझे लगा मैं चुपचाप मर जाऊं तो ही अच्छा है।”

उसने आंसू पोंछे, “और वो ख्वाहिश… मैं देखना चाहता था कि क्या आप मुझे एक दरिंदा मानकर नफरत करेंगी या एक इंसान समझकर मेरी आंखों का दर्द पढ़ेंगी। जब आपने दोबारा मुझसे बात की, तो मुझे लगा शायद कोई है जो सच जानना चाहता है।”

काव्या ने आर्यन का हाथ थामा। “सुनो आर्यन, मैं कसम खाती हूं। मेरी वर्दी की कसम। मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगी। अब यह लड़ाई तुम्हारी नहीं, मेरी है।”

काव्या ने डीजीपी से मिलकर केस को री-इन्वेस्टिगेट (Reinvestigate) करने की मांग की। शेर सिंह की कॉल डिटेल्स और विमला चाची के बयान के आधार पर कोर्ट में ‘रिव्यू पिटीशन’ दाखिल की गई।

सुनवाई के दिन कोर्ट रूम खचाखच भरा था। शेर सिंह भी अपनी वकीलों की फौज के साथ मौजूद था। लेकिन इस बार सरकारी वकील की जगह काव्या ने खुद सबूत पेश किए। उन्होंने शेर सिंह के गुंडों की मोबाइल लोकेशन दिखाई जो हत्या के समय आर्यन के घर पर थे। उन्होंने उस रॉड की दोबारा फॉरेंसिक रिपोर्ट दिखाई, जिस पर शेर सिंह के ‘राइट हैंड मैन’ कालिया के फिंगरप्रिंट मिले थे। और अंत में, विमला चाची ने डर को हराकर गवाही दी।

जज ने अपना फैसला बदला: “नए सबूतों और गवाहों के आधार पर यह स्पष्ट है कि आर्यन खन्ना निर्दोष है। उसे फंसाया गया था। आर्यन खन्ना को बाइज्जत बरी किया जाता है और शेर सिंह तथा उसके साथियों को हत्या के जुर्म में गिरफ्तार करने का आदेश दिया जाता है।”

एक कप कॉफी का वादा

जेल के बड़े लोहे के दरवाजे खुले। आर्यन ने बाहर कदम रखा। आजादी की ठंडी हवा ने उसके चेहरे को स्पर्श किया। सामने काव्या अपनी जीप के पास खड़ी थीं। आज उन्होंने वर्दी नहीं, एक साधारण साड़ी पहनी थी।

आर्यन ने हाथ जोड़कर कहा, “मैडम, आपने मुझे सिर्फ फांसी से नहीं बचाया। आपने मुझे इंसानियत पर भरोसा करना सिखाया। वरना मैं तो मान चुका था कि दुनिया में सिर्फ अंधेरा है।”

काव्या ने मुस्कुराते हुए पूछा, “और वो आखिरी ख्वाहिश?” आर्यन शर्म से लाल हो गया। “मुझे माफ कर दीजिए। वो बस मेरी हताशा थी।”

काव्या ने हंसते हुए कहा, “तुम्हारी उस अजीब ख्वाहिश ने ही मुझे सोचने पर मजबूर किया था। कभी-कभी गलत रास्ते भी सही मंजिल तक ले जाते हैं।” फिर काव्या ने कहा, “अब क्या करोगे?” “गांव वापस जाऊंगा। मां की जमीन पर खेती करूंगा।” फिर आर्यन थोड़ा झिझका, “और अगर आप बुरा न मानें… क्या मैं कभी-कभी आपसे मिलने आ सकता हूं? एक दोस्त की तरह?”

काव्या की आंखों में चमक आ गई। “शिमला की कॉफी बहुत अच्छी होती है। जब भी आओ, मेरे लिए एक कप कॉफी का वादा रहा।”

आर्यन मुस्कुरा दिया—खुल के, दिल से। वह जीप में बैठा और अपने गांव की ओर निकल गया। काव्या उसे जाते हुए देखती रहीं। पुलिस की नौकरी ने काव्या को सख्त बना दिया था, लेकिन इस केस ने उनके अंदर के इंसान को फिर से जगा दिया था।

दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि खामोशी कभी-कभी सबसे ज्यादा शोर मचाती है, बस उसे सुनने वाला कोई चाहिए। और न्याय के लिए कानून की किताबों के साथ-साथ दिल में जज्बात होना भी जरूरी है।