कचहरी की सीढ़ियों पर बैठा न्याय
वाराणसी—
जिसे दुनिया मोक्ष की नगरी कहती है।
यहाँ की सुबह केवल मंदिरों की घंटियों से नहीं, बल्कि अदालतों के बाहर बजती टाइपराइटरों की खटखट, वकीलों की काली कोटों की सरसराहट और मुवक्किलों की थकी उम्मीदों से शुरू होती है।
14 नवंबर 2023 की वह ठंडी सुबह भी कुछ ऐसी ही थी।
वरुण पुल के पास स्थित जिला एवं सत्र न्यायालय परिसर रोज़ की तरह जाग रहा था। चाय की दुकानों पर कुल्हड़ों से भाप उठ रही थी। फाइलें बगलों में दबाए वकील तेज़ कदमों से कोर्ट रूम की ओर बढ़ रहे थे।
लेकिन इस सारी हलचल के बीच,
गेट नंबर दो के पास बने हनुमान मंदिर की सीढ़ियों पर
एक अजीब-सी स्थिरता थी।
वहाँ एक बूढ़ा व्यक्ति बैठा था।
फटा हुआ कुर्ता, मैली धोती, नंगे पैरों में फटी बिवाइयाँ।
उलझे बाल, बेतरतीब बढ़ी दाढ़ी।
सामने रखा एक पिचका हुआ एल्यूमिनियम का कटोरा—
जिसमें कभी सूखे फूल, कभी आधा सिक्का पड़ा रहता।
लोग रोज़ उसे देखते थे…
लेकिन कोई देखता नहीं था।

कुछ नए वकील उसे “बाबा” कहकर निकल जाते,
पुराने मुंशी उसे पागल समझते,
और पुलिस वाले उसे यूँ ही बैठा रहने देते—
क्योंकि वह न भीख माँगता था, न किसी को परेशान करता था।
वह बस वहाँ बैठा रहता था।
एक पुराने टूटे फर्नीचर की तरह।
लेकिन अगर कोई गौर से देखता,
तो पाता कि उसकी आँखों में भीख नहीं थी।
उसकी निगाहें रोज़ ठीक दस बजे
जजों की गाड़ियों,
वकीलों की चाल,
और फाइलों के ढेर को
ऐसे पढ़ती थीं
जैसे कोई अनुभवी आँखें कानून की नब्ज टटोल रही हों।
कोर्ट रूम नंबर चार
दोपहर के बारह बज चुके थे।
कोर्ट रूम नंबर चार में सुनवाई अपने चरम पर थी।
यह अदालत थी—
अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश विक्रमजीत सिंह की।
कठोर, अनुशासित और कानून पर असाधारण पकड़ रखने वाले जज।
कहा जाता था—
उनकी अदालत में झूठ बोलना
खुद अपने खिलाफ फैसला लिखने जैसा है।
उस दिन जिस केस की सुनवाई चल रही थी,
वह शहर का सबसे बड़ा घोटाला था—
पूर्वांचल इंफ्रास्ट्रक्चर लैंड स्कैम।
करोड़ों की धोखाधड़ी।
बड़े बिल्डर, सफेदपोश नेता—
सबके चेहरे अदालत में मौजूद थे।
बहस तीखी थी।
माहौल तनावपूर्ण।
इसी बीच,
जज विक्रमजीत सिंह को अचानक घुटन महसूस हुई।
उन्होंने फाइलों से नज़र हटाई
और दाईं ओर की खिड़की की ओर देखा।
वही खिड़की,
जो सीधे हनुमान मंदिर की सीढ़ियों पर खुलती थी।
एक दृश्य जिसने सब बदल दिया
बाहर दो आवारा कुत्ते
बूढ़े के पास रखे खाने के पैकेट पर झपट रहे थे।
सामान्यतः कोई भी भिखारी
डंडा उठाता,
चीखता,
या रोटी बचाने के लिए लड़ता।
लेकिन उस बूढ़े ने ऐसा नहीं किया।
उसने शांति से
अपना खाना उठाया
और कुत्तों के सामने सरका दिया।
कुत्ते शांत हो गए।
इसके बाद उसने जो किया,
उसने जज की निगाहें जकड़ लीं।
उसने अपनी धोती ठीक की।
पीठ सीधी की।
गर्दन तानी।
दोनों हाथ घुटनों पर रखे।
वह ऐसे बैठा
जैसे कोई व्यक्ति
सालों तक अदालतों में बैठा हो।
यह बैठने का ढंग
किसी भिखारी का नहीं था।
यह एक वकील का पोश्चर था।
जज का माथा ठनका।
“उन्हें अंदर बुलाइए”
जज ने मेज पर हाथ रखा।
कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया।
“पेशकार,”
उन्होंने कहा,
“बाहर मंदिर की सीढ़ियों पर जो बुज़ुर्ग बैठे हैं—
उन्हें सम्मान सहित अंदर बुलाइए।”
कोर्ट में खुसर-पुसर फैल गई।
एक भिखारी?
इस हाई-प्रोफाइल केस के बीच?
दो कांस्टेबल बाहर गए।
“बाबा, उठिए… साहब ने बुलाया है।”
बूढ़े ने कोई सवाल नहीं किया।
लाठी उठाई।
धीमे, सधे कदमों से चल पड़ा।
उसकी चाल में
गरीबी थी,
लेकिन झुकाव नहीं।
“जी, माय लॉर्ड”
कोर्ट रूम में दाखिल होते ही
उसने आदतन जज की कुर्सी को नमन किया।
जज चौंक गए।
“आप रोज़ यहाँ बैठते हैं?”
उन्होंने पूछा।
बूढ़े की आवाज़ कांपती थी,
लेकिन शब्द सधे हुए—
“जी… माय लॉर्ड।”
पूरा कोर्ट स्तब्ध।
“माय लॉर्ड”
यह शब्द
किसी भिखारी की जुबान पर नहीं होता।
एक पहचान, एक सन्नाटा
“आपका नाम?”
जज ने पूछा।
बूढ़े ने जैकेट की अंदरूनी जेब से
एक पुराना पहचान पत्र निकाला।
बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश
साल: 1982
नाम: एडवोकेट हरिशंकर उपाध्याय
साथ में एक पीली अख़बार की कटिंग—
“प्रसिद्ध अधिवक्ता हरिशंकर उपाध्याय ने गरीब किसान को दिलाया ऐतिहासिक न्याय”
जज की आँखें भर आईं।
“आप… सीनियर एडवोकेट हरिशंकर उपाध्याय?”
बूढ़े ने निगाह झुका ली—
“वह अब मर चुका है, माय लॉर्ड।
अब जो खड़ा है…
वह सिर्फ एक मुजरिम का पिता है।”
एक पिता की कुर्बानी
जो कहानी सामने आई,
उसने अदालत को झुका दिया।
कैसे एक पिता ने
अपने बेटे को बचाने के लिए
अपनी वकालत,
अपना सम्मान,
और अपनी ज़िंदगी कुर्बान कर दी।
और कैसे वही बेटा
सब बेचकर विदेश भाग गया।
न्याय की वापसी
जज विक्रमजीत सिंह खड़े हुए।
“कानून अंधा होता है—
लेकिन आज महसूस हुआ
कि कभी-कभी हम इंसान भी अंधे हो जाते हैं।”
उन्होंने केस दोबारा खोलने का आदेश दिया।
एसआईटी गठित हुई।
इंटरपोल की मदद ली गई।
तीन महीने बाद—
रोहित उपाध्याय भारत लाया गया।
फैसला
10 साल की सज़ा।
पैतृक संपत्ति पिता को लौटाई गई।
₹50 लाख मुआवज़ा।
रोहित ने पिता की ओर देखा।
हरिशंकर उपाध्याय बोले—
“मैंने एक मुवक्किल को माफ किया था…
लेकिन उस बेटे को नहीं
जिसने पिता की आत्मा मार दी।”
अंत नहीं—प्रायश्चित
आज हरिशंकर उपाध्याय
फिर काला कोट पहनते हैं।
लेकिन अब
वे उन माता-पिता का केस लड़ते हैं
जिन्हें उनके बच्चों ने छोड़ दिया।
और हनुमान मंदिर की वे सीढ़ियाँ
आज भी गवाह हैं—
कि सत्य परेशान हो सकता है,
पराजित कभी नहीं।
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