गरीब मैकेनिक की ईमानदारी – एक प्रेरणादायक कहानी

लखनऊ की ठंडी शाम थी। सूरज गोमती नगर की ऊँची इमारतों के पीछे धीरे-धीरे डूब रहा था। शहर के बाहर पुरानी फैक्ट्री रोड लगभग सुनसान हो चुकी थी। सर्द हवा चल रही थी, और उसी हवा को चीरता हुआ एक दुबला-पतला लड़का अपनी पुरानी खटारा मोटरसाइकिल को किक लगाते हुए आगे बढ़ रहा था। उसका नाम था रवि वर्मा – एक गरीब लेकिन बेहद ईमानदार मैकेनिक। कपड़ों पर तेल-ग्रीस, हाथों पर मेहनत की लकीरें, चेहरे पर दिनभर की थकान, लेकिन आँखों में अजीब सी शांति।

पूरे दिन मेहनत करने के बाद उसकी जेब में मुश्किल से सौ रुपये बचे थे। आज उसके कमरे का किराया भी देना था। फिर भी वह खुद से बोला, “चलो, जो होगा देखा जाएगा। काम तो ईमानदारी से किया है।”

रवि गली से निकलकर पुरानी फैक्ट्री रोड पर पहुँचा तो उसकी नजर अचानक सड़क किनारे पड़ी एक चमचमाती सफेद इंपोर्टेड कार पर टिक गई। कार का बोनट खुला था और उसमें से भाप के घने बादल उठ रहे थे। पहले तो रवि आगे बढ़ने ही वाला था, सोचा – यह बड़ी गाड़ी है, बड़े लोग होंगे, इनकी मदद मिनटों में आ जाएगी। लेकिन जैसे ही उसने ड्राइवर सीट के अंदर झांका, उसका दिल धक से रह गया। गाड़ी में एक खूबसूरत महिला बैठी थी, लगभग आठ महीने की प्रेग्नेंट। चेहरे पर डर, दर्द और घबराहट तीनों साफ़ दिखाई दे रहे थे। ठंड के बावजूद माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। वह बार-बार अपने पेट को पकड़ रही थी और हर साँस जैसे भारी पड़ रही थी।

रवि ने सोचना भी छोड़ दिया। सीधे बाइक रोककर भागता हुआ कार के पास पहुँचा। “मैडम, सब ठीक तो है? गाड़ी में दिक्कत हो गई क्या?” उसने बहुत अदब से पूछा।

महिला ने उसका फटा जैकेट, तेल से सने हाथ और खटारा बाइक देखी। पहले पल में थोड़ी डरी, लेकिन अगले ही पल दर्द उसकी आवाज में उतर आया। “भाई, मेरा नाम काव्या है। मुझे अस्पताल पहुँचना था। अचानक गाड़ी बंद हो गई। फोन भी डिस्चार्ज है और मुझे बहुत दर्द हो रहा है।” इतना कहते ही वह दर्द से कराह उठी।

रवि ने बिना एक सेकंड गवाए कहा, “आप चिंता मत कीजिए, मैं मैकेनिक हूँ, पहले गाड़ी देखता हूँ।”

वह तुरंत बोनट के पास गया। गर्म भाप उसके चेहरे से टकराई, लेकिन उसने झट से अपनी छोटी टॉर्च निकाली और इंजन के अंदर झाँकने लगा। रेडिएटर में पानी था, पर कूलिंग फैन तक जाने वाली बेल्ट टूटकर गिर चुकी थी। इंजन ओवरहीट होकर पूरी तरह जाम होने वाला था।

रवि सीधा होकर बोला, “मैडम, फैन बेल्ट टूट गई है। गाड़ी अब एक इंच भी नहीं चल सकती।”

काव्या की आँखों से आँसू बह निकले। उसकी आवाज टूट गई, “अब मैं क्या करूँ? अस्पताल दूर है… मेरा बच्चा…”

रवि के मन में सिर्फ एक बात आई – अगर मैंने इसे ऐसे ही छोड़ दिया तो शायद यह महिला और उसका बच्चा दोनों मुश्किल में पड़ जाएँगे। उसने झट अपना झोला खोला और उसमें से निकाली एक मजबूत नायलॉन की रस्सी। असली पार्ट तो उसके पास था नहीं, लेकिन उसके पास था अनुभव और इंसानियत। अगले दस मिनट उसने गर्म इंजन के बीच अपने हाथ डालकर रस्सी को बेल्ट की तरह फिट किया। गर्म धातु से उसके हाथ कई जगह जल गए, उंगलियाँ छिल गईं, लेकिन उसने एक बार भी आ नहीं कहा। काव्या बस उसे देखती रही – एक गरीब, ग्रीस से भरा लड़का, जो उसकी लाखों की कार को अपनी जान जोखिम में डालकर ठीक कर रहा था।

आखिरकार रवि ने मजबूत गाँठ लगाई और बोला, “मैडम, गाड़ी स्टार्ट कीजिए।”

काव्या ने काँपते हाथों से चाबी घुमाई। इंजन घरघराया और फिर स्टार्ट हो गया। रस्सी पुली पर ठीक से घूम रही थी। रवि मुस्कुराया, “देखिए मैडम, यह जुगाड़ है, पर मजबूत है। अब आप धीरे-धीरे अस्पताल चलिए।”

काव्या के आँसू रुक ही नहीं रहे थे। उसने पर्स से नोटों की मोटी गड्डी निकाली और कहा, “यह लो, तुम्हें कैसे धन्यवाद दूं? तुमने मेरी और मेरे बच्चे की जान बचाई है।”

रवि एक पल के लिए ठिटका। उसे अपने कमरे का किराया याद आया, खाली जेब याद आई। लेकिन उसने धीरे से हाथ जोड़कर कहा, “नहीं मैडम, इस हालत में की गई मदद का मोल नहीं लगाता। आप बस मेरे लिए, अपने बच्चे के लिए एक दुआ कर देना, वही मेरी कमाई है।”

काव्या वही खड़ी रह गई, आँखों में हैरानी, दिल में सम्मान और मन में एक वादा – जिन्दगी ने मौका दिया तो इसे ढूँढ़कर इसका कर्ज जरूर उतारूंगी।

रवि ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की और अंधेरे में खो गया। पीछे से कार की हेडलाइट उसकी पीठ पर पड़ रही थी और सच में वह किसी फरिश्ते की परछाई लग रहा था।

तीन सप्ताह बाद

तीन सप्ताह बीत गए। लखनऊ की सर्द हवाएँ अब थोड़ी कम हो चुकी थीं। लेकिन रवि की जिन्दगी में ठंड कम होने का कोई नाम ही नहीं था। उसकी टिन की वर्कशॉप वैसे ही चल रही थी, वैसे ही टूटी छत, वैसा ही जंग लगा टूलबॉक्स, और वही रोज की भागदौड़। रवि उस रात की घटना को लगभग भूल चुका था। उसके लिए तो वह बस एक और दिन था जब उसने अपनी इंसानियत निभाई थी। लेकिन दुनिया कभी-कभी उसी भलाई का हिसाब बहुत अलग तरीके से लौटाती है।

उस दिन दोपहर में लखनऊ का सूरज किसी भट्टी जैसा दब रहा था। टिन की छत गर्म होकर आवाजें निकाल रही थी। रवि एक ऑटो रिक्शा का इंजन खोलकर दोनों हाथ उसमें डाले बैठा था। तेल उसकी कोहनी तक फैल गया था, लेकिन रवि उसी ध्यान से काम कर रहा था जैसे यह कोई बड़ी लग्जरी कार हो।

तभी गली के मुहाने पर एक काली चमचमाती Mercedes आकर रुकी। पूरी गली जैसे थम गई। बच्चे खेलते-खेलते रुक गए, औरतें अपने घरों की खिड़की से झाँकने लगीं, और रवि के हाथ रुक गए। ऐसी गाड़ी इस गली में पहली बार आई थी। रवि ने पारा नीचे रखा, हाथ बनियान से पोंछे और थोड़ा घबराकर गाड़ी की तरफ देखा।

Mercedes का दरवाजा धीरे-धीरे खुला और बाहर उतरी वही महिला – काव्या मल्होत्रा। अब वह पहले जैसी कमजोर नहीं लग रही थी। चेहरे पर चमक, आँखों में आत्मविश्वास, और गोद में एक छोटा सा बच्चा।

रवि की साँस अटक गई। स्पैनर हाथ से गिर गया। “मैं… मैडम… आप?” उसकी आवाज खुद-ब-खुद काँप गई।

काव्या मुस्कुराई – एक ऐसी मुस्कान जिसमें शुक्रिया भी था और अपनापन भी। “कैसे हो रवि?” उसने आगे बढ़ते हुए पूछा। “हमने तुम्हें ढूँढने में तीन सप्ताह लगा दिए।”

रवि घबराया, “मैडम, वो तो मेरा फर्ज था। आप यहाँ क्यों आईं? सब ठीक तो है? बच्चा…”

काव्या ने हँसते हुए कहा, “सब ठीक है रवि। यह देखो, यह बच्चा जीवित है सिर्फ तुम्हारी वजह से।”

फिर उसने ड्राइवर को इशारा किया। ड्राइवर और उसके साथ आया आदमी गाड़ी में से एक बड़ा सा कपड़े से ढका बोर्ड बाहर निकालने लगे। रवि हैरानी से देखता रहा, “यह क्या है?”

कुछ सेकंड में बोर्ड उसकी टूटी-फूटी दुकान के सामने खड़ा कर दिया गया। “मैडम, यह… यह क्या है?” रवि की आँखें फैल गईं।

काव्या ने मुस्कुराकर पर्दा हटाया और पर्दा हटते ही गली के हर इंसान ने अपनी साँसें रोक लीं। बोर्ड पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था – रवि मोटर्स – ईमानदारी का भरोसा

लेकिन चौंकाने वाली बात बोर्ड नहीं थी, बल्कि वह जगह थी जहाँ बोर्ड लगा था। वह खाली जमीन जो सालों से बेकार पड़ी थी, अब एक नई बड़ी चमकती वर्कशॉप में बदल चुकी थी। चार हाइड्रोलिक लिफ्टें, नए औजारों का पूरा सेट, एक छोटा साफ-सुथरा ऑफिस और बाहर पार्किंग की जगह – पूरा गैरेज ऐसा लग रहा था जैसे किसी बड़े ब्रांड का सर्विस सेंटर हो।

रवि के पैरों तले जमीन खिसक गई। गला सूख गया, आवाज ही नहीं निकल रही थी। “मैडम, ये… ये सब क्या है?” उसके होठ काँप रहे थे।

काव्या ने आगे बढ़कर बहुत नरमी से कहा, “रवि, उस रात तुमने मेरी जिन्दगी बचाई। मेरे बच्चे की जिन्दगी बचाई। तुमने पैसों को ठुकरा दिया, मगर अपनी इंसानियत नहीं छोड़ी। मैं चाहती हूँ कि तुम्हारी मेहनत भी किसी छोटे टिन शेड तक सीमित ना रहे। तुम्हें वही जगह मिलनी चाहिए जहाँ तुम सच में हकदार हो।”

रवि की आँखों से आँसू बह निकले। वह वही जमीन पर बैठ गया, “मैडम, मैं तो एक मामूली मैकेनिक हूँ। यह सब मेरे लिए बहुत बड़ा है।”

काव्या ने झुककर उसे अपने हाथों से उठाया, “रवि, जब नियत बड़ी होती है ना, तो इंसान खुद-ब-खुद बड़ा बन जाता है। तुम मामूली नहीं हो। इस शहर को तुम जैसे लोगों की जरूरत है।”

इतने में गली के लोग जोर-जोर से तालियाँ बजाने लगे, बच्चे चिल्लाए, “अरे रवि भैया अब सेठ बन गए!”

रवि रोते हुए बोला, “मैडम, बस आपका आशीर्वाद चाहिए।”

काव्या ने बच्चे को उसकी गोद में देते हुए कहा, “यह रहा तुम्हारा सबसे बड़ा आशीर्वाद, रवि। मैं इसे रोज तुम्हारी कहानी सुनाऊँगी कि कैसे एक गरीब आदमी के हाथ मैले हो सकते हैं, पर दिल हमेशा साफ़ होता है।”

रवि की आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे। उसने बच्चे का छोटा सा हाथ पकड़ा और पहली बार उसे लगा कि शायद भगवान ने उसकी दुआ सच में सुन ली हो।

रवि मोटर्स – ईमानदारी का भरोसा

रवि की नई वर्कशॉप – रवि मोटर्स – अब पूरे लखनऊ में चर्चा का विषय बन चुकी थी। कभी लोग उसे गरीब मैकेनिक कहते थे, अब उसी रवि के गैरेज में बड़ी-बड़ी SUV, कारें, स्कूटर्स लाइन में लगी रहतीं। लेकिन रवि वही था – वही सादगी, वही मुस्कान और वही ईमानदारी।

हर सुबह वह अपने कर्मचारियों को एक ही बात कहता, “काम हाथ से करो, पर ग्राहक को हमेशा दिल से संभालो।”

धीरे-धीरे गली का हर गरीब लड़का रवि से सीखने आने लगा। किसी के घर खाने को नहीं था, किसी के पास फीस नहीं थी, किसी को नौकरी चाहिए थी – रवि ने सबको अपने गैरेज में जगह दे दी। और अब वही लड़के एक पूरी टीम बन चुके थे।

लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं होती। कहानी अभी अपनी सबसे बड़ी मोड़ पर आने वाली थी।

एक और परीक्षा

उस शाम रवि वर्कशॉप बंद करने ही वाला था कि उसे दरवाजे पर किसी के पैरों की आवाज सुनाई दी। वह आवाज जानी-पहचानी थी, मगर इस बार उसमें एक अजीब सी बेचैनी थी। रवि ने मुड़कर देखा – वही काव्या, लेकिन इस बार चेहरे पर मुस्कान नहीं थी। आँखों में चिंता थी और उसके पीछे उसका ड्राइवर नहीं था। वह अकेली थी, गोद में उसका बच्चा हल्का सा रो रहा था।

रवि तुरंत दौड़कर आया, “मैडम, सब ठीक है? क्या हुआ?”

काव्या ने गहरी साँस ली, आँखें नम पड़ गईं, “रवि, मुझे तुम्हारी मदद चाहिए। इस बार अपने लिए नहीं, अपने बेटे के लिए नहीं, अपने पति के लिए…”

रवि चौंक गया, “क्या हुआ मैडम? विक्रम सर ठीक हैं?”

काव्या की आँखों में डर उतर आया, “नहीं रवि, विक्रम का एक्सीडेंट हो गया है। गाड़ी पलट गई और डॉक्टर कह रहे हैं कि अगले दो घंटे बहुत क्रूशियल हैं। वे शहर से बाहर बिजनेस मीटिंग के लिए निकले थे और एक ढाबे के पास उनकी कार का ब्रेक फेल हो गया। कोई मदद करने वाला नहीं था।”

रवि के दिमाग में पहली ही सेकंड में एक बात कौंधी – ब्रेक फेल। उसकी मैकेनिक वाली सूझबूझ तुरंत जाग गई। “मैडम, कौन सी रोड पर एक्सीडेंट हुआ?”

“पुरानी काकोरी हाईवे पर,” काव्या ने बताया।

रवि जैसे जम गया – पुराना काकोरी हाईवे वही जगह थी जहाँ बड़े ट्रक वाले अक्सर खुद ही वाहन में हाथ मार देते थे ताकि पार्ट बेच सके। लेकिन बात सिर्फ मैकेनिकल नहीं थी। काव्या की आँखों में जो दर्द था, रवि उससे ज्यादा देर खड़ा नहीं रह सकता था।

“मैडम, चलिए अभी चलते हैं,” रवि ने तुरंत कहा।

काव्या ने चौंककर पूछा, “तुम… लेकिन तुम वहाँ क्यों?”

रवि ने बेहद शांति से कहा, “जिस इंसान की वजह से मैं आज इस जगह पर खड़ा हूँ, अगर वह जिन्दगी और मौत के बीच है तो मैं कैसे दूर रहूँ?”

काव्या की आँखें भर आईं। वह तुरंत बच्चे को संभालते हुए बोली, “रवि, अस्पताल में जगह कम है, मुझे डर लग रहा है…”

रवि बोल पड़ा, “मैडम, चलिए, आप अकेली नहीं हैं। आपका पति ठीक होगा। और अगर भगवान ने हमें मिलाया है तो पूरा होने के लिए ही मिलाया है।”

दोनों तुरंत अस्पताल पहुँचे। ICU के बाहर अफरातफरी मची थी, नर्सें इधर-उधर दौड़ रही थीं, डॉक्टरों के चेहरे पर चिंता थी। काव्या काँपते कदमों से सीधे ICU के काँच तक पहुँची। अंदर विक्रम कई मशीनों से जुड़े बेहोश पड़े थे। काव्या दीवार से टिक गई, उसका शरीर जैसे ढह गया था।

“रवि, वो बचेंगे ना?” आवाज टूट गई थी।

रवि कुछ बोल नहीं पाया, बस काव्या के कंधे पर हाथ रखा, “जब तक दुआ है, आस है मैडम। और मैं जानता हूँ आप दोनों अच्छे लोग हो, भगवान अच्छे लोगों को इतनी जल्दी नहीं छोड़ते।”

अभी वे दोनों ICU के बाहर ही खड़े थे कि डॉक्टर बाहर आए, “मैडम, हमें कार के ब्रेक के बारे में कुछ अहम जानकारी चाहिए।”

काव्या ने चौंककर कहा, “जानकारी क्यों?”

डॉक्टर बोले, “ब्रेक फेल एक्सीडेंट नहीं लगता, किसी ने ब्रेक लाइन काटी।”

यह सुनकर काव्या जैसे पत्थर बन गई। उसकी साँस रुक गई, आँखें फैल गईं, “क्या… किसी ने जानबूझकर…”

डॉक्टर ने सिर हिलाया, “हमें पुलिस रिपोर्ट चाहिए, मैडम।”

उस पल रवि के दिल में एक शक बिजली की तरह कड़क गया। विक्रम एक बड़ा होटल ओनर था। बिजनेस में दुश्मन होना सामान्य बात थी। लेकिन ब्रेक लाइन काटना – यह कोई आम आदमी नहीं कर सकता था। यह किसी अंदर वाले ने किया होगा जो घर, ऑफिस या कार तक आसानी से पहुँचता हो।

रवि धीरे से बोला, “मैडम, क्या आपको किसी पर शक है?”

काव्या ने धीमी आवाज में कहा, “रवि, विक्रम के बिजनेस पार्टनर पिछले कुछ महीनों से काफी नाराज चल रहे थे और वो लोग कई बार धमकी भी दे चुके हैं।”

रवि के हाथ मुट्ठी में बदल गए, “मैडम, मैं पता लगाऊंगा कि असलियत क्या है। सच सामने आएगा, चाहे इसके लिए मुझे किसी से भी भिड़ना पड़े।”

काव्या उसकी तरफ ऐसे देख रही थी जैसे भगवान ने उसे एक बार नहीं, दो बार उसके साथ खड़ा कर दिया हो।

सच की लड़ाई

रवि अस्पताल से निकल गया। होटल के ऑफिस पहुँचा – रात के लगभग 11 बजे थे, लेकिन अंदर लाइटें जल रही थीं। रवि ने एक छोटी सी तरकीब लगाई – होटल का पुराना स्टाफ उसे पहचानता था, उसे रिसेप्शन से पता चला कि राजीव अभी भी कॉन्फ्रेंस रूम में थे।

रवि धीरे-धीरे कॉन्फ्रेंस रूम के पास गया, जहाँ अंदर से आवाजें आ रही थीं, “अच्छा हुआ, विक्रम रास्ते से हट गया, अब जमीन मेरी होगी…”

रवि के पैरों से जैसे जमीन खिसक गई। उसके भीतर मानो किसी ने आग डाल दी। वह फौरन अंदर घुसा और पूरे जोश से बोला, “बस! बहुत सुन लिया!”

राजीव हक्का-बक्का रह गया, “तू… तू कौन है?”

रवि ने एक-एक शब्द चबाकर कहा, “वही आदमी जिसने तुम्हारी गंदी चाल के चलते एक बार काव्या और उसके बच्चे को बचाया था, और अब विक्रम को भी बचाएगा।”

राजीव डर गया, “तुम्हारे पास सबूत है? कुछ नहीं कर पाओगे!”

रवि ने मेज पर रखा राजीव का फोन उठाया, जो कॉल रिकॉर्डिंग पर था। अभी-अभी राजीव जो बोल रहा था, वह सब रिकॉर्ड हो चुका था।

राजीव की आँखें फैल गईं, “यह… यह बंद करो!”

रवि गरजा, “आज नहीं! आज यह रिकॉर्डिंग सीधा पुलिस को जाएगी!”

राजीव रवि पर झपटा, लेकिन रवि ने उसे जोर से धक्का दिया और भागकर होटल स्टाफ को बुला लिया। कुछ ही मिनटों में पुलिस आ चुकी थी। रिकॉर्डिंग सुनी गई, राजीव के चेहरे का रंग उड़ गया। उसे वही हथकड़ी लगाकर ले जाया गया।

जीत की सुबह

ICU खुला। डॉक्टर बाहर आए, चेहरे पर मुस्कान, “मैडम, मरीज अब खतरे से बाहर है। ऑपरेशन सफल रहा।”

काव्या जमीन पर बैठकर रो पड़ी, साँस जैसे दोबारा लौटी हो। उसी समय रवि भी अस्पताल पहुँचा। काव्या उसे देखते ही दौड़ी और उसकी आँखें भर आईं।

“रवि, तुमने सिर्फ मेरी जान नहीं बचाई, तुमने मेरी दुनिया बचा ली।”

रवि ने कान छुआ, “मैडम, मैंने कुछ नहीं किया, यह सब ऊपर वाले का किया हुआ है।”

डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा, “यह ऊपर वाला शायद रवि के रूप में आया है।”

कुछ देर बाद विक्रम होश में आया, कमजोर आवाज में बोला, “रवि, मुझे माफ करना, तुम्हें पहचान नहीं पाया पहले। पर आज समझ आया कि सबसे अमीर वही होता है जिसके दिल में इंसानियत हो।”

रवि की आँखें भीग गईं। काव्या ने बच्चे को रवि की गोद में रखते हुए कहा, “यह बच्चा बिना बोले भी तुम्हारा धन्यवाद करता है रवि, क्योंकि अगर तुम ना होते तो इसकी दुनिया अधूरी रह जाती।”

रवि बच्चे के हाथ को पकड़कर बोला, “मैडम, मैंने कुछ नहीं किया। मैं सिर्फ अपना फर्ज निभा रहा था।”

सच में उस पल हर किसी को लग रहा था कि इंसानियत अगर किसी ने जिंदा रखी है, तो वह रवि जैसे लोग हैं।

प्रेरणा

तो दोस्तों, अगर आप अमीर होकर भी दिल से गरीब हैं, तो आपका कुछ नहीं। लेकिन अगर आप गरीब होकर भी दिल से अमीर हैं, तो दुनिया आपके लिए एक ना एक दिन दरवाजे खोल ही देती है।

रवि की कहानी लखनऊ के हर कोने में गूँजने लगी। उसकी वर्कशॉप अब सिर्फ एक दुकान नहीं थी, वह उम्मीद का केंद्र बन चुकी थी। गरीब लड़के वहाँ काम सीखते, ग्राहक वहाँ भरोसा लेकर आते, और हर कोई रवि की ईमानदारी की मिसाल देता।

रवि ने कभी किसी को पैसे के लिए ठुकराया नहीं, कभी किसी की मजबूरी का फायदा नहीं उठाया। उसकी दुकान का बोर्ड हर सुबह चमकता – रवि मोटर्स – ईमानदारी का भरोसा। और रवि हर दिन भगवान का धन्यवाद करता, “जो दिया है, उसी में खुश रहना है।”