तीन बहनें 1999 में लापता हो गईं — 15 साल बाद, एक भूली-बिसरी तस्वीर भयावह सच उजागर करती है

.
.

तीन बहनें 1999 में लापता हो गईं — 15 साल बाद एक भूली-बिसरी तस्वीर ने भयावह सच खोल दिया

जयपुर की वह सुबह असहनीय गर्म थी। हवा में धूल के कण तैर रहे थे और किसी दूर के मंदिर से आती घंटियों की आवाज़ ऐसी लग रही थी, जैसे शहर किसी पुराने दुःख का जाप कर रहा हो। आश्रम के छोटे-से कमरे में लगभग सत्तर वर्ष की मीरा खिड़की के पास बैठी थी। सामने पीपल का पेड़ था—वही पेड़ जिसकी छाया में लोग थकान उतारने आते थे। मीरा के लिए वह पेड़ समय की तरह था: स्थिर, मौन और सब कुछ देखता हुआ।

मीरा की गोद में एक लिफाफा रखा था। वह लिफाफा बिना नाम के था, बिना पते के—बस आश्रम का पता और उसके नाम का एक मोटा-सा लिखावट में जिक्र। ऐसा अनाम लिफाफा किसी शुभ समाचार जैसा नहीं लगता। वह कुछ ऐसा था जो दरवाज़ा खटखटाकर नहीं आता—सीधे भीतर घुसता है, और भीतर की दीवारें हिला देता है।

मीरा की उंगलियाँ काँप रही थीं। उसने लिफाफे को उलट-पलट कर देखा, जैसे किसी और संकेत की तलाश कर रही हो—किसी परिचित हस्ताक्षर, किसी मुहर, किसी कागज़ की खुशबू। मगर कुछ नहीं। केवल कागज़ की सूखी गंध और एक अनकही बेचैनी।

पिछले पंद्रह सालों से मीरा ने अपनी तीन बेटियों के गायब होने का दर्द चुपचाप जिया था। वह दर्द ऐसा था जैसे किसी ने उसकी छाती में चुप्पी की कील ठोक दी हो। वह रोती थी तो भी धीमे—जैसे रोना भी किसी अपराध की तरह हो। उसने बेटियों के नाम—अनन्या, दिव्या, प्रिया—अपने भीतर ऐसे छुपाए जैसे लोग देवताओं के नाम छुपाकर जपते हैं। सुबह उठते ही उनके नाम, रात सोते समय उनके नाम। कभी-कभी सपनों में उनकी हँसी सुनाई देती, तो वह जागकर तकिए को भींच लेती—क्योंकि हकीकत में उनकी हँसी अब सिर्फ स्मृति थी।

1999 का वह दिन उसकी जिंदगी का सबसे काला दिन था। एक पल में उसके घर की रौशनी बुझ गई थी। पुलिस, मोहल्ले, रिश्तेदार—सबने ढूंढा, पूछा, समझाया, सांत्वना दी, आश्वासन दिए। धीरे-धीरे सब थक गए। दुनिया अपने कामों में लौट गई। और मीरा अकेली रह गई, एक ऐसी माँ की तरह जिसके हाथों से समय ने उसकी संतान छीन ली हो।

आज, पंद्रह साल बाद, यह लिफाफा उसके सामने था।

उसने धीरे-धीरे लिफाफा खोला। भीतर एक तस्वीर थी। जैसे ही तस्वीर बाहर निकली, मीरा की सांस अटक गई। उसकी आँखें फैल गईं, चेहरा पीला पड़ गया। तस्वीर में उसकी तीनों बेटियाँ थीं—अनन्या, दिव्या और प्रिया—जीवित, मुस्कुराती हुईं। वे किसी रंगीन मेले या उत्सव के बीच खड़ी थीं। पीछे रंगोली थी, फूलों की मालाएँ थीं, और मंदिर की एक झलक दिखाई देती थी। मीरा ने तस्वीर को इस तरह देखा जैसे कोई डूबता हुआ इंसान आखिरी सांस में हवा खोजता है।

पर अगले ही पल उसकी रूह काँप गई।

तस्वीर के पीछे, थोड़ा धुंधला पर पहचान में आने वाला, एक चेहरा था। एक चेहरा जो उसके अपने परिवार से था। वही चेहरा जिसने वर्षों तक कसम खाई थी कि उसे कुछ नहीं पता। मीरा की उंगलियों से तस्वीर फिसलते-फिसलते बची। उसका दिल इतनी ज़ोर से धड़कने लगा कि उसे लगा छाती फट जाएगी।

“यह… यह कैसे हो सकता है?” उसके होंठ हिले, आवाज़ नहीं निकली।

उसके सामने दीवार, पीपल की छाया, आश्रम का कमरा—सब घूमने लगा। और अगले पल वह जमीन पर गिर पड़ी।

जब होश आया, चारों तरफ आश्रम की महिलाएँ थीं। कोई माथे पर पानी के छींटे दे रही थी, कोई हाथ सहला रही थी। मगर मीरा की आँखें दीवार पर पड़ी तस्वीर पर जमी थीं।

“वह उनके साथ क्यों था?” मीरा बुदबुदाई। “क्यों?”

किसी को समझ नहीं आया कि वह किसकी बात कर रही है। लेकिन मीरा समझ चुकी थी—अब उसे जयपुर लौटना होगा। उस शहर में, जिसे उसने 15 साल पहले छोड़ दिया था। उन यादों के बीच, जिनसे भागकर वह आश्रम आई थी। अब भागना संभव नहीं था। क्योंकि सच ने उसकी देहरी पर दस्तक दे दी थी।

अगले दिन मीरा बस में बैठी जयपुर की ओर निकल पड़ी। रास्ते भर खिड़की से बाहर देखते हुए उसे हर मोड़, हर पेड़, हर खेत एक पुराने दर्द की तरह दिख रहा था। जैसे शहर उसे पहचान रहा हो। जैसे शहर कह रहा हो: “अब तुम्हें देखना ही पड़ेगा।”

जयपुर पहुँची तो मोहल्ले में लोगों की नजरें उस पर ऐसे टिक गईं जैसे वह कोई भूत हो। कुछ की आँखों में दया थी, कुछ में अपराधबोध, और कुछ में अजीब-सी बेचैनी। मीरा ने किसी की फुसफुसाहट सुनी—“देखो, मीरा वापस आ गई… इतने साल बाद…”

मीरा सीधे अपने पुराने घर के पास गई। घर अब वैसा नहीं था। दीवारें और पुरानी लग रही थीं, आँगन में खामोशी थी। उसे लगा जैसे उसके जाने के बाद घर ने भी सांस लेना छोड़ दिया हो।

पर वह घर देखने नहीं आई थी। वह सच खोजने आई थी।

उसके मन में एक नाम था—राजीव।

राजीव उसका भतीजा था, जिसे उसने बेटे की तरह पाला था। वही राजीव जो लड़कियों के गायब होने के कुछ महीनों बाद अचानक परिवार से अलग हो गया था। किसी ने कहा वह नौकरी के लिए बाहर चला गया। किसी ने कहा वह खुद टूट गया। पर मीरा जानती थी—उसकी आँखों में हमेशा एक अधूरी बात होती थी। एक डर, एक अपराधबोध।

मीरा ने पुराने बाजार में पूछताछ शुरू की। मसालों की गंध, सब्जियों की आवाज़ें, रिक्शों की घंटियाँ—सब वैसा ही था, पर मीरा के लिए सब कुछ बदल चुका था। लोग राजीव का नाम सुनकर नज़रें चुरा लेते। कोई कहता—“नहीं पता।” कोई कहता—“बहुत साल हो गए।”

तभी एक बूढ़ा आदमी, जो कभी उनके परिवार का करीबी था, धीरे से मीरा के पास आया। उसकी आँखें डर से भरी थीं। उसने मीरा को एक तरफ ले जाकर धीमे कहा, “राजीव 1999 में उस घूमने वाले धार्मिक मेले में काम करता था।”

मीरा का दिल धक से रह गया। “कौन सा मेला?”

बूढ़ा आदमी निगल गया। “लक्ष्मीनारायण मंदिर के पास… वही मेला।”

मीरा ने तस्वीर फिर से देखी। मंदिर की झलक… रंगोली… मालाएँ… सब मिल रहा था।

बूढ़ा आदमी ने मीरा का हाथ पकड़ लिया। “अकेले मत जाओ मीरा। कुछ सच्चाइयाँ इंसान को तोड़ देती हैं।”

मीरा ने अपना हाथ छुड़ाया। “मैं पंद्रह साल से टूटी हुई हूँ। अब और क्या टूटेगा?”

उसने राजीव का पुराना किराये का कमरा ढूँढा। मकान मालिक ने अनमने मन से अंदर जाने दिया। कमरा अब स्टोर बना था—धूल, पुराने बक्से, टूटी कुर्सियाँ। मीरा ने एक पुरानी अलमारी खोली। अंदर एक डायरी मिली। कई पन्ने फटे हुए थे, जैसे किसी ने जल्दी में कुछ छुपाया हो।

मीरा ने डायरी के आखिरी कवर पर लिखे शब्द पढ़े— “उन्हें वहाँ कभी नहीं होना चाहिए था।”

उसकी आँखें भर आईं। यह वाक्य किसी दबी चीख की तरह था। जैसे किसी ने सच लिखकर भी डर से उसे अधूरा छोड़ दिया हो।

उसी कमरे की दीवार पर एक पुराना-सा चिन्ह बना था। मीरा ने उसे गौर से देखा। उसे याद आया—यह लक्ष्मीनारायण मंदिर का प्रतीक था। उसी मंदिर के आसपास 1999 में एक बड़ा विवाद हुआ था। कई लोग कहते थे कि मंदिर के कुछ प्रभावशाली लोग गरीब परिवारों का शोषण करते हैं, झूठे वादे करते हैं। मीरा को याद आया—उस दिन उसकी बेटियाँ “विशेष पूजा” में जाने की बात कर रही थीं।

अगली सुबह मीरा मंदिर पहुँची। केसरिया-सफेद दीवारें, अगरबत्ती का धुआँ, घंटियों की आवाज़, भीड़ का शोर—सब कुछ भक्ति जैसा था, पर मीरा के भीतर डर और क्रोध की पूजा चल रही थी।

मंदिर के पिछवाड़े एक बूढ़ी औरत माला फेर रही थी। मीरा ने उससे पूछा, “क्या आप 1999 का मेला याद करती हैं?”

बूढ़ी ने धीरे से सिर हिलाया। मीरा ने तस्वीर दिखाई। बूढ़ी का चेहरा पीला पड़ गया। आँखों में पहचान की चमक आई, फिर डर।

“हाँ,” वह कांपती आवाज़ में बोली, “मैंने इन लड़कियों को देखा था… वे रो रही थीं।”

मीरा के पैरों तले जमीन खिसक गई। “रो रही थीं? किसके साथ?”

बूढ़ी ने होंठ काटे, इधर-उधर देखा, फिर बहुत धीमे बोली, “उसने कहा था… यह उनके भले के लिए है।”

“कौन?” मीरा ने झपटकर पूछा। “कौन उसने?”

पर बूढ़ी चुप हो गई। जैसे किसी अनदेखी दीवार ने उसका गला दबा दिया हो। उसने बस मंदिर के बाहर एक बंद पड़ी पुरानी दुकान की तरफ इशारा किया। “वहाँ जाओ… शायद कुछ मिल जाए।”

दुकान बंद थी, ताला जंग लगा था। मीरा ने चारों तरफ देखा—कोई नहीं। उसने दरवाजा धकेला। वह थोड़ा सा खुल गया। अंदर अंधेरा था, छत से टूटती धूप की पतली धारें, धूल की मोटी परत, मकड़ी के जाले। कोने में एक धातु का बक्सा पड़ा था।

मीरा ने कांपते हाथों से बक्सा खोला। अंदर दर्जनों पुरानी तस्वीरें थीं—सभी उसी मेले की। वह तस्वीरें पलटती रही, और फिर एक तस्वीर पर रुक गई। अनन्या—उसकी बड़ी बेटी—का चेहरा डरा हुआ था। वह पीछे मुड़कर देख रही थी, जैसे किसी से बचकर भाग रही हो।

मीरा की आँखों से आँसू बह निकले।

तभी दरवाज़े पर एक परछाईं पड़ी। किसी के कदमों की आहट। एक आदमी अंदर आया। मध्यम उम्र, सांवली त्वचा, सफेद बालों में काले बाल, और चेहरे पर कठोर गंभीरता।

उसने मीरा को देखा और धीमे कहा, “आप मीरा हैं ना… राजीव की मौसी?”

मीरा चौक गई। “आप कौन हैं?”

“मेरा नाम विक्रम है,” उसने कहा। “मैं 1999 में उस मेले में सुरक्षा का काम करता था।”

मीरा का दिल धड़कने लगा। “आप… मेरी बेटियों को जानते हैं?”

विक्रम ने सिर हिलाया। “हाँ। वे उस दिन बहुत डरी हुई थीं। और… राजीव भी वहाँ था।”

“राजीव?” मीरा का गला सूख गया।

विक्रम ने झिझकते हुए कहा, “मैंने राजीव को किसी से बहस करते देखा था। बहुत तेज़ बहस। हाथापाई तक हो गई थी। लड़कियों के गायब होने से कुछ घंटे पहले।”

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया। “किससे? किससे बहस कर रहा था?”

विक्रम की आँखों में डर उतर आया। “मुझे तब नाम नहीं पता था। पर बाद में पता चला…”

वह रुक गया, जैसे शब्दों में आग हो।

मीरा ने काँपती आवाज़ में कहा, “कृपया बताइए। पंद्रह साल… पंद्रह साल मैंने यह दर्द जिया है।”

विक्रम ने जेब से एक पुराना कागज निकाला और मीरा को दे दिया। “यह नाम है… वही आदमी, जिसके साथ राजीव लड़ रहा था।”

मीरा ने कागज खोला। नाम पढ़ते ही उसका शरीर जैसे पत्थर हो गया।

अरविंद।

उसका पूर्व पति।

वही आदमी जिसने सालों पहले घर छोड़ दिया था। वही जिसके बारे में सबने कहा था कि वह दूर चला गया—मुंबई, दिल्ली, कहीं भी। पर नाम का यह कागज कह रहा था: अरविंद उस दिन वहाँ था।

मीरा की आँखों के सामने अंधेरा छा गया। “यह… यह संभव नहीं।”

विक्रम ने धीरे से कहा, “वह अभी भी जयपुर में है। वर्षों से। मैं आपको पता दे सकता हूँ… पर संभलकर।”

मीरा ने बिना सोचे कहा, “मुझे पता चाहिए।”

अगली सुबह मीरा जयपुर के दक्षिणी हिस्से की एक संकरी गली में पहुँची। पुराने मकान, दीवारों पर पान के दाग, हवा में तली हुई पूड़ियों की खुशबू। एक छोटे से घर के सामने उसने दरवाजा खटखटाया।

दरवाज़ा खुला।

सामने अरविंद खड़ा था—बूढ़ा, झुका हुआ, सफेद दाढ़ी, आँखों में ऐसा अपराधबोध जैसे वह हर रात खुद से हारता हो।

मीरा को देखते ही उसका चेहरा पीला पड़ गया। वह पीछे हट गया, जैसे भूत देख लिया हो।

मीरा ने बिना एक शब्द कहे तस्वीर निकाली और उसके सामने रख दी।

अरविंद की नजर तस्वीर पर पड़ी और उसके घुटने जवाब दे गए। वह चौखट पकड़कर गिरते-गिरते बचा। उसके मुँह से सिसकी निकली, “यह… यह तस्वीर कहाँ से मिली तुम्हें?”

मीरा की आवाज़ पत्थर जैसी कठोर थी। “डाक में। अब सच बताओ। उस दिन क्या हुआ? तुम वहाँ क्यों थे?”

अरविंद अंदर भागा और कुर्सी पर गिर पड़ा। उसने चेहरा हाथों में छुपा लिया। “मीरा… मैं…”

“बोलो!” मीरा लगभग चिल्लाई। “पंद्रह साल से मैं टूट रही हूँ। तुम चुप कैसे रह सकते हो?”

अरविंद ने धीरे-धीरे चेहरा उठाया। आँखें लाल थीं। “मुझे उस दिन के बारे में कुछ पता था… पर मैं कुछ नहीं कर सका।”

मीरा की सांस काँप गई। “क्या मतलब?”

अरविंद की आवाज़ टूटी। “राजीव… वह कुछ रोकना चाहता था। मैंने भी कोशिश की। पर हम देर से पहुँचे।”

“मेरी बेटियाँ?” मीरा ने काँपते हुए पूछा।

अरविंद ने सिर झुका लिया। “वे… वे जा चुकी थीं।”

मीरा रो पड़ी। “तुमने हमें छोड़ा क्यों? अगर तुम्हें पता था तो तुमने पुलिस को क्यों नहीं बताया?”

अरविंद ने कांपते हाथों से छाती पकड़ ली। “मैंने तुम्हें नहीं छोड़ा था, मीरा। मुझे छोड़ना पड़ा। मुझे धमकाया गया था। मुझे डर था कि अगर मैं रहा तो… वे तुम्हें और लड़कियों को…”

वह वाक्य अधूरा रह गया, लेकिन मीरा समझ गई: डर।

अरविंद उठकर एक पुराने बक्से के पास गया। उसने उसमें से कुछ निकाला और मीरा के हाथ में रख दिया। एक टूटा हुआ कड़ा—प्रिया का।

मीरा ने कड़ा देखते ही उसे सीने से लगा लिया। उसकी चीख भीतर ही भीतर फूट गई।

अरविंद ने कहा, “यह मुझे मेले के बाद एक गली में मिला था। मैंने इसे संभालकर रखा… क्योंकि मैं खुद को माफ नहीं कर पाया।”

मीरा ने आँसुओं के बीच पूछा, “तो अब बताओ… क्या करूँ?”

अरविंद ने धीमे कहा, “एक आदमी है… जिसके चेहरे पर बड़ा निशान है। वही जानता है कि उस दिन सच में क्या हुआ।”

.

अगले कई दिनों तक मीरा जयपुर की गलियों में भटकी। रिक्शा स्टैंड, चाय की दुकानें, मंदिर के आसपास, पुराने मोहल्ले—हर जगह पूछती रही। अंत में एक मोची ने बताया कि मंदिर के पास एक स्वास्थ्य शिविर में एक डॉक्टर काम करता था, जिसके गाल पर पुराना निशान है।

मीरा उसी दिन वहाँ पहुँची।

एक साधारण-सी इमारत। भीतर दवाइयों की गंध, बच्चों के रोने की आवाज़, मरीजों की भीड़। मीरा ने पूछताछ की। “डॉक्टर मनोज कहाँ मिलेंगे?”

कमरे के भीतर सफेद कोट में एक आदमी बैठा था। बाएँ गाल पर गहरा निशान। उसने मीरा को देखा, “जी, आप?”

मीरा ने तस्वीर उसके सामने रख दी। डॉक्टर का चेहरा तनाव से भर गया। वह देर तक तस्वीर को देखता रहा। फिर धीमे बोला, “आप इन लड़कियों की माँ हैं।”

मीरा ने सिर हिलाया। “बताइए… मेरी बेटियों के साथ क्या हुआ?”

डॉक्टर मनोज ने गहरी सांस ली। “मैं राजीव को जानता था। वह उस मेले में मेरे साथ काम करता था। उस दिन वह परेशान था। उसने कहा था कि कुछ बहुत गलत होने वाला है… वह उसे रोकना चाहता है।”

मीरा की आँखों में आँसू फिर भर आए। “राजीव कहाँ है?”

मनोज कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “मुझे आपको चेतावनी देनी होगी—सच जानकर आपका परिवार कभी पहले जैसा नहीं रहेगा।”

मीरा ने कहा, “मेरा परिवार पंद्रह साल पहले ही खत्म हो गया था, डॉक्टर।”

मनोज ने अलमारी से एक बंद बक्सा निकाला। “राजीव ने यह मेरे पास छोड़ा था। कहा था—अगर कभी कोई उन तीन बहनों के बारे में पूछे, तो यह दे देना। मैं इसे खोल नहीं पाया।”

उसने चाबी मीरा को दी।

मीरा ने कांपते हाथों से बक्सा खोला। अंदर कागजात थे, एक डायरी, और एक तस्वीर। वह तस्वीर पहली तस्वीर से कुछ मिनट पहले की थी—उसमें तीनों लड़कियाँ राजीव की तरफ देख रही थीं। उनकी आँखों में याचना और डर था। जैसे वे मदद माँग रही हों।

मीरा के होंठ काँपने लगे। “राजीव… तुमने क्या किया?”

मनोज ने धीरे से कहा, “राजीव का पता मेरे पास है। जयपुर से लगभग पचास किलोमीटर दूर एक गाँव में रहता है।”

अगली सुबह मीरा बस में बैठकर गाँव की तरफ निकल पड़ी। रास्ते में खेत, कुएँ, मिट्टी की सड़कें, सड़क किनारे बैठे बूढ़े—सब सामान्य था, मगर मीरा के भीतर तूफान था। उसे डर था कि सच उसे खत्म कर देगा। पर एक माँ का दिल सच से भाग नहीं सकता।

गाँव के बाहर एक झोपड़ी के सामने वह रुकी। एक दुबला-पतला आदमी पानी भर रहा था। सफेद बाल, झुका हुआ शरीर, चेहरे पर झुर्रियाँ और आँखों में वही अपराधबोध—राजीव।

मीरा को देखते ही उसके हाथ से गिलास गिर गया और टूट गया। वह पीछे हटने लगा, जैसे भाग जाना चाहता हो, मगर पैर जम गए।

मीरा ने धीमे कहा, “राजीव… मुझे तुमसे बात करनी है।”

राजीव की आँखों में आँसू आ गए। उसने चेहरा हाथों में छुपा लिया। “मौसी… मुझे पता था आप एक दिन आओगी। मैं इंतजार भी कर रहा था और डर भी रहा था।”

मीरा ने तस्वीर उसके सामने रख दी। राजीव ने देखा और काँप गया। वह जमीन पर बैठ गया, रोने लगा। “मुझे माफ कर दो… मुझे माफ कर दो।”

मीरा ने उसके कंधे पकड़कर कहा, “माफी नहीं चाहिए। सच चाहिए। मेरी बेटियाँ कहाँ हैं?”

राजीव ने कांपती आवाज़ में कहा, “वे खोई नहीं थीं, मौसी… उन्हें छुपाया गया था।”

मीरा जैसे सुन्न हो गई। “छुपाया गया था? किसने?”

राजीव ने सिर झुका लिया। “उस दिन मेले में किसी ने सोचा कि लड़कियाँ खतरे में हैं। परिवार पर कर्ज था… खतरनाक लोग धमकी दे रहे थे। उस व्यक्ति ने सोचा—कुछ दिनों के लिए उन्हें सुरक्षित जगह छुपा देते हैं, फिर लौटा देंगे।”

“कौन था वह व्यक्ति?” मीरा की आवाज़ में आग थी।

राजीव की सांसें तेज़ हो गईं। “मैं… मैं रोकना चाहता था। अरविंद मामा भी। पर देर हो गई।”

मीरा चिल्लाई, “नाम बताओ!”

राजीव ने आँखें बंद कर लीं, जैसे आखिरी बचा हुआ साहस भी टूट रहा हो। फिर बहुत धीमे बोला, “वह… एक औरत थी। एक ऐसी औरत जिसे आप बहुत प्यार करती थीं।”

मीरा का दिल रुक गया। “कौन?”

राजीव ने शब्दों को जैसे ज़हर की तरह बाहर निकाला। “आपकी बड़ी बहन… सुधा बुआ।”

मीरा घुटनों के बल जमीन पर गिर गई। उसका मुँह खुला रह गया, पर आवाज़ नहीं निकली। उसकी बड़ी बहन सुधा—जिसने उसे माँ की तरह पाला था, जिसने उसके बच्चों को गोद में खिलाया था—वही?

राजीव ने रोते हुए आगे बताया। “सुधा बुआ डर गई थीं, मौसी। उन्हें लगा कि अगर वो लोग घर तक पहुँच गए तो लड़कियों को नुकसान होगा। उन्होंने सोचा—मेले की भीड़ में उन्हें कुछ दिनों के लिए एक परिचित के घर रख देते हैं। पर जब वे लड़कियों को ले जा रही थीं, लड़कियाँ डर गईं। उन्हें लगा अपहरण हो रहा है। वे रोने लगीं। और जब सुधा बुआ का ध्यान हटा… वे भाग गईं। भीड़ में तीनों बहनें बिछड़ गईं।”

मीरा ने फटी आवाज़ में पूछा, “फिर?”

“सुधा बुआ पागलों की तरह ढूंढती रहीं,” राजीव बोला, “पर नहीं मिलीं। उन्होंने किसी को सच नहीं बताया, क्योंकि उन्हें डर था कि पुलिस उन्हें अपराधी मानेगी। फिर परिवार की इज्जत… उनका डर… उनकी चुप्पी… सबने मिलकर सब कुछ दबा दिया।”

मीरा की आँखों से आँसू बहते रहे। पंद्रह साल का दर्द उसके भीतर से बह रहा था—कच्चे खून की तरह।

“मेरी बेटियाँ?” मीरा ने फिर पूछा, “वे… अब कहाँ हैं?”

राजीव ने सिर उठाया। “वे जीवित हैं, मौसी। मुझे पिछले साल पता चला। मेले में एक परिवार ने उन्हें खोया हुआ पाया था। उन्होंने अपनाकर पाला। उन्हें नहीं पता था कि कोई माँ पंद्रह साल से उन्हें ढूंढ रही है।”

मीरा के भीतर राहत और चोट एक साथ उठी। बेटियाँ जीवित थीं—पर पंद्रह साल दूर। पंद्रह साल बिना माँ के। पंद्रह साल बिना बेटियों के।

राजीव ने एक पता दिया।

कुछ दिनों बाद मीरा उस घर के सामने खड़ी थी। उसका दिल इतने ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे लगा वह गिर जाएगी। उसने दरवाज़ा खटखटाया।

दरवाज़ा खुला। एक औरत सामने आई। उसके पीछे—एक-एक करके तीन जवान औरतें बाहर आईं। उनके चेहरे बदले थे, शरीर बड़े हो गए थे, आँखों में जीवन की नई परतें थीं। मगर मीरा ने पहचान लिया। माँ का दिल पहचानता है—समय के पार भी।

अनन्या, दिव्या, प्रिया।

मीरा के होंठ काँपे। “मेरी… बेटियाँ…”

तीनों ने उसे अजनबी की तरह देखा, पर उनकी आँखों में भी कुछ हिला—एक अनजान परिचय, जैसे आत्मा किसी पुराने रिश्ते को पहचान रही हो। मीरा ने अपनी पुरानी तस्वीरें दिखाईं, बचपन की बातें बताईं, जन्म के निशान, नामों की कहानियाँ—और धीरे-धीरे उनकी आँखों में आँसू उतर आए।

वे समझ गईं।

तीनों ने मीरा के पैरों में गिरकर उसे पकड़ लिया। मीरा उन्हें सीने से लगा कर रो पड़ी। यह रोना पंद्रह साल का था। यह मिलन ऐसा था कि घर के भीतर खड़े लोग भी रो पड़े।

लड़कियों ने बताया कि जिस परिवार ने उन्हें पाला, उसने उन्हें बहुत प्यार दिया। मगर भीतर हमेशा एक खालीपन था। कभी-कभी वे सपने में किसी औरत को देखतीं जो उन्हें पुकारती थी। वे नहीं जानती थीं कि वह माँ थी—मीरा।

अब वे जान गईं।

मीरा ने उस दिन समझा कि सबसे भयावह चीज बेटियों का गायब होना नहीं था। सबसे भयावह चीज थी—चुप्पी। डर, शर्म, झूठ और “इज्जत” के नाम पर परिवार ने जो मौन ओढ़ा, वही असली अपराध था। अगर उस दिन किसी ने साहस किया होता, अगर सच बोल दिया होता, तो पंद्रह साल का दर्द शायद कुछ दिनों में सिमट जाता।

मीरा ने सुधा से फिर कभी बात नहीं की। सुधा ने माफी मांगने की कोशिश की, पर कुछ घाव इतने गहरे होते हैं कि माफी भी उन्हें भर नहीं पाती। राजीव लौट आया—टूटा हुआ, पर सच बोलकर हल्का। अरविंद भी दूर से ही सही, अपने अपराधबोध के साथ झुककर खड़ा रहा।

कुछ महीनों बाद मीरा ने एक नई तस्वीर खिंचवाई—तीनों बेटियों के साथ। फिर उसने वह पुरानी तस्वीर भी दीवार पर लगाई, जिसे डाक ने उसकी जिंदगी में वापस फेंका था। पुरानी तस्वीर उसके अतीत की चोट थी, नई तस्वीर उसके वर्तमान का मरहम।

और मीरा ने अपनी बेटियों से कहा, “राज हमें सुरक्षित नहीं रखते। वे हमें अलग करते हैं। सच चाहे कितना भी कड़वा हो, चुप्पी से बेहतर होता है।”

उस दिन पहली बार, पंद्रह साल बाद, मीरा ने चैन की सांस ली। क्योंकि अब उसकी प्रार्थनाओं में नाम सिर्फ जीवित नहीं थे—वे सामने थे। साँस लेते, हँसते, रोते, और उसे माँ कहकर पुकारते हुए।