अरबपति ने सब्ज़ी वाली को थप्पड़ मारा, पर निशान देखकर सन्न रह गया — वो उसकी खोई दादी थी!
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“अमीर औरत ने कुचली गरीब बूढ़ी दादी की इज्ज़त, अब मिलेगा कर्मों का फल” — Heart Touching Story
कहते हैं कि इंसान की नियत और कर्म ही उसकी असली पहचान होते हैं। और जब दौलत का नशा सिर चढ़कर बोलता है, तो इंसान अपने सबसे नजदीकी लोगों को भी भूल जाता है। वह सोचने लगता है कि उसने अपने जीवन का मकसद पूरा कर लिया है, अब तो बस अपने आराम और शोहरत का ही राज है। लेकिन असली परीक्षा तो तब शुरू होती है जब उसकी सारी दौलत और रुतबा उसके सामने बिखर जाता है।
यह कहानी है उस अमीर औरत की, जिसने अपनी ही एक बूढ़ी, गरीब औरत की इज्जत को कुचल दिया। उस बूढ़ी औरत का नाम है सावित्री देवी, जो अपने छोटे से घर में रहती थी। उसके पास ना तो कोई दौलत थी, ना ही कोई शोहरत। बस एक छोटी सी झोपड़ी, कुछ सब्जियां और अपने संघर्ष का अनुभव। वह अपनी जिंदगी में बहुत कुछ सह चुकी थी, लेकिन अपने आत्मसम्मान और ईमानदारी को कभी नहीं खोया।
वहीं, दूसरी तरफ था आरव मल्होत्रा, एक युवा बिजनेसमैन, जो अपने कारोबार में इतना मशहूर था कि शहर का हर आदमी उसकी तारीफ करता था। उसकी गाड़ी, उसकी शान-शौकत, सब कुछ उसके अहंकार का परिचायक था। लेकिन उस रात उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा हादसा होने वाला था।
सुधा की कहानी
सुधा एक साधारण सी महिला थी, जो अपने छोटे से घर में रहती थी। उसके पति का देहांत हो चुका था। अब वह अपने बच्चे मुन्ना के साथ मेहनत-मजूरी कर अपना जीवन यापन करती थी। उसका हुनर बहुत अच्छा था—वह कपड़ों पर जरी का काम करती थी। उसकी मेहनत का फल था एक खास दुपट्टा, जिसे उसने दो महीने की मेहनत और पसीने से बनाया था। वह दुपट्टा उसकी बेटी का भविष्य था, उसकी मेहनत का प्रतीक।
उसके पास एक सपना था—अपने बेटे को पढ़ा-लिखा कर इतना काबिल बनाना कि वह कभी किसी के आगे हाथ न फैलाए। वह रोज़ सुबह से शाम तक अपने हुनर का सहारा लेकर मेहनत करती। गांव के बाजार में अपने बनाए कपड़ों को बेचती और अपने बेटे का भविष्य संवारती।
एक दिन, उस गरीब बूढ़ी महिला का एक छोटा सा टुकड़ा भी उसकी आंखों को खटक गया। वह उस दिन बाजार में थी, जब तेज धूप में वह अपने सब्जियों का थैला लेकर घर लौट रही थी। तभी, उसकी छोटी सी दुकान पर एक अमीर औरत, विमला सेठानी, पहुंची। वह अपने आलीशान गाड़ी से उतरी, और उसकी चमकती साड़ी, सोने का हार और रुतबा देखकर हर कोई दंग रह गया।
विमला सेठानी, जो अपने घमंड और रुतबे के लिए पूरे इलाके में मशहूर थी, अपने इस अमीरपन पर बहुत गर्व करती थी। उसका मानना था कि गरीब का काम सिर्फ उसके लिए मशीन बनना है—जिसमें भावना नहीं, इज्जत नहीं। वह हर किसी को अपने पैरों तले कुचलने का हक समझती थी।
उस दिन, जब वह अपने आलीशान हवेली की ओर बढ़ रही थी, तो अचानक उसकी नजर उस बूढ़ी औरत पर पड़ी। वह बूढ़ी औरत, जो अपने छोटे से घर में सब्जियां बेच रही थी, अपने ही हाथों से सब्जियों को धो रही थी। उसकी आंखें बूढ़ी और कमजोर थीं, लेकिन उसकी कलाई पर एक पुराना पान का पत्ता का निशान था। वह निशान, जो कई साल पहले ही गायब हो चुका था।
वह बूढ़ी औरत, जिसे लोग सावित्री देवी कहते थे, अपने उस निशान को देखकर चौंक गई। उसकी आंखें चमक उठीं। वह तुरंत समझ गई कि यह निशान उसकी दादी का है। वह निशान, जो उसके बचपन की यादें ताजा कर रहा था।
विमला सेठानी ने अपने अहंकार के साथ उस बूढ़ी औरत को देखा, और बिना किसी हिचकिचाहट के, अपने गुस्से और घमंड का प्रदर्शन करने लगी। उसने उस बूढ़ी औरत का हाथ पकड़कर कहा, “यह क्या कर रही हो? तुम जैसी गरीब औरतें सड़क पर ही ठीक होती हैं।”
उसने अपने हाथ में रखे पैसे उस बूढ़ी औरत के मुंह पर दे मारे। वह पैसे, जो उसकी मेहनत का फल नहीं बल्कि उसकी बदनसीबी का प्रतीक थे। वह बूढ़ी औरत, जो अपने संघर्ष में बहुत कुछ सह चुकी थी, वह झुकी और अपने सब्जियों को समेटने लगी।

उस समय, वह बूढ़ी औरत अपनी सारी गरिमा और आत्मसम्मान के साथ खड़ी थी। उसकी आंखें गुस्से और पीड़ा से भरी थीं, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। उसकी आंखों में एक चमक थी—जैसे वह अपने अपमान को सहने का साहस जुटा रही हो।
वह बूढ़ी औरत, जिसने अपने जीवन में बहुत कुछ सहा था, अपने उस निशान को देख रही थी। वह निशान, जो उसके बचपन का हिस्सा था। वह निशान, जो उसके जीवन के संघर्ष का प्रतीक था।
और उस पल, आरव का गुस्सा फूट पड़ा। उसने अपने हाथ में रखे पैसे, जो उसकी दौलत और रुतबे का प्रतीक थे, को देखकर उसकी आंखें लाल हो गईं। उसने बिना सोचे-समझे, उस बूढ़ी औरत के गाल पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिया।
थप्पड़ की आवाज़ पूरे बाजार में गूंज गई। हर कोई चौंक गया। कुछ लोग अपने फोन निकालकर वीडियो बनाने लगे। उस बूढ़ी औरत का शरीर लड़खड़ा गया। उसका पल्लू सरक गया और उसके बाल बिखर गए। वह लड़खड़ा कर गिरने ही वाली थी कि उसकी साड़ी की ढीली आस्तीन ऊपर सरक गई।
उस समय, आरव को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसे पीछे से खींच लिया हो। उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। उसकी नजरें उस निशान पर गई, जो उसकी आंखों के सामने घूम रहा था। वह निशान, जो उसकी दादी मां का था। वह निशान, जो उसकी बचपन की यादों का हिस्सा था।
वह बूढ़ी औरत, जो अपने संघर्ष और अपमान के बीच भी अपने आत्मसम्मान को बचाए रखी थी, उसकी आंखों में आंसू आ गए। वह अपने उस अपमान को सह रही थी, जैसे वह उसकी रोज की आदत हो। उसकी आंखें उसके दर्द को छुपाने की कोशिश कर रही थीं।
आखिरकार, वह बूढ़ी औरत अपने घर लौट गई। उसकी आंखें भर आईं। उसने अपने हाथ में पड़ा वह पुराना रुमाल उठाया, जिस पर पान का निशान था। वह निशान, जो उसके जीवन का सबसे बड़ा राज था।
कहते हैं कि कर्म का फल कभी देर नहीं करता। और उस रात, उस बूढ़ी औरत का कर्म उसकी आंखों के सामने ही फल देने लगा। अगले ही दिन, वह अपने घर लौट गई। उसकी हालत इतनी कमजोर थी कि वह खुद से चल भी नहीं सकती थी।
वह घर पहुंची, तो उसकी आंखें लाल थीं। उसकी आंखों में एक नया विश्वास जाग रहा था। उसने अपने उस रुमाल को देखा, और उसकी आंखें भर आईं। वह जान गई कि उसकी मेहनत और संघर्ष का फल आखिरकार उसे मिल ही जाएगा।
कुछ ही दिनों बाद, उस गांव में एक नई शुरुआत हुई। उस बूढ़ी औरत का नाम था सावित्री देवी। उसकी मेहनत और ईमानदारी का फल मिला। उसकी बनाई हुई सब्जियों की मांग पूरे इलाके में हो गई। वह अब उस गरीब बूढ़ी औरत से नहीं, बल्कि उस इलाके की सम्मानित महिला बन चुकी थी।
वहीं, उस अमीर औरत का घमंड और रुतबा, जो उसकी दौलत और शोहरत पर टिका था, एक ही रात में ढह गया। उसकी सारी शान-शौकत मिट्टी में मिल गई। उसकी सारी दौलत और रुतबा उसकी ही गलतियों का परिणाम था।
कर्म का फल
कुछ वर्षों बाद, उस गांव का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। सुधा, उस मेहनती औरत ने अपने हुनर से अपने जीवन को नई दिशा दी। उसने अपने उस संघर्ष के बाद अपने हुनर को और निखारा। उसकी बनाई हुई साड़ियों और दुपट्टों की मांग पूरे जिले में फैल गई। वह अब उस गरीब औरत से नहीं, बल्कि उस इलाके की सम्मानित महिला बन चुकी थी।
उसके बेटे मुन्ना ने शहर के एक बड़े कॉलेज में दाखिला लिया। उसकी मंजिल बहुत ऊंची थी। वह अपने संघर्ष और मेहनत से साबित कर रहा था कि सफलता का रास्ता ईमानदारी और मेहनत से ही तय होता है।
वहीं, उस अमीर औरत का जीवन भी धीरे-धीरे बदलने लगा। उसकी सारी दौलत, उसका रुतबा, सब खत्म हो गया। उसकी जिंदगी में अकेलापन और पछतावा भर गया। वह अपने किए पर पछताती रही।
और अंततः, कर्म का फल उसे उसकी ही आंखों के सामने ही मिला। उसकी सारी दौलत, उसकी रुतबा और उसकी शान-शौकत, सब कुछ खत्म हो गया। वह एक गरीब बूढ़ी औरत की तरह ही रह गई, जो अपने संघर्ष और ईमानदारी का प्रतीक थी।
अंत में
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि इंसान की असली पहचान उसकी नियत और कर्म से ही होती है। दौलत और शोहरत अस्थायी हैं, लेकिन ईमानदारी और इंसानियत अमर हैं। जो भी कर्म करते हैं, उनका फल उन्हें जरूर मिलता है।
सावित्री देवी ने अपने संघर्ष और मेहनत से साबित कर दिया कि अगर नियत साफ हो, तो कीचड़ में भी कमल खिल सकता है। और उस बूढ़ी औरत की कहानी यह भी कहती है कि अंत में जो भी होता है, वह कर्म का फल ही होता है।
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