अकेली विधवा महिला बड़ी मुसीबत में थी… मगर फल वाले ने जो किया, इंसानियत रो पड़ी

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यह कहानी बिहार के सीतामढ़ी जिले के एक छोटे से गांव बसंतपुर की है। गांव छोटा था, लेकिन वहां रहने वाले लोगों के दिल बड़े थे। गांव के किनारे, खेतों के पास, एक पुरानी सी झोपड़ी थी। उसी झोपड़ी में सविता नाम की एक युवती अपने छोटे बेटे गोलू के साथ रहती थी।

सविता की उम्र मुश्किल से पच्चीस साल रही होगी। चेहरे पर मासूमियत थी, लेकिन आंखों में एक गहरा दर्द भी दिखाई देता था। जो लोग उसे पहले से जानते थे, वे कहते थे कि कभी सविता बहुत हंसमुख लड़की हुआ करती थी। वह पूरे गांव में हंसती-मुस्कुराती घूमती रहती थी। लेकिन अब उसकी मुस्कान जैसे कहीं खो गई थी।

कुछ साल पहले तक उसकी जिंदगी बिल्कुल अलग थी। सविता की शादी रामू नाम के एक मेहनती युवक से हुई थी। रामू ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था, लेकिन वह बहुत मेहनती और सीधा-सादा इंसान था। गांव में काम के ज्यादा मौके नहीं थे, इसलिए शादी के कुछ ही महीने बाद रामू कमाने के लिए दिल्ली चला गया।

दिल्ली में उसने एक फैक्ट्री में मजदूरी का काम शुरू किया। वहां उसे ज्यादा पैसे तो नहीं मिलते थे, लेकिन इतना जरूर था कि वह हर महीने थोड़ा-बहुत पैसा गांव भेज देता था। जब भी वह फोन करता, सविता से यही कहता, “बस थोड़ा इंतजार करो सविता, कुछ पैसे जमा हो जाएं, फिर मैं तुम्हें भी अपने साथ दिल्ली ले जाऊंगा।”

सविता को अपने पति पर पूरा भरोसा था। वह हर दिन उसी उम्मीद में जीती थी कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा।

शादी के एक साल बाद उनके घर एक बेटे का जन्म हुआ। रामू उस समय दिल्ली में था, लेकिन जब उसे यह खबर मिली तो वह खुशी से झूम उठा। वह तुरंत गांव आया और अपने बेटे को गोद में उठाकर देर तक उसे देखता रहा।

उसने मुस्कुराते हुए कहा, “यह तो बिल्कुल तोते जैसा है, बोलता भी रहेगा और शरारत भी करेगा। इसका नाम गोलू रखेंगे।”

उस दिन घर में बहुत खुशियां थीं। सविता को लगता था कि उसकी जिंदगी पूरी हो गई है।

लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था।

समय बीतता गया। रामू फिर से दिल्ली लौट गया और मेहनत करने लगा। करीब तीन साल तक जिंदगी किसी तरह चलती रही। सविता गांव में बेटे को संभालती और रामू के लौटने का इंतजार करती रहती।

एक दिन दोपहर का समय था। सविता अपने घर के बाहर बैठी गोलू को खाना खिला रही थी। तभी गांव के दो आदमी उसके घर की तरफ आते दिखाई दिए। उनके चेहरे पर अजीब सी गंभीरता थी।

सविता ने उन्हें देखते ही पूछा, “भैया क्या बात है?”

दोनों कुछ पल चुप रहे। फिर उनमें से एक ने धीरे से कहा, “सविता, हिम्मत रखना… रामू के साथ दिल्ली में हादसा हो गया।”

यह सुनते ही सविता के हाथ से कटोरी गिर गई। उसने घबराकर पूछा, “क्या हुआ? वह ठीक तो है ना?”

लेकिन अगले ही पल जो जवाब मिला, उसने उसकी दुनिया ही उजाड़ दी।

रामू अब इस दुनिया में नहीं रहा था।

दिल्ली की फैक्ट्री में एक बड़ा हादसा हुआ था और उसी हादसे में रामू की मौत हो गई थी। वहां मौजूद गांव के कुछ लोगों ने ही उसका अंतिम संस्कार कर दिया था।

यह खबर सुनते ही सविता जमीन पर बैठ गई और जोर-जोर से रोने लगी। उसका छोटा बेटा गोलू कुछ समझ नहीं पा रहा था। वह अपनी मां को रोता देख खुद भी रोने लगा।

उस दिन के बाद सविता की जिंदगी पूरी तरह बदल गई।

कुछ ही दिनों में उसके हाथों से लाल चूड़ियां उतर गईं। माथे का सिंदूर मिट गया। रंगीन साड़ियों की जगह सफेद कपड़ों ने ले ली।

अब वह एक विधवा बन चुकी थी।

गांव के लोग कुछ दिन तक सहानुभूति जताते रहे। लेकिन धीरे-धीरे सब अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए। सविता के ससुराल वालों ने भी ज्यादा साथ नहीं दिया।

आखिरकार उसे गांव के किनारे एक छोटी सी झोपड़ी में रहने के लिए छोड़ दिया गया।

अब वही झोपड़ी उसकी पूरी दुनिया बन गई थी।

दिन भर वह अपने बेटे को संभालती और किसी तरह जिंदगी गुजारती। लेकिन सबसे मुश्किल पल तब आता जब गोलू अपने पिता के बारे में सवाल पूछता।

एक दिन गोलू आंगन में बैठा अपनी लकड़ी की छोटी गाड़ी चला रहा था। अचानक उसने मासूमियत से पूछा, “मम्मी, पापा कब आएंगे?”

सविता चुप हो गई। उसकी आंखों में आंसू भर आए।

गोलू फिर बोला, “सब लोग कहते हैं पापा भगवान के पास चले गए। लेकिन अगर पापा गए हैं तो अपनी साइकिल क्यों नहीं ले गए?”

यह सुनकर सविता का दिल टूट गया। उसने गोलू को सीने से लगा लिया और रोने लगी।

उसी समय गांव की पगडंडी से एक आदमी अपना फल का ठेला लेकर गुजर रहा था। उसका नाम हरिराम था। वह रोज गांव-गांव घूमकर फल बेचता था।

उसी रास्ते से गुजरते हुए उसकी नजर गोलू पर पड़ी। गोलू उसे देखते ही दौड़कर उसके ठेले के पास पहुंच गया और बोला, “मुझे केला चाहिए।”

सविता ने तुरंत कहा, “नहीं गोलू, हमारे पास पैसे नहीं हैं।”

लेकिन गोलू रोने लगा।

हरिराम कुछ देर तक उस बच्चे को देखता रहा। फिर उसने बिना कुछ कहे चार केले उठाए और गोलू के हाथ में दे दिए।

सविता घबराकर बोली, “भैया, हमारे पास पैसे नहीं हैं।”

हरिराम मुस्कुराकर बोला, “कोई बात नहीं बहन, बच्चा रो रहा था इसलिए दे दिया।”

उस दिन के बाद जब भी हरिराम उस रास्ते से गुजरता, वह गोलू के लिए कुछ न कुछ जरूर ले आता।

धीरे-धीरे वह उस परिवार का हालचाल भी पूछने लगा।

लेकिन एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने सबको डरा दिया।

गांव में तीन ठग आए। वे साधु बनकर लोगों को धोखा देते थे। उन्होंने सुना कि सविता अकेली रहती है, तो उन्होंने उसे निशाना बनाने की योजना बना ली।

एक दिन वे साधु बनकर उसकी झोपड़ी पर पहुंचे और बोले कि वे उसके पति की आत्मा को वापस बुला सकते हैं।

दुख में डूबी सविता उनकी बातों में आ गई।

जैसे ही वह अंदर गई, तीनों ठग भी उसके पीछे अंदर घुस आए।

उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया और सविता को धमकाने लगे। एक ठग ने गोलू के पास चाकू रख दिया।

सविता डर से कांपने लगी।

उसी समय बाहर से आवाज आई — “गोलू बेटा!”

यह आवाज हरिराम की थी।

जब हरिराम ने अंदर झांका तो उसने सारा मंजर देख लिया। उसका खून खौल उठा।

उसने जोर से दरवाजा तोड़ा और अंदर घुस गया।

तीनों ठग भागने लगे, लेकिन हरिराम ने जोर-जोर से चिल्लाकर गांव वालों को बुला लिया।

गांव के लोग दौड़कर आए और तीनों को पकड़ लिया। बाद में पुलिस आई और उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

अगर उस दिन हरिराम समय पर नहीं पहुंचता, तो शायद बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता।

उस दिन के बाद सविता हरिराम को भगवान का भेजा हुआ इंसान मानने लगी।

हरिराम भी रोज वहां आने लगा, गोलू के साथ खेलता और सविता का हालचाल पूछता।

धीरे-धीरे उनके बीच विश्वास और अपनापन बढ़ने लगा।

कुछ साल बाद गांव के बुजुर्गों की मौजूदगी में सविता और हरिराम ने शादी कर ली।

गोलू उस दिन बहुत खुश था, क्योंकि उसे फिर से एक पिता मिल गया था।

सविता की जिंदगी में भी फिर से खुशियों की सुबह लौट आई।

यह कहानी हमें सिखाती है कि दुनिया में बुरे लोग जरूर होते हैं, लेकिन अच्छे लोग भी कम नहीं होते। कभी-कभी एक इंसान की छोटी सी हिम्मत किसी की पूरी जिंदगी बदल सकती है।