Baap Ne Betiyon Ko Akela Kyun Chhor Diya | Dada Ne Sahara Kyun Bana emotional islamic stories

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बाप ने बेटियों को अकेला क्यों छोड़ दिया — दादा ने सहारा क्यों दिया

“या अल्लाह, मेरे बेटे ने इन बच्चियों को छोड़ दिया। अब ये दोनों मेरी जिम्मेदारी हैं। तू ही इनकी हिफाज़त फरमा।”

यह कहानी एक ऐसे बाप की है, जो अपनी बेटियों को बोझ समझकर छोड़ गया था। दो जुड़वा बेटियां, जिनकी परवरिश उनके दादा के सहारे हुई। उन्होंने मेहनत की, सब्र किया और फिर अल्लाह ने ऐसा करम किया कि सब देखते रह गए। और उस बाप का क्या हुआ, जिसे छोड़ने का खामियाज़ा भुगतना पड़ा, उसे सुनकर आप भी रो पड़ेंगे।


गरीब बाप की मेहनत और उम्मीद

करीम बख्श एक गरीब आदमी था, जो एक छोटे से मिट्टी के घर में अपने बेटों और पत्नी के साथ रहता था। उसकी बीवी, जो इस दुनिया से रुखसत हो चुकी थी, के बिना उसका जीवन और भी मुश्किल हो गया था। वह अपना पेट भरने के लिए किसी भी काम को करने को तैयार था। कभी वह ईंटें उठाता, कभी खेतों में काम करता, कभी गांव में छोटे-मोटे काम कर लेता। लेकिन एक चीज में वह कभी समझौता नहीं करता था, वह था अपने बेटे इमरान की पढ़ाई।

करीम बख्श अपनी सारी जमा पूंजी अपने बेटे की शिक्षा पर खर्च करता था। वह खुद कम खर्च करता ताकि इमरान अच्छे से पढ़ सके। करीम बख्श की सारी उम्मीदें अपने बेटे से जुड़ी हुई थीं, और वह चाहता था कि इमरान पढ़-लिख कर अच्छी जिंदगी बिताए।


इमरान का परिवार से दूर जाने का फैसला

समय गुजरता गया, इमरान अब बच्चा नहीं रहा था। वह जवान हो चुका था, लेकिन उसके दिल में कहीं न कहीं उसके बाप की उम्मीदें पूरी करने का दबाव था। करीम बख्श अब पहले से ज्यादा कमजोर हो चुका था, लेकिन उसने मेहनत करना नहीं छोड़ा था। एक दिन करीम बख्श ने इमरान से कहा, “बेटा, मैंने तुझे पढ़ाया-लिखाया, पाला। अब मैं चाहता हूं कि तेरी शादी कर दूं। मेरी उम्र भी ढल रही है।”

इमरान ने कोई जवाब नहीं दिया, बस उसकी आंखों में हल्की सी मुस्कान आई और वह सिर झुका लिया। करीम बख्श ने यही समझा कि बेटा राजी है। करीम बख्श ने गांव में पड़ोस के घर एक लड़की से रिश्ता भेजा और लड़की वालों ने हां कर दी। यह शादी बहुत सादगी से हुई, लेकिन यह शादी सिर्फ करीम बख्श के लिए खुशी का मौका नहीं बनी।


इमरान की बीवी से दूरियां

शादी के बाद, फातिमा ने घर संभाल लिया, लेकिन इमरान अक्सर खामोश रहने लगा। वह बात कम करने लगा, अपनी बीवी से दूर रहने लगा। इमरान के दिल में अब भी एक और लड़की थी, और उसने इस राज को अपनी बीवी और बाप से छिपा रखा था। एक दिन फातिमा ने इमरान से कहा, “मैं मां बनने वाली हूं, और तुम बाप बनने वाले हो।”

फातिमा की आंखों में खुशी थी, लेकिन इमरान के चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी। उसने बस खामोशी से सिर हिलाया। इस खबर का इमरान पर कोई खास असर नहीं हुआ। उसकी दुनिया अब भी कहीं और थी।


फातिमा का इंतजार और इमरान का कर्तव्य से मुंह मोड़ना

फातिमा दिन-ब-दिन बीमार होने लगी, लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की। वह बच्चों की देखभाल करती रही, घर के सारे काम करती रही, और इमरान को खुद से दूर जाते हुए देखती रही। वह कभी भी अपनी समस्याओं को अपनी बीवी या बाप से नहीं कहती थी।

फिर एक दिन, फातिमा की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उसे अस्पताल ले जाया गया और डॉक्टर ने बताया कि वह जुड़वा बेटियों को जन्म देने वाली थी। करीम बख्श और इमरान अस्पताल पहुंचे, लेकिन इमरान पर इस खबर का कोई असर नहीं हुआ।


फातिमा का इंतकाल और करीम बख्श का दुख

कुछ समय बाद फातिमा का इंतकाल हो गया। करीम बख्श का दिल टूट गया। उसने अपनी बेटियों के लिए खुद को जिम्मेदार समझा और अब इन दोनों को पालने की जिम्मेदारी पूरी तरह से उसकी थी। लेकिन इमरान ने न तो अपनी बेटियों को अपनाया और न ही अपनी मां के इंतकाल का कोई अफसोस जताया।

करीम बख्श ने दोनों बेटियों का नाम रखा, इरा और मारिया। उन बेटियों के लिए ही उसने अपनी पूरी ज़िंदगी समर्पित कर दी। उनका दूध पिलाया, उन्हें घर संभालने की शिक्षा दी और उन्हें कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि उनका बाप उनके साथ नहीं है।


इमरान की वापसी और बेटियों से फिर से जुड़ने की कोशिश

कई सालों बाद, इमरान शहर में काम कर रहा था और एक दिन अचानक सड़क पर एक तेज़ रफ्तार गाड़ी ने उसे टक्कर मार दी। उसके पैर बुरी तरह घायल हो गए और वह व्हीलचेयर पर आ गया। इमरान का जीवन उस दिन एक ठहराव पर आकर रुक गया।

वह अपने घर वापस आया, लेकिन इस बार उसकी जिंदगी बिलकुल बदल चुकी थी। अब वह उस पुराने इमरान की तरह नहीं था, जो कभी अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेता था। अब उसे अपनी बेटियों की ज़रूरत महसूस हुई।


बेटियों का इमरान को माफ करना और घर वापस लौटना

इमरान ने अपनी बेटियों को ढूंढने का फैसला किया। वह अपने गांव लौट आया और पता चला कि इरा और मारिया अब खुशहाल जिंदगी जी रही थीं। दोनों बहनों ने इमरान को माफ कर दिया था, क्योंकि उनका दिल हमेशा अपनी मां और दादा के प्यार से भरा हुआ था।

इमरान ने अपनी बेटियों से माफी मांगी और यह समझा कि जिन चीजों को वह कभी बोझ समझता था, वही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन गई। बेटियों ने उसे माफ कर दिया और उसे अपने घर में स्वागत किया।


सीख और अंत

यह कहानी हमें सिखाती है कि कोई भी बाप अपनी बेटियों को कभी बोझ न समझे। बेटियां हमेशा हमारी ताकत होती हैं, जो हमें सबसे कठिन वक्त में सहारा देती हैं। इमरान का यह सफर एक बाप के लिए है, जो अपनी जिम्मेदारी से भाग गया था, लेकिन वक्त ने उसे उसकी गलती सिखा दी और उसकी बेटियों ने उसे माफ करके उसके जीवन को एक नया मोड़ दिया।