जिस पागल को लोग पत्थर मारते थे, उसकी झोपड़ी के सामने रुकीं 50 लाल बत्ती की गाड़ियां 😱

पागल मास्टर: कचरे से निकले कोहिनूर
भाग 1: अंधेरी रात और टिमटिमाती उम्मीद
सूरज ढल चुका था और रामपुर गांव की कच्ची सड़कों पर अंधेरा अपने पैर पसार रहा था। गांव के अधिकांश घरों में चूल्हे जल चुके थे और लोग थकान मिटाने के लिए बिस्तरों की ओर बढ़ रहे थे। लेकिन गांव के बाहर, उस गंदे कूड़े घर के पास जहाँ बदबू का राज था, एक टिमटिमाती स्ट्रीट लाइट के नीचे एक अजीब सा दृश्य रोज़ दिखाई देता था।
वहाँ एक बूढ़ा आदमी, जिसके बाल बेतरतीब बिखरे हुए थे और शरीर पर फटे-पुराने चिथड़े लटक रहे थे, हाथ में एक छड़ी लिए चिल्ला रहा था— “ए कालिया! सीधा बैठ! और मुन्नी, तू अपनी स्लेट ठीक से पकड़! अगर आज पहाड़ा याद नहीं हुआ, तो किसी को घर जाने नहीं दूँगा!”
वह आदमी देखने में किसी भिखारी से कम नहीं लगता था। गले में एक टूटी हुई स्लेट लटकी रहती थी और हाथ में हमेशा चौक का एक छोटा सा टुकड़ा। गांव वाले उसे ‘पागल मास्टर’ कहते थे। उसका असली नाम क्या था? यह शायद वह खुद भी भूल चुका था और गांव वालों ने कभी जानने की कोशिश भी नहीं की।
भाग 2: समाज का तिरस्कार
गांव के लोग उसे आते-जाते पत्थर मारते थे। बच्चे उसे चिढ़ाते थे, दुकानदार उसे अपनी दुकान के आगे से दुत्कार कर भगा देते थे। लोगों को लगता था कि यह पागल उनकी सुख-शांति और ‘ग्राहकी’ खराब कर देगा। लेकिन उस पागल मास्टर को दुनिया की किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था। उसका बस एक ही मिशन था—गांव के वे बच्चे जो कचरा बिनते थे, जो अनाथ थे, या जिनके गरीब माँ-बाप उन्हें मजदूरी पर भेज देते थे, उन्हें पकड़-पकड़ कर पढ़ाना।
रोज शाम को एक तमाशा होता था। पागल मास्टर दौड़-दौड़ कर कचरे के ढेर से बच्चों को पकड़ता। कोई बच्चा हाथ छुड़ाकर भागता, तो कोई उसे काट लेता। लेकिन वह हार नहीं मानता था। वह अपनी फटी जेब से कभी टॉफी निकालता, तो कभी बिस्कुट का एक टूटा हुआ टुकड़ा और बच्चों को लालच देकर उस स्ट्रीट लाइट के नीचे बिठाता।
गांव के लोग हंसते थे। “अरे ओ मास्टर! क्यों इन गधों को घोड़ा बनाने में लगा है? ये कचरा बिनने वाले हैं, कचरा ही बिनेंगे। इनके नसीब में कलम नहीं, कट्टा और कचरा लिखा है!” लेकिन मास्टर उनकी बातों का जवाब नहीं देता था। वह बस अपनी धुन में मगन रहता। उसकी आँखों में एक अजीब सी जिद्द थी।
भाग 3: ज़ुल्म और मास्टर का धैर्य
एक दिन गांव के सरपंच का बेटा, जो अपनी नई जीप के घमंड में चूर था, वहाँ से गुजरा। उसने देखा कि मास्टर सड़क के बीचों-बीच खड़ा होकर बच्चों को ‘क-ख-ग’ सिखा रहा है। सरपंच के बेटे ने ज़ोर से हॉर्न बजाया— “ए पागल! हट सामने से! मरने का शौक है क्या?”
मास्टर नहीं हटा। उसने निडर होकर कहा, “अरे भाई, गाड़ी धीरे चला। देख नहीं रहा बच्चे पढ़ रहे हैं? धूल उड़ेगी तो इनका ध्यान भटक जाएगा।”
सरपंच के बेटे को यह अपमान लगा। वह नीचे उतरा और उसने मास्टर को एक ज़ोरदार धक्का दिया। मास्टर नाली के कीचड़ में जा गिरा। बच्चे डर कर भाग गए। सरपंच का बेटा हंसा और बोला, “बड़ा आया कलेक्टर बनाने वाला! खुद के खाने के लाले हैं और चला है स्कूल खोलने!”
मास्टर कीचड़ में लथपथ था, उसके घुटने से खून बह रहा था। लेकिन उसने अपने दर्द की परवाह नहीं की। उसने नाली के कीचड़ में अपनी चौक ढूँढी और दीवार का सहारा लेकर खड़ा हुआ। उसने भागते हुए बच्चों को आवाज़ दी, “अरे रुको! डरो मत! यह तो बस एक मामूली आदमी है… शिक्षा से बड़ा कोई नहीं होता। वापस आ जाओ!”
उस रात बच्चे वापस नहीं आए, लेकिन मास्टर अकेला उस लाइट के नीचे बैठा रहा। वह अपने लिए नहीं, उन बच्चों के भविष्य के लिए रो रहा था।
भाग 4: एक अनकहा अतीत
सालों तक यही सिलसिला चला। मास्टर की हालत दिन-ब-दिन खराब होती गई, लेकिन उनकी आवाज़ का कड़कपन कम नहीं हुआ। धीरे-धीरे उन अनाथ बच्चों को उस पागल आदमी के अंदर एक पिता दिखाई देने लगा। मास्टर खुद नहीं खाता था, लेकिन बच्चों के लिए कहीं न कहीं से खाना माँग कर लाता। वह लोगों के जूते पॉलिश करता, बोझा ढोता और उन पैसों से बच्चों के लिए किताबें और पेंसिल खरीदता।
एक बार की बात है, कड़ाके की ठंड थी। मास्टर के पास एक ही पुराना कंबल था। उसने देखा कि कालिया नाम का अनाथ बच्चा ठंड से ठिठुर रहा है। मास्टर ने अपना कंबल कालिया को ओढ़ा दिया और खुद पूरी रात बर्फीली हवा में सिकुड़ कर बैठा रहा। अगली सुबह मास्टर को तेज़ बुखार हो गया। उस दिन पहली बार बच्चों ने अपनी मर्जी से किताबें उठाईं।
परंतु, इस पागल मास्टर का असली सच क्या था? असल में, वह कोई साधारण पागल नहीं था। वह कभी शहर की एक बड़ी यूनिवर्सिटी का गोल्ड मेडलिस्ट प्रोफेसर था—प्रोफेसर दीनानाथ। एक सड़क हादसे में उन्होंने अपनी पत्नी और इकलौते बच्चे को खो दिया था। उस हादसे का कारण एक अनपढ़ ड्राइवर और एक भ्रष्ट व्यवस्था थी। उस दिन उन्होंने कसम खाई थी कि वे केवल किताबों वाली पढ़ाई नहीं करवाएंगे, बल्कि उन बच्चों को ‘इंसान’ बनाएंगे जिन्हें दुनिया ‘जानवर’ समझती है।
भाग 5: विदाई और ताने
समय का पहिया घूमा। बच्चे अब बड़े हो रहे थे। मास्टर ने अपनी ज़िंदगी की जमा-पूंजी, जो उन्होंने एक-एक पैसा जोड़कर मटके में रखी थी, निकालकर बच्चों को दी। उन्होंने रोते हुए कहा, “जाओ! अब इस गांव में मत रुकना। शहर जाओ और अपनी दुनिया बदलो। लेकिन वादा करो कि जिस दिन कुछ बन जाओगे, उस दिन किसी गरीब का सहारा बनोगे।”
बच्चे रोते हुए मास्टर के पैर छूकर चले गए। गांव वालों ने फिर ताना मारा— “देखा! भगा दिया न बच्चों को? खा गया उनके पैसे। अब वे कभी नहीं लौटेंगे।”
मास्टर अब बिल्कुल अकेला हो गया था। वह रोज़ उसी स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठता और उन बच्चों की राह देखता। 20 साल गुजर गए। मास्टर अब इतना कमज़ोर हो गया था कि अपनी झोपड़ी से बाहर भी नहीं निकल पाता था। गांव वाले कहते, “अरे बुड्ढे, मरता क्यों नहीं? धरती पर बोझ बना है।”
भाग 6: 50 लाल बत्ती वाली गाड़ियों का काफिला
एक सुबह गांव के सरपंच ने फैसला किया कि मास्टर की झोपड़ी हटा दी जाए क्योंकि वह ‘गंदगी’ फैला रही थी। लोग लाठियां लेकर पहुँचे— “चल रे बुड्ढे! आज तेरा आखिरी दिन है।”
मास्टर ने हाथ जोड़े— “भैया, मुझे यहीं रहने दो। मेरे बच्चे आएंगे… मुझे इंतज़ार है।” लोग हंसने लगे, “कौन से बच्चे? वे तो कब के मर-खप गए होंगे।”
जैसे ही लोग उसे घसीटने वाले थे, तभी ज़मीन एक अजीब सी गड़गड़ाहट से हिलने लगी। आसमान में धूल का गुबार उठा। गाड़ियों का एक लंबा काफिला गांव की तरफ आ रहा था। सबसे आगे पुलिस की गाड़ियाँ थीं, जिनके सायरन से पूरा गांव गूँज उठा। उनके पीछे सफेद रंग की एंबेसडर और बड़ी-बड़ी एसयूवी गाड़ियाँ थीं। पूरी 50 गाड़ियाँ!
गाड़ियाँ सीधा उस कूड़े घर के पास रुकीं। गांव वाले फटी आँखों से देख रहे थे। गाड़ियों से ब्लैक कैट कमांडो बाहर निकले। पहली गाड़ी से एक लंबा आदमी उतरा, जिसकी वर्दी पर अशोक स्तंभ और सितारे चमक रहे थे—वह जिले का एसएसपी (SSP) था। दूसरी गाड़ी से जिले का कलेक्टर, तीसरी से राज्य का शिक्षा मंत्री, चौथी से एक मशहूर सर्जन… एक-एक कर 50 बड़े अधिकारी उतरे।
वे सब दौड़ते हुए उस टूटी झोपड़ी के अंदर गए और उस गंदी खाट के पास घुटनों के बल बैठ गए। एसएसपी साहब ने अपनी टोपी उतारकर मास्टर के पैरों में रख दी और बच्चों की तरह रोने लगे— “मास्टर जी… पहचानते नहीं? मैं कालिया हूँ! आपका कालिया। आज मैं इस जिले का पुलिस कप्तान हूँ।”
कलेक्टर मुन्नी आगे आई और मास्टर के सूखे हाथ अपने सिर पर रख लिए— “गुरु जी, मैं मुन्नी हूँ। आपने कहा था न कि दुनिया झुकेगी… देखिए, आज पूरा प्रशासन आपके कदमों में है।”
भाग 7: गुरु का अंतिम संदेश
यह नज़ारा देखकर गांव वालों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। सरपंच के हाथ से लाठी छूट गई। जिस आदमी को वे पागल कहते थे, वह इन ‘देश चलाने वालों’ का निर्माता था।
शिक्षा मंत्री, जो कभी मास्टर का ही छात्र था, उसने दहाड़ कर गांव वालों से कहा— “शर्म नहीं आती तुम लोगों को? जिस इंसान ने इस देश को इतने अधिकारी दिए, तुमने उसे जानवरों की तरह रखा? तुम जिसे पागल कहते हो, वह हम अनाथों का भगवान है!”
मास्टर की आँखों से आँसू बह रहे थे। उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा, “आ गए तुम लोग… मुझे पता था। आज मेरी तपस्या सफल हो गई। आज शिक्षा जीती है, नफरत हारी है।”
मास्टर की हालत बहुत नाज़ुक थी। डॉक्टरों की टीम ने वहीं झोपड़ी के बाहर एक अस्थायी आईसीयू बनाया। लेकिन मास्टर जानते थे कि उनका समय आ गया है। उन्होंने सबको पास बुलाया और कहा— “मेरे बच्चों… कभी अपनी कुर्सी का घमंड मत करना। जैसे मैंने तुम्हारा हाथ थामा था, तुम भी किसी गरीब का हाथ थामना। इस देश में कोई बच्चा अनपढ़ नहीं रहना चाहिए।”
इतना कहकर उस ‘पागल मास्टर’ ने अपनी आँखें हमेशा के लिए मूँद लीं। एक विजेता की तरह, एक राजा की तरह।
भाग 8: विरासत
मास्टर की अंतिम यात्रा में ऐसा जनसैलाब उमड़ा जो किसी प्रधानमंत्री की यात्रा में भी नहीं देखा गया था। 50 लाल बत्ती वाली गाड़ियों ने सायरन बजाकर उन्हें अंतिम सलामी दी। गांव का हर व्यक्ति रो रहा था—पछतावे के आँसू।
उन 50 छात्रों ने मिलकर गांव में एक भव्य स्कूल और कॉलेज बनवाया, जिसका नाम रखा गया— “पागल मास्टर विद्या मंदिर”। उस स्कूल के गेट पर मास्टर की एक प्रतिमा लगाई गई, जिसमें वे हाथ में छड़ी और गले में स्लेट लटकाए खड़े थे। नीचे लिखा था— “एक पागल, जिसने भारत का भविष्य लिख दिया।”
यह कहानी हमें सिखाती है कि शिक्षक कभी साधारण नहीं होता। प्रलय और निर्माण उसकी गोद में पलते हैं।
उपसंहार: गुरु का सम्मान ही राष्ट्र का सम्मान है। पागल मास्टर ने साबित किया कि अगर गुरु के पास जिद्द हो, तो वह कूड़े में पड़े पत्थरों को भी तराश कर ताज का हीरा बना सकता है।
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