नंदिनी 2 | कूड़ा बिनने वाले ने कर दिखाया दूसरा चमत्कार | लेफ्टिनेंट नंदिनी की सच्चाई | मौत से छीना
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नंदिनी 2 : मौत से छीना हुआ जीवन
रात के ठीक दो बज रहे थे।
सैन्य अस्पताल की ऊँची इमारत पर पीली रोशनी टिमटिमा रही थी। बाहर सन्नाटा था, लेकिन भीतर बेचैनी उबल रही थी।
आईसीयू के बाहर एक बेंच पर बारह साल का वंश बैठा था। कंधे पर पट्टी बंधी थी। घुटनों पर सूखा खून। चेहरा धूल और आँसुओं से सना हुआ। पर आँखों में डर से ज्यादा जिद थी।
आईसीयू के भीतर लेफ्टिनेंट नंदिनी राठौड़ बेहोश पड़ी थीं।
मशीन की हर बीप वंश के दिल की धड़कन से जुड़ी हुई लग रही थी।

हमला
अचानक अस्पताल के मुख्य गेट पर ब्रेक की तीखी आवाज गूंजी।
दो बाइक। फिर एक काली जीप।
गेट पर तैनात सिपाही चौंक गए।
“कौन हो तुम लोग?”
जीप से चार आदमी उतरे। चेहरे काले कपड़े से ढंके। हाथों में हथियार।
एक ने ठंडी आवाज में कहा—
“लेफ्टिनेंट नंदिनी राठौड़ से मिलना है।”
“मुलाकात का समय खत्म है,” सिपाही ने रोका।
दूसरे ने बंदूक ऊपर उठा दी—
“हमें समय की परवाह नहीं।”
अगले ही पल हवा में गोली चली।
धड़ाम!
अस्पताल के शीशे कांप उठे। चीखें गूंज उठीं।
मौत दरवाज़े पर
आईसीयू का दरवाज़ा आधा खुला था।
वंश ने सब सुना।
उसे समझने में देर नहीं लगी—
ये लोग नंदिनी को मारने आए हैं।
वह दौड़ा।
आईसीयू के अंदर घुसा। दरवाज़ा भीतर से बंद कर दिया।
बाहर धमाके। धक्के। आवाजें।
“दरवाज़ा खोलो!”
नंदिनी बेहोश थीं। उन्हें पता भी नहीं था कि मौत फिर दरवाज़े पर खड़ी है।
वंश ने तेजी से सोचा।
पीछे एक सर्विस गेट था।
उसने बेड के पहिए पकड़े। छोटे हाथ कांप रहे थे। पर हिम्मत अडिग थी।
“आपको कुछ नहीं होने दूँगा,” उसने फुसफुसाया।
वह बेड को पीछे के रास्ते से बाहर ले गया। एक नर्स सामने आई। वंश ने सिर्फ इतना कहा—
“छुपाना है।”
नर्स समझ गई।
दोनों ने मिलकर नंदिनी को स्टोर रूम में छिपा दिया।
कुछ सेकंड बाद बंदूकधारी आईसीयू में घुसे।
“खाली है!”
बाहर सेना ने जवाबी फायर किया। अफरातफरी मच गई।
दो हमलावर पकड़े गए। लेकिन दो भाग निकले।
खतरा खत्म नहीं हुआ
मेजर राठौड़ ने वंश के कंधे पर हाथ रखा।
“तूने फिर बचा लिया।”
वंश चुप रहा।
उसी समय खबर आई—
“सर, दो लोग भाग निकले।”
मेजर का चेहरा सख्त हो गया।
वंश ने खिड़की से बाहर देखा। अंधेरे में दो परछाइयाँ दीवार के पास दिखीं।
वे वापस आएंगे।
दूसरा हमला
रात गहराती गई।
अचानक पीछे के कॉरिडोर में हलचल हुई।
वंश समझ गया—
इस बार वे सीधे अंदर घुसेंगे।
उसने फैसला किया।
अस्पताल अब सुरक्षित नहीं।
उसने मशीन का प्लग हटाया। पोर्टेबल ऑक्सीजन लगाया।
बेड को सीढ़ियों की ओर धकेला।
सीढ़ियाँ उतरना सबसे मुश्किल था। हर स्टेप पर पसीना टपक रहा था।
तभी पीछे से आवाज आई—
“रुको!”
गोली चली।
कांच टूटा।
वंश ने पास पड़ा स्टैंड उठाकर हमलावर की ओर फेंका। एक सेकंड का मौका मिला।
बस एक सेकंड।
वह नंदिनी को लेकर बाहर भागा।
रात की दौड़
अस्पताल के पीछे कच्ची सड़क थी।
बेड आगे नहीं जा सकता था।
वंश ने फैसला लिया।
उसने बेहोश नंदिनी को कंधे पर उठाया।
बारह साल का दुबला-पतला लड़का।
लेकिन उस रात वह पहाड़ से भी मजबूत था।
पीछे से आवाज—
“रुको वरना गोली मार देंगे!”
वह नहीं रुका।
पगडंडी पर दौड़ते हुए वह फिसला। दोनों गिरे।
नंदिनी का सिर मिट्टी से टकराया।
वंश ने फिर उठाया।
“थोड़ा और… बस थोड़ा और…”
गांव की पहली झोपड़ी दिखी।
फिर उसका अपना छोटा सा घर।
कूड़ा बीनने वाला
वंश का घर मिट्टी का था। छप्पर टूटा हुआ।
उसकी मां बीमार थी।
दिन में वंश कूड़ा बीनता था।
शहर की गलियों से प्लास्टिक, लोहे के टुकड़े, बोतलें उठाता।
उन्हीं पैसों से घर चलता था।
लेकिन आज वही लड़का एक सेना अधिकारी की जान बचा रहा था।
उसने नंदिनी को खाट पर लिटाया। दरवाज़ा अंदर से अटका दिया।
बाहर कदमों की आहट आई।
बंदूक की नली दरार से अंदर झांकी।
वंश नंदिनी के सामने खड़ा हो गया।
अगर गोली चलती — पहले उसे लगती।
कुछ सेकंड…
फिर कदम दूर चले गए।
वंश जमीन पर बैठ गया। सांसें तेज। लेकिन नंदिनी जिंदा थीं।
नंदिनी की सच्चाई
सुबह होने लगी।
उसी समय मेजर राठौड़ की टीम गांव पहुंची। उन्होंने वंश का घर ढूंढ लिया।
“तू यहाँ है?” मेजर ने हैरानी से पूछा।
वंश बोला—
“अस्पताल सुरक्षित नहीं था।”
डॉक्टर आए। नंदिनी को प्राथमिक उपचार दिया।
तभी नंदिनी की उंगलियाँ हल्की सी हिलीं।
मेजर ने धीमे स्वर में कहा—
“तुम्हें पता है वो लोग क्यों आए थे?”
वंश ने सिर हिलाया।
मेजर बोले—
“नंदिनी एक गुप्त ऑपरेशन पर थीं। उन्होंने हथियारों की तस्करी करने वाले गिरोह का भंडाफोड़ किया। उस गिरोह का सरगना बहुत बड़ा अपराधी है। उसने कसम खाई थी — नंदिनी जिंदा नहीं बचेगी।”
वंश की आँखों में आग जल उठी।
जागृति
कुछ घंटे बाद नंदिनी की आँखें खुलीं।
कमजोर आवाज में पूछा—
“मैं कहाँ हूँ?”
वंश पास आया।
“आप सुरक्षित हैं।”
नंदिनी ने उसे पहचान लिया।
“तुम… वही लड़के… जिसने मुझे पहले भी बचाया था?”
यह दूसरा चमत्कार था।
पहली बार भी वंश ने ही उन्हें बचाया था, जब गोली लगने के बाद वह सड़क पर गिर पड़ी थीं।
आखिरी टकराव
उसी शाम खबर आई—
भागे हुए हमलावर गांव के बाहर छिपे हैं।
सेना ने घेराबंदी की।
मुठभेड़ हुई।
इस बार अपराधी बच नहीं पाए।
उनका सरगना भी पकड़ा गया।
उसने स्वीकार किया—
“नंदिनी ने हमारा खेल खत्म कर दिया था।”
सम्मान
कुछ महीनों बाद।
दिल्ली में एक समारोह आयोजित हुआ।
लेफ्टिनेंट नंदिनी राठौड़ को बहादुरी के लिए सम्मान मिला।
और मंच पर बुलाया गया एक दुबले-पतले लड़के को।
“वंश,” उद्घोषणा हुई,
“जिसने असाधारण साहस दिखाकर एक अधिकारी की जान बचाई।”
तालियाँ गूंज उठीं।
नंदिनी ने वंश के सिर पर हाथ रखा—
“तुम सिर्फ कूड़ा बीनने वाले नहीं हो। तुम सच्चे सैनिक हो।”
सरकार ने वंश की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने की घोषणा की।
उसकी माँ का इलाज करवाया गया।
नया सपना
कुछ साल बाद।
एक युवा कैडेट परेड ग्राउंड में खड़ा था।
उसकी वर्दी चमक रही थी।
नाम प्लेट पर लिखा था—
कैडेट वंश कुमार
परेड के बाद वह एक महिला अधिकारी के सामने सलाम करता है।
वह अधिकारी थीं—
लेफ्टिनेंट नंदिनी राठौड़।
दोनों की आँखों में गर्व था।
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