इंसानियत का सच्चा सिपाही

शाम का ट्रैफिक अपने चरम पर था। मुंबई की सड़कों पर गाड़ियों की कतारें, हॉर्न की आवाज़ें, ब्रेक की चीखें और बसों के पीछे भागते लोग—सब कुछ भाग रहा था। इसी भागदौड़ के बीच फुटपाथ पर एक बुजुर्ग आदमी औंधे मुंह पड़ा था। कपड़े धूल से सने, माथे से बारीक सा खून बह रहा था और दाहिना हाथ कांपते हुए हवा में सहारे की तरह उठा हुआ था। जैसे किसी अदृश्य दरवाजे की कुंडी टटोल रहा हो। उसने दो-तीन बार बोलने की कोशिश की, मगर आवाज गले में अटक कर रह गई। लोग उसे देखते थे, मगर रुकते नहीं थे। किसी ने धीरे से कहा, “नशे में होगा।” एक ने मोबाइल कैमरा ऑन किया, थोड़ा झूम किया, फिर जेब में डाल लिया। “लेट ऑफिस पहुंचूं पहले,” सोचकर आगे बढ़ गया। दो लड़के कंधे उचकाते हुए निकल गए, “पंगा क्यों लें? पुलिस केस हो जाएगा।” हर गुजरते मिनट के साथ बुजुर्ग की सांस छोटी होती जा रही थी। आंखों का सफेदपन फैल रहा था, हाथ हवा में कांपता और फिर गिर पड़ता। शहर की रफ्तार बेपरवाह रही। जैसे एक आदमी का गिरना रोज की भीड़ का मामूली सा रूटीन हो।

उसी समय लाल रंग की पुरानी रिक्शा लेकर एक दुबला पतला रिक्शा वाला पास से गुजरा। उम्र 30-32 के बीच, नाम इमरान। दिन भर की थकान चेहरे पर दिखाई दे रही थी। टीशर्ट पसीने से भीगी थी और कंधे पर रस्सी से बंधा छोटा सा थैला, जिसमें रात की रोटी और कुछ बची सब्जी थी। वह रोज इसी रास्ते से निकलता था। पर आज उसकी नजर उस बुजुर्ग के कांपते हाथ पर अटक गई। रिक्शा थोड़ा आगे निकल चुका था। उसे रोक कर इमरान पीछे मुड़ा। कुछ सेकंड के लिए सोचा, “अभी घर पहुंचना है, बाकी दवा भी खरीदनी है। यह पड़ जाए पुलिस का चक्कर तो…” मगर सामने सड़क पर पड़ा वो वृद्ध चेहरा, सूखी आंखें, होठों पर कार्डबोर्ड सा सन्नाटा, इमरान की हिचक तोड़ गया। उसने रिक्शा मोड़ा और फुटपाथ के किनारे लाकर खड़ा किया। इमरान झुक कर बोला, “बाबा, सुन पा रहे हैं?” बुजुर्ग की पलकें फड़फड़ाई, होठों पर एक शब्द ठहरा—”पानी…” इमरान ने अपनी बोतल निकाली, ढक्कन खोला और सावधानी से उनके होठों तक पहुंचाया। दो घूंट पानी अंदर गया, एक घूंट बाहर ढलका, मगर आंखों में हल्की सी रोशनी लौटी।

उसी बीच भीड़ की आवाज फिर गूंजी, “मत छू भाई, केस बन जाएगा, एंबुलेंस बुला दे, हाथ मत लगा।” इमरान ने फोन पर 108 डायल किया। कॉल कनेक्ट होने में वक्त लगा। ऑपरेटर ने लोकेशन पूछी—”5 से 10 मिनट में आ जाएगी।” इमरान ने बुजुर्ग की कलाई पकड़ी। नाड़ियां बहुत तेज नहीं, मगर चल रही थी। उसने गहरी सांस ली। “10 मिनट भी बहुत होते हैं,” उसने सोचा। पीछे से किसी ने झल्ला कर कहा, “भाई, तुम हटा लो रिक्शा, ट्रैफिक जाम हो रहा है।” इमरान ने पलट कर देखा, फिर धीरे से बुजुर्ग को सहारा दिया। “बाबा, मैं उठाता हूं, थोड़ा दर्द होगा।” वह अकेले दम से उठा नहीं पाता। पास खड़े दो लड़के, जो पहले मना कर चुके थे, अब अपराधबोध में हाथ बढ़ा ही चुके थे। तीनों ने मिलकर बुजुर्ग को रिक्शा की गद्दी पर लिटाया। इमरान ने अपने माथे का पसीना पोंछा और पैडल पर पैर रख दिया। नजदीक का सरकारी अस्पताल 15 मिनट में।

रिक्शा शहर की नसों से ज्यादा तेज चल पड़ा। बसे बाएं, कारें दाएं और इमरान बीच की सांस में। वह कभी हॉर्न की लह सुनता, कभी पीछे पलट कर बाबा की सांस। उसने कुर्ते की जेब से रुमाल निकाला, बुजुर्ग के माथे पर बांधा। खून कुछ धीमा हुआ। हवा ने धूल उड़ाई और रात के खाने की रोटी जो थैले में रखी थी, उसकी याद अचानक बेवकूफ सी लगी। आज का एक ही काम था—इस जान को अस्पताल तक पहुंचाना।

अस्पताल के फाटक पर उसने ब्रेक मारी। गेट के ऊपर बोर्ड पर नीली ट्यूबलाइट टिमटिमा रही थी। इमरान ने गार्ड को पुकारा, “वृद्ध है, चोट लगी है, अंदर…” गार्ड ने फाइल देखते हुए नाक सिकोड़ ली, “पहले इमरजेंसी में नाम, पता, पुलिस एंट्री, स्ट्रेचर बाद में…” इमरान ने बात काट दी, “नाम, पता बाद में, सांस अभी टूटी तो?” गार्ड ने कंधे उचकाए, अस्पताल की सीढ़ियों की ओर इशारा किया। इमरान ने रिक्शा वहीं लॉक किया, अपनी पूरी ताकत से बुजुर्ग को कंधे पर ताना—एक हाथ उनकी पीठ के नीचे, दूसरा घुटनों के पास—और सीढ़ियां चढ़ने लगा।

अंदर इमरजेंसी वार्ड के बाहर दो नर्सें फॉर्म पर झुकी थी। इमरान हांफते हुए बोला, “मैडम, प्लीज, बिस्तर… यह मेरे नहीं, किसी के बाबा हैं। बस सांस संभाल लीजिए।” एक नर्स ने थरथराती नजर से बुजुर्ग का चेहरा देखा, “सीटी रूम खाली नहीं, डॉक्टर राउंड पर है, पहले डिटेल…” इमरान की आंखें लाल हो गई, “डिटेल बाद में लिख लो, अब अगर देरी हुई तो यह मर जाएंगे।” उसकी आवाज में दहशत थी, मगर विनती भी। उसने जेब से मुड़ी पर्ची निकाली, “देखो, इतना कैश है मेरे पास, जो लगे काट लेना, मैं रोज देता रहूंगा, बस अभी बिस्तर…” वार्ड के भीतर से एक अटेंडेंट ने झांका, दृश्य समझा, “स्ट्रेचर!” उसने ऊंची आवाज में कहा। दो सेकंड में पहिए वाला स्ट्रेचर बाहर आया। इमरान ने सावधानी से बुजुर्ग को उतारा और नर्सों की मदद से उन्हें अंदर धकेला। दरवाजा बंद होने लगा। इमरान बाहर कांच से टिक कर खड़ा हो गया। सांस लंबी, आंखें गीली। पहली बार उसने सोचा, “कौन होंगे यह?” कुर्ते की जेब में शायद कोई पहचान, कोई पुराना कार्ड। उसने बाहर बैठे गार्ड को इशारे से पुकारा, “देख लें, शायद नाम मिल जाए।” गार्ड ने अनमने से जेब टटोली, एक पुराना घिसा हुआ कार्ड निकला। ऊपर छोटे अक्षरों में श्री… इमरान ने पढ़ने की कोशिश की। पर तभी अस्पताल के बाहर से तेज सायरन गूंजा। लाल-नीली बत्तियां दीवारों पर दौड़ गई। मुख्य फाटक पर पुलिस की जीपें अचानक आकर रुकी। दो अधिकारी तेज कदमों से अंदर की तरफ बढ़े। इमरान चौका, “इतनी जल्दी पुलिस किस लिए?”

इमरजेंसी का दरवाजा आधा खुला। अंदर से किसी डॉक्टर की आवाज आई, “बीपी गिर रहा है, ऑक्सीजन बढ़ाओ।” इमरान के पैर वहीं जड़ हो गए। बाहर पुलिस की वर्दियां, अंदर मशीनों की बीप और उसके बीच खड़ा वह एक रिक्शा वाला जिसके पास साहस था, पैसे नहीं। कांच से झरता सफेद उजाला इमरान के चेहरे पर पड़ा। उसने धीरे से फुसफुसाया, “अल्लाह, बस इनकी सांस बचा ले।” इमरान अभी भी इमरजेंसी वार्ड के बाहर खड़ा था। आंखों के सामने कांच की खिड़की के पीछे डॉक्टर और नर्सें बुजुर्ग के चारों ओर भागदौड़ कर रही थी। मशीनें बीप-बीप कर रही थी और ऑक्सीजन मास्क उनके चेहरे पर कसकर लगाया जा चुका था। बाहर गार्ड और स्टाफ एक दूसरे से कानाफूसी कर रहे थे। तभी पुलिस की जीप से एक ऊंचे कद का इंस्पेक्टर उतरा। उसके चेहरे पर तनाव साफ था। सीधे रिसेप्शन पर पहुंचा और तेज आवाज में बोला, “अभी-अभी खबर आई है कि शहर के रिटायर्ड जज, जस्टिस रमेश प्रसाद वर्मा कहीं गायब थे और उनकी खोजबीन चल रही थी। क्या कोई बुजुर्ग व्यक्ति यहां लाया गया है?” रिसेप्शनिस्ट ने हड़बड़ाकर हां कहा, “जी हां, थोड़ी देर पहले एक रिक्शा वाले ने एक बुजुर्ग को इमरजेंसी में भर्ती करवाया है।” इंस्पेक्टर के चेहरे का रंग बदल गया। उसने गार्ड की तरफ देखा, “वो रिक्शा वाला कहां है?” भीड़ ने इमरान की ओर इशारा किया। इमरान घबरा गया। मगर इंस्पेक्टर उसकी ओर बढ़ा और अचानक सैल्यूट कर दिया, “तुमने वह काम किया है जो कई बड़े लोग करने से डरते हैं। अगर तुम समय पर इन्हें यहां नहीं लाते तो आज शहर एक महान शख्सियत को खो देता।”

भीड़ में से कोई फुसफुसाया, “यह वही है ना जिन्होंने कभी शहर की सबसे बड़ी अदालत में इंसाफ दिया था?” दूसरा बोला, “हां, मैंने सुना था इन्हें बहुत ईमानदार और सख्त माना जाता था।” तीसरा धीरे से बोला, “सोचो, हम जैसे लोग इन्हें नशेड़ी या भिखारी समझकर छोड़ रहे थे।” इमरान ने धीरे से कहा, “मैंने तो इन्हें किसी के अब्बा जैसा ही समझा था।” उसकी आवाज में कोई घमंड नहीं था, बस इंसानियत की सादगी थी। इंस्पेक्टर ने सबके सामने कहा, “शहर की पुलिस इनके परिवार को सूचित कर चुकी है। और तुम,” उसने इमरान की ओर देखा, “आज से हमारे लिए सिर्फ एक रिक्शा वाला नहीं, बल्कि इंसानियत का सच्चा सिपाही हो।”

इमरजेंसी के दरवाजे पर अब भीड़ जमा थी, लेकिन माहौल बदल चुका था। वही लोग जो अभी थोड़ी देर पहले तमाशा देखकर निकल गए थे, अब पछतावे में खड़े थे। एक बुजुर्ग महिला ने इमरान से कहा, “बेटा, तेरा दिल बहुत बड़ा है। तुझे सलाम।” इमरान ने बस सिर झुका लिया। वार्ड के अंदर से जब नर्स ने इशारा किया कि मरीज अब होश में आने लगे हैं, तो पूरा अस्पताल एक पल के लिए थम गया। हर कोई देखना चाहता था उस इंसान को जो कभी अदालत में न्याय की आवाज था और आज सड़क पर गिरा मिला।

इमरान धीरे-धीरे दरवाजे के पास आया और कांच से देखा। जस्टिस वर्मा की पलकों ने हल्की हरकत की। होंठ सूखे थे, मगर आंखों में धीमी चमक लौट रही थी। उन्होंने धीरे से इधर-उधर नजर दौड़ाई और उनकी आंखें दरवाजे के उस रिक्शा वाले पर आकर टिक गई। इमरान का दिल जोर से धड़का। उसने हाथ जोड़कर सलाम किया। वर्मा की आंखें भर आई, जैसे बिना बोले कह रहे हो, “तुमने मुझे नया जीवन दिया।”

भीड़ फिर से कानाफूसी करने लगी। पर इस बार कोई हंस नहीं रहा था। हर चेहरा गंभीर था, हर आंख में सवाल—क्या हम इतने पत्थर हो गए हैं कि इंसानियत दिखाने के लिए अब हमें एक रिक्शा वाले से सीखना पड़ रहा है?

अस्पताल का सन्नाटा गाढ़ा हो गया। बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी। बूंदें कांच से फिसल रही थी। और उस रात मुंबई के भीड़भाड़ वाले इस अस्पताल में इंसानियत ने खुद को साबित किया था—एक थके हुए रिक्शा वाले की सांसों के साथ।

अस्पताल की गलियारे में अब भीड़ जमा थी। पुलिसकर्मी व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रहे थे। तभी बाहर से एक काली गाड़ी रुकी। उसमें से एक अधेड़ उम्र की महिला और एक युवक भागते हुए अंदर आए। महिला की आंखें रो-रो कर लाल हो चुकी थी। वह सीधे डॉक्टर की ओर बढ़ी, “डॉक्टर साहब, मेरे पति… वो ठीक तो है ना?” डॉक्टर ने शांत स्वर में कहा, “हां, अभी खतरे से बाहर हैं। लेकिन आप बहुत देर से आई। अगर इस रिक्शा वाले ने इन्हें समय पर अस्पताल ना पहुंचाया होता, तो शायद इन्हें बचाना मुश्किल हो जाता।”

महिला की नजरें अचानक इमरान पर टिक गई। उसने तुरंत अपने आंचल से आंसू पोंछे और दोनों हाथ जोड़ दिए, “बेटा, तूने हमें जिंदगी लौटा दी। मैं तेरी यह कर्जदार रहूंगी उम्र भर।” इमरान घबरा गया। उसने हाथ जोड़कर कहा, “अम्मा जी, मैंने तो वही किया जो हर इंसान को करना चाहिए। मैंने उन्हें अपने अब्बा जैसा ही समझा।” युवक, जो जस्टिस वर्मा का बेटा था, इमरान के पैरों की ओर झुक गया। उसकी आवाज कांप रही थी, “भाई, हम तो पिता को खो चुके समझ रहे थे। तूने उन्हें हमें लौटा दिया।”

भीड़ यह दृश्य देखकर चुप थी। वे सब वही लोग थे जो चंद घंटे पहले सड़क किनारे पड़े उस बुजुर्ग को देखकर मुंह मोड़ गए थे। अचानक मीडिया की गाड़ियों के सायरन गूंज उठे। पत्रकार कैमरों और माइक लेकर अस्पताल की ओर दौड़े। फ्लैश लाइट्स चमकने लगी। एक रिपोर्टर चिल्लाया, “यह वही जस्टिस रमेश प्रसाद वर्मा हैं, जो तीन दशक तक अपनी ईमानदारी और फैसलों के लिए जाने जाते थे। कल से यह लापता थे और पुलिस इन्हें ढूंढ रही थी। और आज यह सड़क पर लहूलुहान मिले।” दूसरा रिपोर्टर बोला, “सोचिए, शहर का इतना बड़ा इंसान और लोग इन्हें पहचान तक ना सके। इंसानियत इतनी सस्ती हो गई है।”

सवाल हवा में तैर रहे थे और भीड़ झुकी नजरों के साथ खड़ी थी। लेकिन उस रात, एक रिक्शा वाले ने बता दिया था कि इंसानियत अभी जिंदा है।