तलाक के 5 साल बाद पत्नी को ऑटो चलाते देख अमीर पति सन्न रह गया | फिर जो हुआ|

रिश्तों का मीटर और स्वाभिमान की जीत

अध्याय 1: एक अनपेक्षित मुलाकात

मुंबई की सुबह हमेशा की तरह भागदौड़ भरी थी। समंदर की नम हवाओं के बीच शहर की सड़कों पर गाड़ियों का रेला लगा था। इसी शोर के बीच एक काली चमचमाती मर्सिडीज़ धीरे-धीरे सिग्नल पर आकर रुकती है। गाड़ी के पिछले हिस्से में बैठा आदमी शहर का जाना-माना बिजनेसमैन अद्वैत मल्होत्रा था। अद्वैत के लिए वक्त का मतलब पैसा था। उसके चेहरे पर एक खास किस्म का आत्मविश्वास और आंखों में सत्ता की चमक रहती थी। वह अपने मोबाइल पर स्टॉक मार्केट के उतार-चढ़ाव देख रहा था। उसके लिए दुनिया महज नंबरों और सौदों का खेल थी।

तभी बगल में एक पीला-काला ऑटो आकर रुका। अद्वैत ने अनमने भाव से खिड़की से बाहर देखा, और अगले ही पल उसका पूरा वजूद सुन्न पड़ गया। मोबाइल की स्क्रीन पर उसकी उंगलियां जम गईं। दिल की धड़कनें जैसे रुकने का बहाना ढूंढने लगीं।

उस ऑटो की स्टीयरिंग पर एक महिला के हाथ जमे हुए थे। साधारण सूती साड़ी, चेहरे पर पसीने की बूंदें, और आंखों में सड़क पर टिका हुआ ध्यान। पर वह चेहरा… वह चेहरा अद्वैत की रूह को कंपा देने के लिए काफी था। वह नैना थी। उसकी पूर्व पत्नी। वही नैना, जिसे अद्वैत ने 5 साल पहले अपनी जिंदगी से एक फालतू सामान की तरह बाहर फेंक दिया था।

अद्वैत का गला सूख गया। उसने गाड़ी का शीशा नीचे करना चाहा, कुछ कहना चाहा, लेकिन शब्द साथ छोड़ चुके थे। सिग्नल हरा हुआ, ऑटो ने एक झटका लिया और भीड़ में ओझल हो गया। अद्वैत वहीं बुत बना बैठा रहा। पीछे से बजते हॉर्न ने उसे वर्तमान में खींचा। उसने अपने ड्राइवर से कहा, “उस ऑटो का पीछा करो!”

अध्याय 2: यादों का कड़वा धुआं

जैसे-जैसे मर्सिडीज़ उस ऑटो के पीछे तंग गलियों में मुड़ रही थी, अद्वैत यादों के दलदल में धंसता चला गया। 5 साल पहले का मंजर उसकी आंखों के सामने नाचने लगा। नैना एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की थी—पढ़ी-लिखी, शांत और स्वाभिमानी। अद्वैत ने उससे शादी तो की, लेकिन कभी उसे बराबरी का दर्जा नहीं दिया।

“तुम मेरे लेवल की नहीं हो, नैना,” अद्वैत अक्सर पार्टी से लौटने के बाद चिल्लाता था। “तुम्हारे माता-पिता ने मुझे दिया ही क्या है? मेरे दोस्तों के सामने मुझे शर्मिंदा मत किया करो।”

अद्वैत का अहंकार पैसे की चमक के साथ बढ़ता गया। उसने नैना पर झूठे आरोप लगाए, उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया और एक दिन निर्दयता से कह दिया, “मुझे तलाक चाहिए। तुम मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती हो।” नैना ने सिर्फ एक सवाल पूछा था, “मेरी गलती क्या है?” अद्वैत के पास कोई जवाब नहीं था, सिवाय सत्ता के घमंड के। बिना किसी गुज़ारे भत्ते के, बिना किसी सहारे के, उसने नैना को सड़क पर छोड़ दिया था।

आज वही नैना अद्वैत की आंखों के सामने ऑटो चला रही थी। जिस औरत को उसने कभी धूप में पैदल नहीं चलने दिया था, वह आज मुंबई की तपती सड़कों पर मुसाफिरों को ढो रही थी।

अध्याय 3: स्वाभिमान की दीवार

ऑटो एक साधारण से स्टैंड पर रुका। अद्वैत अपनी गाड़ी से उतरा। उसके कदम भारी थे। जब वह नैना के पास पहुँचा, तो नैना ने उसे देखा। उसकी आंखों में एक पल के लिए पहचान की चमक आई, फिर वह पूरी तरह शांत हो गई।

“नैना…” अद्वैत की आवाज़ कांपी। नैना ने अद्वैत की आंखों में झांका और बिना किसी भावना के बोली, “ऑटो चाहिए तो बैठिए। मीटर से ही चलूंगी।”

अद्वैत उस छोटी सी ऑटो की सीट पर बैठ गया। वह आदमी जो करोड़ों की डील चंद मिनटों में फाइनल कर देता था, आज एक ऑटो के मीटर की ‘टिक-टिक’ सुनकर घबरा रहा था। नैना ने मीटर गिराया। “कहाँ जाना है?” उसने पूछा। “जहाँ तुम ले चलो,” अद्वैत ने धीमी आवाज़ में कहा।

नैना ने हल्की मुस्कान दी—वह मुस्कान खुशी की नहीं, बल्कि एक कठिन युद्ध जीतने के बाद आने वाले ठहराव की थी। उसने ऑटो को एक तंग बस्ती की ओर मोड़ दिया। अद्वैत ने देखा कि नैना के वे हाथ, जो कभी मखमल जैसे नरम थे, अब स्टीयरिंग पकड़ते-पकड़ते सख्त हो चुके थे। वह समझ गया कि यह नैना की मजबूरी नहीं, उसकी ताकत थी।

बस्ती में पहुँचकर नैना ने ऑटो रोका। “इतने पैसे हुए,” उसने मीटर की ओर इशारा करते हुए कहा। अद्वैत ने अपनी जेब से नोटों की गड्डी निकाली, पर नैना ने उसे रोक दिया। “सिर्फ उतना, जितना मीटर पर है। मुझे खैरात नहीं, अपनी मेहनत की कमाई चाहिए।”

अध्याय 4: अंतरात्मा की पुकार

उस रात अद्वैत सो नहीं सका। उसका आलीशान बंगला उसे काटने को दौड़ रहा था। उसे वे रातें याद आईं जब नैना उसका इंतज़ार करती थी और वह उसे झिड़क देता था। अगले दिन उसने अपने वकील को बुलाया।

“5 साल पहले जो तलाक हुआ था, क्या वह पूरी तरह कानूनी था?” अद्वैत ने पूछा। वकील कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, “सर, कानूनी तौर पर कागज़ ठीक थे, लेकिन आपने अपनी ताकत का इस्तेमाल करके उसे बेसहारा छोड़ दिया था। अगर वह आज शिकायत करे, तो आप बड़ी मुसीबत में पड़ सकते हैं।”

उधर नैना ऑटो स्टैंड पर अपनी सहेली से बात कर रही थी। “आज वह मिला था,” नैना ने कहा। “क्या तुम्हें डर लगा?” सहेली ने पूछा। नैना ने आसमान की तरफ देखा, “नहीं। उसे देखकर मुझे यकीन हो गया कि मैं सही थी। मैंने खुद को टूटने से बचा लिया।”

अगली सुबह नैना ने एक बड़ा फैसला लिया। वह पुलिस स्टेशन पहुँची और अद्वैत मल्होत्रा के खिलाफ मानसिक उत्पीड़न और धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज कराई। खबर बिजली की तरह पूरे शहर में फैल गई।

अध्याय 5: अदालत का संग्राम

अदालत के बाहर मीडिया का जमावड़ा था। ‘करोड़पति बिजनेसमैन बनाम ऑटो चालक पूर्व पत्नी’—यह खबर हेडलाइंस में थी। अद्वैत कटघरे में खड़ा था। पहली बार उसे महसूस हुआ कि पैसा उसे इस जिल्लत से नहीं बचा सकता।

नैना की वकील मीरा देशमुख ने जिरह शुरू की। “नैना जी, आपने ऑटो चलाना क्यों चुना?” नैना ने गरिमा के साथ जवाब दिया, “क्योंकि मुझे किसी के टुकड़ों पर नहीं पलना था। मुझे अपनी बेटी की तरह अपनी इस पहचान पर गर्व है।”

कोर्ट में सन्नाटा छा गया जब नैना ने बताया कि कैसे उसे रात के अंधेरे में घर से निकाला गया था और कैसे उसने भूखे रहकर भी हार नहीं मानी। अद्वैत का सिर झुकता चला गया। जब अद्वैत की बारी आई, तो उसने अपनी सफाई देने के बजाय सच स्वीकार कर लिया। “मुझसे गलती हुई, जज साहब। मैंने पैसे को इंसानियत से ऊपर समझा।”

न्यायाधीश ने अपना फैसला सुनाया। अद्वैत को दोषी पाया गया। उसे भारी मुआवजा देने और सार्वजनिक रूप से माफी मांगने का आदेश दिया गया।

अध्याय 6: माफी और नया सवेरा

कोर्ट रूम के बीचों-बीच अद्वैत नैना के सामने खड़ा था। उसकी आंखों में आंसू थे। “नैना, मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हें बहुत छोटा समझा, लेकिन आज समझ आया कि तुम मुझसे कहीं ज्यादा बड़ी हो।”

नैना ने उसे देखा और शांत स्वर में कहा, “माफी… मैं तुम्हें बहुत पहले ही माफ कर चुकी हूँ, अद्वैत। क्योंकि अगर मैं नफरत पालती, तो आज यहाँ तक नहीं पहुँच पाती। लेकिन याद रखना, माफी का मतलब यह नहीं है कि सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा। हमारी राहें अब अलग हैं।”

अद्वैत वहीं खड़ा रह गया और नैना अदालत से बाहर निकल गई। कुछ महीनों बाद, नैना ने उस मुआवजे की राशि से ‘शक्ति ऑटो स्टैंड’ की शुरुआत की, जहाँ सिर्फ महिलाएं ऑटो चलाती थीं। वह आज भी कभी-कभी खुद ऑटो चलाती है, क्योंकि वह उसकी आजादी का प्रतीक था।

एक शाम, उसी ट्रैफिक सिग्नल पर नैना का ऑटो रुका। बगल में एक साधारण कार में अद्वैत बैठा था। इस बार उसके चेहरे पर घमंड नहीं, बल्कि एक गहरा पछतावा था। नैना ने उसे देखा, एक हल्की सी सिर की नोड (nod) दी और सिग्नल हरा होते ही अपना ऑटो आगे बढ़ा दिया।

अद्वैत पीछे रह गया। उसके पास अब भी करोड़ों थे, लेकिन वह सुकून नहीं था जो नैना की आंखों में था। नैना की कहानी ने शहर को बता दिया था कि किसी औरत की मेहनत उसकी मजबूरी नहीं, उसका गौरव होती है।

निष्कर्ष

नैना की यह कहानी हमें सिखाती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, यदि इंसान के पास आत्म-सम्मान और मेहनत करने का जज्बा है, तो वह राख से भी उठकर खड़ा हो सकता है।

आपकी राय: अगर आप नैना की जगह होते, तो क्या आप अद्वैत को माफ कर पाते? क्या हमारे समाज को आज भी महिलाओं के पेशेवर चुनावों को सम्मान की दृष्टि से देखने की ज़रूरत है?