एक आवाज जो थमी नहीं

एक विपक्षी नेता खड़े हुए।
उनकी आवाज में गुस्सा भी था और पीड़ा भी।

उन्होंने माघ मेले की एक घटना का जिक्र किया—
एक धार्मिक संत, उनके शिष्य, प्रशासन, रोके गए स्नान, कथित दुर्व्यवहार…

उन्होंने सवाल उठाए।
सिर्फ घटना पर नहीं, व्यवस्था पर।

“धर्म की बात करते हैं, लेकिन संतों से प्रमाण मांगते हैं?”
उनकी आवाज गूंज रही थी।

कुछ सदस्य मेज थपथपा रहे थे।
कुछ असहज थे।
कुछ मुस्कुरा रहे थे।

बात धर्म से विदेश नीति तक

फिर चर्चा मुड़ी विदेश नीति पर।

उन्होंने आरोप लगाए—
विदेशों में भारतीयों के साथ व्यवहार,
सीजफायर पर बयान,
पड़ोसी देशों की गतिविधियां,
सरकार की चुप्पी।

हर वाक्य के साथ सदन का तापमान बढ़ता गया।

सभापति बीच-बीच में टोकते—
“तथ्य रखें… मर्यादा रखें…”

लेकिन राजनीति में भावनाएं अक्सर मर्यादा से तेज दौड़ती हैं।

जवाब आया

सत्ता पक्ष से एक मंत्री खड़े हुए।

उनकी आवाज शांत थी, लेकिन शब्द धारदार।

उन्होंने कहा—
“आरोप गंभीर हैं तो प्रमाण भी गंभीर होने चाहिए।”

उन्होंने कुछ अंतरराष्ट्रीय आरोपों को खारिज किया।
कहा कि आधिकारिक रिकॉर्ड में वैसा कुछ नहीं।

उन्होंने यह भी जोड़ा—
“झूठे आरोप देश की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं।”

अब मेजें दूसरी तरफ से थपथपाईं गईं।

सदन का सच

संसद उस दिन अदालत नहीं थी,
लेकिन बहस किसी मुकदमे से कम नहीं लग रही थी।

एक पक्ष सवाल पूछ रहा था।
दूसरा पक्ष जवाब दे रहा था।
सभापति व्यवस्था बचा रहे थे।

और देश?
वह अपने-अपने नजरिए से फैसला कर रहा था।

असली कहानी

उस दिन कोई निष्कर्ष नहीं निकला।
कोई फैसला नहीं हुआ।

लेकिन एक बात साफ थी—

लोकतंत्र सिर्फ चुनाव से नहीं चलता,
टकराती आवाजों से भी चलता है।

सवाल जरूरी हैं।
जवाब भी जरूरी हैं।
और सबसे जरूरी है—तथ्य।

अंत में

संसद की बहसें कभी सिर्फ शब्द नहीं होतीं।
वे देश की दिशा तय करने वाली सोच की लड़ाइयां होती हैं।

कभी सच तुरंत नहीं मिलता।
कभी समय तय करता है कि कौन सही था।

लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती यही है—
यह बोलने की जगह देता है,
और सुनने की भी।

अगर चाहो तो मैं इसे
और ज्यादा ड्रामेटिक, न्यूज़-स्टाइल, या कहानी-नुमा राजनीतिक थ्रिलर की तरह भी लिख सकता हूं।