माँ गायब थी, बेटा ढूंढ रहा था… सच्चाई ऐसी जो यकीन से बाहर थी

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माँ गायब थी, बेटा ढूंढ रहा था… एक सच्ची कहानी जो यकीन से बाहर थी

पंजाब के लुधियाना शहर की जैन फैमिली इलाके की सबसे अमीर और प्रतिष्ठित परिवारों में से एक थी। इस घर में रीमा जैन अपने तीन बच्चों—भानु प्रताप, भरत और भानवी के साथ रहती थीं। परिवार का व्यापार, सामाजिक प्रतिष्ठा और खुशहाल जीवन सब कुछ था, लेकिन तीन साल पहले एक दुखद घटना ने सब बदल दिया। रीमा के पति, सुनील जैन, जो जाने-माने इंडस्ट्रियलिस्ट थे, एक शाम घर से निकले और फिर कभी वापस नहीं लौटे। उनकी हत्या कर दी गई थी। रीमा ने हिम्मत दिखाई, परिवार और बिजनेस दोनों को संभाला, लेकिन दिल के किसी कोने में डर और चिंता हमेशा बनी रही।

सुनील की मौत के बाद, रीमा ने बच्चों की जिम्मेदारी उठाई, बिजनेस को संभाला और समाजसेवा में भी सक्रिय रहीं। उनकी दिनचर्या बहुत सख्त थी—रोज सुबह सतलुज क्लब जाकर एक्सरसाइज और स्विमिंग करतीं, 9 बजे तक घर लौट आतीं, फिर ऑफिस जातीं। लेकिन 30 जुलाई 2005 की सुबह सब बदल गया। हमेशा की तरह रीमा क्लब गईं, बेटे भानु प्रताप को बताया कि 9 बजे तक लौट आएंगी। लेकिन उस दिन 9 बजा, फिर 9:30, मगर रीमा नहीं लौटीं। भानु ने फोन किया, पर फोन बंद था। चिंता बढ़ी, सतलुज क्लब पहुंचे, वहाँ पता चला कि रीमा 9 बजे ही जा चुकी थीं। ऑफिस में भी नहीं थीं। घर में भी नहीं। कहीं कोई सुराग नहीं।

भानु के दिमाग में पिता की यादें घूमने लगीं। तीन साल पहले सुनील भी ऐसे ही गायब हुए थे। उस दिन रीमा ने खुद पति की तलाश की थी, और सुनसान जगह पर उनकी कार मिली थी, जिसमें सुनील खून से लथपथ पड़े थे। गोलियों से उनकी हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज किया, परिवार से पूछताछ की। शक सुनील के बड़े भाई अनिल जैन उर्फ मिक्की जैन पर भी गया, क्योंकि बिजनेस और संपत्ति को लेकर विवाद था। पुलिस ने अनिल को गिरफ्तार किया, लेकिन सबूतों के अभाव में वह छूट गया। सुनील के असली कातिल का आज तक कोई सुराग नहीं मिला।

अब रीमा जैन भी गायब थीं। भानु ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाई। पुलिस ने मामले को गंभीरता से लिया, क्योंकि परिवार पहले ही एक त्रासदी झेल चुका था। जांच शुरू हुई—बिजनेस राइवल्स, परिवार, क्लब के स्टाफ, ड्राइवर, रिश्तेदार—हर जगह छानबीन हुई। रीमा का कोई व्यक्तिगत विवाद नहीं था, वे मिलनसार और समाजसेवी थीं। पुलिस को सबसे पहले शक फिर से अनिल जैन पर गया। भानु और परिवार ने बताया कि रीमा और अनिल के बीच बिजनेस को लेकर विवाद था। पुलिस ने अनिल को हिरासत में लिया, पूछताछ की, लेकिन कोई ठोस सबूत नहीं मिला। दो दिन बाद अनिल को छोड़ना पड़ा।

रीमा की कार का नंबर सभी पुलिस स्टेशनों में फ्लैश किया गया। टोल नाकों पर अलर्ट जारी हुआ। पड़ोसी राज्यों में भी सूचना भेजी गई। लेकिन कई दिनों तक कोई सुराग नहीं मिला। न तो फिरौती की कॉल आई, न कोई शव मिला। मीडिया में खबरें छपने लगीं, परिवार तनाव में था, पुलिस उलझन में थी। तभी एक दिन दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पार्किंग में एक पुलिस कांस्टेबल को रीमा की कार दिखी। दिल्ली पुलिस ने लुधियाना पुलिस को सूचना दी। परिवार और पुलिस एयरपोर्ट पहुँचे। कार सही तरीके से पार्क थी, कोई डेंट नहीं था, पार्किंग स्लिप भी थी। कार में रीमा का स्विमिंग कॉस्ट्यूम मिला। पुलिस ने सोचा शायद रीमा किसी इमरजेंसी में दिल्ली आई हों, विदेश गई हों। लेकिन जब घर की तलाशी ली गई, तो उनका पासपोर्ट घर पर ही था। यानी वे विदेश नहीं गई थीं।

अब शक हुआ कि किडनैपर्स ने पुलिस को गुमराह करने के लिए कार एयरपोर्ट पर खड़ी की थी। दिल्ली पुलिस ने भी जांच शुरू की। तभी मुखबिरों से पता चला कि रीमा के गायब होने से कुछ दिन पहले जसबीर नाम का व्यक्ति सतलुज क्लब के बाहर देखा गया था। जसबीर अनिल जैन के जानने वालों में से था और आपराधिक रिकॉर्ड भी था। पुलिस ने जसबीर, कुलदीप और तरसेम को पुराने केस के बहाने गिरफ्तार किया। पूछताछ में जसबीर टूट गया और कबूल कर लिया कि रीमा की हत्या अनिल जैन के कहने पर की गई थी। डील दो लाख रुपये में हुई थी, जिसमें एक लाख एडवांस मिला था।

अब पुलिस ने अनिल जैन को फिर से पकड़ा। पहले वह इनकार करता रहा, लेकिन जब पुलिस के पास सबूत आ गए, तो उसने सब सच बता दिया। उसने बताया कि रीमा को सतलुज क्लब से किडनैप किया गया, अपनी फैक्ट्री में ले जाया गया, वहाँ मारपीट की गई, प्रॉपर्टी के कागजों पर साइन करवाए गए। फिर रीमा को इंसुलिन के चार शॉट्स दिए गए, जिससे उनका शुगर लेवल गिर गया और मौत हो गई। शव को फैक्ट्री के स्टोरेज में छिपाया गया, फिर अगले दिन गटर में फेंक दिया गया ताकि वह सेप्टिक टैंक में चला जाए। रीमा की कार को दिल्ली एयरपोर्ट पर पार्क कर दिया गया ताकि पुलिस गुमराह हो जाए।

16 फरवरी 2006 को पुलिस ने फैक्ट्री में जाकर सेप्टिक टैंक से हड्डियों का कंकाल बरामद किया। कपड़ों की कढ़ाई, सफेद पेन, चप्पल—सब देखकर बेटे ने पहचान लिया। डीएनए टेस्ट हुआ, 100% मैच हुआ। रीमा की हत्या की वजह थी—बदला, प्रॉपर्टी और बिजनेस पर कब्जा, और भाभी से दुश्मनी। अनिल को गुस्सा था कि उसे छोटे भाई की हत्या में झूठा फंसाया गया था, और संपत्ति पर कब्जा करना चाहता था।

2012 तक केस चला। 34 गवाहों के बयान हुए। कोर्ट ने सबूतों की गहराई से जांच की। 3 दिसंबर 2012 को फैसला आया—अनिल जैन, जसबीर, कुलदीप और तरसेम को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। लेकिन सुनील जैन की हत्या आज भी रहस्य बनी हुई है।

सीख

रीमा जैन की कहानी हमें सिखाती है कि सबसे बड़ा खतरा कभी-कभी घर के अंदर ही छुपा होता है, जहां हम सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं। जब लालच रिश्तों पर हावी हो जाता है, तो खून के रिश्ते भी बेगाने हो जाते हैं। पैसा और प्रॉपर्टी कभी इंसानियत से बड़ी नहीं हो सकती। सच को कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है, लेकिन मिटाया नहीं जा सकता। न्याय देर से मिले, पर जब मिलता है तो हर साजिश को बेनकाब कर देता है।