नौकरी की तलाश में दिल्ली जा रहा था लड़का, ट्रेन में टीटी लड़की ने जो किया—इंसानियत रो पड़ी

इंसानियत का सफर: ट्रेन की टीटी और एक बेबस मुसाफिर

अध्याय 1: एक भारी मन और अनिश्चित भविष्य

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव का रहने वाला समीर, जिसकी आँखों में सपने तो बहुत थे लेकिन जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं थी। समीर के पिता एक लंबे समय से बीमार थे और घर का सारा बोझ उसके कंधों पर आ गया था। गाँव में खेती से गुजारा नहीं हो रहा था, इसलिए उसने तय किया कि वह नौकरी की तलाश में दिल्ली जाएगा।

समीर ने अपनी पुरानी फटी हुई बैग में दो जोड़ी कपड़े रखे और गाँव के लोगों से उधार मांगकर जनरल टिकट के पैसे जुटाए। लेकिन स्टेशन पहुँचते ही उसे पता चला कि जनरल बोगी में इतनी भीड़ है कि पैर रखने की जगह नहीं है। मजबूरन, उसने अपनी किस्मत के भरोसे स्लीपर क्लास के डिब्बे में पैर रख दिया। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, क्योंकि उसे पता था कि उसके पास स्लीपर का टिकट नहीं है और अगर पकड़ा गया तो जुर्माना देने के पैसे भी उसके पास नहीं थे।

अध्याय 2: ट्रेन की हलचल और दिल की धड़कन

ट्रेन अपनी गति से दौड़ रही थी। समीर खिड़की के पास एक कोने में दुबक कर बैठ गया। उसने अपना पुराना बैग अपनी गोद में कसकर पकड़ रखा था। उसके चेहरे पर थकान, डर और लाचारी साफ़ दिखाई दे रही थी। वह बार-बार बाहर अंधेरे की ओर देख रहा था, यह सोचकर कि क्या दिल्ली पहुँचकर उसे काम मिलेगा? क्या वह अपने बीमार पिता की दवाइयों के पैसे भेज पाएगा?

तभी डिब्बे में सन्नाटा छा गया। यात्रियों ने अपनी आवाजें धीमी कर लीं। समीर ने मुड़कर देखा, नीली वर्दी में एक महिला टीटीई (TTE) टिकट चेक करते हुए उसकी ओर बढ़ रही थी। उसका नाम प्लेट पर लिखा था—’अंजलि’। अंजलि दिखने में जितनी सख्त थी, उसकी आँखों में उतनी ही गंभीरता थी। समीर का गला सूख गया। उसने अपनी नजरें झुका लीं।

अध्याय 3: सामना और बेबसी की दास्तां

अंजलि समीर के पास पहुँची। उसने शांत स्वर में कहा, “टिकट दिखाइए।”

समीर के हाथ काँप रहे थे। उसने अपनी जेब से वह जनरल टिकट निकाला और अंजलि की ओर बढ़ा दिया। अंजलि ने टिकट देखा और फिर समीर के चेहरे की ओर। “यह जनरल का टिकट है, और आप स्लीपर कोच में बैठे हैं। आपको जुर्माना देना होगा।”

समीर की आँखों में आँसू आ गए। उसने धीमी आवाज में कहा, “मैडम, मेरे पास जुर्माना देने के पैसे नहीं हैं। मेरे पास बस यही टिकट है। मुझे दिल्ली जाना है, काम ढूंढने के लिए। घर में पिता जी बहुत बीमार हैं, अगर मैं नहीं गया तो…” उसका गला भर आया और वह आगे कुछ नहीं बोल पाया।

अंजलि ने देखा कि समीर की आँखों में झूठ नहीं था। उसने उसके बैग को देखा, जो जगह-जगह से सिला हुआ था। डिब्बे के अन्य यात्री उसे हिकारत भरी नजरों से देख रहे थे, जैसे उसने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो।

अध्याय 4: टीटी अंजलि का अप्रत्याशित कदम

अंजलि ने अपनी डायरी निकाली और कुछ लिखने लगी। सबको लगा कि वह रसीद काट रही है और अब समीर को अगले स्टेशन पर उतार दिया जाएगा। समीर ने अपना बैग उठाया और खड़े होने लगा।

लेकिन तभी अंजलि ने जो किया, उसने सबको हैरान कर दिया। अंजलि ने अपनी जेब से पैसे निकाले और जुर्माना खुद भर दिया। उसने रसीद काटी और समीर के हाथ में थमाते हुए कहा, “बैठ जाओ। यह दिल्ली तक की तुम्हारी सीट की रसीद है। तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं है।”

समीर अवाक रह गया। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि कोई अजनबी उसके लिए ऐसा करेगा। उसने कहा, “मैडम, मैं यह पैसे आपको कैसे लौटाऊंगा?”

अंजलि ने मुस्कुराते हुए कहा, “मुझे पैसे नहीं चाहिए। बस वादा करो कि जब तुम दिल्ली में सफल हो जाओगे, तो किसी ऐसे इंसान की मदद करना जो तुम्हारी तरह ही मजबूर हो।”

अध्याय 5: एक भोजन और एक नई उम्मीद

रात काफी हो चुकी थी। पैंट्री कार का एक कर्मचारी खाना लेकर निकला। अंजलि ने उसे रोका और एक थाली समीर के लिए खरीदी। समीर ने दो दिनों से कुछ नहीं खाया था। उसने पहले मना किया, लेकिन अंजलि की डाँट में छुपी ममता ने उसे खाना खाने पर मजबूर कर दिया।

समीर की आँखों से आँसू गिर रहे थे और वह खाना खा रहा था। डिब्बे में जो लोग उसे पहले अपराधी समझ रहे थे, अब उनकी आँखों में भी शर्मिंदगी थी। अंजलि ने जाते-जाते उसे अपना एक पुराना विजिटिंग कार्ड दिया और कहा, “अगर दिल्ली में रहने या काम ढूंढने में कोई बड़ी दिक्कत आए, तो इस नंबर पर संपर्क करना। मेरा भाई वहाँ एक एनजीओ चलाता है।”

अध्याय 6: दिल्ली का स्टेशन और एक नया इंसान

सुबह जब ट्रेन दिल्ली के स्टेशन पर रुकी, तो समीर वह पुराना डरा हुआ लड़का नहीं था। उसकी आँखों में अब एक चमक थी और दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा। उसने अंजलि को ढूंढने की कोशिश की, लेकिन वह अपनी ड्यूटी खत्म कर जा चुकी थी।

समीर ने स्टेशन की जमीन को छुआ और मन ही मन कहा, “आज आपने सिर्फ मेरी यात्रा सफल नहीं की, बल्कि मेरी इंसानियत पर विश्वास को फिर से जगा दिया।”

अध्याय 7: सालों बाद की सफलता

दस साल बीत गए। दिल्ली में ‘समीर फाउंडेशन’ नाम का एक बड़ा संस्थान खड़ा हो चुका था, जो गरीब बच्चों की पढ़ाई और बेसहारा लोगों की मदद करता था। समीर अब एक सफल व्यवसायी था।

एक दिन वह अपनी गाड़ी से जा रहा था, तभी उसने देखा कि सड़क किनारे एक बुजुर्ग महिला बैठी है, जिसके पास सामान का ढेर है और कोई उसकी मदद नहीं कर रहा। समीर ने गाड़ी रोकी। जैसे ही वह करीब पहुँचा, उसकी धड़कन रुक गई। वह कोई और नहीं, बल्कि अंजलि थी, जो अब रिटायर हो चुकी थी।

अंजलि ने उसे नहीं पहचाना। समीर की आँखों में आँसू आ गए। उसने झुककर उनके पैर छुए और कहा, “मैडम, आज आपकी रसीद का कर्ज चुकाने का समय आ गया है।”

उपसंहार: कर्मों का पहिया

अंजलि को जब वह ट्रेन की घटना याद आई, तो उनकी आँखों में भी खुशी के आँसू थे। समीर उन्हें अपने साथ अपने घर ले गया और उन्हें वह सम्मान दिया जिसकी वह हकदार थीं।

यह कहानी हमें बताती है कि इंसानियत का कोई धर्म या वर्दी नहीं होती। एक छोटा सा नेक काम किसी की पूरी जिंदगी बदल सकता है। ट्रेन की उस टीटी ने सिर्फ एक टिकट नहीं बनाया था, बल्कि एक टूटे हुए इंसान के भविष्य की बुनियाद रखी थी।

शिक्षा: किसी की लाचारी का मजाक न उड़ाएं, बल्कि यदि संभव हो तो सहारा बनें। आपके द्वारा किया गया एक छोटा सा उपकार भविष्य में हजार गुना होकर आपके पास वापस आता है।