हृदय का साम्राज्य: अरबपति और ममता की कहानी

नियो-क्लासिकल शैली में बना वह बंगला दक्षिण दिल्ली के सबसे महंगे इलाके में शान से खड़ा था। उसकी ऊंची दीवारें और लोहे के काले गेट चीख-चीखकर उसके मालिक, विक्रम खन्ना की अमीरी का बखान करते थे। लेकिन उस घर के भीतर एक अजीब सी खामोश ठंढक थी। वह घर नहीं, एक आलीशान मुर्दाघर जैसा लगता था।

विक्रम खन्ना—एक ऐसा नाम जिससे व्यापार जगत कांपता था। हजारों करोड़ का साम्राज्य, तीन देशों में फैली गगनचुंबी इमारतें और सटीक निर्णय लेने की क्षमता। लेकिन एक साल पहले एक सड़क दुर्घटना ने उनकी पत्नी प्रिया को उनसे छीन लिया था। उस दिन के बाद से विक्रम खन्ना ने खुद को काम के बोझ तले दबा लिया था। उनके दो मासूम जुड़वा बेटे, आरव और अयान, उस आलीशान बंगले के कमरों में परछाइयों की तरह घूमते थे। वे चुप हो गए थे, उनकी हंसी कहीं खो गई थी।

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अंजलि का आगमन

विक्रम ने बच्चों के लिए दुनिया के सबसे महंगे मनोवैज्ञानिक और नैनी (देखभाल करने वाली) नियुक्त की थीं। लेकिन कोई भी आरव और अयान की आंखों की उदासी को नहीं पढ़ सका। फिर एक दिन अंजलि शर्मा आई। अंजलि के पास कोई बड़ी डिग्री नहीं थी, न ही वह फराटेदार अंग्रेजी बोलती थी। वह एक साधारण मध्यम वर्गीय परिवार से थी, जिसने अपनी बेटी को कैंसर की वजह से खो दिया था।

विक्रम ने उसे नौकरी पर रखते समय सिर्फ एक बात कही थी, “मुझे काबिलियत से ज्यादा सच्चाई चाहिए।”

अंजलि ने काम शुरू किया। विक्रम सुबह जल्दी निकल जाते और रात को देर से लौटते। कई हफ्तों तक वे दोनों एक-दूसरे से नहीं मिले। लेकिन विक्रम ने एक बदलाव महसूस किया। घर में अब बच्चों के रोने की आवाजें नहीं आती थीं। वे समय पर नाश्ता करते थे और स्कूल जाने के लिए तैयार रहते थे।

वह एक पल जिसने सब बदल दिया

उस शुक्रवार की दोपहर, एक बिजनेस मीटिंग टल जाने के कारण विक्रम अप्रत्याशित रूप से घर जल्दी लौट आए। जैसे ही वे लिविंग रूम के पास पहुंचे, उन्हें कुछ ऐसा सुनाई दिया जिसने उनके कदम रोक दिए।

हंसी।

एक ऐसी खिलखिलाती मासूम हंसी, जिसे उन्होंने एक साल से नहीं सुना था। विक्रम ने धीरे से दरवाजे की दरार से अंदर झांका।

दृश्य हैरान कर देने वाला था। अंजलि फर्श पर घुटनों के बल बैठी थी, एक ‘घोड़ा’ बनी हुई थी। अयान उसकी पीठ पर बैठा था और आरव बगल में तालियां बजा रहा था। अंजलि हाफते हुए कह रही थी, “घोड़ा अब थक गया है छोटे साहब, अब घोड़े को पानी चाहिए!”

विक्रम सन्न रह गए। उनका हजारों करोड़ का साम्राज्य, उनकी गाड़ियां, उनके नौकर-चाकर जो बच्चों को खिलौनों से भर देते थे, वे कभी वह हंसी नहीं खरीद पाए जो इस साधारण लड़की ने फर्श पर घुटनों के बल चलकर पैदा कर दी थी।

ममता का पाठ

जब अंजलि ने विक्रम को दरवाजे पर देखा, तो वह घबराकर खड़ी हो गई। “माफ कीजिए सर, मैं बस बच्चों का मन बहला रही थी।”

विक्रम ने कुछ नहीं कहा। उनकी नजरें अपने बच्चों के चमकते चेहरों पर थीं। उस रात विक्रम ने घर के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी। उन्होंने देखा कि अंजलि केवल एक नौकरानी नहीं थी। वह आरव को अपनी मां की याद आने पर गले लगाकर सुलाती थी। वह अयान को कहानियों के जरिए यह सिखाती थी कि जो चले जाते हैं, वे सितारों बनकर हमें देखते हैं।

विक्रम ने अगले दिन अंजलि को बुलाया। उनकी आवाज में आज वह कठोरता नहीं थी। उन्होंने पूछा, “अंजलि, तुम यह कैसे कर लेती हो? मैंने सबसे महंगे एक्सपर्ट्स बुलाए, पर बच्चे कभी ऐसे नहीं हंसे।”

अंजलि ने नम आंखों से मुस्कुराते हुए कहा, “सर, बच्चों को विशेषज्ञ की जरूरत नहीं होती, उन्हें बस एक ऐसे इंसान की जरूरत होती है जो उनके साथ ‘बच्चा’ बन सके। वे खिलौनों से नहीं, वक्त से प्यार करते हैं। आपने उन्हें सब कुछ दिया, बस अपना ‘साथ’ नहीं दिया।”

पूर्वाग्रह और तूफान

जैसे-जैसे अंजलि घर का हिस्सा बनती गई, घर में रौनक लौटने लगी। लेकिन समाज और विक्रम की मां, सावित्री खन्ना, इस रिश्ते को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थीं। सावित्री जी ने अंजलि के अतीत के बारे में अफवाहें सुनीं और उसे घर से निकालने की कोशिश की।

“विक्रम, यह एक साधारण नौकरानी है। लोग क्या कहेंगे कि खन्ना खानदान की बहू एक ऐसी लड़की बनेगी जो फर्श पर झाड़ू लगाती थी?” सावित्री जी ने कड़े शब्दों में कहा।

लेकिन इस बार विक्रम नहीं झुके। उन्होंने अपनी मां से कहा, “मां, जब मैं काम में व्यस्त था और मेरे बच्चे मर रहे थे, तब इस ‘साधारण’ लड़की ने उन्हें जीवन दिया। इसने मुझे सिखाया कि दौलत से घर बनता है, पर प्यार से परिवार।”

‘खुले दिल’ की शुरुआत

विक्रम ने व्यापार से थोड़ा समय निकालकर बच्चों के साथ बिताना शुरू किया। उन्होंने अंजलि की मदद से ‘खुले दिल’ (Open Heart) नामक एक चैरिटी फाउंडेशन की शुरुआत की। यह केंद्र उन बच्चों के लिए था जिन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया था।

अंजलि अब केवल एक नौकरानी नहीं थी, वह उस फाउंडेशन की निदेशक बनी। उसने साबित किया कि एक मां का दिल किसी भी डिग्री से बड़ा होता है। उसने उन बच्चों को फिर से हंसना सिखाया जो बोलना भूल चुके थे।

क्षमा और पुनर्जन्म

कहानी का अंत तब हुआ जब अंजलि अपनी मां से मिलने अपने पुराने गांव गई। विक्रम और बच्चे भी उसके साथ थे। वहां अंजलि ने अपनी मां को माफ किया, जो गरीबी के कारण उसे छोड़कर चली गई थी। विक्रम ने महसूस किया कि अंजलि की महानता उसके दुखों से उपजी थी।

विक्रम ने एक भव्य प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की, “एक परिवार खून के रिश्तों से नहीं, बल्कि उस विश्वास से बनता है जो हम एक-दूसरे में रखते हैं। अंजलि ने मेरे घर को मंदिर बना दिया है।”

निष्कर्ष

आज, वह बंगला अब खामोश नहीं है। वहां हर शाम हंसी गूंजती है। विक्रम खन्ना अब केवल एक अरबपति नहीं हैं, वे एक पिता हैं। अंजलि खन्ना अब केवल एक नाम नहीं, बल्कि हजारों अनाथ बच्चों की ‘दीदी’ और एक घर की धड़कन है।

याद रखिये, सबसे बड़ी दौलत वह नहीं जो बैंक में जमा हो, बल्कि वह है जो आपके बच्चों की मुस्कान में झलके।


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