महिला टीचर ने ||रो-रो कर कहा बहुत बचा लिया रिश्ते को अब अलग होना है और फिर|

रिश्तों का पुनर्जन्म: सीमा और सुरेंद्र के सात साल का संघर्ष

मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले का एक छोटा सा गांव, जहाँ परंपराएं आज भी आधुनिकता पर भारी पड़ती हैं। यहीं के एक मध्यमवर्गीय परिवार में सुरेंद्र और सीमा का विवाह हुआ। सुरेंद्र परिवार का सबसे लाडला और छोटा बेटा था, जबकि सीमा एक पढ़ी-लिखी, स्वाभिमानी और सरकारी स्कूल में शिक्षिका थी।

विवाह और उम्मीदों का टकराव

विवाह के शुरुआती दिन खुशहाल थे। सीमा एक सरकारी शिक्षिका थी, इसलिए आर्थिक रूप से परिवार को कोई कमी नहीं थी। सुरेंद्र एक साधारण किसान परिवार से था और अपनी माँ की हर बात को पत्थर की लकीर मानता था। समस्या तब शुरू हुई जब समाज की दकियानूसी बातों ने सुरेंद्र की माँ के कान भरने शुरू किए।

पड़ोस की महिलाओं ने ताना मारना शुरू किया, “बहू सरकारी नौकरी वाली है तो क्या हुआ, दहेज में तो कुछ खास नहीं लाई। सुरेंद्र के पास इतनी जमीन है, उसके स्तर की शादी होती तो गाड़ी और मोटा पैसा मिलता।” ये बातें सुरेंद्र की माँ के मन में घर कर गईं। धीरे-धीरे माँ ने सीमा को दहेज के ताने देना शुरू कर दिया।

सीमा अक्सर शांति से जवाब देती, “माँ जी, मैं खुद कमाती हूँ। आपको जो चाहिए मैं लाकर दूँगी, लेकिन मेरे माता-पिता पर दबाव मत बनाइए।” लेकिन लालच का कोई अंत नहीं होता। माँ ने सुरेंद्र को भड़काना शुरू किया और सुरेंद्र अपनी माँ के प्रभाव में आकर सीमा से झगड़ने लगा।

सात साल का मानसिक वनवास

शादी के कुछ साल बीतते-बीतते हालात बदतर हो गए। सुरेंद्र अब सीमा पर हाथ भी उठाने लगा था। सीमा ने सोचा कि शायद कुछ दिन मायके रहने से सुरेंद्र को उसकी कमी महसूस होगी और उसे अपनी गलती का अहसास होगा। वह रूठकर अपने पिता के घर चली गई। लेकिन यहाँ पासा उल्टा पड़ गया।

सुरेंद्र की माँ ने उसे सख्त हिदायत दी, “उसे वहीं रहने दे, जब तक उसके बाप के घर से मोटा दहेज न आए, उसे वापस मत लाना।” सुरेंद्र ने अपनी पत्नी का नंबर ब्लैकलिस्ट कर दिया और उससे बात करना पूरी तरह बंद कर दिया। सीमा दो साल तक अपने मायके में बैठी रही, इस उम्मीद में कि कोई उसे लेने आएगा।

दो साल बाद, जब गांव में बातें होने लगीं, तो सीमा ने पंचायत बुलाई। पंचायत के दबाव में सुरेंद्र उसे वापस ले तो गया, लेकिन घर के भीतर का माहौल और भी जहरीला हो गया।

मातृत्व पर प्रहार और साजिश

वापस आने के बाद सीमा गर्भवती हुई। वह बहुत खुश थी कि शायद बच्चे के आने से सब ठीक हो जाएगा। लेकिन उसकी सास ने एक नई और भयानक साजिश रची। सास चाहती थी कि सुरेंद्र अपने बड़े भाई के बेटे को गोद ले ले ताकि परिवार की संपत्ति उसी घर में रहे। उसने सुरेंद्र पर दबाव बनाया कि सीमा का बच्चा गिरा दिया जाए।

सुरेंद्र ने अपनी माँ की बात मानकर सीमा को मजबूर किया और दो बार सीमा का गर्भपात (Miscarriage) करवा दिया गया। जब सीमा को पता चला कि यह सब उसके जेठ के लड़के को वारिस बनाने के लिए किया जा रहा है, तो उसका सब्र का बाँध टूट गया। वह फिर से मायके चली गई।

कोर्ट का दरवाजा और अंतिम निर्णय

शादी को सात साल बीत चुके थे। इन सात सालों में सीमा ने हर संभव कोशिश की—पंचायत, मान-मनौव्वल, सहनशीलता—लेकिन कुछ नहीं बदला। सुरेंद्र अब भी अपनी माँ की कठपुतली बना हुआ था। अंततः, सीमा ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तलाक की अर्जी दे दी।

कोर्ट में जब पहली तारीख पड़ी, तो सीमा जज साहब के सामने फूट-फूटकर रो पड़ी। उसने अपनी आपबीती सुनाई—दहेज का उत्पीड़न, दो बार जबरन गर्भपात, और सात साल का अलगाव। उसने स्पष्ट कह दिया, “साहब, अब बस बहुत हो गया। मैं अब इस घुटन भरे रिश्ते में नहीं रह सकती। मुझे आज़ादी चाहिए।”

सुरेंद्र ने कोर्ट में झूठ बोलने की कोशिश की कि वह उसे साथ रखना चाहता है, लेकिन सीमा के पास पंचायत के कागजात और अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट्स थीं, जिन्होंने सुरेंद्र के झूठ की पोल खोल दी। जज साहब ने सुरेंद्र को कड़ी फटकार लगाई और उसे सोचने के लिए एक आखिरी मोहलत दी।

एक दोस्त की सलाह और हृदय परिवर्तन

कोर्ट से बाहर आने के बाद सुरेंद्र अपने बचपन के दोस्त रवि के साथ बैठा। रवि ने सुरेंद्र को आईना दिखाया। उसने पूछा, “सुरेंद्र, क्या सीमा का चरित्र खराब है? क्या वह अपशब्द बोलती है? क्या वह पैसे नहीं देती?”

सुरेंद्र ने कहा, “नहीं, वह तो बहुत आज्ञाकारी और लॉयल है।”

तब रवि ने उसे धिक्कारते हुए कहा, “थू है तुझ पर! आज के जमाने में ऐसी पत्नी मिलना सौभाग्य की बात है जो कमाती भी है और तेरा सम्मान भी करती है। तू अपनी माँ के अंधे मोह में अपने घर की लक्ष्मी को लात मार रहा है। याद रख, अगर आज सीमा चली गई, तो दोबारा ऐसी औरत तेरे जीवन में कभी नहीं आएगी।”

माफी और नया सवेरा

रवि की बातों ने सुरेंद्र के दिमाग के जाले साफ कर दिए। उसे अहसास हुआ कि उसने पिछले सात सालों में सीमा के साथ कितनी बड़ी नाइंसाफी की है। वह उसी रात सीमा के मायके पहुँचा और सबके सामने उसके पैरों में गिरकर रोने लगा।

उसने अपनी गलतियों की माफी मांगी और वादा किया कि अब वह किसी के बहकावे में नहीं आएगा। सीमा को यकीन नहीं हो रहा था कि जो पति सात साल तक पत्थर बना रहा, वह आज पानी-पानी हो गया है। सीमा का प्यार जीत गया। वह अपने पति के साथ वापस आई।

सुरेंद्र ने घर जाकर अपनी माँ को साफ कह दिया कि अब सीमा और उसका जीवन उनकी दखलंदाजी से मुक्त रहेगा। उसने अपनी पत्नी के लिए एक अलग स्टैंड लिया।

आज सीमा और सुरेंद्र खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उनके अब दो प्यारे बच्चे हैं। सीमा ने अपने घर को टूटने से बचा लिया और सुरेंद्र ने समय रहते अपनी “घर की लक्ष्मी” को पहचान लिया।

कहानी की सीख

यह कहानी हमें सिखाती है कि किसी भी रिश्ते में ‘कम्युनिकेशन’ और ‘स्वतंत्र विवेक’ का होना बहुत जरूरी है। दूसरों की बातों में आकर अपने जीवनसाथी का तिरस्कार करना अंततः विनाश की ओर ले जाता है। यदि समय रहते सुधार कर लिया जाए, तो उजड़े हुए घर भी फिर से बस सकते हैं।

लेखक का संदेश: रिश्तों को बचाने की कोशिश आखिरी दम तक करनी चाहिए, लेकिन अपने आत्मसम्मान की कीमत पर नहीं।