लड़की ने पुलिस दरोगा को पेड़ से बांध कर फिर कर दिया कारनामा/ S.P. साहब के उड़े होश/
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एक खौफनाक दास्तान
अध्याय 1: गुलाबी शहर का एक साधारण कोना
राजस्थान की राजधानी जयपुर, जिसे दुनिया ‘गुलाबी शहर’ के नाम से जानती है, अपनी भव्यता और इतिहास के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन इसी शहर के एक शांत और मध्यमवर्गीय इलाके ‘बोधगया’ में एक छोटा सा घर था, जहाँ खुशियाँ अपनी सादगी में बसती थीं। इस घर का मुखिया था सुरेश कुमार।
सुरेश एक सीधा-सादा और मेहनती व्यक्ति था। वह पेशे से एक ऑटो ड्राइवर था। करीब छह महीने पहले ही उसने अपनी जमा-पूँजी लगाकर और कुछ कर्ज लेकर एक नया ऑटो रिक्शा खरीदा था। उसके लिए वह ऑटो सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि उसके परिवार के बेहतर भविष्य की सीढ़ी था। दिन भर जयपुर की तपती सड़कों पर ऑटो चलाकर वह महीने के 20-25 हजार रुपये कमा लेता था, जिससे उसके छोटे से परिवार का गुजारा सम्मानपूर्वक चल रहा था।
सुरेश के परिवार में उसकी पत्नी चंपा देवी और उसकी छोटी बहन आरती रहती थीं। चंपा एक घरेलू और समझदार महिला थी, जो घर की धुरी थी। वहीं आरती, जो कॉलेज में पढ़ रही थी, पूरे परिवार की लाडली और उम्मीदों का केंद्र थी। वह न केवल पढ़ाई में तेज थी, बल्कि संस्कारी और बेहद मेहनती भी थी। सुरेश का नियम था—सुबह 9 बजे वह आरती को कॉलेज छोड़ता और शाम 4 बजे अपनी सवारी छोड़कर उसे लेने पहुँच जाता। उनके जीवन की गाड़ी पटरी पर बिल्कुल सही चल रही थी, लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही लिख रखा था।

अध्याय 2: 15 अगस्त – आजादी का दिन और गुलामी की जंजीरें
साल 2025 का स्वतंत्रता दिवस। पूरे देश में तिरंगा फहराया जा रहा था। आरती के कॉलेज में भी बड़ा उत्सव था। सुबह जब सुरेश ने आरती को कॉलेज छोड़ा, तो आरती ने उत्साह से कहा, “भाई, आज फंक्शन खत्म होने में थोड़ा समय लगेगा। जैसे ही कार्यक्रम खत्म होगा, मैं आपको फोन कर दूँगी, आप मुझे लेने आ जाना।”
दिन भर कॉलेज में देशभक्ति के गीत गूँजते रहे। शाम के करीब 3 बजे कार्यक्रम संपन्न हुआ। आरती ने सुरेश को फोन किया, लेकिन किस्मत का खेल देखिए—सुरेश उस वक्त शहर के दूसरे छोर पर एक लंबी सवारी लेकर गया हुआ था। उसने बेबसी से कहा, “आरती बहन, मैं अभी बहुत दूर हूँ और ट्रैफिक भी बहुत है। तुम ऐसा करो, किसी दूसरे ऑटो से घर आ जाओ। देर मत करना।”
आरती ने एक दूसरा ऑटो लिया। उसे लगा कि वह सुरक्षित है, लेकिन उस ऑटो में पहले से ही उसके मोहल्ले के दो लड़के—विवेक और कार्तिक—सवार हो गए। ये दोनों लड़के अपने आवारापन और गलत आदतों के लिए जाने जाते थे। जैसे-जैसे ऑटो सुनसान रास्तों की ओर बढ़ा, विवेक और कार्तिक की नीयत डोलने लगी।
शहर से करीब दो किलोमीटर दूर, जहाँ आबादी कम और खेत ज्यादा थे, उन्होंने ऑटो ड्राइवर को धमकाकर रुकवा लिया। विवेक ने ड्राइवर की गर्दन पर चाकू रख दिया और चिल्लाया, “अगर जान प्यारी है तो ऑटो छोड़कर भाग जा, और इस लड़की को यहीं रहने दे!”
बेचारा ड्राइवर अपनी जान बचाकर भागा। आरती के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने चीखने की कोशिश की, लेकिन उन दरिंदों ने उसकी गर्दन पर चाकू रख दिया। वे उसे घसीटते हुए पास के एक खेत में बने कमरे (कोठड़े) में ले गए। वहाँ जो हुआ, उसने न केवल आरती की आत्मा को झकझोर दिया, बल्कि इंसानियत को भी शर्मसार कर दिया।
अध्याय 3: एक मसीहा और एक खूनी मंजर
जब वह दरिंदगी चल रही थी, तभी उस खेत का मालिक, कृष्ण कुमार, वहाँ पहुँच गया। उसे अपने कोठड़े से आती चीखें और अजीब आवाजें सुनाई दीं। जब उसने दरवाजा पीटा, तो विवेक और कार्तिक बाहर निकले। कृष्ण कुमार ने अंदर का नजारा देखा तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने उन दोनों को पहचान लिया। आरती बदहवास होकर कृष्ण कुमार से लिपट गई और रोने लगी। विवेक और कार्तिक उसे धक्का देकर वहाँ से भाग निकले।
कृष्ण कुमार ने हिम्मत दिखाई और आरती को सुरक्षित उसके घर पहुँचाया। घर पहुँचते ही जब आरती ने अपनी भाभी चंपा को सारी बात बताई, तो घर में मातम छा गया। जब सुरेश घर लौटा और उसने अपनी बहन की हालत देखी, तो उसका खून खौल उठा। एक सीधा-सादा ऑटो ड्राइवर पल भर में एक शिकारी बन गया।
वह घर में रखी एक पुरानी तलवार लेकर निकल पड़ा। रात के 8 बज रहे थे। उसने पूरे गांव और आसपास के इलाकों में उन्हें ढूंढा। आखिरकार, उसे खबर मिली कि विवेक और कार्तिक नदी के किनारे शराब पी रहे हैं। सुरेश वहाँ काल बनकर पहुँचा। वे दोनों नशे में धुत थे। सुरेश ने बिना कुछ सोचे-समझे अपनी तलवार से उन दोनों के हाथ और पैर काट दिए। उनकी चीखें आसमान चीरने लगीं। लोग इकट्ठा हुए और बीच-बचाव किया, वरना सुरेश उस दिन उन्हें जान से ही मार देता।
अध्याय 4: रक्षक बना भक्षक – राजेश सोलंकी का प्रवेश
विवेक और कार्तिक के परिवार वाले पुलिस स्टेशन पहुँचे। यहाँ कहानी में प्रवेश होता है दरोगा राजेश सोलंकी का। सोलंकी पुलिस की वर्दी में एक ऐसा दाग था, जो रिश्वत, शराब और अय्याशी के लिए बदनाम था। जब उसे पता चला कि सुरेश ने लड़कों पर हमला किया है, तो उसने बिना किसी देरी के सुरेश के घर पर छापेमारी की।
सोलंकी जब सुरेश के घर पहुँचा, तो उसकी नजर आरती और चंपा पर पड़ी। शराब के नशे में डूबे उस पुलिसवाले की गंदी नजरों ने उन दोनों औरतों को नाप लिया। उसने सुरेश को गिरफ्तार किया और थाने ले गया। थाने में उसने सुरेश की बेरहमी से पिटाई की।
चंपा और आरती घबरा गई थीं। वे रात के 11 बजे थाने पहुँचे। सोलंकी ने उन्हें एकांत में बुलाया। आरती ने रोते हुए कहा, “साहब, मेरे भाई का कोई कसूर नहीं है। उन लड़कों ने मेरी इज्जत लूटी थी।”
सोलंकी के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आई। उसने कहा, “अगर भाई को बचाना है, तो तुम्हें कीमत चुकानी होगी।” उसने सीधे-सीधे आरती के सामने अपनी काली मांग रख दी। आरती के पास कोई रास्ता नहीं था। सोलंकी ने उस रात सुरेश के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं करने का वादा किया, लेकिन बदले में आरती को उसके साथ ‘वक्त’ गुजारने पर मजबूर किया।
उस रात सोलंकी उनके घर पहुँचा और आरती की अस्मत से खेला। इतना ही नहीं, उसने अपने मोबाइल से आरती की अश्लील वीडियो भी बना ली। अगले दिन उसने सुरेश को छोड़ तो दिया, लेकिन सुरेश को यह नहीं पता था कि उसकी आजादी की कीमत क्या थी।
अध्याय 5: ब्लैकशेल और तबाही का सिलसिला
अगले दो दिनों तक घर में सन्नाटा रहा। चंपा और आरती ने यह बात सुरेश से छिपाई। लेकिन राजेश सोलंकी की हवस अभी शांत नहीं हुई थी। वह 8 सितंबर की रात फिर से शराब के नशे में धुत होकर उनके घर पहुँचा। इस बार उसने सुरेश के सामने अपना मोबाइल रख दिया।
“देखो सुरेश, तुम्हारी बहन की वीडियो मेरे पास है। अब से हर रात मैं यहाँ आऊँगा। अगर रोका, तो यह वीडियो इंटरनेट पर डाल दूँगा,” सोलंकी ने दहाड़ते हुए कहा।
सुरेश की दुनिया उजड़ चुकी थी। वह अपनी ही आँखों के सामने अपनी बहन को उस दरिंदे के साथ कमरे में जाते देखने पर मजबूर था। करीब 20-25 रातें इसी नरक में गुजरीं। सोलंकी हर रोज आता, शराब पीता और आरती का शोषण करता। सुरेश और चंपा बाहर बैठकर अपनी बेबसी पर आंसू बहाते। लेकिन एक रात, सुरेश के अंदर का धीरज टूट गया।
अध्याय 6: अंतिम हिसाब – सितंबर की वह काली रात
8 सितंबर 2025। उस रात सुरेश, चंपा और आरती ने एक गुप्त योजना बनाई। यह आर-पार की लड़ाई थी। सोलंकी हमेशा की तरह अपनी जीप लेकर पहुँचा। वह नशे में था। जैसे ही वह आरती को लेकर बेडरूम में गया, सुरेश ने घर का मुख्य दरवाजा अंदर से बंद कर लिया।
चंपा के हाथ में एक तेज चाकू था और सुरेश के हाथ में वही तलवार। वे दोनों कमरे के अंदर घुसे। सोलंकी कुछ समझ पाता, उससे पहले सुरेश ने तलवार से उसकी गर्दन पर वार किया। सोलंकी लहूलुहान होकर नीचे गिर पड़ा।
उन तीनों ने मिलकर उस आधे मरे पुलिसवाले को घसीटते हुए आंगन में निकाला। आंगन में एक नीम का पेड़ था। उन्होंने सोलंकी को उस पेड़ से मजबूती से बांध दिया। आरती, जिसकी आँखों में अब डर नहीं बल्कि प्रतिशोध की ज्वाला थी, उसने तलवार उठाई और उस दरिंदे का गुप्तांग काट दिया। सोलंकी की चीखें उसके ही पापों का हिसाब दे रही थीं। अंत में, सुरेश ने एक ही वार में उसकी गर्दन धड़ से अलग कर दी।
अध्याय 7: समर्पण और एक उजाड़ भविष्य
खून से सने हुए वे तीनों—भाई, बहन और पत्नी—सीधे पुलिस स्टेशन पहुँचे। उन्होंने सरेंडर कर दिया। जब बड़े पुलिस अधिकारी (S.P.) सुरेश श्रीवास्तव ने उनसे पूछताछ की, तो सुरेश कुमार ने अपनी आपबीती सुनाई।
एस.पी. साहब सन्न रह गए। उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि उनके महकमे में सोलंकी जैसा राक्षस छिपा बैठा था। लेकिन कानून अपनी जगह था। सुरेश श्रीवास्तव ने भारी मन से उनके खिलाफ चार्जशीट तैयार की।
आज वह पूरा परिवार जेल की सलाखों के पीछे है। सुरेश का वह खुशहाल घर अब एक खंडहर बन चुका है। वह ऑटो, जिसे उसने बड़े चाव से खरीदा था, अब थाने में धूल फांक रहा है।
निष्कर्ष: सवाल और न्याय
यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो एक आम आदमी कहाँ जाए? आरती और चंपा ने जो किया, वह कानून की नजर में अपराध था, लेकिन क्या समाज और नैतिकता की नजर में वह सही था?
सुरेश कुमार का परिवार बर्बाद हो गया, लेकिन उन्होंने उस व्यवस्था के मुंह पर तमाचा मारा जो गरीबों की चीखें नहीं सुनती। यह कहानी उन सभी ‘सोलंकी’ जैसे लोगों के लिए एक चेतावनी है कि जुल्म की इंतिहा होने पर एक साधारण इंसान भी महाकाल बन सकता है।
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