नौकरी के इंटरव्यू में आई लड़की से करोड़पति बोला—मेरी पत्नी बन जाओ… आगे जो हुआ, सोच भी नहीं सकते

 

सौदा या समर्पण: जब करोड़पति ने इंटरव्यू में मांगा राधा का हाथ

दिल्ली की चमचमाती ऊंची इमारतों के साए में हजारों कहानियां हर रोज जन्म लेती हैं, लेकिन राधा की कहानी उन सबसे जुदा थी। राधा, जिसकी उम्र महज 23-24 साल थी, अपनी आंखों में थकान और कंधों पर जिम्मेदारियों का पहाड़ लिए दिल्ली के ऑफिसों के चक्कर काट रही थी।

संघर्ष की पृष्ठभूमि

राधा के पिता एक फैक्ट्री में मामूली मजदूर थे। मां के बचपन में गुजर जाने के बाद, राधा ने बड़ी मुश्किल से ट्यूशन पढ़ाकर और सिलाई करके अपनी पढ़ाई पूरी की थी। लेकिन दो साल पहले एक हादसे ने सब बदल दिया। उसके पिता को लकवे (Paralysis) का अटैक आया और घर की आर्थिक रीढ़ टूट गई। दवाइयों का खर्च और घर का किराया राधा के लिए एक दुःस्वप्न बन गया था।

वह अजीबोगरीब इंटरव्यू

महीनों की तलाश के बाद, राधा एक बहुत बड़ी कंपनी के ऑफिस पहुंची। उसे लगा कि कोई मैनेजर उसका इंटरव्यू लेगा, लेकिन उसे सीधे कंपनी के मालिक विकास के केबिन में बुलाया गया। विकास, जो एक सफल करोड़पति था, शांत लेकिन पैनी नजरों वाला इंसान था।

इंटरव्यू के दौरान विकास ने राधा से उसकी पारिवारिक स्थिति के बारे में पूछा। राधा ने ईमानदारी से सब बता दिया। तभी विकास ने एक ऐसा प्रस्ताव रखा जिसने राधा के पैरों तले जमीन खिसका दी। विकास ने कहा, “मेरी पत्नी बन जाओ।”

राधा सन्न रह गई। उसे लगा कि उसकी मजबूरी का मजाक उड़ाया जा रहा है। वह गुस्से में वहां से निकल आई, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

मजबूरी और समझौता

अगले ही दिन अस्पताल में डॉक्टरों ने जवाब दे दिया—इलाज के लिए बड़ी रकम चाहिए थी। राधा के पास कोई रास्ता नहीं बचा था। उसने विकास को फोन किया। विकास ने अपनी शर्तें साफ कीं: “एक साल की कागजी शादी। इस दौरान तुम्हारे पिता का इलाज और सारी जरूरतें मेरी जिम्मेदारी होंगी। एक साल बाद तुम आजाद होगी।”

पिता की जान बचाने के लिए राधा ने अपनी ‘इज्जत’ और ‘मजबूरी’ के बीच जंग लड़ी और आखिरकार समझौते के कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए।

सोने का पिंजरा और अकेलापन

शादी के बाद राधा एक विशाल बंगले में आ गई। वहां सब कुछ था—दौलत, नौकर-चाकर और सुख-सुविधाएं, लेकिन गर्माहट नहीं थी। विकास और राधा के बीच कोई रिश्ता नहीं था। विकास अक्सर रात भर जागता और अपनी बालकनी में अकेला खड़ा रहता।

एक दिन राधा को स्टोर रूम में विकास की एक पुरानी डायरी मिली। उसे पढ़कर राधा को पता चला कि विकास पत्थर दिल नहीं, बल्कि ‘जख्मी’ था। उसकी पहली पत्नी ने उसे दौलत के लिए छोड़ दिया था, जिससे उसका प्यार और भरोसे से विश्वास उठ गया था।

पत्थर का पिघलना

धीरे-धीरे राधा ने उस घर को संभालना शुरू किया। उसने नौकरों की मदद की, घर में जान फूंकी और विकास का ख्याल रखना शुरू किया। विकास, जो कभी किसी पर भरोसा नहीं करता था, राधा की निस्वार्थ सेवा देखकर पिघलने लगा।

एक साल बीतने को था। समझौते की मियाद पूरी होने वाली थी। विकास की पहली पत्नी अचानक वापस आ गई और अपनी जगह मांगने लगी। उसे लगा कि राधा तो सिर्फ एक ‘कॉन्ट्रैक्ट’ है और उसे आसानी से हटाया जा सकता है।

अंतिम फैसला: सौदा बना सच्चा प्यार

कोर्ट में तलाक के कागजात तैयार थे। विकास की पहली पत्नी खुश थी। लेकिन ऐन मौके पर विकास ने उन कागजों को फाड़ दिया। उसने सबके सामने स्वीकार किया कि राधा उसकी मजबूरी नहीं, बल्कि उसकी जरूरत बन चुकी है।

विकास ने कहा, “एक साल पहले मैंने एक समझौता किया था, लेकिन आज मैं अपना हक मांग रहा हूं। राधा, क्या तुम सच में मेरी पत्नी बनोगी?”

राधा की आंखों में आंसू थे, लेकिन ये बेबसी के नहीं, बल्कि खुशी के थे। उसने विकास का हाथ थाम लिया। जिस रिश्ते की शुरुआत एक ‘सौदा’ बनकर हुई थी, वह सच्चे ‘समर्पण’ में बदल चुका था।

निष्कर्ष

राधा की कहानी हमें सिखाती है कि कभी-कभी सबसे कठिन और गलत लगने वाले रास्ते भी हमें सही मंजिल तक ले जाते हैं। अगर नियत साफ हो, तो मजबूरी में लिया गया फैसला भी जिंदगी का सबसे खूबसूरत मोड़ बन सकता है।

सीख: विश्वास और प्रेम किसी सौदे के मोहताज नहीं होते, वे समय और समर्पण से उपजते हैं।