7 साल बाद बेटी IAS बनकर लौटी… माँ-बाप को टूटी झोपड़ी में देखकर रो पड़ी | फिर जो हुआ…

सोनपुर की बेटी: संघर्ष से सम्मान तक का सफर
सोनपुर… एक ऐसा गांव जहाँ वक्त की रफ़्तार आज भी थमी हुई सी लगती थी। धूल भरी सड़कें, कच्चे मकान और चारों तरफ पसरी हुई गरीबी। इसी गांव के एक सुदूर कोने में बनी थी रामदीन की झोपड़ी। यह झोपड़ी नहीं, बल्कि दुखों का एक ऐसा घर था जहाँ छत से पानी नहीं, बल्कि लाचारी टपकती थी। दीवारों में पड़ी दरारें बूढ़े रामदीन और उसकी पत्नी शांति देवी की उम्र की तरह ही गहरी थीं।
1. अभावों का बचपन और बड़ा सपना
रामदीन खेतों में मजदूरी करता था और शांति देवी गांव के संपन्न घरों में बर्तन मांजती थी। उनकी इकलौती बेटी थी—आरती। आरती का बचपन गांव के दूसरे बच्चों जैसा नहीं था। जब दूसरे बच्चे मिट्टी के खिलौनों से खेलते, तब आरती फटी हुई पुरानी किताबों को जोड़कर पढ़ने की कोशिश करती।
रामदीन थका-हारा जब घर लौटता, तो आरती अक्सर पूछती, “बाबूजी, क्या मैं पढ़कर बड़ा अफसर बन सकती हूँ?” रामदीन उसकी आंखों में चमक देखकर अपनी थकान भूल जाता और कहता, “हाँ बेटी, तू पढ़, हम भूखे सो लेंगे पर तुझे पढ़ाएंगे।”
2. शहर का संघर्ष और तानों की गूँज
आरती ने दसवीं और बारहवीं में गांव में टॉप किया। लेकिन असली चुनौती तब शुरू हुई जब उसे कॉलेज के लिए शहर जाना पड़ा। गांव के लोग तानें मारते थे, “लड़की को इतना पढ़ाकर क्या होगा? आखिर में तो चूल्हा ही फूंकना है।” शांति देवी इन तानों को चुपचाप पी जाती थी। उसने अपनी आखिरी जमापूँजी—अपनी चांदी की पायल—बेच दी ताकि आरती शहर जाकर पढ़ाई कर सके।
शहर आरती के लिए आसान नहीं था। एक छोटे से कमरे में चार लड़कियों के साथ रहना, दिन में पढ़ाई करना और रात में ट्यूशन पढ़ाकर अपना खर्च निकालना। कई रातें उसने सिर्फ पानी पीकर गुजारीं, लेकिन जब भी वह टूटने लगती, उसे अपने पिता की फटी कमीज और मां के बर्तन मांजते हाथ याद आ जाते।
3. सात साल का कठिन तप
आरती ने तय किया कि वह IAS (भारतीय प्रशासनिक सेवा) की परीक्षा देगी। पहले प्रयास में वह असफल हुई, दूसरे में भी नहीं हो पाया। गांव में चर्चा होने लगी कि “पैसे बर्बाद हो रहे हैं, अब शादी कर देनी चाहिए।” लेकिन आरती ने हार नहीं मानी। सात सालों तक वह दुनिया से कट गई। सात साल तक वह न किसी शादी में गई, न किसी त्यौहार पर घर लौटी।
इधर गांव में रामदीन बीमार रहने लगा। झोपड़ी और जर्जर हो गई। शांति देवी ने मजदूरी बढ़ा दी ताकि बेटी को पैसे भेज सके। कई बार आरती को घर से फोन आता, “बेटी, सब ठीक है, तू बस पढ़ाई कर।” लेकिन आरती जानती थी कि उन आवाजों के पीछे कितना दर्द छुपा है।
4. वापसी: जब आरती ‘आईएएस’ बनकर लौटी
एक सुबह अखबार की सुर्खी बनी— ‘किसान की बेटी बनी आईएएस’। आरती ने परीक्षा पास कर ली थी। सात साल की तपस्या सफल हुई। उसे नियुक्ति पत्र मिला, लेकिन उसका मन शहर की चमक-धमक में नहीं लगा। वह उसी सादे लिबास में बस में बैठकर सोनपुर के लिए रवाना हुई।
जब वह बस से उतरी, तो किसी ने उसे पहचाना नहीं। वह पैदल ही अपनी झोपड़ी की तरफ बढ़ी। सामने का दृश्य देखकर उसका कलेजा मुंह को आ गया। झोपड़ी का छप्पर गिर चुका था, और आंगन में उसके पिता जमीन पर फटी चादर पर लेटे थे।
आरती दौड़कर झोपड़ी के भीतर घुसी और मां से लिपट गई। “मां, मैं आ गई!”
शांति देवी की आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। रामदीन ने अपनी कमजोर आंखें खोलीं और कांपती आवाज में बोले, “आ गई मेरी अफसर बेटी?”
5. झोपड़ी से महल तक का सफर
आरती ने सबसे पहले अपने माता-पिता का इलाज करवाया। उसने ठान लिया था कि अब उनके दुख के दिन खत्म हो चुके हैं। सरकारी प्रोटोकॉल और गाड़ियां जब गांव पहुंचीं, तो वही लोग जो कभी ताने मारते थे, अब माला लेकर खड़े थे।
आरती ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अपने माता-पिता के लिए एक पक्का घर बनवाना शुरू किया। जब पुरानी झोपड़ी की दीवार गिरी, तो शांति देवी भावुक हो गईं। आरती ने कहा, “मां, यह दीवार नहीं, हमारी गरीबी गिर रही है।”
6. गांव की बदलती सूरत
आरती सिर्फ अपने माता-पिता के लिए नहीं लौटी थी। उसने गांव के लिए काम करना शुरू किया। सोनपुर में पानी की पाइपलाइन बिछवाई, स्कूल की मरम्मत करवाई और एक ‘शिक्षा केंद्र’ की स्थापना की। उसने गांव की लड़कियों से कहा, “मुश्किलें आएंगी, लेकिन अगर आप डटी रहीं, तो दुनिया को रास्ता देना ही पड़ेगा।”
रामदीन अब चारपाई पर नहीं, बल्कि अपने नए घर के बरामदे में आरामकुर्सी पर बैठते थे। एक शाम उन्होंने आरती से कहा, “बेटी, आज की रोटी का स्वाद अलग है।” आरती ने पूछा, “क्यों बाबूजी?” रामदीन बोले, “क्योंकि आज की रोटी में अपमान नहीं, सम्मान मिला हुआ है।”
7. एक नया अध्याय
कुछ समय बाद आरती का तबादला दूसरे जिले में हो गया। विदाई के दिन पूरा गांव उमड़ पड़ा। अब गांव की हर झोपड़ी में एक सपना पल रहा था। हर मां अपनी बेटी को आरती जैसा बनाना चाहती थी।
आरती ने जाते समय मां के पैर छुए। शांति देवी ने कहा, “बेटी, जहाँ भी रहना, इस मिट्टी को और अपनी जड़ों को मत भूलना।” आरती की गाड़ी जैसे-जैसे गांव से दूर जा रही थी, वह देख रही थी कि सोनपुर अब सिर्फ एक पिछड़ा गांव नहीं था, वह अब उम्मीदों का गांव बन चुका था।
कहानी का सार
यह कहानी हमें सिखाती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, दृढ़ इच्छाशक्ति और मेहनत से भाग्य की रेखाएं बदली जा सकती हैं। माता-पिता का संघर्ष ही संतान की सबसे बड़ी प्रेरणा होनी चाहिए।
नोट: अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ हो, तो अपने माता-पिता का सम्मान करें और अपने सपनों के लिए लड़ना कभी न छोड़ें।
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