भारती सिंह रो पड़ीं जब उनके 3 साल के बेटे ने घर छोड़ने की बात कही

परिचय
भारतीय टेलीविजन और कॉमेडी की दुनिया में भारती सिंह एक जाना-पहचाना नाम हैं। अपनी हँसी, चुलबुले अंदाज और बेबाक बातें उन्हें दर्शकों के दिलों में खास जगह दिलाती हैं। हाल ही में भारती सिंह दो बेटों की माँ बन गई हैं, लेकिन उनका एक ब्लॉग वायरल हो रहा है जिसमें वे भावुक होकर कहती हैं कि वे शुक्रगुजार हैं कि उनके पास बेटी नहीं है।
आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो भारती हमेशा एक बेटी की ख्वाहिश करती थीं, आज वे कह रही हैं—”थैंक गॉड मेरी बेटी नहीं है!” इस लेख में हम भारती सिंह की भावनाओं, भारतीय समाज में बेटियों की स्थिति और माता-पिता के मनोविज्ञान को विस्तार से समझेंगे।
माँ का दिल और बेटा गोला
भारती सिंह का बड़ा बेटा ‘गोला’ अब बड़ा हो चुका है। एक दिन गोला ने अपनी माँ से कहा, “मेरा बैक पैक करो, मैंने आपके साथ नहीं रहना। मैं अब जा रहा हूँ।”
यह बात सुनते ही भारती सिंह रोने लगीं। एक माँ के लिए उसका बच्चा उससे दूर जाने की बात भी असहनीय होती है। भारती ने अपने ब्लॉग में रोते-रोते कहा कि जब उन्हें यह बर्दाश्त नहीं हो रहा कि उनका बेटा उनसे दूर जाये, तो वे अपनी बेटी को कैसे किसी और घर भेज सकती हैं?
भारती की भावनाएँ हर उस माँ की भावनाएँ हैं, जो अपनी औलाद से बेइंतिहा प्यार करती है।
भारती ने कहा—”थैंक गॉड मेरी बेटी नहीं है। क्योंकि मैं कभी यह सोच भी नहीं सकती कि मैं अपनी बेटी की शादी करूंगी और उसको किसी और घर भेज दूंगी।”
भारतीय समाज में बेटियों का स्थान
भारतीय समाज में बेटियों का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन साथ ही उनके प्रति कई सामाजिक मान्यताएँ और भावनाएँ जुड़ी होती हैं।
हर माँ-बाप अपनी बेटी को पालते-पोसते, पढ़ाते-लिखाते, संस्कारी बनाते हैं। लेकिन जब शादी का समय आता है, तो उन्हें अपनी बेटी को विदा करना पड़ता है।
यह विदाई किसी भी माँ-बाप के लिए सबसे कठिन पल होता है। माँ-बाप दिल पर पत्थर रखकर अपनी बेटी को दूसरे घर भेजते हैं।
भारती सिंह ने उन सभी माँ-बाप को सलाम किया, जो बेटियों को पढ़ाते हैं, उन्हें सशक्त बनाते हैं, और फिर समाज के बनाए रूल्स को एक्सेप्ट कर उनकी शादी कर देते हैं।
भावनाओं की गहराई और माँ-बेटी का रिश्ता
भारती सिंह ने अपने ब्लॉग में कहा—”ऐसा लगता है कि थैंक गॉड बेटी नहीं है। वरना मैं तो मर ही जाती यह सोच सोच के कि इसको बड़े करके पाल-पोस के इसकी शादी कर देनी है।”
यह भावनाएँ सिर्फ भारती की नहीं, बल्कि हर उस माँ की हैं, जो अपनी बेटी से बेइंतिहा प्यार करती है।
माँ-बेटी का रिश्ता बहुत गहरा और भावनात्मक होता है। माँ अपनी बेटी में खुद को देखती है, उसकी हर खुशी और तकलीफ में साथ रहती है।
लेकिन समाज के नियमों के अनुसार, एक दिन वह अपनी बेटी को विदा करती है, उसकी शादी कर देती है और उसे दूसरे घर भेज देती है।
यह पल माँ के लिए सबसे कठिन होता है।
समाज, संस्कृति और बदलती सोच
भारती सिंह की भावनाएँ यह भी दर्शाती हैं कि आज भी हमारे समाज में बेटियों की विदाई को लेकर कितना दर्द और भावनात्मक संघर्ष है।
हालांकि समय के साथ समाज बदल रहा है, लड़कियाँ अब पढ़-लिखकर, नौकरी करके, अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं।
माँ-बाप भी बेटियों को सशक्त बनाने में पीछे नहीं हैं।
फिर भी, शादी और विदाई का दर्द हर माँ-बाप के दिल में रहता है।
भारती सिंह ने बेटियों के माता-पिता को सलाम किया—”मैं उन सब लोगों को सैल्यूट करती हूँ जो बेटियों के माँ-बाप हैं। जो बेटियों को पढ़ाते-लिखाते हैं, उनको संस्कारी बनाते हैं। उनको इतना प्यार देते हैं और फिर किस तरह से वह उनकी शादी कर देते हैं और दिल पर पत्थर रख लेते हैं। मैं तो ऐसा कभी भी ना कर सकती और मैं कर ही नहीं पाऊंगी।”
माता-पिता की जिम्मेदारी और बेटियों का भविष्य
भारती सिंह की बातों से यह भी समझ आता है कि बेटियों की परवरिश सिर्फ उनकी शादी तक सीमित नहीं है।
आज की बेटियाँ अपने सपनों को पूरा कर रही हैं, अपने माता-पिता का नाम रोशन कर रही हैं।
माँ-बाप की जिम्मेदारी है कि वे बेटियों को आत्मनिर्भर बनाएं, उन्हें हिम्मत दें, और उनकी खुशियों में हमेशा साथ दें।
भारती सिंह की भावनाएँ एक तरफ माँ के दिल का दर्द दिखाती हैं, वहीं दूसरी तरफ समाज को यह संदेश भी देती हैं कि बेटियों को सिर्फ विदा करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें मजबूत, आत्मनिर्भर और खुशहाल बनाने के लिए पालें।
बेटियाँ: बोझ नहीं, वरदान हैं
भारती सिंह की भावनाएँ भले ही व्यक्तिगत हैं, लेकिन समाज में कई बार बेटियों को बोझ समझा जाता है।
यह सोच गलत है। बेटियाँ बोझ नहीं, वरदान हैं।
वे अपने माता-पिता की ताकत, उनकी खुशियाँ और उनके सपनों की पूर्ति हैं।
भारती सिंह ने बेटियों के माता-पिता को सलाम किया, लेकिन साथ ही यह भी बताया कि माँ-बाप के लिए सबसे मुश्किल पल है अपनी बेटी को विदा करना।
समाज के बनाए नियम और माँ-बाप का संघर्ष
भारती सिंह ने कहा—”मैं उन मां-बाप पर सलाम है जो अपनी बेटी के लिए यह सब कुछ कर लेते हैं और इस सोसाइटी के बनाए हुए रूल्स को एक्सेप्ट करते हैं।”
भारती की यह बात समाज के बनाए नियमों पर सवाल उठाती है।
क्या बेटियों को हमेशा विदा करना जरूरी है?
क्या माँ-बाप अपनी भावनाओं को दबाकर समाज के नियमों को मानने के लिए मजबूर हैं?
समाज बदल रहा है, लेकिन कई जगह आज भी वही पुराने रिवाज और नियम हैं, जो माँ-बाप को मजबूर करते हैं कि वे अपनी बेटी को शादी के बाद दूसरे घर भेज दें।
यह भावनात्मक संघर्ष हर माँ-बाप के दिल में रहता है।
निष्कर्ष: माँ का दिल और बेटियों का भविष्य
भारती सिंह की भावनाएँ हर उस माँ की भावनाएँ हैं, जो अपनी औलाद से बेइंतिहा प्यार करती है।
उनकी बातें समाज को सोचने पर मजबूर करती हैं कि बेटियों को सिर्फ विदा करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें मजबूत और खुशहाल बनाने के लिए पालें।
भारती सिंह ने बेटियों के माता-पिता को सलाम किया, उनकी हिम्मत की तारीफ की, और अपनी भावनाएँ सबके सामने रखीं।
भारती सिंह का यह ब्लॉग समाज में एक नई सोच लाता है—बेटियाँ बोझ नहीं हैं, वे वरदान हैं।
माँ-बाप की जिम्मेदारी है कि वे बेटियों को आत्मनिर्भर बनाएं, उन्हें प्यार दें, और उनकी खुशियों में हमेशा साथ दें।
News
उस दिन के बाद ऑफिस का पूरा माहौल बदल गया। अब कोई भी किसी की औकात या कपड़ों से तुलना नहीं करता था। सब एक-दूसरे की मदद करने लगे। अर्जुन सबसे प्रेरणा देने वाला इंसान बन गया। रिया भी अब पूरी तरह बदल चुकी थी। वह विनम्रता से छोटे काम करने लगी और धीरे-धीरे सबका विश्वास जीतने की कोशिश करने लगी।
चायवाले से मालिक तक: इंसानियत की असली पहचान सुबह-सुबह जयपुर शहर की सबसे बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के ऑफिस के गेट…
रिया फूट-फूट कर रो पड़ी। उसके सारे सपने, घमंड और अभिमान पल भर में टूट गए थे। बाकी सभी कर्मचारी भी कांप गए। सब सोचने लगे, “हे भगवान, हमने भी कल उस चायवाले की हंसी उड़ाई थी। अब अगर मालिक को याद आ गया तो हमारी भी छुट्टी हो जाएगी।”
चायवाले से मालिक तक: इंसानियत की असली पहचान सुबह-सुबह जयपुर शहर की सबसे बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के ऑफिस के गेट…
दूसरे दिन का माहौल चायवाले से मालिक तक: इंसानियत की असली पहचान
चायवाले से मालिक तक: इंसानियत की असली पहचान सुबह-सुबह जयपुर शहर की सबसे बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के ऑफिस के गेट…
चायवाले से मालिक तक: इंसानियत की असली पहचान
चायवाले से मालिक तक: इंसानियत की असली पहचान सुबह-सुबह जयपुर शहर की सबसे बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के ऑफिस के गेट…
I gave a drenched old man shelter in my home. The next morning, he offered to buy my house for $1. “I’m not joking,” he said. “I can’t explain, but you need to leave it immediately.”
I gave a drenched old man shelter in my home. The next morning, he offered to buy my house for…
शीर्षक: “शिखर पर अहंकार नहीं, इंसानियत टिकती है”
शीर्षक: “शिखर पर अहंकार नहीं, इंसानियत टिकती है” सुबह के दस बजे थे। शहर के सबसे आलीशान रेस्टोरेंट “एमराल्ड टैरेस…
End of content
No more pages to load






