DM के office पहुँचा एक भिखारी पति — और डीएम साहिबा ने जो किया, उसे देखकर सबकी आँखें भर आईं।
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नंदिनी और राघव : डीएम ऑफिस में एक भिखारी पति की कहानी
अध्याय 1 : सत्ता के गलियारों में एक अजनबी
जिले का सबसे व्यस्त इलाका, जहां हर ईंट में प्रशासन की धमक महसूस होती थी। बाहर चिलचिलाती धूप थी, लेकिन जिलाधिकारी नंदिनी सिंघानिया के विशाल ऑफिस में एसी की ठंडी हवा और फाइलों की सरसराहट के सिवा कोई शोर नहीं था। नंदिनी अपने काम में डूबी थी, सादे रंग की हैंडलूम साड़ी पहने, कलाई पर पतली घड़ी, चेहरा कठोर और तेज से भरा। उनकी कलम की एक नोक से जिले की तस्वीर बदल जाती थी।
लेकिन आज उनका मन बेचैन था। बार-बार खिड़की के बाहर जाती भीड़ और गेट पर हलचल उनकी एकाग्रता तोड़ रही थी। तभी उन्होंने अपने पीए मिश्रा जी को बुलाया, “बाहर क्या शोर है? कोई डेलीगेशन आया है?”
मिश्रा जी ने झांककर देखा, “नहीं मैडम, कोई डेलीगेशन नहीं है। एक पागल भिखारी है, सुबह से गेट पर खड़ा है, अंदर आने की जिद कर रहा है। संत्री उसे भगा रहे हैं, लेकिन वह मान नहीं रहा। कह रहा है कि उसे ‘नंदू’ से मिलना है।”
‘नंदू’ शब्द सुनते ही नंदिनी का दिल धड़क उठा। पूरे जिले में, परिवार में, अब कोई उन्हें ‘नंदू’ नहीं कहता। यह नाम तो उनके अतीत के बंद दरवाजे के पीछे छूट गया था।
फिर अचानक बाहर से एक चीख आई, “नंदू, एक बार बाहर आ। देख तेरा राघव आया है।” नंदिनी जैसे करंट लगने पर कुर्सी से उठ खड़ी हुईं। चेहरे का रंग उड़ चुका था। वह दौड़ती हुई बाहर गईं।
अध्याय 2 : भीड़ में एक पहचान
बाहर दो पुलिसवाले एक फटेहाल आदमी को घसीटते हुए जीप की तरफ ले जा रहे थे। कपड़े तार-तार, दाढ़ी बढ़ी हुई, पैरों में चप्पल तक नहीं। उसका चेहरा धूल से सना था, लेकिन आंखों में एक अजीब चमक थी। वह चिल्ला रहा था, “मुझे नंदिनी से मिलना है। वो जानती है मुझे।”
पुलिसवाले डांट रहे थे, “चुप कर पागल! डीएम मैडम तेरे जैसे भिखारियों से मिलेंगी?”
तभी पीछे से नंदिनी की कड़क आवाज गूंजी, “रुको!” पुलिसवाले तुरंत रुक गए, सैल्यूट मारा। भीड़ में सन्नाटा छा गया। सब देख रहे थे, जिले की सबसे सख्त डीएम साहिबा एक भिखारी के लिए बाहर क्यों आईं?
वह भिखारी धीरे-धीरे मुड़ा, अपनी धुंधली आंखों से सीढ़ियों पर खड़ी नंदिनी को देखा। उसके सूखे होठों पर दर्द भरी मुस्कान थी, “नंदू…” उसने बहुत धीमे से कहा।
नंदिनी लड़खड़ाते कदमों से उसके पास पहुंचीं। बदबू का झोंका आया, लेकिन नंदिनी को कुछ होश नहीं था। उन्होंने उसके चेहरे को गौर से देखा – वही आंखें, वही माथा, जो कभी उनके लिए सपने देखा करता था।
“राघव…” नंदिनी की आवाज कांप रही थी।
राघव ने अपने गंदे हाथ पीछे छिपा लिए, “पहचान लिया तूने? मुझे लगा तू भूल गई होगी। कलेक्टर बन गई है।”
अध्याय 3 : डीएम साहिबा का सच
पूरा ऑफिस स्टाफ देख रहा था। तभी वह हुआ जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी – डीएम नंदिनी सिंघानिया उस भिखारी के पैरों में गिर पड़ीं। उन्होंने अपना माथा उसके धूल भरे नंगे पैरों पर रख दिया और फूट-फूटकर रोने लगीं।
“राघव, तुम इस हाल में कहां थे? मैंने तुम्हें कहां नहीं ढूंढा?” नंदिनी का रोना किसी बच्चे जैसा था। उनका पद, अहंकार, सब आंसुओं में बह गया।
राघव पीछे हटते हुए बोले, “अरे नंदू, यह क्या कर रही है? तू डीएम है। लोग देख रहे हैं। उठ पगली, मेरे पैर गंदे हैं।”
नंदिनी ने उसके पैर नहीं छोड़े। ऊपर देखा और आंसुओं से भीगे चेहरे के साथ चिल्लाई, “खड़ी क्या हो सब लोग? पानी लाओ, गाड़ी निकालो। यह मेरे पति हैं, राघवेंद्र प्रताप सिंह।”
सन्नाटा छा गया। मिश्रा जी के हाथ से फाइल गिर गई। पुलिसवालों के पसीने छूट गए। नंदिनी ने राघव का हाथ पकड़ा, “चलो अंदर।” अब यह आदेश नहीं, निवेदन था।
अध्याय 4 : अतीत की गलियों में
राघव ने ऑफिस की इमारत को देखा, अपनी फटी कमीज को देखा, “नंदू, मैं अंदर नहीं जाऊंगा। लोग बातें बनाएंगे। तेरी बदनामी होगी। मैं बस तुझे एक नजर देखने आया था।”
“मेरी खुशी तुम हो राघव। अगर तुम साथ नहीं, तो यह कुर्सी, बंगला, रुतबा सब आग लगे। चलो अंदर।”
राघव को खींचते हुए नंदिनी ऑफिस ले गईं। लोग दीवार से सट गए। एक तरफ सख्त साड़ी में डीएम साहिबा, दूसरी तरफ फटेहाल भिखारी। लेकिन नंदिनी की आंखों में जो अपनापन था, उसने किसी को बोलने की हिम्मत नहीं दी।
चेंबर में बैठकर नंदिनी ने वेटर से गर्म पानी और तौलिया मंगवाया। वह खुद राघव का चेहरा साफ करने लगीं। राघव सहम गया, “नंदू, छोड़ यह सब। लोग क्या कहेंगे? तू इतनी बड़ी अफसर और मैं…”
नंदिनी ने उसकी बात काट दी, “चुप बिल्कुल चुप। आज मैं बोलूंगी।”
अध्याय 5 : इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की यादें
वक्त का पहिया पीछे घूम गया। दस साल पहले इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी, जहां नंदिनी एक साधारण परिवार की लड़की थी – पिता क्लर्क, मां सिलाई करती थीं। उसका सपना था आईएएस बनना, लेकिन पैसे नहीं थे। यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी ही उसका सहारा थी।
दूसरी तरफ राघव – जमींदार परिवार का इकलौता बेटा, बिंदास, दिल का राजा। उसके पास सब कुछ था, लेकिन भीतर एक खालीपन था।
दोनों की मुलाकात एक किताब को लेकर हुई थी। नंदिनी ने पहले किताब देखी थी, लेकिन राघव ने उठा ली। बहस हुई, फिर दोस्ती। राघव को नंदिनी का समर्पण आकर्षित करता था। वह देखता था कैसे वह लंच के पैसे बचाकर फोटो कॉपी करवाती थी।
धीरे-धीरे राघव भी लाइब्रेरी में बैठने लगा, सिर्फ नंदिनी को पढ़ते हुए देखने के लिए। दो साल बीते, दोनों बेहद करीब आ गए।
अध्याय 6 : सपनों के लिए बलिदान
यूपीएससी फॉर्म भरने का समय आया। नंदिनी के पिता बीमार हो गए, सारी जमा पूंजी इलाज में चली गई। नंदिनी के पास दिल्ली जाने और तैयारी करने के पैसे नहीं थे। वह हार मान गई थी।
एक शाम गंगा किनारे रो रही थी। राघव आया, “क्या हुआ नंदू?”
“सब खत्म हो गया राघव। पैसे नहीं हैं। मेरा सपना बस सपना ही रह जाएगा।”
राघव ने अपनी पसंदीदा बुलेट, सोने की चैन बेच दी। अपने पिता की तिजोरी से पैसे चुरा लिए। वह पैसे एक लिफाफे में डालकर नंदिनी के घर गया।
“यह किसी का एहसान नहीं है। यह एक स्कॉलरशिप है। जब अफसर बन जाओगी, सूद समेत लौटा देना।”
नंदिनी जानती थी कि यह झूठ है, लेकिन राघव की आंखों में विश्वास था। नंदिनी दिल्ली चली गई। राघव ने वादा किया कि वह इंतजार करेगा।
अध्याय 7 : बिछड़ना और इंतजार
दिल्ली में नंदिनी ने दिन-रात मेहनत की। दो साल बाद रिजल्ट आया – ऑल इंडिया रैंक 12, वह आईएएस बन गई थी। उसने सबसे पहले राघव को कॉल किया, लेकिन नंबर मौजूद नहीं था। दोस्तों से पूछा, जवाब मिला – राघव को उसके पिता ने घर से निकाल दिया, क्योंकि उसने चोरी की थी।
राघव ने अपना सब कुछ छोड़ दिया, लेकिन नंदिनी का नाम नहीं बताया। वह बस इतना बोला कि जुए में पैसे उड़ा दिए ताकि नंदिनी पर कोई आंच न आए।
नंदिनी ने पागलों की तरह राघव को ढूंढा, लेकिन वह कहीं नहीं मिला। किसी ने कहा, वह शहर छोड़ गया; किसी ने कहा, मर गया।
नंदिनी टूट गई, लेकिन उसने कसम खाई – वह राघव को ढूंढ निकालेगी। उसने शादी नहीं की, पूरी जिंदगी उस एक इंसान के इंतजार में बिता दी।
अध्याय 8 : सात साल बाद
आज सात साल बाद, वह राघव उसे मिला, लेकिन इस हाल में – एक भिखारी के रूप में।
नंदिनी ने अपने हाथों से राघव को नहलाया, खाना खिलाया। उसके घावों को देखा – सिगरेट से जलाए गए निशान, कोड़ों के घाव, टूटा पैर। नंदिनी रोती रही, हर घाव पर उसका नाम लिखा था।
राघव ने अपनी कहानी सुनाई – फुटपाथ पर सोना, मजदूरी करना, गटर साफ करना, भूखे रहना। एक दिन अखबार में नंदिनी की तस्वीर देखी, आईएएस बन गई थी। उसी दिन उसने अपनी मौत का फैसला कर लिया – उसने खुद को मार दिया, बस दूर से नंदिनी को देखना चाहता था।
अध्याय 9 : समाज से सामना
तभी मिश्रा जी दौड़े आए, “मैडम, किसी ने वीडियो वायरल कर दिया है। मीडिया बाहर खड़ी है, कमिश्नर साहब लाइन पर हैं।”
नंदिनी ने कहा, “10 मिनट में प्रेस कॉन्फ्रेंस होगी। मैं और मेरे पति दोनों साथ आएंगे।”
राघव डर गया, “नंदू, वे तुझे बर्बाद कर देंगे।”
“जब तक तुम साथ हो, मुझे कोई बर्बाद नहीं कर सकता।”
मीडिया के सामने नंदिनी ने कहा, “आप जिसे भिखारी कह रहे हैं, अगर वह ना होता तो आज मैं इस कुर्सी पर ना होती। मैंने भिखारी को नहीं, उस राजा को अपनाया है जिसने अपनी सल्तनत एक लड़की के सपनों पर लुटा दी।”
अगर इस इंसान को पति कहने की वजह से मेरी नौकरी जाती है, तो मैं अभी इस्तीफा देने को तैयार हूं।
अध्याय 10 : पिता का पश्चाताप
भीड़ में हलचल हुई। राघव के पिता, ठाकुर विक्रम प्रताप सिंह, मंच पर आए। वह अपने बेटे के पैरों में गिर पड़े, “मुझे माफ कर दे मेरे बच्चे। मैं अंधा हो गया था। तू हीरा था, मैंने तुझे कोयला समझा।”
राघव ने अपने पिता के सीने से लगकर रोया। बाप-बेटे का वह मिलन आंसुओं के सैलाब में डूब गया।
अध्याय 11 : बदलाव की लहर
प्रशासन ने नंदिनी के खिलाफ जांच बैठा दी। लेकिन समाज बदल चुका था। सोशल मीडिया पर राघव ट्रेंड करने लगा। लोग उसके त्याग की पूजा करने लगे। हजारों खत, फूल, दवाइयां डीएम आवास पर आने लगीं।
नंदिनी ने राघव का इलाज शुरू करवाया। देश के बड़े डॉक्टरों ने जिम्मेदारी ली। राघव के लिए सामान्य जीवन में लौटना मुश्किल था, लेकिन प्यार ने वह काम कर दिखाया जो दवाइयां नहीं कर सकीं।
अध्याय 12 : आश्रय गृह का उद्घाटन
दो साल बाद, जिला मुख्यालय में आश्रय गृह का उद्घाटन था। नंदिनी ने मंच से कहा, “यह उन हजारों बेसहारा लोगों की उम्मीद है जो सड़कों पर दम तोड़ देते हैं। इसकी फंडिंग राघव ने दी है।”
राघव मंच पर आया, आत्मविश्वास से भरा। “प्यार में ताजमहल बनता है, लेकिन असली प्यार वह है जो जीते जी आपको इंसान बना दे। मेरी पत्नी ने मुझे इंसान बनाया, अब मैं वादा करता हूं कि इस शहर में कोई भी भूख से नहीं मरेगा।”
राघव ने पिता की संपत्ति का बड़ा हिस्सा गरीबों के लिए दान कर दिया। ‘राघव फाउंडेशन’ चलाने लगा, जो बेघर, मानसिक रूप से बीमार लोगों को नई जिंदगी देता था।
अध्याय 13 : प्रेम की परिभाषा
समारोह के बाद, नंदिनी ने राघव का कॉलर ठीक किया, “आज बहुत अच्छा बोले तुम। मुझे गर्व है तुम पर।”
राघव ने मुस्कुराते हुए कहा, “गर्व मुझ पर नहीं, अपनी पसंद पर करो नंदू। अगर तुम उस दिन कलेक्टेट के गेट पर उस गंदे भिखारी को गले नहीं लगाती, तो आज यह राघव जिंदा नहीं होता।”
नंदिनी मुस्कुराई, “तुमने मुझे बनाया, मैंने तुम्हें बचाया। हिसाब बराबर।”
राघव हंसा, “प्यार में हिसाब नहीं होता, बेहिसाब होता है।”
दोनों गाड़ी में बैठे। सूरज ढल रहा था, लेकिन उनकी जिंदगी में अब कभी अंधेरा नहीं आने वाला था।
अंतिम अध्याय : समाज की सोच बदल गई
यह कहानी सिर्फ नंदिनी और राघव की नहीं है, बल्कि उस विश्वास की है जो हम अक्सर खो देते हैं। समाज ने राघव को भिखारी माना, लेकिन नंदिनी ने उसके त्याग को देखा। सच्चा प्रेम वह है जो आपको तब थामे जब आप पूरी तरह टूट चुके हों।
राघव का त्याग और नंदिनी का समर्पण यह साबित करता है कि पद, प्रतिष्ठा, पैसा – सब प्रेम और मान्यता के सामने बौने हैं।
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