तीन – डकैतों ने बैंक में घुसकर सबको बंधक बनाया.. फिर बूढ़े ने जो आगे किया! | Emotional Story

लूट से सेवा तक — तीन नकाबपोशों की प्रेरक कहानी
अध्याय 1: बैंक में घुसपैठ
दोपहर के 2:30 बजे थे। इंदौर के कमलापुर इलाके में स्थित सेंट्रल बैंक ऑफ महाराष्ट्र की शाखा में अचानक तीन नकाबपोश घुसे। हवा में गोलियां चलाते हुए चिल्लाए:
“कोई हरकत की तो गोली माथे में घुसेगी! सब नीचे बैठ जाओ, हाथ सिर के पीछे रखो!”
बैंक के 35 लोग डर से कांप उठे। बच्चे रोने लगे, औरतें सहम गईं, मर्द फर्श पर लेट गए।
लेकिन उसी भीड़ में एक 70 साल का बूढ़ा आदमी था, सफेद बाल, आंखों में सुकून, चेहरे पर मुस्कान। वह जमीन पर नहीं बैठा, बल्कि खड़ा रहा और लुटेरों की तरफ देखता रहा।
सबसे लंबा लुटेरा बंदूक तानते हुए बोला, “ए बुड्ढे, सुनाई नहीं दिया? बैठ जा, वरना गोली खाएगा!”
बूढ़ा मुस्कुराता रहा, “बेटा, मैं बैठूंगा नहीं, मुझे तुमसे बात करनी है।”
तीनों लुटेरे हंस पड़े। “फिल्म का हीरो है क्या?”
बूढ़ा बोला, “अगर मेरी बात सुन ली, तो भागने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिंदगी बच जाएगी।”
अध्याय 2: सच का खुलासा
तीसरे लुटेरे ने कहा, “बोल क्या कहना है?”
बूढ़ा बोला, “तुम तीनों बैंक लूटने आए हो, लेकिन आज बैंक में कोई पैसा नहीं है। शनिवार को सारी कैश रिजर्व बैंक में ट्रांसफर हो गई थी। अभी सिर्फ ₹5 लाख हैं, वो भी अलार्म सिस्टम से जुड़े हैं। छुए तो 3 मिनट में पुलिस आ जाएगी।”
तीनों लुटेरे चौंक गए। मैनेजर ने कांपते हुए पुष्टि की—“बूढ़े साहब सही कह रहे हैं।”
अब लुटेरे परेशान, “हम फंस गए!”
बाहर पुलिस की गाड़ियों के सायरन गूंजने लगे। किसी ने पहले ही पुलिस को कॉल कर दिया था।
बूढ़ा बोला, “अब दो रास्ते हैं: या तो भागो और मर जाओ, या मेरी बात सुनो और बच जाओ।”
अध्याय 3: आत्मसमर्पण की राह
तीसरा लुटेरा बोला, “तेरे पास क्या प्लान है?”
बूढ़ा: “नकाब उतारो, मुझे बंधक बना लो, पुलिस से कहो कि सेफ पैसेज मिले तो छोड़ोगे। वैसे भी तुम्हारी पहचान हो चुकी है—सीसीटीवी, बॉडी लैंग्वेज, आवाज, हाइट, हाथों के निशान सब रिकॉर्ड हो चुके हैं। अगर सरेंडर कर दोगे, तो कम सजा मिल सकती है।”
तीसरे लुटेरे ने नकाब उतारा—25 साल का, आंखों में डर और पछतावा।
“हम पहली बार कर रहे हैं, पैसों की सख्त जरूरत थी।”
बूढ़ा बोला, “गलत रास्ता कभी सही मंजिल तक नहीं पहुंचाता। अभी भी देर नहीं हुई है, किसी को मारा नहीं है, सिर्फ धमकाया है। सरेंडर करोगे तो माफी मिल सकती है।”
पहला और दूसरा लुटेरा अभी भी बंदूक ताने हुए थे।
बूढ़ा: “मारो गोली, मुझे डर नहीं है, मेरी जिंदगी के 70 साल पूरे हो गए हैं, खोने को कुछ नहीं है, लेकिन तुम्हारे पास पूरी जिंदगी है।”
दूसरे लुटेरे का हाथ कांपा, बंदूक गिर गई, नकाब उतारा—युवा लड़का, रोता हुआ।
“हमसे गलती हो गई, हम सरेंडर करना चाहते हैं।”
पहला लुटेरा अड़ा था, “हम लड़ेंगे!”
बूढ़ा उसकी आंखों में देखता है, “तुम्हारा नाम अर्जुन है ना, मां बीमार है, इलाज के लिए पैसे चाहिए थे?”
अर्जुन की आंखों से आंसू, बंदूक छूट गई, “आप कैसे जानते हैं?”
“तुम्हारी मां पिछले महीने इसी बैंक में लोन अप्रूवल करवाने आई थी। मैंने उनसे बात की थी।”
अध्याय 4: दर्द और उम्मीद
अर्जुन बोला, “मां को कैंसर है, इलाज में ₹20 लाख लगेंगे, मजदूरी करता हूं, महीने के ₹10,000 कमाता हूं, कोई मदद नहीं मिली। इसलिए दोस्तों को साथ लेकर यह कदम उठाया—राज और विक्रम।”
बूढ़ा: “गलत रास्ता कभी सही मंजिल नहीं देता। अगर पकड़े जाते, जेल जाते, मां का इलाज कौन करता?”
अर्जुन: “अब क्या करूं?”
बूढ़ा: “रास्ता है—सरेंडर करो, पुलिस के सामने गलती मानो, मैं पुलिस से बात करूंगा, बैंक मैनेजर से कहूंगा कि केस वापस लें।”
विक्रम बोला, “हमने गोलियां चलाई हैं, लोगों को डराया है।”
बूढ़ा: “छोटा जुर्म है, सही तरीके से केस लड़ो तो बेल मिल सकती है। भागोगे या हिंसा करोगे तो फांसी तय।”
राज बोला, “हम सरेंडर करना चाहते हैं, लेकिन पुलिस मार देगी।”
बूढ़ा: “मैं तुम्हारे साथ रहूंगा, पुलिस से बात करूंगा।”
अध्याय 5: आत्मसमर्पण और इंसानियत
तीनों ने बंदूकें नीचे रखीं, हाथ ऊपर किए। बूढ़ा आगे बढ़ा, दरवाजा खोला, “इंस्पेक्टर साहब, गोली मत चलाइए, ये तीनों सरेंडर कर रहे हैं, किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया है।”
इंस्पेक्टर रमेश यादव: “आप कौन हैं?”
“राम प्रसाद शर्मा, रिटायर्ड बैंक ऑफिसर। ये गलती से यहां आ गए थे, अब इन्हें एहसास हो गया है।”
इंस्पेक्टर ने तीनों को गिरफ्तार किया। बैंक मैनेजर ने बूढ़े का शुक्रिया अदा किया, “आपने सबकी जान बचाई।”
पुलिस स्टेशन में पूछताछ, तीनों ने सच बता दिया। इंस्पेक्टर: “मजबूरी समझता हूं, लेकिन कानून कानून है।”
बूढ़ा: “मैं वकील का इंतजाम करूंगा, बैंक मैनेजर से केस वापस लेने की बात करूंगा।”
मैनेजर ने कोशिश का वादा किया।
अध्याय 6: बूढ़े का राज
रात को अर्जुन ने सलाखों के पीछे से पूछा, “शर्मा जी, आपने इतना रिस्क क्यों लिया?”
बूढ़े की आंखों में आंसू, “50 साल पहले मैं भी तुम्हारी जगह था। मैंने भी बैंक लूटने की कोशिश की थी।”
सब हैरान।
“मैं भी गरीब था, मां बीमार थी, नौकरी नहीं थी। तीन दोस्तों के साथ बैंक लूटने गए। उस दिन एक बुजुर्ग मैनेजर केशव राव ने हमें समझाया, पुलिस के सामने सरेंडर कराया, केस वापस लिया, वकील दिलवाया, कोर्ट में हमारे पक्ष में गवाही दी। हमें सिर्फ 6 महीने की सजा मिली, प्रोबेशन पर छोड़ दिया। जेल से बाहर आने पर केशव राव ने नौकरी दिलवाई, मां का इलाज करवाया। उन्होंने मुझे जिंदगी दी। मैंने वादा किया था, अगर कभी मौका मिला तो किसी की वैसे ही मदद करूंगा।”
“आज 50 साल बाद भगवान ने मौका दिया। जब तुम तीनों को देखा, मुझे अपना अक्स दिखा। वही किया जो केशव राव ने मेरे लिए किया था।”
तीनों लड़के रो पड़े, “आपका एहसान कभी नहीं भूलेंगे, वादा करते हैं कभी गलत रास्ते पर नहीं जाएंगे।”
अध्याय 7: नई शुरुआत
अगले दिन बैंक ने केस वापस ले लिया, तीनों को बेल मिल गई।
बूढ़े ने दोस्तों से फंड इकट्ठा किया—₹15 लाख अर्जुन के मां के इलाज के लिए दिए।
“यह तोहफा है, कर्ज मत समझना, केशव राव की तरफ से।”
अर्जुन ने पैर छुए, “वादा करता हूं, जब पैसे होंगे, किसी की ऐसे ही मदद करूंगा।”
तीनों के लिए नौकरी का इंतजाम—अर्जुन को कंस्ट्रक्शन कंपनी में सुपरवाइजर, राज होटल में मैनेजर, विक्रम दुकान में सेल्समैन।
6 महीने बाद अर्जुन की मां का ऑपरेशन हुआ, ठीक हो गई।
अर्जुन अपनी मां को लेकर बूढ़े के घर गया, मां ने पैर छुए, “आप भगवान हैं।”
बूढ़ा: “बेटा थोड़ा भटक गया था, अब सही रास्ते पर है।”
अध्याय 8: केशव फाउंडेशन — सेवा की राह
एक साल बाद तीनों ने मिलकर ‘केशव फाउंडेशन’ नाम से एनजीओ शुरू किया।
गरीब, मजबूर लोगों की मदद करना, बीमार लोगों का इलाज, बच्चों की पढ़ाई, बेरोजगारों को रोजगार दिलाना।
बूढ़ा मार्गदर्शक बना, सेवा की राह सिखाई।
5 साल बाद केशव फाउंडेशन शहर का नामी एनजीओ बन गया, हजारों लोगों की जिंदगी बदली।
अध्याय 9: अंतिम विदाई और प्रेरणा
राम प्रसाद शर्मा डायरी में लिखते हैं, “मैंने अपना कर्ज चुका दिया, तीन जिंदगियां बचाई, अब जीवन सफल है।”
2 साल बाद दिल का दौरा, अस्पताल में भर्ती।
अर्जुन, राज, विक्रम पहुंचे, “शर्मा जी, आप ठीक हो जाएंगे।”
बूढ़ा: “मेरा समय आ गया है, अब तुम्हारी जिम्मेदारी है केशव फाउंडेशन को आगे बढ़ाओ।”
अगले दिन शर्मा जी ने आखिरी सांस ली।
अंतिम संस्कार में हजारों लोग शामिल हुए।
तीनों दोस्तों ने गुरु को कंधा दिया, रोते हुए अंतिम यात्रा में शामिल हुए।
अध्याय 10: प्रेरक विरासत
10 साल बाद केशव फाउंडेशन पूरे राज्य में फैल चुका है, 500 से ज्यादा लोगों की जिंदगी बदली।
तीनों दोस्त अब सम्मानित नागरिक, समाज सेवक।
राम प्रसाद शर्मा की याद में स्कूल खोला, जहां गरीब बच्चे मुफ्त में पढ़ते हैं।
हर साल बैंक लूट की सालगिरह पर उस बैंक के सामने खड़े होकर गुरु को याद करते हैं।
गलती करना इंसानी है, लेकिन उससे सीखना और सुधरना महानता है।
(कहानी समाप्त)
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