नौकर ने पुलिस दरोगा की पत्नी के साथ किया करनामा/अंजाम ठीक नहीं हुआ/

धुंधला चरित्र और टूटी मर्यादा: एक दुखद अंत
यह कहानी उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के गाजीपुर गांव की है। यहाँ का समाज अपनी सादगी और परंपराओं के लिए जाना जाता था, लेकिन इसी गाँव के एक आलीशान और चमकते मकान के भीतर मर्यादाएँ धीरे-धीरे दम तोड़ रही थीं। बाहर से जो घर स्वर्ग जैसा दिखता था, उसके भीतर अंधेरा पनप रहा था।
अध्याय 1: पद का अहंकार और भटकता मन
जमशेर सिंह पुलिस विभाग में एक हेड कांस्टेबल के पद पर कार्यरत था। उसके पास धन, शक्ति और संपत्ति की कोई कमी नहीं थी। गाँव के ऊँचे टीले पर बना उसका घर सबसे भव्य था, जिसकी संगमरमर की दीवारें उसकी समृद्धि की गवाही देती थीं। पाँच एकड़ की उपजाऊ ज़मीन से होने वाली आय ने उसे आर्थिक रूप से निश्चिंत कर दिया था। लेकिन जमशेर सिंह एक ऐसे व्यक्तित्व का स्वामी था जो अपने पद की गरिमा भूल चुका था। वह अक्सर शराब और अन्य बुरी आदतों का शिकार रहता था। उसके लिए वर्दी का मतलब सेवा नहीं, बल्कि रौब झाड़ना था।
जमशेर की पत्नी, अनीता देवी, गाँव की सबसे शालीन और सुंदर महिलाओं में से एक थी। वह धैर्य की प्रतिमूर्ति थी, परंतु जमशेर का मन अपनी सुघड़ पत्नी और घर की सुख-शांति में कम, और बाहर की रंगीनियों में अधिक रमता था। वह अक्सर ड्यूटी का बहाना बनाकर पंद्रह-बीस दिनों तक घर से नदारद रहता। पीछे छूट जाता था अनीता का सूना घर और उसका गहराता अकेलापन। अनीता अक्सर खिड़की के पास बैठकर घंटों आसमान निहारती, यह सोचकर कि क्या कभी उसके जीवन में भी पति का प्रेम और सानिध्य लौट पाएगा।
अध्याय 2: कोयल देवी की मजबूरी और जमशेर का अनुचित व्यवहार
दिसंबर की एक सर्द रात में, जब जमशेर अपने घर के आँगन में बैठा शराब का आनंद ले रहा था, तभी दरवाजे पर धीमी सी दस्तक हुई। दरवाजा खोलने पर सामने कोयल देवी खड़ी थी, जिसकी आँखों में खौफ और बेबसी साफ झलक रही थी। उसका पति सुरेश, जो एक साधारण मज़दूर था, पुलिस की पकड़ में था। कोयल को डर था कि पुलिस उसके बेगुनाह पति पर कोई बड़ा केस न लाद दे।
जमशेर ने कोयल की इस लाचारी को अपनी हवस की सीढ़ी बना लिया। उसने पहले तो भारी-भरकम रिश्वत की मांग की, और जब कोयल ने अपनी कंगाली का वास्ता दिया, तो जमशेर ने मुस्कुराते हुए एक ऐसी शर्त रखी जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया। कोयल के पास कोई और रास्ता नहीं था; अपने पति की जान और भविष्य बचाने के लिए उसने पत्थर दिल जमशेर की बातों को स्वीकार कर लिया। अनीता पास के कमरे से यह सब सुन रही थी। उसके भीतर का आत्मसम्मान रो रहा था, लेकिन जमशेर के हिंसक स्वभाव और समाज के डर से उसने अपनी जुबान पर ताला लगा लिया। उस रात जमशेर ने कोयल देवी के घर जाकर मर्यादा की हर उस सीमा को लांघ दिया, जिसकी रक्षा की कसम उसने वर्दी पहनते समय ली थी।
अध्याय 3: अनीता का अकेलापन और विजय का प्रवेश
समय का पहिया चलता रहा, लेकिन जमशेर के कुकर्म नहीं थमे। वह अब और भी अधिक निडर और निर्लज्ज हो गया था। अनीता की सहनशीलता अब जवाब दे चुकी थी। पति के प्रति उसकी श्रद्धा घृणा में बदल गई थी। घर के कामों के बोझ और मानसिक थकान को कम करने के लिए उसने एक सहायक रखने का विचार किया। जमशेर ने लापरवाही से कह दिया, “जो ठीक लगे कर लो, बस मुझे परेशान मत करना।”
अनीता ने गाँव के पास की एक छोटी सी दुकान पर काम करने वाले विजय नाम के युवक को अपने घर में नौकर के तौर पर रख लिया। विजय एक साधारण परिवार से था और उसे पैसों की सख्त जरूरत थी। विजय रोज सुबह आता, बगीचे की सफाई करता और घर के भारी काम निपटाता। धीरे-धीरे, जमशेर की हफ़्तों लंबी अनुपस्थिति के दौरान, अनीता और विजय के बीच बातचीत बढ़ने लगी। अनीता को विजय की बातों में वह सम्मान और सुकून मिला, जो जमशेर ने कभी नहीं दिया था। अपमान और अकेलेपन की आग में जल रही अनीता अब विजय की ओर आकर्षित होने लगी थी। मर्यादा की वह पतली लकीर, जिसे वह सालों से बचाए हुए थी, अब धुंधली पड़ने लगी थी।
अध्याय 4: षड्यंत्र और गहराता अंधकार
अनीता और विजय के बीच बढ़ती नज़दीकियों की फुसफुसाहट अब गाँव की गलियों तक पहुँचने लगी थी। विजय भी अब अपनी मालकिन के प्रति अधिक आश्वस्त हो गया था। उसने अपने दोस्त दर्शन सिंह को भी इस राज का हिस्सा बना लिया। दर्शन अक्सर विजय के साथ घर आने लगा। जमशेर, जो स्वयं भ्रष्टाचार और व्यभिचार में डूबा हुआ था, अपनी पत्नी के बदलते व्यवहार को भांप नहीं सका।
एक दिन जमशेर और अनीता की शादी की सालगिरह थी। अनीता ने उम्मीद की थी कि शायद इस खास दिन पर जमशेर घर आएगा, लेकिन जमशेर ने फोन पर ही उसे दुत्कार दिया। प्रतिशोध और हताशा से भरी अनीता ने उस रात विजय और दर्शन दोनों को घर बुला लिया। उस रात उस आलीशान मकान के भीतर मर्यादा की दीवारें पूरी तरह ढह गईं। अनीता यह सोचकर खुद को सही ठहरा रही थी कि यदि उसका पति गलत कर सकता है, तो उसे भी अपनी खुशी चुनने का हक है। लेकिन वह भूल गई थी कि पाप की बुनियाद पर खड़ा महल कभी टिकता नहीं है। जमशेर को अपनी गुप्त सूचनाओं के जरिए अब भनक लग चुकी थी और वह अपनी पत्नी को रंगे हाथों पकड़ने की योजना बनाने लगा था।
अध्याय 5: खूनी रात और आत्मसमर्पण
10 जनवरी 2026 की वह रात काल बनकर आई। जमशेर ने अनीता को संदेश भेजा कि वह ड्यूटी के कारण दो दिन और नहीं आएगा। अनीता ने मौका पाकर विजय और दर्शन को घर बुला लिया। आधी रात के समय, जब वे तीनों घर के भीतर मर्यादा की सारी हदें पार कर रहे थे, तभी अचानक मुख्य द्वार धड़धड़ाते हुए खुला। सामने जमशेर खड़ा था, जिसकी आँखों में खून उतर आया था।
अपने ही घर में अपनी पत्नी को पराये मर्दों के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखकर जमशेर का अहंकार चोटिल हो गया। विजय और दर्शन, जो थोड़ी देर पहले खुद को शक्तिशाली समझ रहे थे, जमशेर की पिस्तौल और खूंखार रूप देखकर खिड़की के रास्ते भाग खड़े हुए। लेकिन अनीता भाग नहीं सकी। जमशेर ने उसे पकड़ लिया और अपनी वर्दी का बचा-कुचा सम्मान भी क्रोध की आग में झोंक दिया। उसने कानून और संविधान की परवाह किए बिना न्याय खुद करने का फैसला लिया। वह रसोई की ओर भागा और वहां से मांस काटने वाला बड़ा चाकू उठा लाया। अनीता की चीखें उन संगमरमर की दीवारों में ही दबकर रह गईं। जमशेर ने वार पर वार कर अपनी पत्नी की जीवनलीला समाप्त कर दी।
हत्या करने के बाद, जमशेर का जुनून ठंडा हुआ, तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वह रात के अंधेरे में ही खून से लथपथ कपड़ों में थाने पहुँचा और अपनी पत्नी की हत्या का जुर्म कबूल करते हुए आत्मसमर्पण कर दिया।
निष्कर्ष: समाज के लिए एक चेतावनी
यह दुखद अंत हमें कई गंभीर सबक देता है, जिन पर विचार करना आवश्यक है:
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मर्यादा का पतन: जब घर का मुखिया ही अनैतिक हो, तो पूरे परिवार की नींव हिल जाती है। मर्यादा केवल एक शब्द नहीं, बल्कि समाज का संतुलन है।
गलत रास्ते का चुनाव: पति के कुकर्मों का बदला स्वयं गलत रास्ता अपनाकर लेना कभी भी सुखद परिणाम नहीं देता। अनीता का प्रतिशोध अंततः उसकी मृत्यु का कारण बना।
चरित्र ही असली धन है: धन और शक्ति इंसान को पद दे सकते हैं, लेकिन बिना चरित्र के इंसान पशु से भी बदतर हो जाता है।
कानून का सम्मान: कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कानून का रक्षक ही क्यों न हो, उसे कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है।
जमशेर अब कालकोठरी में अपने अंत का इंतजार कर रहा है। वह घर, जो कभी गाँव की शान था, अब एक ‘भूतिया खँडहर’ में तब्दील हो गया है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि हमारे कर्म साये की तरह हमारा पीछा करते हैं, और जैसा हम बोते हैं, वैसा ही काटते हैं।
नोट: यह कहानी समाज में जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से लिखी गई है। इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से संबंध मात्र एक संयोग हो सकता है।
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