दुष्ट बेटे ने अपने पिता को बाइक से बांधा और देखिये उसने अपने पिता के साथ क्या किया 😢

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प्रस्तावना

गांव की तपती दोपहर थी। मिट्टी से धूल उड़ रही थी, और तंग गलियों में लोग हैरत और दर्द भरी नजरों से एक जुल्म का मंजर देख रहे थे। करीम बख्श के हाथ मजबूत रस्सियों से बंधे हुए थे, और वह बेबस, बुरी तरह बाइक के पीछे घिसटता चला आ रहा था। उसका जवान बेटा बाइक को पूरी ताकत से तेज चला रहा था, जैसे सामने इंसान नहीं कोई बोझ बंधा हो। बूढ़ा बाप बार-बार लड़खड़ाता, कभी घुटनों के बल गिरता, कभी जमीन पर घिसटता। मगर रस्सियों के जाल में जकड़ा वो मजबूर था। न रुक सकता था, न बच सकता था। उसके कांपते हुए होंठ फरियाद कर रहे थे, “खुदा के लिए जुल्म मत कर, मैं तेरा बाप हूं।”

मगर बेटे की आंखों में जरा सी भी नरमी ना थी। वो बाइक को और तेज करता गया, जैसे बाप के वजूद से उसका कोई रिश्ता बाकी ही न रहा हो। गांव वाले साकित खड़े थे, कोई आगे बढ़ने की हिम्मत ना कर सका। एक जगह जाकर बेटे ने जोर से बाइक रोकी, नीचे उतरकर करीम बख्श की तरफ सख्त निगाहों से देखा और ठंडे लहजे में बोला, “दोबारा अगर तूने मुझे अपनी शक्ल दिखाई तो तुझे जान से मार दूंगा।” फिर उसने बाइक स्टार्ट की और धुआं सा उड़ाता हुआ वहां से चला गया।

करीम बख्श जमीन पर पड़ा कराह रहा था। उसके हाथ रस्सियों में बंधे थे, कपड़े छिले हुए, चेहरा मिट्टी और खरोचों से रंगा हुआ था। आंखों से खामोश आंसू बह रहे थे और जिस्म दिल जख्मों से चूर था। एक आदमी आगे बढ़ा, उसे सहारा दिया और अपनी आवाज में एक कस्म का गम व नाउदी मिलाकर बोला, “क्या जमाना आ गया है? बेटे ने अपने बाप के साथ ऐसा सुलूक किया।”

गांव वाले उसे उठाकर हकीम के पास ले गए। हकीम ने नरमी से मरहम पट्टी की। मगर करीम बख्श की जुबान फिर भी बंद रही। उसकी आंखें पथरी हो चुकी थीं, जैसे वह किसी दहला देने वाले मंजर को देखकर खामोश खो गया हो। जब लोग बार-बार पूछने लगे कि करीम बख्श बताओ आखिर तुम्हारे बेटे ने तुम्हारे साथ यह सब क्यों किया? तब भी वह बोल ना सका। आखिरकार उसने धीमी फटी हुई आवाज में कहा, “यह मेरे गुनाहों की सजा है।”

मरहम पट्टी के बाद वह लाठी के सहारे खड़ा हुआ और बगैर किसी जवाब के गांव के बाहर की तरफ चल पड़ा। लोग हैरत, हमदर्दी और सवालात लिए उसे पीछे से देखते रहे। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे, चेहरे पर एक अजीब सा पछतावा और कुचला हुआ दर्द नमूदार था।

Zalim Bete Ne Baap Ko Bike Ke Saath Baandh Kar Dekho Uske Saath Kya Kiya 😢 | Islamic Story

अतीत की यादें

करीम बख्श चलते-चलते एक घने जंगल तक पहुंचा। एक पुराने दरख्त के साए तले बैठकर वो अचानक फूट-फूट कर रोने लगा। उसने आहिस्तगी से कहा, “समीना, मुझे माफ कर दो। जो कुछ तूने कहा था, आज वो सच साबित हो गया।” फिर उसका जहन धीरे-धीरे अतीत की यादों में खो गया।

करीम बख्श एक लापरवाह और अय्याश मिजाज नौजवान था। छोटे से घर में अकेला रहता था और बाप-दादा की जमीनों से आने वाली आमदनी पर जिंदगी गुजार रहा था। मां-बाप को दुनिया से रुखसत हुए कई बरस बीत चुके थे। और अब उसकी जिंदगी का महावर सिर्फ ऐश-बशरत थी।

एक दिन गांव के पुराने कुएं पर उसकी नजर एक लड़की पर पड़ी। वो समीना थी—निहायत मासूम, बाहाया और खूबसूरत। पानी भरने में मशरूफ समीना को देखकर करीम बख्श के दिल में पहली बार कोई नरम लहर उठी और वो उसी लम्हे दिल हार बैठा। कुछ ही दिनों में उसने समीना के घर रिश्ता भिजवा दिया। मगर उसके बाप ने साफ इंकार कर दिया। बूढ़े बाप ने गुस्से से कहा, “एक अय्याश लड़के के हाथ में मैं अपनी बेटी की जिंदगी कैसे दे दूं?”

करीम बख्श ने लाख मिन्नतें कीं, मगर दरवाजा उसके मुंह पर बंद कर दिया गया। इनकार के बावजूद वह बाज ना आया। वो कभी कुएं पर, कभी बरगद के दरख्त के साए तले चुपचाप समीना का इंतजार करता। इब्तदा में समीना उसकी तवज्जो से घबराती रही, मगर वक्त के साथ-साथ वह भी उसकी मोहब्बत में खींचती चली गई। सादा और नरम दिल लड़की आखिर उसके जज्बात से मुतासिर हो गई और दोनों के दरमियान खामोश मोहब्बत परवान चढ़ने लगी।

इसी दौरान अचानक समीना के बाप को दिल का दौरा पड़ा और वह दुनिया से रुखसत हो गया। अब समीना की मां बेटी के दिल का हाल समझ चुकी थी। करीम बख्श की जिद और समीना की पसंद के आगे उसने हथियार डाल दिए और खामोशी से समीना की शादी करीम बख्श से कर दी।

मोहब्बत की बहार और दोस्ती का जहर

समीना की जिंदगी में पहली बार बहार आई। उसे यूं महसूस होता था जैसे उसे उसकी मोहब्बत, उसका ख्वाब हकीकत का रूप देकर मिल गया हो। वो दिल से मुतमइन और बेहद खुश थी। यूं ही वक्त गुजरता गया।

एक दोपहर समीना आंगन में बैठी घर के कामों से फॉरेग हो रही थी कि अचानक उसके मोबाइल फोन की घंटी बज उठी। नंबर देखा तो वह उसकी बचपन की सहेली नादिया का था। वही नादिया जो शादी के बाद शहर चली गई थी और जिससे कई साल से कोई राब्ता ना था। समीना ने मुस्कुरा कर कॉल उठाई, मगर दूसरी तरफ से रोने की आवाज सुनकर उसका दिल कांप गया।

“समीना, मैं टूट गई हूं। मैं कहां जाऊं?”
नादिया हिचकियों के साथ बोली, “मेरे मां-बाप अब इस दुनिया में नहीं रहे। शौहर भी चल बसा। मैं अकेली हूं। मेरे साथ सिर्फ मेरा मासूम बेटा है। किसी का सहारा नहीं।”

समीना का दिल दर्द से भर आया। उसने नरमी से जवाब दिया, “नादिया, तुम फिक्र मत करो। कल ही गांव आ जाओ। अम्मा-अब्बा का पुराना घर अब भी खाली है। तुम वहीं रह सकती हो। मैं राशन और जरूरत की हर चीज पहुंचा दूंगी। तुम अकेली नहीं हो, मैं हूं ना।”

कुछ दिन बाद नादिया अपने बेटे के साथ गांव आ गई और समीना के पुराने घर में रहने लगी। यह बात करीम बख्श को भी मालूम थी, मगर उसने इस मामले को ज्यादा अहमियत ना दी। वक्त गुजरता रहा।

समीना और करीम बख्श की शादी को 5 साल मुकम्मल हो चुके थे, मगर औलाद की नेमत अब तक नसीब ना हुई थी। समीना हर रात हाथ उठाकर दुआएं करती, “या अल्लाह, हमें भी खुशियों का वह दरवाजा दिखा जिसका नाम औलाद है।”

दोस्ती में छुपा धोखा

इसी दौरान एक रोज नादिया समीना और करीम बख्श के घर आई। जब उसने समीना की खुशहाल जिंदगी, कुशादा घर और करीम बख्श की मोहब्बत भरी निगाहें देखीं तो उसके दिल में हसद की आग भड़क उठी। वो समीना की खुशियों को हजम ना कर सकी। उसके अंदर एक जहरीला ख्याल जन्म लेने लगा।

समीना इस खतरे से बेखबर थी। उसे क्या मालूम था कि जिसे वह सहारा समझकर लाई है, वही उसकी जिंदगी में अंधेरे की पहली लकीर बनने वाली है और उसका शौहर और उसकी सहेली मिलकर उसकी किस्मत में एक गहरा गड्ढा खोद रहे हैं।

नादिया आहिस्ता-आहिस्ता रास्तों में करीम बख्श को रोकने लगी। कभी सलाम के बहाने, कभी कोई सवाल, कभी कोई मस्नूई परेशानी—वो अपनी मीठी बातों से उसके दिल में जगह बनाने लगी। कुछ ही दिनों में उसने करीम बख्श के दिल-दिमाग में सर भर दिया।

एक दिन वो हमदर्दी का लिबास ओढ़कर बोली, “करीम बख्श, सोचो समीना तुम्हें औलाद नहीं दे सकती, तुम्हारी नस्ल का क्या होगा? मेरे पास तो एक बेटा है, अगर हम एक हो जाएं तो तुम्हें वारिस भी मिल जाएगा और मोहब्बत भी।”

करीम बख्श घबरा कर बोला, “ये कैसे मुमकिन है? समीना मेरी बीवी है और तुम तो उसकी सहेली हो।”
मगर नादिया की चालाक बातें, उसका दिखावा, उसकी झूठी मोहब्बत आहिस्ता-आहिस्ता करीम बख्श की कमजोर अकल पर पर्दा डालती गई। वो जानता था यह गलत है, मगर फिर भी दिल से उस फितने में फंसता चला गया।

मोहब्बत का पतन

इधर समीना ने कुछ दिनों से महसूस किया था कि करीम बख्श बदल गया है। वो बात कम करता, निगाहें चुराता, बार-बार गुस्सा करता और कमरे का सुकून अजनबी लगने लगा।

इसी परेशानी में एक दोपहर वह कुएं पर पानी भरने गई तो उसके चेहरे पर थकन और दिल में उदासी थी। घड़ा जमीन पर रखकर वो एक डूबती सांस के साथ बैठ गई। “शायद औलाद ना होने की वजह से वह मुझसे नाराज रहने लगा है।” उसने रोकते हुए आंसू पोंछे और घर की तरफ वापस चल पड़ी।

मगर घर पहुंचते ही उसकी दुनिया पल भर में टूट गई। दरवाजा खोलते ही सामने का मंजर उसके कदमों तले जमीन खींच लाया। नादिया और करीम बख्श आमने-सामने बैठे थे, हंसते मुस्कुराते जैसे किसी और ही दुनिया में हो। करीम बख्श नादिया की उंगली में अंगूठी पहना रहा था।

समीना के हाथ से घड़ा छूट कर फर्श पर जा गिरा। पानी बिखरा और उसके साथ ही उसकी सारी उम्मीदें भी। वो तेज कदमों से बढ़ी और एक जोरदार थप्पड़ नादिया के चेहरे पर रसीद किया। “शर्म नहीं आई तुम्हें? मैंने तुम्हें अपनी बहन कहा, अपने घर का दरवाजा खोला, मुश्किल वक्त में सहारा दिया। और तुम, तुमने मेरी ही छत के नीचे मेरे घर पर डाका डाला। निकल जाओ अभी के अभी।”

नादिया गुस्से और जिल्लत के साथ वहां से निकल गई। मगर उसके जाते ही करीम बख्श ने उल्टा दहाड़ते हुए कहा, “तुमने नादिया पर हाथ कैसे उठाया? वो मुझसे मोहब्बत करती है। तुम कौन होती हो उसे रोकने वाली?”

समीना खामोश आंसुओं से भीगी आंखों के साथ उसे देखती रह गई। यह वही करीम बख्श था जो कभी उसके बगैर सांस ना लेता था। उसका दिल टूट चुका था। और पहली बार उसे महसूस हुआ कि दुआओं से ज्यादा किसी और तूफान ने उसकी जिंदगी को घेर लिया है।

जुल्म की इंतेहा

यूँ ही दिन गुजरते गए। करीम बख्श का रवैया समीना के लिए जहर बनता जा रहा था। वो मामूली बात पर चीखता, ताने देता और हर बार यही जख्म देकर चला जाता।

“तुम मुझे औलाद नहीं दे सकती। तुम बांझ हो। मेरा क्या मुस्तकबिल है तुम्हारे साथ?”
समीना चुप रहती, आंसू पीती, सीना जलता मगर जुबान ना खुलती। क्योंकि उसने कभी सोचा ही ना था कि मोहब्बत का अंजाम इतना सख्त कभी हो सकता है।

एक दिन अचानक करीम बख्श नादिया और उसके बेटे को घर ले आया।
समीना की आंखों में हैरत, दुख और खौफ एक साथ सिमट गए।
“करीम बख्श, यह सब क्या है? तुम इन्हें यहां क्यों लाए हो?”
करीम बख्श ने सर्द लहजे में वो जुमला कहा जिसने समीना की रूह चीर दी।
“मैं नादिया से निकाह कर चुका हूं। और आज से यह मेरा बेटा है। तुम तो औलाद दे नहीं सकती, मुझे वारिस चाहिए था और वह अब मुझे मिल चुका है।”

जमीन समीना के कदमों से यूं सरक गई जैसे किसी ने उसकी जिंदगी का स्तंभ अचानक खींच लिया हो। वो कांपती आवाज में फकत इतना कह सकी, “करीम, तुमने यह क्या किया?”

नादिया आगे बढ़ी, सीना तान कर झर भरी मुस्कुराहट के साथ, “अब तुम्हारी इस घर में जगह नहीं। यह घर, यह जमीनें, सब कुछ मेरे बेटे का है। तुम बस यहां से दफा हो जाओ।”

समीना की आंखों से बहते आंसू रुक ही ना सके। करीम बख्श ने उसके बाजू को बेरहमी से पकड़ा, घसीटते हुए दरवाजे तक लाया। वो फरियाद करती रही, गिड़गिड़ाती रही। “मेरे साथ यह जुल्म ना करो, मैंने तुमसे मोहब्बत की है, दुश्मनी नहीं।”

मगर करीम बख्श के दिल पर जुल्मत का ताला पड़ चुका था। उसने समीना को दहलीज के बाहर जोर से धक्का दिया। वो जमीन पर गिरी, सिसकियों में डूबी और टूटी आवाज में बस इतना कह सकी, “करीम बख्श, याद रखना, जिस औरत और उसके बेटे के लिए तुमने मुझे ठुकरा दिया, एक दिन यही तुम्हें रुसवा करेंगे, तुम इसी दरवाजे पर पछताओगे।”

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तकदीर का खेल

समीना की वो आखिरी चीखें खामोश रात में गुम हो गईं और वह अश्कों में भीगती गांव से बाहर चली गई। ना कोई आस, ना कोई सहारा, सिर्फ दिल का मलबा और दुआओं की राख साथ लिए। करीम बख्श ने पलट कर ना देखा। उसने नादिया और उसके बेटे को अपनी जिंदगी बना लिया। उस बच्चे पर हद से ज्यादा मोहब्बत न्योछावर की, उसे खून से ज्यादा कीमती समझा।

मगर वक्त का पहिया रुका नहीं। वही बच्चा जब जवान हुआ, उसे बाप की जरूरत ना रही। नादिया के साथ मिलकर उसने सारी जायदाद अपने नाम करवा ली और एक दिन उसी करीम बख्श को दरवाजे से धक्का देकर निकाल दिया। बिल्कुल उसी तरह जैसे कभी समीना को निकाला गया था।

अब वह जंगल के तन्हा रास्ते में एक दरख्त से टेक लगाए बैठा था। हाथ आंखों पर रखे, चीख-चीख कर रो रहा था। यादों ने उसे जकड़ लिया था, पछतावे ने उसका दिल चीर दिया था। देर से सही, उसे समझ आ चुका था—उसने सिर्फ समीना को नहीं खोया था, उसने अपनी किस्मत, अपना घर और अपनी इज्जत सब कुछ अपने हाथों से बर्बाद किया था।

जुल्म का बदला और अंत

दूसरी तरफ नादिया आंगन में बैठी मुस्कुराहटों में गुम थी। उसे लगता था कि वह जिंदगी की बाजी जीत गई है। जायदाद, जमीनें, घर, सब कुछ उसके कदमों में था। उसे यकीन था कि अब उसकी दुनिया मुकम्मल है। मगर वो यह नहीं जानती थी कि अल्लाह की पकड़ से बड़ी कोई पकड़ नहीं और जुल्म का कर्ज कभी माफ नहीं होता।

नादिया का बेटा फक्र से बोला, “अम्मा, यह सारी जमीनें बेचकर जो पैसा आया है, मैं उसे कारोबार में लगाऊंगा। अब देखिएगा हमारा नाम और दौलत दिन दुगनी रात चौगुनी बढ़ेगी। हम बहुत अमीर हो जाएंगे।”
नादिया की आंखों में गरूर चमक उठा। उसे लगा अब कोई तूफान उसे छू भी नहीं सकता।

बेटा पैसा लेकर शहर रवाना हो गया। मगर तकदीर ने उसके लिए कुछ और लिख रखा था। रास्ते में खौफनाक एक्सीडेंट हुआ, और वो नौजवान जिसके ख्वाब अभी पलकों पर ताजा थे, लाश की सूरत मां के दरवाजे पर वापस आया।

जवान बेटे की मय्यत देखकर नादिया के वजूद से चीखें फूट पड़ीं। वो सीना पीट-पीट कर बिलखती रही, आंसुओं से आंखें जल गईं मगर सदमा कम ना हुआ। वो कहती जाती, “मेरे बेटे, तूने अभी जीना तो शुरू भी नहीं किया था।”

उसी रोने के बीच अचानक माजी का वो लम्हा उसके ज़हन में बिजली बनकर लौट आया, जब समीना ने दहलीज पर खड़े होकर रोते हुए कहा था, “नादिया, याद रखना, तुम दोनों एक दिन पछताओगे। तुमने मुझसे मेरा सब कुछ छीना है, एक दिन तुमसे भी सब कुछ छीन जाएगा।”
आज वह अल्फाज सच साबित हो चुके थे। जायदाद गई, पैसा गया, अब बेटा भी चला गया।

करीम बख्श पहले ही घर से निकाला जा चुका था, और अब नादिया तन्हा, खाली हाथ और टूटे दिल के साथ किनारों पर बिखर गई थी। चंद ही दिनों में भूख ने उसे बेहाल कर दिया। वह दर-दर की ठोकरें खाती, दरवाजों पर दस्तक देती, सड़कों पर हाथ फैलाकर रोटी मांगती फिर रही थी। गरूर खाक हो चुका था और आंखों में सिर्फ नदामत बची थी। उसके दिल में एक ही आवाज पलट-पलट कर गूंजती रही, “काश समीना मुझे माफ कर दे, मैंने बहुत जुल्म किया, बहुत बड़ा गुनाह।”

अंतिम मोड़

मगर वो यह भी जानती थी, इंसान शायद जुल्म भूल जाए, मगर अल्लाह कभी नहीं भूलता। अल्लाह के यहां देर है, अंधेर नहीं। आज करीम बख्श और नादिया दोनों जलील-खार थे। बेटे से मेहरूम, आस से खाली और दुनिया की ठोकरों का शिकार। और यह सब उसी जुल्म का बदला था जो उन्होंने समीना जैसे पाक दिल पर ढाया था।

नादिया की जिंदगी अब किसी भी सहारे से खाली हो चुकी थी। सड़कों पर भीख मांगते-मांगते एक दिन वो बोझिल कदमों के साथ गिरी और फिर कभी ना उठ सकी। उसकी लाश सुनसान सड़क पर पड़ी रही। लोग पास से गुजरते हुए बस इतना कहते, “अरे देखो, कैसे लावारिसों की तरह मर गई, ना कोई अपना, ना कोई पूछने वाला।” जाने कौन थी, किसी को उसके माजी का इल्म ना था, ना उस जुल्म की कहानी का जो उसने कभी खुद अपने हाथों से लिखा था। दफन भी कर दिया गया, मगर ना कोई कब्र पर फातिहा पढ़ने वाला था, ना कोई बेटा कंधा देने वाला।

इधर करीम बख्श की हालत उससे भी बदतर थी। वो पागलों की तरह गली-गली, जगह-जगह मारा-मारा फिरता, उसका ज़हनी तवाजुन टूट चुका था। वो हर अजनबी से एक ही सवाल करता, “क्या तुमने मेरी समीना को देखा है? मेरी समीना कहां है?” लोग ठिठक कर उसे देखते और अफसोस से सर हिलाकर कहते, “यह बेचारा दीवाना हो गया है, जाने किस समीना का रोना है।”

वक्त गुजरता रहा, साल बीत गए, मगर करीम बख्श के दिल की आवाज एक लम्हे को भी खामोश ना हुई। वो ना थका, ना रुका, बस तारीकियों में भटकता रहा।

माफी और सबक

एक दिन सड़क किनारे वो थका-हारा, फटे कपड़ों में मिट्टी से अटा बैठा था। आंखों में नमी, चेहरे पर शिकस्त, दिल पर बोझ। ऐसे में वहां से एक बावकार औरत गुजरी। उसके साथ एक नौजवान लड़का भी था। औरत ने रुक कर बेटे से कहा, “बेटा, उस बुढ़ापे और बेबसी को देखते हो? कुछ मदद कर दो, शायद कोई भूखा हो, कोई बेसहारा हो।”

करीम बख्श ने सिसकते हुए नजरें उठाई और वक्त थम गया। वो चेहरा, वो आंखें, वो पहचान। उसने हल्की कपकपाहट के साथ कहा, “तुम…तुम समीना हो?”
औरत ने हैरत से उसे देखा, “हां, मेरा नाम समीना है, मगर तुम कौन हो? मुझसे क्यों?”

उसकी बात पूरी भी ना हुई थी कि करीम बख्श उसके कदमों में गिर गया। कांपती आवाज में वो फूट पड़ा, “मैं…मैं करीम बख्श हूं। समीना, मुझे माफ कर दो। मैं बर्बाद हो गया, मैं मर गया अंदर से।”

समीना के कदम जैसे जमीन में गढ़ गए। उसकी आंखों के सामने एक पल में बरसों पुरानी आग भड़क उठी। वही दिन, वही धक्के, वही जख्म। मगर उसके चेहरे पर नफरत ना थी, बस एक ठंडी खामोशी। उसने धीरे से कहा, “मैंने तुम्हें माफ कर दिया, करीम बख्श। अधूरे दिल लेकर कोई जीता नहीं। मैंने अपने रब के लिए तुम्हें पहले ही माफ किया था। यह मेरा बेटा है, मेरा सहारा।”

करीम बख्श ने बेयकीनी से लड़के को देखा और समीना ने खामोश लहजे में सच कह दिया, “जिस दिन तुमने मुझे धक्के देकर घर से निकाला, मैं मां बन चुकी थी। मगर यह राज मुझे बाद में मालूम हुआ। मैंने बहुत कुछ बर्दाश्त किया, मगर अल्लाह ने मुझे सहारा भी दिया, इज्जत भी।”

यह कहकर समीना पलट गई। वो माजी को दोबारा ना दोहराना चाहती थी, ना फिर से रोई हुई जिंदगी जीकर खुद को कमजोर करना चाहती थी। उसका सफर खत्म नहीं हुआ था, लेकिन करीम बख्श का हो चुका था। वो सड़क पर बैठा समीना के कदमों के निशान देखता रह गया। उसके पास अब ना घर था, ना रिश्ता, ना आस, सिर्फ पछतावा, आंसू और वो वक्त जो कभी पलट कर नहीं आता।

उपसंहार

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सीख:
जुल्म और धोखे का अंजाम हमेशा दर्द और पछतावा होता है। मोहब्बत, माफी और इंसानियत ही सबसे बड़ी दौलत है।
कभी किसी का दिल मत दुखाइए, क्योंकि वक्त का पहिया हर किसी को उसकी करनी का फल जरूर देता है।