खाकी और सादगी: व्यवस्था की सफाई

अध्याय 1: सुनहरी सुबह और एक अनजाना चेहरा

सुबह की पहली किरण ने जब शहर की ऊँची इमारतों और तंग गलियों को छूना शुरू किया, तो ऐसा लगा मानो पूरा शहर सोने की चादर ओढ़कर जाग रहा हो। सूरज की सुनहरी रोशनी सड़कों पर किसी पिघले हुए सोने की तरह बिछी हुई थी। परिंदों की चहचहाहट और दूर किसी मंदिर से गूँजती शंख की पावन ध्वनि ने वातावरण में एक अजीब सी शांति भर दी थी। लेकिन यह शांति केवल ऊपरी थी। शहर का वह पुराना बाज़ार, जिसे ‘पुरानी चुंगी’ कहा जाता था, अपनी रोजमर्रा की रफ़्तार पकड़ने लगा था।

उसी हलचल भरी सड़क पर एक महिला पैदल चली जा रही थी। उसने साधारण सूती कुर्ती और सफेद पायजामा पहना था। उसके कंधे पर एक पुराना सा झोला लटका था और पैरों में साधारण चप्पलें थीं। उसके चेहरे पर न तो कोई मेकअप था और न ही कोई अहंकार, बल्कि एक गहरा सुकून और सादगी थी। बाज़ार के शोर के बीच वह बिल्कुल वैसी ही लग रही थी जैसे कोई मिडिल क्लास स्कूल की अध्यापिका या अपने घर के लिए राशन लेने निकली कोई आम महिला।

बिना किसी सुरक्षा गार्ड के, बिना किसी सरकारी गाड़ी के शोर के, वह महिला भीड़ का हिस्सा बनी हुई थी। कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था कि इस सादे लिबास के पीछे इस पूरे ज़िले की सबसे तेजतर्रार, निडर और ईमानदार पुलिस अफसर आईपीएस नंदिनी राठौर छिपी हुई है।

नंदिनी ने आज अपनी वर्दी, अपनी पिस्तौल और अपने पद का वह भारी रुतबा अपने सरकारी बंगले की अलमारी में बंद कर दिया था। उनका मकसद बहुत साफ था। वे वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर फाइलों के सूखे पन्नों के जरिए शहर का हाल नहीं जानना चाहती थीं। वे देखना चाहती थीं कि जिस व्यवस्था (System) की वह मुखिया हैं, वह सिस्टम एक आम, गरीब और बेसहारा नागरिक के साथ असल में कैसा बर्ताव करता है।

अध्याय 2: रहमत मियां का ठेला और सादगी का स्वाद

चलते-चलते नंदिनी की नज़र सड़क के एक कोने में लगे एक जर्जर लकड़ी के ठेले पर पड़ी। धुएँ और तेल की खुशबू हवा में तैर रही थी। यह ‘रहमत मियां’ का मशहूर कचौड़ी और जलेबी का ठेला था। 60 साल के रहमत मियां, जिनकी कमर थोड़ी झुक गई थी, लेकिन उनकी फुर्ती किसी जवान से कम नहीं थी। उनके चेहरे की गहरी झुर्रियों में उनकी पूरी जिंदगी की ईमानदारी और हाड़-तोड़ मेहनत का इतिहास दर्ज था।

नंदिनी उस ठेले के पास पहुँची। वहाँ कुछ मजदूर और रिक्शेवाले खड़े होकर नाश्ता कर रहे थे। नंदिनी ने एक सौम्य मुस्कान के साथ कहा, “बाबा, एक प्लेट कचौड़ी मुझे भी खिलाइए। पर ध्यान रखिएगा, थोड़ी तीखी होनी चाहिए।”

रहमत मियां ने अपनी पसीने से भीगी गमछी से माथा पोंछा और मुस्कुराते हुए बोले, “अभी लीजिए बिटिया! हमारे यहाँ का स्वाद ऐसा है कि आप एक बार खाएंगी तो रोज़ यहीं खिंची चली आएंगी।”

.

.

.

.

उन्होंने बड़े जतन से दो कुरकुरी कचौड़ियाँ तोड़ीं, उन पर गर्म आलू की रसेदार सब्जी डाली, ऊपर से कटी हुई मिर्च और खट्टी-मीठी चटनी सजाकर मिट्टी के दोने में नंदिनी की तरफ बढ़ा दिया। नंदिनी ने जैसे ही पहला निवाला लिया, उन्हें लगा मानो इस शहर की असली मिठास और ईमानदारी इन्हीं गलियों में बसी है। उन्हें वह स्वाद किसी फाइव स्टार होटल के पकवानों में भी नहीं मिला था।

अध्याय 3: आतंक का प्रवेश – इंस्पेक्टर भैरव सिंह

अचानक, उस शांतिपूर्ण माहौल को पुलिस के कर्कश सायरन और बुलेट मोटरसाइकिलों की कान फाड़ देने वाली आवाज़ ने चीर दिया। बाज़ार की भीड़ घबराकर इधर-उधर होने लगी। दो काली बुलेट और एक नीली बत्ती वाली सरकारी जीप धूल उड़ाती हुई सीधे रहमत मियां के ठेले के सामने आकर रुकी।

जीप का दरवाज़ा खुला और जो शख्स बाहर निकला, उसे देखकर पूरे बाज़ार में एक खौफनाक सन्नाटा पसर गया। वह था इलाके का सबसे बदनाम, भ्रष्ट और क्रूर पुलिस अफसर—इंस्पेक्टर भैरव सिंह

उसकी बड़ी-बड़ी मूँछें, आँखों पर लगा काला चश्मा और हाथ में पकड़ी हुई भारी बेंत (लाठी) उसके घमंड की गवाही दे रही थी। भैरव सिंह के भारी जूतों की आहट जैसे-जैसे ठेले की तरफ बढ़ रही थी, वहाँ खड़े आम लोगों की सांसें डर के मारे अटक रही थीं।

भैरव सिंह ने अपने दांत पीसते हुए कड़क आवाज़ में कहा, “ओए रहमत! तुझे कितनी बार समझाया है कि इस सड़क पर ठेला नहीं लगाना है? तू क्या खुद को यहाँ का नवाब समझता है?”

रहमत मियां का शरीर कांपने लगा। उन्होंने हाथ जोड़कर रुंधे गले से कहा, “साहब, मैं बहुत गरीब आदमी हूँ। घर में बीमार बीवी है और छोटे-छोटे पोते-पोतियों का पेट पालना होता है। मैंने ठेला बिल्कुल किनारे लगाया है, इससे किसी को कोई तकलीफ नहीं हो रही…”

भैरव सिंह ने एक अट्टहास किया और बोला, “तकलीफ नहीं हो रही? यह तू तय करेगा? और यह बता, इस हफ्ते का ‘हफ्ता’ (रिश्वत) कहाँ है? लगता है तेरी कमाई कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है जो पुलिस की आँखों में धूल झोंक रहा है।”

रहमत मियां की आँखों से आंसू बहने लगे। “साहब, आज तो बोहनी भी ठीक से नहीं हुई। शाम तक जो भी कमाऊँगा, खुद आकर थाने दे दूँगा। आज मुझ गरीब पर रहम कर दीजिए।”

“रहम? पुलिस को रहम सिखाता है तू?” भैरव सिंह का चेहरा गुस्से से लाल हो उठा।

अगले ही पल, भैरव सिंह ने अपने भारी बूट से कचौड़ियों के उस खौलते हुए तेल की कढ़ाई पर जोरदार लात मारी। एक भयानक आवाज़ के साथ पूरा ठेला पलट गया। खौलता हुआ तेल, कचौड़ियाँ, जलेबियाँ और रहमत मियां की पूरे दिन की मेहनत कीचड़ में मिल गई।

रहमत मियां चीख मारकर ज़मीन पर गिर पड़े और कांपते हाथों से अपनी बिखरी हुई रोजी-रोटी समेटने लगे। पूरा बाज़ार तमाशबीन बना खड़ा था, किसी की हिम्मत नहीं थी कि उस जालिम वर्दी वाले के खिलाफ एक शब्द भी बोल सके।

अध्याय 4: शेरनी की दहाड़ और व्यवस्था की चुनौती

नंदिनी, जो कुछ ही कदमों की दूरी पर खड़ी यह सब देख रही थी, उसका खून खौल उठा। एक आईपीएस अफसर की आत्मा इस अमानवीय कृत्य को देखकर तड़प उठी। उसने अपनी कचौड़ी का दोना पास के एक खंभे पर रखा और भारी कदमों से भैरव सिंह के ठीक सामने जाकर खड़ी हो गई।

उसकी आवाज़ में एक अजीब सा फौलादी ठहराव था, “यह कौन सा कानून है जो आपको एक लाचार इंसान की रोजी-रोटी को जूतों तले रौंदने का हक देता है? क्या आप अपनी इस वर्दी का यही मतलब समझते हैं?”

पूरा बाज़ार हैरान रह गया। एक साधारण सी दिखने वाली महिला ने इलाके के ‘डॉन’ इंस्पेक्टर को ललकार दिया था। भैरव सिंह ने नंदिनी को सिर से पैर तक हिकारत भरी नज़रों से देखा और हंसा।

“अरे वाह! आज तो बाज़ार में एक नई समाज सुधारक पैदा हुई है। ऐ औरत! तू है कौन जो पुलिस के काम में अपनी टांग अड़ा रही है? अपना रास्ता नाप, वरना यह जो हमदर्दी का भूत तेरे सिर पर सवार है, उसे उतारने में मुझे दो मिनट भी नहीं लगेंगे।”

नंदिनी अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिली। “मैं इस देश की एक नागरिक हूँ। और जब मैं किसी रक्षक को भक्षक बनते देखती हूँ, तो मैं खामोश नहीं रह सकती। यह सीधा जुल्म है और आपको इसकी कीमत चुकानी होगी।”

भैरव सिंह का अहंकार तिलमिला उठा। “जुर्रत देख इसकी! सिपाही विक्रम, इसे दिखाओ कि पुलिस से बदतमीजी करने का अंजाम क्या होता है!”

इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, भैरव सिंह ने अपना भारी हाथ हवा में लहराया और नंदिनी के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया।

थप्पड़ की वह गूँज पूरे बाज़ार में सन्नाटा फैला गई। नंदिनी का चेहरा एक तरफ झुक गया, गाल पर उंगलियों के लाल निशान उभर आए और उनके होंठ के किनारे से खून की एक बूंद छलक आई।

नंदिनी के मन में एक पल के लिए ख्याल आया कि वह अभी अपनी पहचान बता दे। लेकिन उसने खुद को रोका। उसे इस व्यवस्था की उस गहराई तक जाना था जहाँ आम नागरिक दम तोड़ देता है। उसे देखना था कि यह वर्दी वाले और कितना गिर सकते हैं।

“विक्रम! इस औरत को घसीट कर जीप में डालो। इसे थाने ले जाकर मैं खुद वह ‘कानून’ समझाऊंगा जो यह मुझे सिखा रही थी,” भैरव सिंह ने दहाड़ते हुए कहा।

अध्याय 5: कोतवाली का नर्क और लॉकअप की रात

नंदिनी को पुलिस जीप में ठूंस दिया गया। जीप के अंदर बैठे सिपाही भद्दे मजाक कर रहे थे। वे उसे एक अपराधी की तरह देख रहे थे। कुछ ही देर में जीप उस कोतवाली थाने पहुँची, जो आम लोगों के लिए किसी नर्क से कम नहीं था।

नंदिनी को धक्का देते हुए अंदर ले जाया गया। “मुंशी! इस औरत को औरतों वाले लॉकअप में डाल दो। रात को इसकी ‘विशेष’ खातिरदारी करेंगे,” भैरव सिंह ने आदेश दिया।

लोहे का वह भारी और जंग लगा दरवाजा चरमराकर खुला। नंदिनी को उस बदबूदार, सीलन भरी कोठरी में धकेल दिया गया। अंदर का माहौल इतना दमघोटू था कि सांस लेना दूभर था।

वहाँ दो और महिलाएँ पहले से मौजूद थीं। एक बुजुर्ग महिला, जिनका नाम फातिमा था, और एक युवा लड़की, रेवती।

फातिमा ने कांपती आवाज़ में पूछा, “बिटिया, तुमने ऐसा क्या गुनाह कर दिया जो ये दरिंदे तुम्हें यहाँ ले आए?”

नंदिनी ने अपनी चोट के दर्द को छुपाते हुए कहा, “बस एक सच बोलने की गलती की है मां।”

फातिमा रो पड़ी, “सच बोलना ही तो इस मुल्क में गरीबों का सबसे बड़ा जुर्म है। मेरे बेटे को इन्होंने सिर्फ इसलिए उठा लिया क्योंकि उसने इन पुलिस वालों को मुफ्त राशन देने से मना कर दिया था।”

रेवती ने अपनी कहानी सुनाई कि कैसे उसे एक झूठे चोरी के केस में फंसाकर यहाँ पीटा जा रहा है ताकि वह अपनी जमीन के कागजात पर दस्तखत कर दे।

इन कहानियों को सुनकर नंदिनी की आँखें नम हो गईं, लेकिन उनकी मुट्ठियां गुस्से से और भी ज्यादा कस गईं। यह वह सच्चाई थी जो वह अपने आलीशान ऑफिस में बैठकर कभी नहीं जान पातीं।

अध्याय 6: यातना कक्ष और टूटी हुई सीमा

रात के करीब दो बज रहे थे। पूरे थाने में सन्नाटा था, सिवाय पुलिस वालों की हँसी और गालियों के। अचानक भैरव सिंह लॉकअप के बाहर आया। उसके हाथ में एक कोरा कागज था।

“ऐ मैडम! बहुत नेतागिरी कर रही थी न? अब इस कागज पर अंगूठा लगा या दस्तखत कर। इसमें लिखा है कि तूने पुलिस पर हमला किया और तू नशे में थी। अगर साइन कर दिए, तो सुबह छोड़ दूँगा, वरना…” उसने अपनी लाठी सलाखों पर मारी।

नंदिनी धीरे से उठी और सलाखों के पास आकर बोली, “मैं किसी झूठे कागज पर दस्तखत नहीं करूँगी।”

भैरव सिंह का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने दरवाजा खुलवाया और नंदिनी के बाल पकड़कर उसे घसीटते हुए बगल के ‘पूछताछ कक्ष’ में ले गया। वहाँ की छत से एक नंगा बल्ब लटक रहा था और चारों तरफ खून और पसीने की बदबू फैली थी।

उसने नंदिनी को एक कुर्सी पर बांध दिया। “अभी भी वक्त है, मान जा।”

नंदिनी ने उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा, “मारो मुझे। लेकिन याद रखना, वर्दी की हर एक गरिमा को जो तुम आज तार-तार कर रहे हो, उसका हिसाब कुदरत तुमसे जरूर लेगी।”

भैरव सिंह ने गुस्से में अपनी लाठी उठाई और नंदिनी के पैरों पर प्रहार किया। दर्द की एक लहर नंदिनी के पूरे शरीर में दौड़ गई, लेकिन उसके मुँह से सिसकी तक नहीं निकली। सारी रात उसे मानसिक और शारीरिक यातना दी गई, लेकिन वह फौलाद की तरह डटी रही।

अध्याय 7: सुबह का सूरज और अंतिम प्रहार

सुबह की पहली किरण के साथ ही थाने में चहल-पहल शुरू हो गई। भैरव सिंह को लग रहा था कि उसने उस औरत को तोड़ दिया है। उसने मुंशी से कहा, “इसे बाहर निकालो, इसकी जमानत का कोई जुगाड़ हुआ है।”

नंदिनी को जब मुख्य हॉल में लाया गया, तो उसकी हालत खराब थी। बाल बिखरे हुए, कपड़ों पर धूल और खून के दाग, और चेहरे पर नीले पड़े निशान। उसी वक्त वहाँ एक स्थानीय न्यूज़ चैनल की रिपोर्टर मेघा अपने कैमरामैन के साथ पहुँच गई।

मेघा ने जैसे ही कैमरा ऑन किया, भैरव सिंह के सिपाहियों ने उसे धक्का देकर बाहर निकालने की कोशिश की। “कैमरा बंद करो! यहाँ कोई सर्कस नहीं चल रहा है,” सिपाही विक्रम चिल्लाया।

तभी एक बूढ़ी औरत, फातिमा की माँ, दरोगा के पैरों में गिरकर अपने बेटे की भीख मांगने लगी। मुंशी ने उसे गंदी गाली दी और उसे लात मारकर बाहर फेंकने की कोशिश की।

यह वह पल था जब नंदिनी का सब्र पूरी तरह जवाब दे गया।

नंदिनी ने अपनी आवाज़ को पूरी ताकत के साथ बुलंद किया, “बस! बहुत हो गया इंस्पेक्टर भैरव सिंह!”

उस आवाज़ में ऐसी कड़क थी कि भैरव सिंह के हाथ से चाय का गिलास छूटकर गिर गया।

नंदिनी ने अपने फटे हुए कुर्ते की आंतरिक जेब से एक छोटा सा स्मार्टफोन निकाला। पुलिस वालों को लगा कि वह कोई वीडियो बना रही है। “इसका फोन छीनो!” भैरव सिंह दहाड़ा।

जैसे ही सिपाही विक्रम आगे बढ़ा, नंदिनी ने हाथ उठाकर उसे वहीं रोक दिया। उसकी आँखों में वह तेज था जिसे देखकर कोई भी अपराधी कांप जाए।

“अपनी जगह पर खड़े रहो, वरना अगली गोली तुम्हारे पैरों में होगी!”

नंदिनी ने एक नंबर डायल किया और फोन को लाउडस्पीकर पर डाल दिया।

“हेलो! डीजीपी ऑफिस? मुझे डीजीपी साहब से बात करनी है। कहिए आईपीएस नंदिनी राठौर बोल रही हूँ।”

जैसे ही यह नाम गूँजा, पूरे थाने में ऐसा सन्नाटा पसर गया मानो किसी ने सबकी सांसे छीन ली हों। मुंशी के हाथ से पेन गिर गया, सिपाही विक्रम का चेहरा सफेद पड़ गया और इंस्पेक्टर भैरव सिंह के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

फोन के दूसरी तरफ से डीजीपी की घबराई हुई आवाज़ आई, “मैडम? आप कहाँ हैं? हम पूरी रात से आपको ढूंढ रहे हैं, आपका फोन बंद आ रहा था।”

नंदिनी ने भैरव सिंह की आँखों में आँखें गड़ाते हुए कहा, “सर, मैं कोतवाली थाने के लॉकअप में हूँ। यहाँ का सिस्टम सड़ चुका है। मैं चाहती हूँ कि आप विजिलेंस टीम और एसएसपी के साथ अभी इसी वक्त यहाँ पहुँचें। आज इस कचरे की सफाई होनी चाहिए।”

अध्याय 8: न्याय का महासंग्राम

अगले पंद्रह मिनटों में कोतवाली थाने के बाहर का नजारा बदल गया। नीली और लाल बत्तियों वाली दर्जनों गाड़ियाँ सायरन बजाती हुई वहाँ पहुँचीं। भारी पुलिस बल ने पूरे थाने को घेर लिया।

जब डीजीपी और एसएसपी अंदर दाखिल हुए, तो उन्होंने देखा कि उनके ज़िले की सबसे जांबाज आईपीएस अधिकारी धूल और खून से सनी हालत में खड़ी है।

“सलामी!” डीजीपी ने चिल्लाकर कहा।

सभी बड़े अफसरों ने नंदिनी को सलाम किया। यह दृश्य देखकर बाज़ार के लोग जो बाहर जमा थे, दंग रह गए। रिपोर्टर मेघा का कैमरा लगातार चल रहा था और यह खबर पूरे शहर में आग की तरह फैल गई थी।

भैरव सिंह के घुटने कांपने लगे। वह लड़खड़ाते हुए नंदिनी के पैरों में गिर गया। “मैडम… मुझे माफ कर दीजिए… मुझे नहीं पता था कि आप…”

नंदिनी ने उसे लात मारकर दूर किया और गरजते हुए कहा, “तुमने मुझे इसलिए नहीं पीटा कि मैं आईपीएस हूँ। तुमने मुझे इसलिए पीटा क्योंकि मैं तुम्हें एक बेबस आम औरत लगी थी। तुमने रहमत मियां का ठेला इसलिए नहीं पलटा कि वह सड़क पर था, बल्कि इसलिए क्योंकि वह तुम्हें रिश्वत नहीं दे सका था। तुम्हारी वर्दी पर लगे ये सितारे जनता की सुरक्षा के लिए हैं, उनके सीने को रौंदने के लिए नहीं।”

नंदिनी ने तुरंत आदेश दिया, “एसएसपी साहब, इंस्पेक्टर भैरव सिंह और यहाँ मौजूद उन सभी सिपाहियों को तुरंत गिरफ्तार किया जाए जिन्होंने कल रात इन मासूम औरतों और मुझ पर हाथ उठाया है। इनके खिलाफ कस्टोडियल टॉर्चर और भ्रष्टाचार का मुकदमा दर्ज करें।”

फातिमा और रेवती को उसी वक्त लॉकअप से बाहर निकाला गया। वे दोनों अवाक होकर नंदिनी को देख रही थीं। जिस ‘बिटिया’ को वे रात भर दिलासा दे रही थीं, वह उनकी रक्षक बनकर सामने खड़ी थी।

अध्याय 9: एक नई शुरुआत

थाने से बाहर निकलते समय नंदिनी की नज़र भीड़ में खड़े रहमत मियां पर पड़ी। उनके चेहरे पर अभी भी डर था। नंदिनी उनके पास गईं और उनके उन झुर्रियों भरे हाथों को अपने हाथों में ले लिया।

“बाबा, कल की कचौड़ी बहुत स्वाद थी। आपका ठेला आज शाम तक वहीं लगेगा, और इस बार कोई आपसे ‘हफ्ता’ नहीं मांगेगा। यह नगर निगम का लाइसेंस है, जो मैंने सुबह ही जारी करवा दिया है।”

रहमत मियां की आँखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। उन्होंने कांपते हाथों से नंदिनी के सिर पर आशीर्वाद दिया।

तभी रिपोर्टर मेघा ने अपना माइक आगे किया, “मैडम, आप इस घटना के जरिए देश को क्या संदेश देना चाहती हैं?”

नंदिनी ने सीधे कैमरे की तरफ देखा। उनकी आँखों में थकान थी, लेकिन एक नई चमक भी थी। “मेरा संदेश स्पष्ट है—पुलिस जनता की मित्र है, उसकी मालिक नहीं। अगर रक्षक ही भक्षक बनेगा, तो हम जैसे लोग अपनी वर्दी उतारकर भी लड़ना जानते हैं। कानून सबके लिए बराबर है, चाहे वो एक आईपीएस हो या एक कचौड़ी बेचने वाला।”

अध्याय 10: व्यवस्था का पुनर्जन्म (उपसंहार)

अगले कुछ हफ्तों में उस ज़िले की पूरी तस्वीर बदल गई। भैरव सिंह को जेल भेज दिया गया और उसकी अवैध संपत्ति जब्त कर ली गई। ज़िले के हर थाने में ‘जनता मित्र’ डेस्क बनाई गई, जहाँ आम आदमी बिना किसी डर के अपनी शिकायत दर्ज करा सकता था।

नंदिनी राठौर अब केवल एक आईपीएस अफसर नहीं थीं, वे उस शहर की उम्मीद बन चुकी थीं। वे अक्सर आज भी सादे कपड़ों में बाज़ार निकल जाती थीं, लेकिन अब किसी पुलिस वाले में यह जुर्रत नहीं थी कि वह किसी गरीब पर हाथ उठाए।

उस शाम, जब सूरज फिर से ढल रहा था, नंदिनी रहमत मियां के ठेले पर पहुँचीं। इस बार उनके साथ उनकी पूरी टीम वर्दी में थी।

“बाबा, आज फिर से वही तीखी कचौड़ी खिलाइए!”

रहमत मियां ने मुस्कुराते हुए कचौड़ी दी और कहा, “बिटिया, आज पैसे नहीं लूँगा।”

नंदिनी ने सख्ती से लेकिन प्यार से कहा, “बाबा, कानून सबके लिए बराबर है। मैंने अपनी सेवा दी, आपने अपना स्वाद दिया। हिसाब बराबर होना चाहिए।”

उन्होंने पैसे दिए और अपनी टीम के साथ आगे बढ़ गईं। शहर की हवाओं में अब केवल धूल नहीं थी, बल्कि इंसाफ की एक मीठी खुशबू भी घुल चुकी थी।


समाप्त