26 जनवरी के दिन विधायक के बेटे ने फौजी की बहन से बदतमीज़ी की 🇮🇳फिर फौजी ने जो किया सिस्टम कांप उठा

तिरंगे की लाज: एक फौजी का संकल्प
अध्याय 1: एक शुभ प्रभात और मां की सीख
26 जनवरी का दिन था। कड़ाके की ठंड के बीच सूरज की पहली किरण ने गांव की मिट्टी को छुआ ही था कि रीना की नींद खुल गई। आज का दिन उसके लिए बेहद खास था। गणतंत्र दिवस के अवसर पर उसे स्कूल में भाषण देना था और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेना था।
रीना रसोई में गई, जहाँ उसकी माँ पूजा का दीया जला रही थीं। “माँ, मुझे बहुत देर हो रही है। सब दोस्त स्कूल पहुँच गए होंगे। आज 26 जनवरी है, मुझे जल्दी जाना है,” रीना ने उत्साह में कहा।
माँ ने मुस्कुराते हुए अपनी बेटी के सिर पर हाथ रखा। उन्होंने पास रखा हुआ एक छोटा सा तिरंगा उठाया और उसे रीना की कमीज पर बड़े प्यार से लगाया। माँ की आँखों में एक अजीब सी चमक और गंभीरता थी। उन्होंने कहा, “जा बेटा, पर एक बात हमेशा याद रखना। यह तिरंगा सिर्फ एक कपड़ा नहीं, हमारी उम्मीदें हैं। हमारे शहीदों का खून है। इसे कभी गिरने मत देना और खुद भी कभी टूटने मत देना।”
रीना ने गर्व से अपना सिर ऊँचा किया। “माँ, यह तिरंगा सिर्फ स्कूल में लहराने के लिए नहीं है। यह उन लोगों का सपना है जो आज हमारे साथ नहीं हैं। आज मुझे उनकी इज़्ज़त निभानी है।”
माँ ने उसे गले लगा लिया और कहा, “बेटी, हमेशा खुश रहना और अपने देश की सेवा करना, यही सबसे बड़ा गर्व है। और हाँ, आज घर जल्दी आ जाना, क्योंकि तेरा भाई… तेरा वीर भाई बॉर्डर से घर वापस आ रहा है।”
रीना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसका भाई, जो सरहद पर देश की रक्षा करता था, आज महीनों बाद घर आ रहा था। “ठीक है माँ, मैं वादा करती हूँ, मैं जल्दी घर वापस आ जाऊँगी!”
अध्याय 2: दोस्ती और जिम्मेदारी
घर से निकलते ही रीना को उसकी सहेली कविता मिली। कविता भी स्कूल जाने के लिए तैयार थी। रीना ने उसे देखते ही कहा, “हाय कविता! तू भी अभी निकल रही है? चल जल्दी, आज तिरंगा सिर्फ स्कूल में नहीं, दिल में भी लहराना है। अगर लेट हो गए तो अच्छा नहीं लगेगा।”
रास्ते में चलते हुए रीना ने देखा कि कविता कुछ परेशान थी। उसकी चाल धीमी थी और चेहरा उतरा हुआ था। “क्या बात है कविता? तू इतनी परेशान क्यों है?” रीना ने पूछा।
कविता की आँखों में आँसू आ गए। उसने धीमी आवाज़ में कहा, “रीना, मेरी माँ की तबीयत बहुत खराब है। घर में दवा के पैसे भी नहीं हैं। अगर तू 500 रुपये दे दे तो मैं दोपहर को लौटते समय दवा ले आऊँगी।”
रीना ने बिना सोचे समझे अपना बटुआ निकाला। उसने कहा, “तू कैसी बात कर रही है कविता? तेरी माँ मेरी माँ है। तू ये पैसे रख और ज्यादा टेंशन मत ले। हम 26 जनवरी का प्रोग्राम खत्म करके साथ में दवा लेकर तेरे घर चलेंगे।”
दोनों सहेलियाँ हिम्मत बांधकर स्कूल की ओर बढ़ चलीं, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि रास्ते में कोई भेड़िया उनका इंतज़ार कर रहा था।
अध्याय 3: गुंडे का आतंक
गाँव के मोड़ पर एक पुरानी हवेली के पास कुछ काली गाड़ियाँ खड़ी थीं। वहां शहर के विधायक का बेटा, सूरज, अपने गुर्गों के साथ खड़ा था। सूरज एक बदतमीज़ और रसूखदार लड़का था, जिसे कानून का कोई डर नहीं था। वह पिछले तीन सालों से रीना का पीछा कर रहा था।
जैसे ही रीना और कविता वहां से गुजरीं, सूरज ने रास्ता रोक लिया। “क्यों रीना, आज बहुत देर कर दी? मैं सुबह से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ,” सूरज ने सिगरेट का धुआँ छोड़ते हुए कहा।
रीना ने हिम्मत दिखाई और कहा, “मैंने तुमको कितनी बार मना किया है, मेरा रास्ता मत रोका करो। और कान खोलकर सुन लो, तुम्हारे जैसे गुंडे से मैं क्या, मेरी जूती भी प्यार नहीं करेगी!”
सूरज की आँखों में खून उतर आया। “प्यार तो तुझे करना ही पड़ेगा। अगर अब तूने मना किया तो मैं ज़ोर-जबरदस्ती भी करूँगा। अभी प्यार से समझा रहा हूँ, समझ जा।”
रीना डरी नहीं। उसने ललकारते हुए कहा, “मैं तेरी धमकियों से डरने वाली नहीं हूँ। जा और ये धमकी अपने घर वालों को दे।”
सूरज ने हंसते हुए कहा, “तुझे नहीं पता मैं कौन हूँ? इस पूरे जिले में मेरा राज चलता है। पूरी सरकार मेरी मुट्ठी में है और तू एक मामूली गरीब की लड़की है। अगर तू शादी नहीं करना चाहती, तो कम से कम एक रात के लिए मेरी हवेली आ जा।”
रीना का धैर्य जवाब दे गया। उसने बिना डरे सूरज के चेहरे पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया। “साले आदमी! तुझे अभी नहीं पता मैं किसकी बहन हूँ। जब तुझे पता चलेगा तो तेरी सांसें रुक जाएंगी!”
सूरज अपमान से तिलमिला उठा। उसने अपने आदमियों, रामू और रणबीर को आदेश दिया, “पकड़ो इस लड़की को और गाड़ी में डालो! इसकी अकड़ आज मैं अपनी हवेली में तोड़ूँगा।”
कविता ने बचाने की कोशिश की, लेकिन गुर्गों ने उसे धक्का दे दिया। रीना को जबरन गाड़ी में डाला जाने लगा। रीना ने चिल्लाकर कविता से कहा, “कविता, तू भाग! घर जा और माँ को बता कि मुझे विधायक के बेटे ने किडनैप किया है! भाग यहाँ से!”
अध्याय 4: सिस्टम का असली चेहरा
कविता बदहवास होकर भागी। उसने सोचा कि घर जाने से पहले पुलिस की मदद लेना ज़रूरी है। वह दौड़ती हुई थाने पहुँची। वहां के इंस्पेक्टर साहब आराम से कुर्सी पर बैठे चाय पी रहे थे।
“सर, मेरी दोस्त को बचा लीजिए! विधायक का बेटा उसे उठाकर हवेली ले गया है!” कविता ने हाँफते हुए कहा।
इंस्पेक्टर ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और उपहास उड़ाते हुए कहा, “तू कौन है? और किस विधायक की बात कर रही है? जा यहाँ से, अभी टाइम नहीं है, बाद में आना।”
कविता दंग रह गई। “सर, आप ये क्या कह रहे हैं? वहां एक लड़की की जान और इज़्ज़त खतरे में है और आप कह रहे हैं बाद में आना?”
इंस्पेक्टर चिल्लाया, “तू हमें सिखाएगी? विधायक जी के खिलाफ जाने की हिम्मत कैसे हुई? इस इलाके में वही कानून है जो विधायक जी चाहते हैं। हवलदार! इस लड़की को हवालात में डालो, बहुत बोल रही है।”
कविता को जबरन जेल में डाल दिया गया। उसे अपनी दोस्त की फिक्र सता रही थी। उसने रोते हुए कहा, “तुम सब पुलिस वाले नहीं, दलाल हो! जब रीना के भाई को पता चलेगा, तो तुम में से कोई नहीं बचेगा।”
अध्याय 5: वीर भाई का आगमन
इसी बीच, गाँव की सड़क पर एक फौजी जीप रुकी। उसमें से एक गबरू जवान उतरा, जिसकी वर्दी पर मेडल चमक रहे थे। यह वीर था, रीना का भाई। वह अपनी माँ और बहन के लिए ढेर सारे तोहफे लेकर आया था।
घर पहुँचते ही उसने माँ के पैर छुए। माँ की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। “मेरा बच्चा वापस आ गया!”
वीर ने इधर-उधर देखा और पूछा, “माँ, मेरी प्यारी बहन रीना कहाँ है? क्या वह अपने भाई से नाराज़ है जो सामने नहीं आई?”
माँ ने कहा, “नहीं बेटा, वह तो सुबह स्कूल गई थी तिरंगा फहराने। पर अभी तक वापस नहीं आई।”
वीर के मन में कुछ खटका। “माँ, आप चिंता मत करो। मैं अभी जाकर उसे देखता हूँ।”
वीर जैसे ही बाज़ार की ओर बढ़ा, उसे कविता के पिता, रमेश चाचा मिले। वह बहुत परेशान थे। “क्या हुआ चाचा?” वीर ने पूछा।
चाचा ने रोते हुए बताया, “बेटा, मेरी बेटी कविता और तुम्हारी बहन रीना दोनों स्कूल के लिए निकली थीं, पर स्कूल पहुँची ही नहीं। मैं पुलिस स्टेशन गया था, पर उन्होंने मुझे भगा दिया।”
वीर की मुट्ठियाँ भिंच गईं। “चाचा, आप घर जाइए। अब मैं आ गया हूँ। अगर मेरी बहन और आपकी बेटी को कुछ हुआ, तो मैं पूरा सिस्टम हिला दूँगा।”
अध्याय 6: थाने में तांडव
वीर सीधा पुलिस स्टेशन पहुँचा। वहां का नज़ारा देखकर उसका खून खौल उठा। इंस्पेक्टर और हवलदार शराब की बोतलें खोलकर बैठे थे और कविता जेल के अंदर रो रही थी।
“कविता!” वीर ने दहाड़कर कहा।
कविता ने उसे देखा और चिल्लाई, “भैया! रीना को बचा लो! विधायक का बेटा उसे हवेली ले गया है और इन पुलिस वालों ने मुझे यहाँ बंद कर दिया!”
इंस्पेक्टर ने वीर को देखकर कहा, “अरे भाई तू कौन है? क्यों अपनी टांग तुड़वाने आ गया? चला जा यहाँ से।”
वीर ने इंस्पेक्टर की मेज़ पर ज़ोर से हाथ मारा। “हरामखोर! वर्दी पहनकर दलाली करता है? तुझे पता है तू किससे बात कर रहा है?”
इंस्पेक्टर ने हाथ उठाया ही था कि वीर ने उसका हाथ मरोड़कर उसे ज़मीन पर पटक दिया। “ये थाना है या कोठा? एक फौजी को जेल भेजने की धमकी देता है?”
तभी बाहर से गाड़ियों के काफिले की आवाज़ आई। वीर के यूनिट के कर्नल साहब अपने जवानों के साथ वहां पहुँच गए थे। वीर ने पहले ही उन्हें फोन कर दिया था।
कर्नल साहब ने अंदर आते ही स्थिति का जायज़ा लिया। “इंस्पेक्टर, तुम सस्पेंड हो! और तुम्हारे साथ ये सब भी जेल जाएंगे। सोल्जर! विधायक की हवेली को चारों तरफ से घेर लो। एक परिंदा भी बाहर नहीं निकलना चाहिए!”
अध्याय 7: हवेली पर न्याय
हवेली के अंदर सूरज रीना के साथ बदतमीज़ी करने की कोशिश कर रहा था। रीना अभी भी निडर खड़ी थी। “तेरा अंत बहुत करीब है सूरज!”
तभी अचानक हवेली का दरवाज़ा धमाके के साथ खुला। फौज के जवान अंदर घुस आए। सूरज के गुंडे हथियार डालकर भागने लगे। वीर सबसे आगे था। उसने देखा कि रीना को एक कमरे में बंद किया गया था।
“रीना!” वीर ने दरवाज़ा तोड़ दिया।
रीना अपने भाई को देखते ही उससे लिपट गई। “भैया! मुझे पता था आप ज़रूर आओगे।”
वीर ने रीना के सिर पर हाथ फेरा और फिर मुड़कर सूरज की ओर देखा। सूरज थर-थर काँप रहा था। “मुझे माफ कर दो… मुझे नहीं पता था यह फौजी की बहन है।”
वीर ने उसकी गर्दन पकड़ी और उसे घसीटते हुए बाहर ले आया। “तुझे क्या लगा था? कि तू किसी गरीब की बेटी को उठा लेगा और कोई कुछ नहीं करेगा? फौजी की बहन हो या देश की कोई भी बेटी, सबकी इज़्ज़त हमारी जिम्मेदारी है।”
वीर ने सूरज को इतना मारा कि उसकी रूह काँप गई। फिर उसे फौज के हवाले कर दिया गया। विधायक को भी भ्रष्टाचार और अपहरण के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया।
अध्याय 8: एक नया सवेरा
शाम का समय था। गाँव के चौक पर तिरंगा शान से लहरा रहा था। रीना, कविता, वीर और गाँव के सभी लोग वहां जमा थे। कर्नल साहब ने रीना और कविता की बहादुरी की प्रशंसा की।
रीना ने अपने भाई की वर्दी की ओर देखा और फिर लहराते हुए तिरंगे की ओर। उसकी आँखों में गर्व के आँसू थे। उसने माँ से कहा, “माँ, आपने सही कहा था। यह तिरंगा सिर्फ कपड़ा नहीं, हमारी उम्मीद है। आज मेरे भाई ने इसकी लाज बचा ली।”
वीर ने अपनी बहन को सैल्यूट किया और कहा, “देश की सुरक्षा सीमा पर होती है, लेकिन देश का सम्मान घर की बेटियों की सुरक्षा में है।”
पूरा गाँव ‘जय हिंद’ के नारों से गूँज उठा। उस दिन 26 जनवरी का उत्सव सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि अन्याय पर न्याय की जीत का प्रतीक बन गया।
उपसंहार: यह कहानी हमें सिखाती है कि जब तक हमारे देश में वीर और निडर नागरिक मौजूद हैं, तब तक कोई भी अन्याय टिक नहीं सकता। बेटियों का सम्मान ही राष्ट्र का असली सम्मान है।
जय हिंद! जय भारत!
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