जब मैं रेस्तरां पहुँची, मेरी बहू ने कहा: “वह अलग खाती है,” लेकिन बिल चुकाते समय…

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अपनी इज्जत की लड़ाई

मुझे आज भी वह दिन याद है, जब मैं पहली बार अपने बेटे और बहू के साथ रेस्त्रां में गई थी। मदर्स डे था और हम सब ने सोचा था कि इस खास दिन को एक साथ मनाया जाए। लेकिन उस दिन ने मेरी जिंदगी का मोड़ बदल दिया था, और मुझे अपनी इज्जत को वापस पाने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी थी। इस कहानी का उद्देश्य सिर्फ यह नहीं है कि मैं अपनी इज्जत वापस कैसे लायी, बल्कि यह भी कि कैसे एक महिला अपने हक के लिए खड़ी हो सकती है, चाहे उम्र कितनी भी हो। यह कहानी है एक 74 वर्षीय महिला पूनम सेठी की, जिन्होंने अपनी बहू की तानाशाही और अपमान के बावजूद अपनी आत्मसम्मान को वापस हासिल किया।

शुरुआत: एक साधारण जिंदगी

मेरा नाम पूनम सेठी है, और मैं चंडीगढ़ के सेक्टर 22 में रहती हूं। 35 साल तक मैंने सेंट जेवियर्स इंग्लिश मीडियम स्कूल में प्रधानाचार्य के रूप में काम किया। मेरी शादी 49 साल पहले हुई थी और मेरे पति का नाम हरबंस सिंह सेठी था। वह पंजाब नेशनल बैंक में मैनेजर थे और हम दोनों मध्यमवर्गीय परिवार से थे। हमारे पास ज्यादा संपत्ति नहीं थी, लेकिन हरबंस ने हमेशा कहा था कि “प्रॉपर्टी ही असली सुरक्षा है।” और इसी सोच ने हमारे जीवन को एक नई दिशा दी।

हमने 80 के दशक में सेक्टर 22 में एक दो बीएचके फ्लैट खरीदा था, जिसकी कीमत तब ₹15,000 थी। आज उसी फ्लैट की कीमत ₹75 लाख है। मेरे पति ने हमेशा समझाया कि संपत्ति के लिए किसी से मदद नहीं चाहिए, क्योंकि यह हमें कभी धोखा नहीं देगी। उन्होंने अपनी जिंदगी में काफी मेहनत की और 90 के दशक में एक रेस्टोरेंट में निवेश किया। उस समय हम साइलेंट पार्टनर थे, लेकिन इमारत हमारे नाम पर थी।

एक दुखद मोड़: पति का निधन

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। मेरे पति को किडनी की गंभीर बीमारी हो गई और हमें उनके इलाज के लिए पीजीआई चंडीगढ़ के चक्कर काटने पड़े। यह समय हमारे जीवन का सबसे कठिन समय था। मेरी आंखों के सामने वह आदमी कमजोर होता गया, जिसे मैं हमेशा एक मजबूत स्तंभ मानती थी। 18 महीने तक उनकी तबियत बिगड़ी रही और अंततः 3 महीने बाद उनकी मौत हो गई।

उनकी मौत ने मेरी दुनिया ही बदल दी थी। 47 साल की शादी के बाद अचानक उनकी अनुपस्थिति ने मुझे अकेला कर दिया। मैं जानती थी कि मुझे अकेले ही सब कुछ संभालना होगा, लेकिन उस समय मेरे पास कोई अन्य विकल्प नहीं था। मैं स्कूल वापस लौट आई और बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। हालांकि यह सब मेरे लिए आसान नहीं था, लेकिन मैं धीरे-धीरे सशक्त होती गई। मैंने अपने जीवन को फिर से संजोने का प्रयास किया।

सालों बाद: बहू ने सास को नीचा दिखाना शुरू किया

मेरा बेटा कुणाल, जो दिल्ली में काम करता था, महीने में एक बार आता था। एक दिन उसने मुझे बताया कि वह किसी लड़की को डेट कर रहा है और उससे शादी करना चाहता है। मैं बहुत खुश हुई, क्योंकि कुणाल को खुश देखना मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण था। फिर वह नेहा नाम की लड़की को लेकर मेरे पास आया। वह लड़की सुंदर और फैशनेबल थी, लेकिन मुझे शुरू से ही उसकी बातों में कुछ अलग सा लगा। वह हमेशा मुझसे बहुत औपचारिक रूप से बात करती थी और मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि वह मुझे सच में पसंद करती है।

शादी के बाद नेहा और कुणाल दिल्ली में रहने लगे और मैं चंडीगढ़ में अकेली। शुरुआत में सब कुछ ठीक था, लेकिन फिर नेहा ने धीरे-धीरे मुझसे दूरी बनानी शुरू कर दी। उसकी मांगें बढ़ने लगीं। वह मुझसे काम करवाने लगी और कभी “थैंक यू” नहीं कहती थी। जैसे-जैसे समय गुजरता गया, मुझे यह एहसास होने लगा कि नेहा मुझे अपनी घरेलू नौकरानी की तरह ट्रीट कर रही है।

इज्जत की लड़ाई

एक दिन नेहा ने मुझसे कहा कि मुझे छोटे कमरे में शिफ्ट हो जाना चाहिए। मेरा दिल टूट गया, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। यह पहला कदम था, जब मैंने महसूस किया कि नेहा मुझे घर में कोने में धकेलना चाहती है। उसके बाद नेहा ने मुझसे और भी बहुत कुछ करना शुरू किया, जैसे कि मेरे पुराने बर्तन, सोफे, और अन्य सामान बदलवाना। उसने कहा कि यह सब पुराना और बेजान हो चुका है।

लेकिन मेरी असली परीक्षा तब शुरू हुई, जब नेहा ने मुझे घर के खर्चों में योगदान देने के लिए कहा। यह मेरे लिए अपमानजनक था। मेरी प्रॉपर्टीज, एफडी, किराए का पैसा सब कुछ मेरे नाम पर था, लेकिन फिर भी मुझे पैसे देने के लिए कहा जा रहा था। यह सब बहुत ही चौंकाने वाला था। लेकिन मैंने किसी को भी जवाब नहीं दिया, क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि कुणाल के घर में कोई कलह हो।

फिर एक दिन, नेहा ने मुझसे कहा कि मुझे अपने सोने के जेवर देने चाहिए। उसने कहा कि मुझे उन्हें इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। मुझे एहसास हुआ कि यह उसका चाल था, ताकि वह मेरे सारे जेवर ले सके। जब मैंने मना किया तो वह और ज्यादा दबाव बनाने लगी। इस सब के बाद मुझे महसूस हुआ कि अब मुझे अपनी सुरक्षा करनी होगी। मैंने अपने सारे कागजात सुरक्षित कर लिए और कुछ और कदम उठाए।

चुपचाप तैयारी:

मैंने चुपचाप अपनी सारी संपत्ति को सुरक्षित किया, बैंक लॉकर लिया, और नेहा की बातचीत को रिकॉर्ड करना शुरू किया। मैं जानती थी कि एक दिन मुझे अपनी इज्जत वापस पाने के लिए एक बड़ा कदम उठाना होगा। फिर मदर्स डे के दिन, जब नेहा ने मुझे रेस्त्रां में अलग बिठाया, तब मैंने तय किया कि अब वक्त आ गया है।

रेस्त्रां में, मैं जानती थी कि वह क्या करने जा रही है। जब बिल चुकाने का समय आया, तो नेहा ने कहा कि मैं बिल चुकाऊं। लेकिन उस दिन, रेस्त्रां के मैनेजर ने जब मुझे पहचाना और मैंने अपनी बहू से कहा कि यह रेस्त्रां मेरी प्रॉपर्टी है, तो सारे लोग चौंक गए।

इसने नेहा को पूरी तरह से हिला दिया। अब वह जान गई थी कि मैं कोई साधारण बुजुर्ग महिला नहीं हूं। मेरे पास संपत्ति है, ताकत है और सबसे बढ़कर, मेरा आत्मसम्मान है।

निष्कर्ष:

यह कहानी उन सभी महिलाओं के लिए है जो किसी न किसी रूप में दबाव महसूस करती हैं। मुझे अपनी इज्जत वापस पाने में सात साल लगे, लेकिन मैंने कभी हार नहीं मानी। इस संघर्ष ने मुझे यह सिखाया कि किसी भी उम्र में, आप अपने अधिकारों के लिए खड़ी हो सकती हैं, बशर्ते आपको अपनी ताकत का एहसास हो।