होने वाली पत्नी का अतीत सुनकर.. लड़के ने मुस्कुराकर फिर जो किया इंसानियत रो दी | Heart touching story

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मुस्कान की कीमत – इंसानियत से बनी शादी

प्रस्तावना

जयपुर की सर्दियों की शाम थी। हर ओर फूलों की महक, संगीत की गूंज और मेहमानों की मुस्कानें थीं। एक बड़ा सा मैरिज हॉल, जहां दूल्हा सचिन स्टेज पर खड़ा था, आंखों में अपनी दुल्हन का इंतजार लिए। तभी लाल जोड़े में सजी रेखा ने हॉल में कदम रखा। चेहरे पर हल्की मुस्कान, पर चाल में अजीब सी थकान। कोई बोला, दुल्हन थोड़ी हेल्दी लग रही है। पर किसी ने नहीं जाना कि वह हल्की सी मोटाई नहीं, बल्कि उसकी कोख में पलती एक अनकही सच्चाई थी। आज वह पूरे समाज से कुछ छुपाने आई थी।

क्या थी वह सच्चाई? उसकी आंखों में छिपी हुई थी। और जब यह सच दूल्हा सचिन को पता चलेगा, क्या वह शादी से इंकार करेगा या इंसानियत निभाएगा? यही कहानी है रेखा की, आरव की और सचिन की – एक ऐसी कहानी जो हर किसी के दिल को छू जाती है।

रेखा – एक आम लड़की, असाधारण चाहत

जयपुर की गलियों में रेखा का बचपन साधारण था। पिता सरकारी कर्मचारी, मां गृहणी और एक छोटा भाई। रेखा पढ़ने में तेज थी, किताबों की शौकीन। उसकी आंखों में सपने थे, लेकिन दिल में एक डर भी – क्या उसकी खुशियां कभी पूरी होंगी?

कॉलेज के दिनों में रेखा की मुलाकात आरव से हुई। आरव बहुत अमीर घर से था। उसके पिता जयपुर के बड़े बिजनेसमैन थे। रेखा की आंखों में आरव के लिए वह मासूम चमक थी जो पहली मोहब्बत के साथ आती है। दोनों की दुनिया अलग थी, लेकिन दिल एक थे। लाइब्रेरी से शुरू हुई मुलाकातें जिंदगी की गलियों तक पहुंच चुकी थीं।

आरव अक्सर रेखा से कहता, “अगर मैं तुम्हें खो दूं तो शायद खुद को खो दूंगा।” रेखा हंसकर कहती, “तो मत खोना।” दोनों की आंखों में एक सपना था – छोटी सी जिंदगी, एक घर और एक बच्चा जिसका नाम रेखा पहले से सोच चुकी थी – सांची, क्योंकि सांची का मतलब होता है सच्चाई।

इम्तिहान – प्रेम, वादा और बिछड़न

एक शाम आरव रेखा के घर नहीं आया। रेखा बेचैन हो उठी। कॉल किया, नंबर स्विच ऑफ। अगले दिन कॉलेज पहुंची, आरव गायब। दो दिन, चार दिन, हफ्ता गुजर गया। रेखा की आंखों में नींद गायब थी। वह हर रोज वही चाय वाला ढाबा जाती, जहां अब खाली कप और यादें रह गई थीं।

फिर एक दिन आरव के पिता खुद रेखा के घर आए। कड़क आवाज, ऊंचा सिर और ठंडी नजर। उन्होंने कहा, “देखो बेटी, आरव अब विदेश जा रहा है। हम उसे तुम्हारे जैसे छोटे परिवार की लड़की के साथ नहीं देख सकते।” रेखा की मां ने हाथ जोड़ लिए, “साहब, वो बच्चे हैं, गलती हो गई।” आदमी बोला, “गलती नहीं, सीमा भूल गई तुम्हारी बेटी। हमने आरव को समझा दिया है। अगर वह तुम्हारे साथ रहा तो उसे अपनी प्रॉपर्टी से बेदखल कर दूंगा।”

रेखा ने कहा, “उन्होंने कहा था कि वह सब छोड़ देंगे।” वह हंसा, “प्यार का जोश दो महीने रहता है। जिंदगी भर पेट पालने के लिए दौलत चाहिए।” उसके जाने के बाद घर में तूफान आ गया। पिता बोले, “रेखा, हमें समाज में जीना है। यह सब बंद करो।” रेखा रोई, “पर पापा, मैंने प्यार किया है।” पिता बोले, “और हमने तेरा रिश्ता तय कर दिया है।”

रेखा के कमरे की दीवारें अब गवाह बन गईं। जहां पहले हंसी थी, अब सन्नाटा था। आईने में वह खुद को देखती, “क्या मैं इतनी बुरी हूं कि किसी को प्यार करने की सजा मिली?” उसकी मां हर रोज समझाती, “बेटी, यह सब किस्मत है। अच्छा लड़का मिल रहा है, डॉक्टर है, बड़ा घर है।” रेखा सुनती मगर दिल कहीं और था।

उसके कमरे में एक डायरी थी। हर पन्ने पर आरव का नाम। एक कोने में उसने लिखा – “अगर तू लौटा तो मैं तुझे माफ कर दूंगी। पर अगर नहीं लौटा तो मैं फिर कभी किसी को नहीं चाहूंगी।”

नई शुरुआत – शादी, डर और सच्चाई

जयपुर का वही मैरिज हॉल, जहां हर रोशनी जैसे दिखावा कर रही थी। फूलों की महक में नकली मुस्कानें छिपी थीं। दूल्हा सचिन – डॉक्टर, विनम्र, सच्चा। हर चेहरे पर खुशी थी, पर उसे रेखा का चेहरा कुछ कह रहा था।

वरमाला की रस्म शुरू हुई। तालियां बजी और तभी रेखा के हाथ कांपे। उसकी सांसे अटकने लगीं। सचिन ने झट से उसे संभाला, “क्या हुआ? पानी लाओ।” लोगों ने कहा, “गर्मी में चक्कर आ गया होगा।” पर सचिन की आंखों ने देखा – यह सिर्फ शरीर की कमजोरी नहीं थी, यह दिल की चीख थी।

कमरे में सचिन ने रेखा को लेटे देखा। धीरे से बोला, “रेखा, तुम मुझसे कुछ कहना चाहती हो?” रेखा ने रोते हुए कहा, “डॉक्टर साहब, मैं मजबूर थी। मैं किसी और से प्यार करती थी।” सचिन की सांस रुक गई। कमरे में खामोशी थी। “कौन था वो?” रेखा ने कहा, “अब वह कोई नहीं है, क्योंकि वह मुझे छोड़कर चला गया।” उसकी आंखों से आंसू गिरते गए।

सचिन पास बैठा, “तुम्हें माफी नहीं चाहिए, सुकून चाहिए और मैं तुम्हें वह दूंगा।” वह दिन, वह पल रेखा के जीवन की सबसे बड़ी हार और सचिन की इंसानियत की सबसे बड़ी जीत की शुरुआत थी।

सचिन – इंसानियत की मिसाल

कमरे में पीली रोशनी धीमे-धीमे झूल रही थी। बाहर बैंड की आवाजें धुंधली हो गई थीं। सचिन कुछ देर तक चुप बैठा रहा। एक डॉक्टर की आंखों में तर्क था, पर एक इंसान के दिल में करुणा। उसने पानी का गिलास आगे बढ़ाया। रेखा ने कांपते हाथों से घूंट लिया, फिर नजर नीची कर ली।

सचिन ने बहुत धीरे कहा, “कहानी पूरी सुनाओ, मैं भागना नहीं चाहता। सुनना चाहता हूं।” रेखा ने आंखें बंद कर ली, “मैंने किसी से प्यार किया। सच था वो। पर वह चला गया। किसी दिन समझाऊंगी। इतना कहकर चुप हो गया वो। फोन बंद, मिलना बंद, सब कुछ जैसे मैं थी ही नहीं। घर वालों ने जाना तो शादी तय कर दी। आज तक नहीं लौटा।”

सचिन ने सिर हिलाया, “आज तुमने खुद से लड़ाई लड़ते-लड़ते हिम्मत खो दी।” रेखा का चेहरा ढह गया, “मैंने आपको धोखा देना नहीं चाहा। पर सब कुछ इतना जल्दी। मुझे लगा शायद वक्त सिखा देगा भूलना।”

सचिन ने अपनी सीट आगे खिसकाई, “तुम्हारे दर्द का नाम है अधूरा वादा। किसी ने निभाया नहीं और तुमसे कहा गया कि चुपचाप निभाओ। पर सुनो, तुम्हें किसी से माफी नहीं मांगनी। अपना सच बोलना अपमान नहीं होता।”

परिवार, समाज और सच का सामना

दरवाजा खटका। रेखा की मां, पिता और कुछ नजदीकी रिश्तेदार अंदर आ गए। मां हॉल में घबराहट, आंखों में बेचैनी। पिता बोले, “बेटा, सब मेहमान बाहर इंतजार कर रहे हैं। बस 10 मिनट में फेरे शुरू करवाने हैं। लड़की ठीक है ना?”

सचिन खड़ा हुआ, उसकी आवाज संयत थी, “अंकल, रेखा ठीक है शरीर से, पर भीतर से टूटी हुई है। और टूटे हुए दिल से सात फेरे नहीं उठते।” कमरे में सन्नाटा। रेखा की मां के होठ कांपे, “बेटा, अब यह बातें बंद करो, लोग क्या कहेंगे, हमारी इज्जत…” सचिन ने एक पल आंखें बंद की, “इज्जत सच से बनती है, झूठ से नहीं। मुझे लोग नहीं, रेखा की जिंदगी दिखाई दे रही है।”

एक चाची ने फुसफुसा कर कहा, “डॉक्टर साहब, शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा। लड़की-लड़के में प्यार तो बाद में भी हो जाता है।” सचिन ने सीधी नजर से देखा, “प्यार बाद में हो जाता है – यह वाक्य किसी का जीवन बर्बाद करने का सबसे आसान तरीका है। मैं ऐसी दवा नहीं देता जो मर्ज को और बढ़ा दे।”

पिता झुंझलाए, “तो क्या करें? बारात वापस भेज दें। समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे।” सचिन एक कदम आगे बढ़ा, आवाज धीमी मगर धारदार, “बारात वापस भेजना अपमान नहीं है। अपमान है बेटी के सच को दबाकर उसके गले में झूठ डाल देना। लेकिन सुनिए, मैं बारात वापस नहीं भेज रहा।”

सबके चेहरे पर एक साथ हैरानी। “तो मैं रेखा से ही शादी कर रहा हूं। पर किसी सौदे की तरह नहीं। उसके सच को लेकर, उसकी इज्जत को अपने कंधों पर रखकर। अगर वो हां कहे तो।”

कमरा सांस लेना भूल गया। रेखा ने सिर उठाया। उसकी आंखों में आश्चर्य और रुलाई एक साथ तैर आए। “पर आप क्यों? आपको तो सब अभी पता चला…” सचिन मुस्कुराया, “किसी को जानने में साल लगते हैं, पर किसी की पीड़ा समझने में एक पल काफी है। तुम झूठ बोलती तो मैं दूर चला जाता। तुमने सच बोला तो मैं पास आ रहा हूं।”

रेखा की मां फूट पड़ी, “बेटा, हाय राम…” सचिन ने कहा, “सोचिए मत मां, बस एक बात समझ लीजिए – जिस बेटी की आंखों में डर आपसे बड़ा हो जाए, वहां आपकी परवरिश नहीं, आपका आतंक लिखा जाता है। आज से इसे डर के नहीं, भरोसे के हाथ पकड़ने दीजिए।”

पिता बोले, “वो कल भी बोलेंगे, आज भी बोलेंगे। फर्क इतना है कि आज वे आपके झूठ के लिए बोलेंगे, कल मेरी बेटी की सच्चाई के लिए। मैं कल वाला शोर चुनता हूं।”

सच की शादी – इंसानियत की जीत

हॉल में खुसुरफुसुर तेज हो चुकी थी। स्टेज की चमक अब जैसे आंखें चुभा रही थी। बैंड वाले धीमी धुन पर आ गए। कुछ रिश्तेदारों ने अनुमान बांटने शुरू कर दिए – लड़की बीमार निकली, दूल्हे को लड़की पसंद नहीं आई, दहेज… हर तुक्का रेखा के चरित्र पर चोट की तरह लगता।

सचिन ने माइक उठाया। उसकी आवाज में अजीब सी शांति थी, जैसे आंधी के बीच खड़ा कोई पेड़। “सभी को नमस्कार। रस्में थोड़ी देर रुकी हैं क्योंकि एक जरूरी बात करनी है – मेहमानों से नहीं, परिवारों से। हम सब जीवन भर इज्जत, शोहरत और रस्मों की बात करते रहे हैं, पर सबसे जरूरी चीज भूल गए – इंसानियत।”

हॉल में फुसफुसाहट धीमी पड़ी। बच्चे अपनी जगह थम गए। कैमरे उसकी ओर मुड़ गए।

“आज मैं एक फैसला ले रहा हूं – दूल्हा बनकर नहीं, इंसान बनकर। मैं रेखा से वहीं शादी करूंगा, जहां उसकी सच्चाई मेरे दुपट्टे के नीचे सुरक्षित रहे। मैं उसे बदलना नहीं चाहता, मैं उसके सच को स्वीकार करना चाहता हूं। जो लोग सोचते हैं कि शादी एक समझौता है, उन्हें बताना चाहता हूं कि शादी समझौता नहीं, भरोसा होती है। अगर आप सब इसका साथ दे पाए तो ब्लेसिंग्स दें, नहीं दे पाए तो कम से कम उसकी पीठ पर पत्थर ना फेंके।”

एक बुजुर्ग दादाजी उठकर बोले, “लड़का ठीक कह रहा है। बेटी का सिर जमीन की तरफ झुका देखकर सात फेरे नहीं उठते। दिल सिर उठाकर हां कहे तभी बनते हैं घर।”

हॉल में धीरे-धीरे तालियां बजने लगीं – पहले संकोच में, फिर खुलकर। कुछ लोग अब भी भौचक्क थे, पर सचिन की आवाज से ज्यादा बुलंद कोई नहीं थी।

सचिन ने माइक रखा, रेखा की ओर मुड़ा, “तुम्हारी हां बाकी है रेखा। दुनिया की हां मुझे नहीं चाहिए।” रेखा के कदम कांपे। वह स्टेज पर आई। आंखें भीगी, पर चेहरा उजला। “हां।” उसने इतना ही कहा। पर उस हां में अनगिनत अधूरे सपनों का समर्पण था, अनगिनत भय का अंतिम सांस था।

फेरों के पहले पंडित जी चुपचाप उसके पास आए, “बेटा, कुछ मंत्रों से ज्यादा आज तुम्हारे शब्द काम आएंगे। तुम चाहो तो सात फेरे भी अपने शब्दों से बांध लो। मैं उन्हें संस्कार मान लूंगा।” सचिन ने हौले से सिर झुकाया।

अग्निसाक्षी बनी। चारों ओर गेंदा और गुलाब की महक, दीपों की लौ कांप रही थी। सचिन और रेखा ने साथ जीने-मरने का वादा किया। हर दुख-तकलीफ में दोनों एक दूसरे के साथ रहेंगे। एक दूसरे को लेकर चलेंगे और कोई भी ऐसी बात एक दूसरे से नहीं छुपाएंगे।

फेरों के बाद सचिन ने रेखा की मां को आगे बुलाया, “मां, एक रस्म मेरी तरफ से। आप अपनी बेटी के माथे से यह डर का सिंदूर पोंछ दें। मैं उसके मांग में भरोसे का सिंदूर भरूंगा।” मां फूट कर रो पड़ी। कांपते हाथों से उन्होंने रेखा के माथे को चूमा। सचिन ने सिंदूर उठाया, भरते समय फुसफुसाया, “यह लाल रंग तुम्हारी शर्म नहीं, तुम्हारी शक्ति है।” वरमाला फिर उठी, पर इस बार उसका वजन हल्का था। तालियां गूंजी, अंदर से, बाहर से, ऊपर से – जैसे हॉल की छत भी कह रही हो, आज सही हुआ।

नया रिश्ता – भरोसे की नींव

रात गहरी हो चुकी थी। कमरे में धीमी पीली रोशनी, खिड़की से आती सर्द हवा और नए रिश्ते की पहली सांसे। रेखा बेड की किनारी पर बैठी थी, हाथ में अपनी पुरानी डायरी। सचिन दरवाजे पर ठिटका, “अंदर आ जाऊं?” रेखा मुस्कुरा दी, “यह घर है, दरवाजे पर खटखटाने की जरूरत नहीं।”

सचिन पास आया, “मैं एक बाउंड्री साफ करना चाहता हूं। तुम्हें अपने कमरे में, अपने समय में, अपने आंसुओं में जितनी जगह चाहिए, मेरे बिना भी तुम्हें मिलेगी। मैं तुम्हारा पहरेदार नहीं, साथी हूं।” रेखा की पलकों ने एक मोती ढलकाया।

“आज पहली बार लगता है कि मेरी आवाज मेरी है।” सचिन ने हल्की शरारत से कहा, “तुम आज सोओगी। कल तुम्हारा पहला फर्ज नाश्ता बनाना नहीं होगा। पहला फर्ज होगा खुद को माफ करना।” रेखा हंसी – वही खिलखिलाहट जो महीनों से कहीं खो गई थी। “मैं कोशिश करूंगी।” “नहीं, हम कोशिश करेंगे।”

सचिन ने टेबल से पानी उठाया। डायरी की ओर देखा, “यह किसने लिखा? अगर तू लौटा तो मैं माफ कर दूंगी, अगर नहीं लौटा तो फिर कभी किसी को नहीं चाहूंगी।” रेखा ने डायरी बंद कर दी, “वह मेरी उम्र का सबसे बच्चा वादा था। आज समझ आई – किसी की कमी पूरी करने के लिए किसी को चाहना प्यार नहीं, डर होता है। आपसे मुझे डर नहीं।”

सचिन ने लंबी सांस छोड़ी, “तो आज एक नया वादा लिखो। मैं खुद को चाहूंगी, ताकि किसी को चाहने में कभी डर ना लगे।” रेखा ने कलम उठाई, पन्ने पर हल्के-हल्के अक्षर उभरने लगे, “मैं अपनी सच्चाई को अपने माथे की बिंदी बनाकर पहनूंगी और अपने घर में किसी भी झूठ की चप्पलें बाहर उतरवाऊंगी।”

सचिन ने ताली नहीं बजाई, केवल मुस्कुराया, “अब सो जाओ, मिसेज रेखा सचिन मेहता।” रेखा चौकी, “क्या सच में?” “हां, और मेहता से पहले जो रेखा है वही मेरी पहचान है।” मानो कमरे की हवा ने कहा – आमीन।

नई सुबह, नया भरोसा

सुबह की पहली रोशनी पर्दों से छनकर कमरे में बिखरी। रेखा की नींद गहरी थी। कई महीनों बाद सचिन ने किचन में चाय चढ़ाई – चीनी, अदरक, इलायची। वह हर घूंट में एक सहज जीवन का स्वाद घोल रहा था। ट्रे उठाकर लौटा तो रेखा खिड़की पर खड़ी थी। सूरज उसकी पलकों पर टिक गया था।

“गुड मॉर्निंग।” सचिन ने कहा। रेखा ने धीमे से जवाब दिया, “गुड मॉर्निंग।” फिर अचानक बोली, “कल जब आपने सबके सामने जो कहा, मुझे लगा आप हार जाओगे।” “हार?” सचिन मुस्कुराया, “हार तब होती है जब हम जीतने की कोशिश करते हैं। मैंने कोशिश नहीं की, मैंने चुना। और जब हम इंसानियत चुनते हैं, जीत-हार के सब स्कोर बोर्ड खुद-ब-खुद उतर जाते हैं।”

रेखा ने चाय उठाई, “धन्यवाद कहना बड़ा छोटा लगता है।” “तो मत कहो। बस इतना कर दो – जब कभी किसी और लड़की की आंखों में वही डर दिखे जो कल तुम्हारी आंखों में था, तो उसके लिए तुम वह कर देना जो मैंने तुम्हारे लिए किया। उसके सच को उसके खिलाफ कभी इस्तेमाल ना होने देना।” रेखा ने सिर हिलाया, “मैं करूंगी।”

सचिन ने हल्का सा झुककर कहा, “एक छोटी सी विनती और – आरव अगर कभी लौटे, अगर कभी तो मुझे बताना। मुझे उससे कोई हिसाब नहीं चाहिए, केवल यह कहना है कि उसने जो खालीपन छोड़ा था, उसी खाली जगह में हमने एक घर बना लिया है।”

रेखा ने गहरी नजर से देखा, “आपको डर नहीं लगेगा?” “डर तब लगता है जब भरोसा उधार का हो। हमारा भरोसा किस्तों में नहीं आया, सीधे मोहर के साथ आया है।”

अतीत का सामना – आरव की वापसी

सालों गुजर चुके थे। जयपुर की गलियां जहां कभी रेखा के कदम कांपते थे, अब उन्हीं गलियों में उसकी हंसी गूंजती थी। रेखा अब रेखा सचिन मेहता थी। एक स्कूल में बच्चों को पढ़ाती थी और शाम को सचिन के साथ क्लीनिक लौटते वक्त छोटी सी चाय की दुकान पर रुकना उनका रोज का सिलसिला था।

एक दिन जयपुर के एमआई रोड चौराहे पर, लाल बत्ती पर रेखा ने देखा – एक परिचित चेहरा, वो पल जैसे जम गया। सड़क पार करते हुए एक शख्स जिसकी चाल कभी उसके सपनों का हिस्सा थी – सफेद शर्ट, कंधे पर बैग, आंखों में वही गहराई। आरव।

रेखा की सांस रुक गई। हाथ में पकड़ा टिफिन कांप गया। वह तुरंत पीछे मुड़ी, पर गाड़ी रुक नहीं सकती थी। सचिन ने देखा, “क्या हुआ?” रेखा ने झट से सिर हिलाया, “कुछ नहीं।” शायद आंखों का धोखा, अतीत था जो अचानक सामने आ गया था।

दोपहर को स्कूल के बाद जब रेखा बाहर निकली, तभी किसी ने आवाज दी, “रेखा…” वो आवाज जैसे दिल की धड़कन से आई हो। रेखा धीरे से मुड़ी, आरव उसके सामने खड़ा था। कुछ पल के लिए समय थम गया। कई सालों की चुप्पी, शिकायतें, रोश सब एक नजर में समा गए।

आरव ने धीमी आवाज में कहा, “कैसी हो?” रेखा ने खुद को संभालते हुए कहा, “अच्छी हूं, और तुम?” “ठीक हूं, बस जिंदगी ने रास्ता लंबा कर दिया।” दोनों के बीच एक पल का अजीब सन्नाटा था।

आरव बोला, “मैं जयपुर लौट आया हूं। पापा अब नहीं रहे, कंपनी अब मेरी है।” रेखा ने सिर्फ सिर हिलाया। आरव ने झिझकते हुए कहा, “मुझे पता चला, तुम्हारी शादी हो गई। डॉक्टर है ना?” रेखा मुस्कुराई, “हां, बहुत अच्छा इंसान है।” “खुश हो?” रेखा ने उसकी आंखों में देखकर कहा, “हां, बहुत। क्योंकि अब मेरी खुशी किसी और के साथ जुड़ी नहीं है।”

आरव की नजरें झुक गईं। उसने धीमे से कहा, “रेखा, मैं गया था मजबूरी में। मेरे पापा ने कहा था कि अगर मैं तुम्हारे साथ रहूंगा तो वह मुझे घर से निकाल देंगे, प्रॉपर्टी से बेदखल कर देंगे। मैं डर गया था। सोचा कुछ समय बाद लौट आऊंगा। पर वक्त बीत गया।”

रेखा ने पल भर उसकी ओर देखा, “तुमने वह चुना जिससे तुम्हें सब कुछ मिला और मैंने वह चुना जिससे मुझे मैं वापस मिली।”

आरव की आंखें भर आईं, “तुम मुझसे नफरत करती हो?” रेखा बोली, “पहले करती थी। फिर समझ आया, नफरत भी एक तरह का रिश्ता है, जो अब नहीं चाहिए। और सचिन – उन्होंने मुझे वो दिया जो तुमने छीन लिया था – यकीन।”

आरव चुप हो गया। उसके होंठ कांपे, “काश मैं भी इतना सच्चा होता।” रेखा ने कहा, “सच हर किसी के हिस्से नहीं आता आरव। कुछ लोग उसे खोकर पाते हैं और कुछ उसे छोड़कर खो देते हैं।”

सड़क पर अब ट्रैफिक कम हो गया था। लोग जल्दी में थे, पर यह दो चेहरे मानो वक्त के बाहर खड़े थे। आरव ने हाथ जोड़कर कहा, “तुम खुश रहो। मैं चाहता हूं अगर इस जन्म में मौका मिले तो शायद मैं वो इंसान बन पाऊं जो तुम्हारे लायक होता।” रेखा ने हल्की मुस्कान दी, “तुम थे, पर वक्त नहीं था। और जब वक्त आया, तुम नहीं थे। अब दोनों हैं – अपने-अपने रास्तों पर।”

आरव ने पलट कर देखा, रेखा जा रही थी – धीरे-धीरे, पर बहुत मजबूती से। उसकी चाल में अब झिझक नहीं थी, आत्मसम्मान था। उसकी आंखों में कोई अधूरापन नहीं था, बस एक सुकून था कि उसने अपने दिल के बोझ को वहीं छोड़ दिया जहां कभी उसने पहली बार मोहब्बत महसूस की थी।

भरोसे की जीत – नया जीवन

शाम को जब सचिन क्लीनिक से लौटा, रेखा बालकनी में बैठी थी। चेहरे पर एक गहरी शांति थी। सचिन ने पास आकर पूछा, “आज कुछ अलग लग रही हो। क्या मिला कोई पुराना चेहरा?” रेखा मुस्कुराई, “हां, मिला और खो भी गया।”

सचिन ने बिना कुछ पूछे उसका हाथ थामा। रेखा ने कहा, “वो लौटा था – आरव। पर इस बार मैंने उसे अलविदा नहीं कहा, क्योंकि अब मेरे पास किसी को खोने का डर नहीं है।” सचिन ने धीमे से कहा, “डर खत्म हो जाए तो इंसान आजाद हो जाता है।”

रेखा ने सिर उसकी कंधे पर टिकाया, “हां, और मुझे आज एहसास हुआ कि मैंने शादी सिर्फ तुमसे नहीं की थी, मैंने जिंदगी से समझौता नहीं, भरोसा किया था।” सचिन ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “तो अब डरना मत, क्योंकि अब तुम्हारी कहानी किसी ‘वो लौट आया’ पर नहीं खत्म होती, बल्कि किसी ‘मैं मुस्कुराई’ पर खत्म होती है।”

रेखा की आंखें बंद हो गईं। हवा में हल्की ठंडक थी, पर दिल में अजीब सी गर्मी जिसे सिर्फ सुकून कहा जा सकता है।

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