बिन मां के 3 बच्चे और एक आया: फौजी पिता ने CCTV में क्या देखा?.

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बिन माँ के तीन बच्चे और एक आया

फौजी पिता ने CCTV में क्या देखा?

देहरादून की वह रात असहज रूप से शांत थी।

इतनी शांत कि दीवार पर टँगी घड़ी की टिक-टिक हथौड़े की चोट जैसी लग रही थी। बाहर लगातार बारिश हो रही थी। बिल्कुल वैसी ही बारिश, जैसी उस मनहूस दिन हुई थी—जब मेजर विक्रम सिंह की दुनिया उजड़ गई थी।

सरकारी बंगला, जो कभी बच्चों की हँसी और अंजलि की चहक से गूंजता था, अब एक खाली खोल बन चुका था। ड्राइंग रूम में सिर्फ सन्नाटा पसरा था।

मेजर विक्रम वर्दी उतारकर कुर्सी पर बैठे थे। आँखों में नींद नहीं थी—सिर्फ एक ऐसा खालीपन था, जो जीवनसाथी के चले जाने के बाद इंसान को अंदर ही अंदर खा जाता है।

टेबल पर अंजलि की तस्वीर रखी थी। तस्वीर पर चढ़ी माला के फूल सूखने लगे थे, लेकिन विक्रम का ज़ख्म अब भी हरा था।

अभी तीन महीने ही तो हुए थे।

सिर्फ तीन महीने… और ऐसा लगता था जैसे सदियाँ बीत गई हों।

तभी अचानक बच्चों के कमरे से रोने की आवाज़ आई।

एक नहीं।
दो नहीं।
तीनों एक साथ।

लव, कुश और जय।

तीन साल के तीन मासूम—जिन्हें यह तक नहीं पता था कि उनकी माँ अब कभी लौटकर नहीं आएगी।

विक्रम झट से उठे।
वे दुश्मन की गोलियों के सामने नहीं डगमगाते थे।
लेकिन अपने बच्चों की रोती आवाज़ उन्हें भीतर से तोड़ देती थी।

वह दौड़कर बच्चों के कमरे में पहुँचे।

बिस्तर अस्त-व्यस्त था।
दूध की बोतल ज़मीन पर लुढ़की हुई थी।
तीनों बच्चे भूख और डर से बिलख रहे थे।

विक्रम ने एक को गोद में उठाया।
दूसरे को चुप कराने की कोशिश की।

लेकिन वह खुद को असहाय महसूस कर रहे थे।

वह एक फौजी थे।
पर माँ कैसे बना जाता है—यह उन्हें नहीं आता था।

उस रात उन्होंने तीनों बच्चों को सीने से लगाकर रोते हुए आसमान की ओर देखा।

“अंजलि… तुम मुझे अकेला छोड़कर क्यों चली गई?
मैं यह सब कैसे संभालूँगा?”


अगली सुबह सूरज तो निकला, लेकिन विक्रम की ज़िंदगी में अँधेरा ही था।

घर अस्त-व्यस्त था।
रसोइया ठीक से खाना नहीं बना पा रहा था।
बच्चे चिड़चिड़े थे।

विक्रम को यूनिट जाना था—लेकिन बच्चों को इस हाल में छोड़कर जाना असंभव लग रहा था।

तभी दरवाज़े की घंटी बजी।

सामने एक साधारण-सी लड़की खड़ी थी।
उम्र करीब पच्चीस-छब्बीस साल।
सादी सूती साड़ी, माथे पर छोटी-सी बिंदी।
आँखों में झिझक… और डर।

“नमस्ते साहब,” उसने हाथ जोड़कर कहा।

वह मीरा थी।

रामू काका उसे गाँव से लेकर आए थे।

“काम पता है?” विक्रम की आवाज़ सख्त थी।

“जी साहब,” मीरा ने सिर झुकाया,
“बच्चों की देखभाल करनी है।”

“यह सिर्फ नौकरी नहीं,” विक्रम बोले,
“यह ज़िम्मेदारी है।
मेरे बच्चों की माँ नहीं है।
ज़रा-सी लापरवाही भी मैं बर्दाश्त नहीं करूँगा।”

मीरा ने पहली बार उनकी आँखों में देखा।

वहाँ गुस्सा नहीं था।
वहाँ एक टूटे हुए पिता की लाचारी थी।

“मैं पूरी कोशिश करूँगी, साहब,” उसने धीमे से कहा।


पहले ही दिन मीरा ने कुछ ऐसा किया जिसकी विक्रम को उम्मीद नहीं थी।

बच्चे उसे देखकर घबरा गए।
जय रोने लगा।

लेकिन मीरा ने आवाज़ ऊँची नहीं की।

वह ज़मीन पर बैठ गई।
साड़ी के पल्लू से एक लकड़ी का खिलौना निकाला।

“अरे देखो,” वह बच्चों की भाषा में बोली,
“यह चिंटू खरगोश है।
जंगल से रास्ता भटक गया है।”

रोता हुआ जय चुप हो गया।

मीरा ने उसे गोद में उठा लिया—ऐसे, जैसे वह उसका अपना बच्चा हो।

दरवाज़े पर खड़ा विक्रम सब देख रहा था।

पहली बार… उसे राहत महसूस हुई।


दिन बीतते गए।

घर बदलने लगा।

अगरबत्ती की खुशबू।
हँसी की आवाज़ें।
रोना कम—खिलखिलाहट ज़्यादा।

लेकिन विक्रम भरोसा नहीं करता था।

अंजलि के जाने के बाद उसने घर में CCTV लगवा दिए थे।

वह ऑफिस में बैठकर घर की स्क्रीन देखता था।

एक दोपहर उसने कैमरा खोला।

जो देखा… उसने उसका दिल रोक दिया।

मीरा ज़मीन पर बैठी बच्चों को खाना खिला रही थी।

लेकिन साथ-साथ कहानी सुना रही थी।

“एक राजा था… और उसके तीन बहादुर राजकुमार…”

कुश ने मुँह मोड़ लिया।

मीरा ने रोटी को जहाज़ बना दिया।

“ज़ूम… लैंडिंग!”

कुश हँस पड़ा।

विक्रम के होंठों पर अनजाने में मुस्कान आ गई।

फिर मीरा ने लोरी गाई।

लोकगीत।
कच्चे सुर।
लेकिन उसमें माँ की ममता थी।

जय नींद में कुनमुनाया—मीरा ने उसे सीने से लगा लिया।

विक्रम की आँखें भर आईं।

उसे अंजलि याद आ गई।


उस शाम उसने देखा—अंजलि की तस्वीर के आगे दिया जल रहा था।

“किसने जलाया?” विक्रम ने पूछा।

“मैंने, साहब,” मीरा बोली,
“शाम को घर सूना नहीं लगता।”

विक्रम कुछ कह न सका।


लेकिन समाज को यह शांति मंज़ूर नहीं थी।

बुआ जी आईं।

“जवान विधुर… और जवान आया,”
“दुनिया क्या कहेगी?”

मीरा रोते हुए रसोई में भाग गई।

उस रात विक्रम ने CCTV में देखा—मीरा अकेले बैठकर रो रही थी।

वह उठना चाहता था।

पर उठ नहीं पाया।


और फिर आई वह रात।

कुश को तेज़ बुखार।
दौरे।

बारिश।
अंधेरा।

मीरा चिल्लाई—

“सोचिए मत, साहब! बच्चा मर जाएगा!”

उस रात मीरा ने माँ बनकर कुश को बचाया।

अस्पताल में डॉक्टर ने कहा—

“आपकी पत्नी ने बहुत समझदारी दिखाई।”

विक्रम चुप रहा।

क्योंकि उस पल…
मीरा सच में माँ थी।


सुबह पड़ोस की फुसफुसाहटें शुरू हुईं।

बुआ जी ने ताना मारा।

विक्रम ने पहली बार आवाज़ ऊँची की—

“अगर आज मीरा नहीं होती,
तो शायद मेरा बेटा नहीं बचता।

यह इस घर की इज़्ज़त है।”


उस दिन के बाद CCTV सिर्फ निगरानी का साधन नहीं रहा।

वह गवाह बन गया—

एक आया के माँ बनने का।
एक फौजी के फिर इंसान बनने का।
और एक टूटे घर के फिर परिवार बनने का।

क्योंकि कभी-कभी
रिश्ते खून से नहीं,
कर्म से बनते हैं।


समाप्त