पिज्जा डिलीवरी बॉय बेटे का एडमिशन कराने गया… प्रिंसिपल उसके पैरों में गिर पड़ी | Emotional Story
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पिज्जा डिलीवरी बॉय बेटे का एडमिशन कराने गया… प्रिंसिपल उसके पैरों में गिर पड़ी | एक भावुक कहानी
प्रस्तावना
हर इंसान की जिंदगी में ऐसे मोड़ आते हैं, जब उसे अपने अतीत से सामना करना पड़ता है। कुछ लोग उस अतीत से डरकर भाग जाते हैं, तो कुछ लोग उसका सामना करके आगे बढ़ जाते हैं। यह कहानी है समीर वर्मा की, एक साधारण पिज्जा डिलीवरी बॉय, जिसकी जिंदगी ने कई उतार-चढ़ाव देखे। उसकी मेहनत, संघर्ष, और माफ करने की ताकत ने न सिर्फ उसकी, बल्कि उसके आसपास के लोगों की जिंदगी बदल दी।
चंदनपुर का समीर
छोटे से गांव चंदनपुर में समीर वर्मा अपने बूढ़े मां-बाप और एक बड़ी बहन के साथ रहता था। पिता किसान थे, जिनकी आमदनी बहुत सीमित थी। बहन की शादी के लिए पिता ने भारी कर्ज लिया, जो धीरे-धीरे पूरे परिवार पर बोझ बन गया। हर सुबह कोई न कोई साहूकार दरवाजा पीटता, हर शाम मां की आंखें रोतीं और हर रात समीर का सीना जलता।
समीर देखता था कि उसके माता-पिता की आंखों में सिर्फ चिंता और दर्द है। एक दिन उसने मां से कहा, “मां, अब यहां रहकर कुछ नहीं होगा। मैं शहर जा रहा हूं। काम करूंगा। सबका कर्ज चुकाऊंगा।” पिता चुप रहे, लेकिन समीर की आंखों में वो जिद थी जो सिर्फ किस्मत बदलने वालों की आंखों में होती है।
शहर की कठिन जिंदगी
सिर्फ 17 साल की उम्र में समीर एक छोटे से बैग के साथ रायगढ़ शहर पहुंचा। शहर उसके लिए बिल्कुल नया था, और निर्दयी भी। दिन में होटल में बर्तन धोता, रात को बस स्टैंड की ठंडी जमीन पर सोता। कभी डांट, कभी गालियां, लेकिन समीर झुका नहीं। दो साल तक उसने अपनी मेहनत जारी रखी।
फिर एक दिन उसे एक फूड चेन में काम मिल गया। लाल टीशर्ट, पीठ पर बैग। वह बन गया पिज्जा डिलीवरी बॉय। दिन-रात पसीना बहाता, हर महीने मां को पैसे भेजता। धीरे-धीरे कर्ज उतरने लगा। बहन का घर बस गया। समीर को पहली बार लगा कि वह भी जिंदगी का हकदार है।
एक ऑर्डर ने जिंदगी बदल दी
किसे पता था कि एक ऑर्डर, एक पिज्जा बॉक्स उसकी पूरी जिंदगी बदल देगा। एक लड़की हर शाम वही ऑर्डर, वही पता – नाम था नैना मेहता। समीर जब भी पिज्जा देने जाता, नैना की आंखें आईने में उससे टकरातीं।
धीरे-धीरे बातें बढ़ीं और एक दिन नैना ने कह दिया, “समीर, मुझे तुमसे प्यार हो गया है। अगर तुमने मुझे छोड़ा तो मैं मर जाऊंगी।” समीर डर गया, प्यार और डर के बीच। उसने हां कह दी, और यहीं से एक ऐसा जाल बुनना शुरू हुआ, जिसका अंजाम कोई नहीं जानता था।

प्यार या जाल?
शुरुआत में नैना का प्यार समीर को मीठा लगा। बहुत मीठा। लेकिन कुछ मिठास ऐसी होती है जो धीरे-धीरे जहर बन जाती है। समीर को शुरू में कुछ समझ नहीं आया। वह बस इतना जानता था कि पहली बार कोई उसे पिज्जा बॉय नहीं, समीर कहकर बुला रहा है। उसके हाल पूछ रहा है। उसके सपनों की बात कर रहा है।
कुछ हफ्तों तक सब ठीक रहा। लेकिन फिर एक शाम नैना ने कहा, “आज मेरे साथ होटल चलो।” समीर घबरा गया। उसने धीरे से कहा, “नैना, यह सब शादी से पहले ठीक नहीं लगता।” लेकिन नैना की आवाज बदल गई, “अगर तुम मुझसे प्यार करते हो तो मना नहीं करोगे।”
समीर टूट गया, डर गया और उसी डर में उसने हां कह दी। उस रात जो हुआ, वह एक पल की कमजोरी नहीं थी, वह एक सोची-समझी साजिश थी। कमरे के एक कोने में मोबाइल रखा था, कैमरा ऑन था और समीर को इसका अंदाजा तक नहीं था।
ब्लैकमेल और डर
अगली सुबह समीर के फोन पर एक वीडियो आया। साथ में एक लाइन, “अब से तुम मेरी हर बात मानोगे, वरना यह वीडियो सब देखेंगे।” समीर के पैरों तले जमीन खिसक गई। जिसे वह प्यार समझ रहा था, वह ब्लैकमेल निकली।
अब नैना जब बुलाती, समीर डिलीवरी छोड़ देता। पैसे मांगती, वह दे देता। धमकाती, वो चुप रहता। उसका शरीर कमजोर होने लगा। आंखों की चमक बुझ गई।
मां की पुकार और दोस्त की सलाह
दिवाली से पहले मां का फोन आया, “बेटा, इस बार घर आजा। तेरा चेहरा बहुत याद आ रहा है।” समीर बिना कुछ कहे घर निकल पड़ा। लेकिन इस बार दीये की रोशनी भी उसके चेहरे तक नहीं पहुंची। मां ने देखा, समझ गई। यह थकान नहीं थी, यह डर था।
अगले दिन उसका बचपन का दोस्त रोहन आया। समीर को देखते ही बोला, “अरे यार, तू तो अंदर से टूट गया है।” और पहली बार समीर फूट-फूट कर रो पड़ा। उसने सब बता दिया – प्यार, होटल, वीडियो और हर दिन का डर।
रोहन चुपचाप सुनता रहा। फिर बोला, “अब डर बदलने का वक्त आ गया है। लेकिन गुस्से से नहीं, दिमाग से।”
डर से लड़ने की हिम्मत
उस रात समीर बहुत देर तक जागता रहा। डर के साथ एक नई हिम्मत भी जाग रही थी और उसने फैसला कर लिया था। अब वो भागेगा नहीं। दिवाली के अगले दिन समीर रायनगर लौट आया। लेकिन इस बार वो वही डरपोक पिज्जा डिलीवरी बॉय नहीं था। इस बार उसके भीतर कुछ बदल चुका था। डर अभी भी था, लेकिन डर से बड़ा था आत्मसम्मान।
नैना से आखिरी मुलाकात
समीर ने सबसे पहले नैना को कॉल किया। आवाज शांत रखी, जैसे कुछ हुआ ही ना हो। “नैना, तुमसे मिलना है।” नैना खुश हो गई। उसे लगा समीर अब भी उसके जाल में फंसा हुआ है।
कैफे में मिलते ही नैना बोली, “आज देर हो गई। चलो किसी प्राइवेट जगह चलते हैं।” समीर मुस्कुराया और पहली बार बिना झुके बोला, “नहीं, आज नहीं। आज मैं तुम्हारे पापा से मिलना चाहता हूं।”
नैना चौंक गई, “पापा से क्यों?”
समीर ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “क्योंकि अब मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं।”
नैना के चेहरे का रंग उड़ गया। उसके होंठ कांपने लगे। “दहेज में?”
समीर ने धीरे से कहा, “मुझे बस एक चीज चाहिए – वो होटल वाला वीडियो।”
नैना कुर्सी से लगभग गिर पड़ी, “तुम पागल हो गए हो? तुम ऐसा नहीं कर सकते।”
समीर पहली बार पूरी ताकत से बोला, “मैं कर सकता हूं, क्योंकि अब मेरे पास भी सबूत है।”
नैना की आंखों से आंसू बहने लगे। “प्लीज समीर, मेरी शादी हो चुकी है। अगर यह सामने आ गया तो सब खत्म हो जाएगा।”
समीर चुप रहा। उसकी आंखों में गुस्सा नहीं था, बस सालों का दर्द था। कुछ देर बाद उसने कहा, “मैं तुम्हें माफ करता हूं। लेकिन एक शर्त पर।”
नैना ने उम्मीद से देखा।
“आज के बाद तुम मेरी जिंदगी में कभी नहीं आओगी। और अगर आई तो यह वीडियो तुम्हारे पति तक पहुंचेगा।”
नैना ने सिर झुका लिया। उसकी हार साफ थी। समीर बाहर निकल आया। सड़क पर खड़ा होकर उसने गहरी सांस ली। उस रात उसने वह वीडियो हमेशा के लिए डिलीट कर दिया, क्योंकि उसे बदला नहीं चाहिए था, उसे सिर्फ आजादी चाहिए थी।
नई शुरुआत
समय बीतता गया। समीर ने मेहनत जारी रखी। एक डिलीवरी बॉय से छोटी सी फूड डिलीवरी टीम बना ली। और फिर उसकी शादी हुई काव्या से – साधारण, समझदार और सच्ची।
कुछ साल बाद उनका बेटा हुआ – अंश। जब अंश के स्कूल एडमिशन का समय आया, तो समीर नहीं जानता था कि किस्मत एक बार फिर उसे उसी मोड़ पर लाने वाली है।
अंश के एडमिशन का दिन
अंश अब 5 साल का हो चुका था। होशियार, सवाल पूछने वाला और अपने पापा को हीरो मानने वाला बच्चा। समीर और काव्या चाहते थे कि अंश एक अच्छे स्कूल में पढ़े। ऐसे स्कूल में जहां उसे सिर्फ किताबें नहीं, इंसान बनना भी सिखाया जाए।
एक नाम बार-बार सुनाई देता था – ग्रीन वैली इंटरनेशनल स्कूल। बड़ा स्कूल, महंगी यूनिफार्म और पेरेंट्स का इंटरव्यू।
काव्या घबराई हुई थी, “समीर, वहां बड़े लोग आते हैं। सूट-बूट वाले।”
समीर मुस्कुराया, “मैं आज भी पिज्जा डिलीवरी वाला हूं। और मुझे इस पर शर्म नहीं, गर्व है।”
इंटरव्यू वाले दिन समीर ने वही सादी शर्ट पहनी। अंश का हाथ थामे, सीधे प्रिंसिपल के ऑफिस पहुंचा। जैसे ही दरवाजा खुला, समीर की सांस थम गई। सामने बैठी थी वही औरत, वही आंखें, वही चेहरा – नैना। अब वह इस स्कूल की प्रिंसिपल थी। महंगी साड़ी, संतुलित आवाज।
लेकिन जैसे ही उसकी नजर समीर पर पड़ी, उसका चेहरा सफेद पड़ गया। उसने तुरंत कहा, “मिसेज, बच्चे को बाहर बैठाइए। मुझे इनके साथ अकेले में बात करनी है।”
दरवाजा बंद हुआ। कमरे के अंदर सन्नाटा था। और फिर नैना कुर्सी से उठी और अगले ही पल समीर के पैरों में गिर पड़ी। “प्लीज मुझे माफ कर दो। वो गलती, वो डर आज भी मेरा पीछा नहीं छोड़ता।”
समीर घबरा गया। उसे उठाया। शांत आवाज में बोला, “अब यह सब मत कहो। मैं सिर्फ अपने बेटे का एडमिशन कराने आया हूं।”
नैना रोती हुई बोली, “तुम सच में सब भूल चुके हो?”
समीर ने सिर झुका कर कहा, “भूला नहीं हूं। लेकिन माफ कर चुका हूं। और माफी कमजोरी नहीं होती, माफी ताकत होती है।”
नैना की आंखों में शर्म थी, पछतावा था और शायद खुद से नफरत भी।
नया रिश्ता, नई सीख
समीर ने दरवाजा खोला। काव्या और अंश अंदर आए। नैना ने बिना देर किए फॉर्म साइन किया। “आपका बेटा हमारे स्कूल का हिस्सा है।”
समीर ने हाथ जोड़ दिए, “धन्यवाद।”
लेकिन एक बात याद रखिएगा, “बच्चों को पढ़ाने से पहले उन्हें इंसान बनाना जरूरी होता है।”
वह बिना पीछे देखे चला गया। कुछ महीने बाद पेरेंट्स टीचर मीटिंग थी। समीर अकेला गया। टीचर ने मुस्कुराकर कहा, “आपका बेटा बहुत अलग है। उसमें लीडरशिप है और दिल भी।”
कॉरिडोर में नैना खड़ी थी। धीरे से बोली, “अगर उस दिन तुम मुझे माफ ना करते, तो शायद मैं आज ये इंसान नहीं होती।”
समीर ने कहा, “गलती हर कोई करता है, लेकिन वही लोग बड़े होते हैं जो अपनी गलती से आगे निकल जाते हैं।”
अंश को जिंदगी की सीख
घर आकर समीर ने अंश को सीने से लगाया और कहा, “बेटा, अगर जिंदगी में कभी दो रास्ते मिले – एक बदले का और एक माफी का, तो माफी वाला रास्ता चुनना। क्योंकि माफ करने वाले सबसे ज्यादा मजबूत होते हैं।”
अंश ने मुस्कुराकर कहा, “पापा, आप मेरे हीरो हो।”
अंतिम संदेश
शाम का सूरज ढल रहा था। लेकिन समीर की जिंदगी में अब हमेशा के लिए उजाला हो चुका था। दोस्तों, अब आपसे एक सवाल – अगर आप समीर की जगह होते, तो क्या करते? क्या आप भी माफी का रास्ता चुनते या बदले का?
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