Betiya Apne Baap ki maiyat ko kandha Dekar Dafnane Chali gai fir jo hua Allah ka Mojija Stori Taime

गाँव में एक समय था जब अहमद खान नामक एक सख्त मिजाज आदमी रहता था। वह अपने बेटों शाहिद और आदिल पर गर्व करता था, लेकिन उसकी चार बेटियां—मरियम, समरीन, आयशा और हिना—उसके लिए केवल एक जिम्मेदारी थीं।

अहमद खान ने हमेशा बेटियों को नजरअंदाज किया, उन्हें घर के कामों में व्यस्त रखा, जबकि बेटों को हर सुख-सुविधा दी।

एक दिन, अहमद खान अचानक गायब हो गए। पूरे मोहल्ले में अफरा-तफरी मच गई। उनकी बेटियों ने पक्की कर दी थी कि अब वह इस दुनिया में नहीं रहे।

दस दिनों बाद, जब उनकी लाश घर से निकली, तो कोई भी उसके करीब जाने की हिम्मत नहीं जुटा सका। उनकी बेटियों ने तय किया कि वे अपने पिता की मयत को कंधों पर उठाकर कब्रिस्तान ले जाएंगी।

जब वे कब्रिस्तान पहुँचे, तो वहाँ हर कोई हैरान रह गया। कोई भी उनके जनाजे को कंधा देने नहीं आया। अहमद खान ने ऐसा क्या किया था कि उसकी मौत की खबर किसी को नहीं हुई?

अहमद खान की बेटियों ने अपने पिता की याद में एक अद्भुत साहस दिखाया। उन्होंने अपने पिता को कंधा देकर यह साबित कर दिया कि वे भी सम्मान की हकदार हैं।

रास्ते में लोग खड़े थे, कुछ की आँखों में हैरत थी, जबकि कुछ के दिलों में अफसोस। जब उन्होंने कब्र पर मिट्टी डाली, तो मरियम ने कहा, “हमने अपना फर्ज निभा दिया। चाहे आपने हमें बेटियां समझा हो या नहीं।”

यह एक ऐसा पल था जो गाँव के लोगों के दिलों में हमेशा के लिए बस गया।

अहमद खान ने अपने जीवन में हमेशा बेटों को प्राथमिकता दी। वह चाहता था कि उसके बेटे पढ़ाई में आगे बढ़ें और नाम कमाएँ। लेकिन बेटियों के लिए उसके पास कभी समय नहीं था।

वह उन्हें हमेशा काम करने के लिए कहता था, जबकि बेटों को हर सुख-सुविधा देता था। बेटियों ने हमेशा अपने पिता की उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश की, लेकिन कभी भी उनके प्रयासों की सराहना नहीं की गई।

अहमद खान की मौत के बाद, गाँव में चर्चा होने लगी कि उसकी बेटियों ने उसे कंधा दिया। यह एक ऐसा पल था जिसने सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया।

क्या बेटियाँ केवल जिम्मेदारी हैं, या वे भी अपने पिता के लिए सम्मान की हकदार हैं? गाँव के लोग धीरे-धीरे समझने लगे कि बेटियों की भी एक पहचान है।

उन्होंने महसूस किया कि अहमद खान ने अपने जीवन में जो किया, वह गलत था।

अहमद खान की बेटियों ने अपने पिता की याद में एक नया सफर शुरू किया। उन्होंने अपने लिए एक नई पहचान बनाई।

वे गाँव में महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ने लगीं। उन्होंने शिक्षा पर जोर दिया और अपने जैसे अन्य लड़कियों को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

वे समझ गईं कि उनकी ताकत उनके अंदर है, और वे किसी से कम नहीं हैं।

उन्होंने अपने पिता के नाम को सम्मानित करने का फैसला किया, लेकिन अब वे खुद को साबित करने के लिए संघर्ष करेंगी।

इस कहानी ने यह साबित कर दिया कि बेटियाँ किसी भी परिवार का अभिन्न हिस्सा होती हैं।

उन्हें भी वही सम्मान और प्यार मिलना चाहिए, जो बेटों को मिलता है।

अहमद खान की बेटियों ने अपने साहस और संघर्ष से यह दिखा दिया कि वे किसी भी स्थिति में कमजोर नहीं हैं।

उनकी यह यात्रा न केवल उनके लिए, बल्कि पूरे गाँव के लिए एक प्रेरणा बन गई।

आज भी जब लोग उस दिन को याद करते हैं, तो उनकी आँखों में आँसू आ जाते हैं, लेकिन साथ ही गर्व भी होता है कि बेटियों ने अपने पिता को कंधा देकर उस सख्त दिल को भी सिखा दिया कि बेटियाँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

इस कहानी ने हमें यह सिखाया कि हर इंसान को समान अधिकार मिलना चाहिए, चाहे वह बेटा हो या बेटी।

बेटियों की ताकत और साहस को कभी कम नहीं आंकना चाहिए।