Ramzan Ke Mahine Mein Ammi Jaan Ki Bahuo Ne Kiya UN Per Zulm Aur Badi Bahu per Aaya Allah ka Azaab

गाँव में एक बुजुर्ग महिला, सलीमा, जिसे सभी अम्मी जान के नाम से जानते थे, अपने छह बेटों के साथ एक पुरानी हवेली में रहती थीं। अम्मी जान का दिल बहुत बड़ा था, और वह हमेशा दूसरों की मदद करती थीं। गाँव के लोग उन्हें माँ की तरह मानते थे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी अपने बेटों की परवरिश में लगा दी, खुद भूखी रहकर उन्हें खुशहाल जीवन देने की कोशिश की।

जब उनके बेटों की शादी का समय आया, तो अम्मी जान ने अपनी हैसियत से बढ़कर बहुएं लाई। शुरुआत में सब कुछ ठीक था, लेकिन धीरे-धीरे बहुओं का व्यवहार बदलने लगा। पहले जो बहुएं उन्हें प्यार से बुलाती थीं, अब उनकी इज्जत नहीं करती थीं। अम्मी जान सोचने लगीं कि क्या उनकी सारी कुर्बानियाँ बेकार हो गईं?

एक दिन, अम्मी जान को तेज बुखार हो गया। जब उन्होंने छोटी बहू से पानी माँगा, तो उसने झुंझलाते हुए कहा, “आप बूढ़ी हो गई हैं, खुद ही ले लीजिए।” अम्मी जान को यह सुनकर बहुत दुख हुआ, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। उनके बेटे भी बहुओं के पक्ष में खड़े हो गए और अम्मी जान की कोई परवाह नहीं की।

फिर रमजान का महीना आया, जो अम्मी जान के लिए बहुत खास था। उन्होंने रोजा रखने की तैयारी की, लेकिन बहुओं ने उन्हें तंग करना शुरू कर दिया। कभी खाना छुपा देतीं, कभी नमक ज्यादा डाल देतीं। अम्मी जान चुपचाप सहती रहीं, केवल अल्लाह से दुआ करती रहीं कि उन्हें हिम्मत मिले।

एक दिन, जब अम्मी जान ने छोटी बहू से फिर से पानी माँगा, तो उसने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा, “हमें काम करने के लिए आपका हुक्म नहीं चाहिए।” अम्मी जान का दिल टूट गया, लेकिन उन्होंने फिर भी सब्र किया।

धीरे-धीरे बहुओं का जुल्म बढ़ता गया। जब अम्मी जान नमाज पढ़ने बैठतीं, तो बहुएं जानबूझकर बच्चों को उनके पास छोड़ देतीं, जिससे उन्हें इबादत करने में दिक्कत होती। एक दिन, अम्मी जान बेहोश हो गईं और बड़ी बहू ने उन्हें घर से बाहर फेंक दिया।

अम्मी जान जमीन पर पड़ी रहीं, दर्द और बेबसी में। उन्होंने बस अल्लाह से दुआ की, “या अल्लाह, तू सब देख रहा है।” अगले ही पल, बड़ी बहू किचन में गिर गई और उबलते तेल में जल गई। उसकी चीखें पूरे घर में गूंज गईं।

जब सब लोग दौड़कर आए, तो देखा कि बड़ी बहू का चेहरा जल चुका था। अस्पताल में डॉक्टर ने कहा कि अब उसका चेहरा पहले जैसा नहीं हो सकता। बड़ी बहू ने अपने गुनाहों की सजा पाई थी। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने कहा, “मैंने अम्मी जान पर जुल्म किया। अल्लाह ने मुझे सजा दी।”

अब सभी बेटे और बहुएं अम्मी जान को ढूंढने निकले। गर्मी में, वे हर जगह दौड़े, लेकिन अम्मी जान कहीं नहीं मिलीं। अंततः, वे एक पेड़ के नीचे बेहोश पड़ी मिलीं। उनके बेटे ने उन्हें गोद में उठाया और अस्पताल ले गया। डॉक्टर ने कहा कि उनकी हालत बहुत नाजुक है।

अम्मी जान को होश आया और उन्होंने कहा, “मैंने सबको माफ कर दिया। लेकिन सबक लो, और आगे से कभी किसी के साथ जुल्म मत करना।” जब अम्मी जान बड़ी बहू के पास गईं, तो बड़ी बहू ने कहा, “मैंने आपके साथ बहुत जुल्म किया, मुझे माफ कर दीजिए।”

अम्मी जान ने कहा, “मैंने तुम्हें हमेशा बेटी माना था, लेकिन तुमने मेरे साथ क्या किया?” बहुएं सब अम्मी जान के कदमों में गिर गईं और माफी माँगी।

इस घटना के बाद, घर का माहौल बदल गया। बेटों ने अपनी माँ की अहमियत समझी और बहुओं ने उनकी देखभाल करना शुरू किया। लेकिन बड़ी बहू के चेहरे पर जलने के निशान हमेशा के लिए रह गए।

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि माँ-बाप की इज्जत करनी चाहिए और कभी भी उनके साथ जुल्म नहीं करना चाहिए। अल्लाह की सजा बहुत सख्त होती है, और हमें अपने गुनाहों की कीमत चुकानी पड़ती है। अम्मी जान की कुर्बानी और उनके सब्र ने सबको एक महत्वपूर्ण सबक दिया।