पति 5 साल बाद डीएम बनकर लौटा तो देख पत्नी रेलवे स्टेशन पर कुली का काम कर रही है फिर जो हुआ…

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त्याग और स्वाभिमान की एक दास्तां: जब फ़र्ज़ ने प्रेम को पहचाना

अध्याय 1: सपनों की नींव और संघर्ष की दीवारें

सुबह के साढ़े चार बजे का वक्त था। रेलवे कॉलोनी का वह छोटा सा कमरा, जिसकी दीवारों पर सीलन के नक्शे बने हुए थे, एक अजीब सी खामोशी में डूबा था। बाहर कुत्ते ठंडी हवा से बचने के लिए गोल होकर सो रहे थे, लेकिन उस कमरे की खिड़की से आती हल्की पीली रोशनी गवाही दे रही थी कि कोई अपनी किस्मत से जंग लड़ रहा है।

मेज पर किताबों का अंबार था। लक्ष्मीकांत की ‘पॉलिटी’ से लेकर ‘करंट अफेयर्स’ की पत्रिकाओं तक, सब कुछ बिखरा हुआ था। उन्हीं के बीच बैठा था अभिनव। उसकी आँखें नींद के बोझ से लाल थीं, लेकिन दिमाग में एक ही जुनून सवार था—UPSC।

पल्लवी रसोई में अदरक कूट रही थी। चाय की महक जब अभिनव तक पहुँची, तो उसकी थकी हुई नसों में थोड़ी जान आई। पल्लवी ने चुपचाप चाय का कप मेज पर रखा। उसने कुछ कहा नहीं, बस अभिनव के कंधे पर हाथ रखा। उस स्पर्श में वह भरोसा था जो हज़ारों शब्दों से बड़ा होता है।

उनकी शादी को तीन साल हुए थे। कोई बड़ी धूमधाम नहीं, बस मंदिर के सात फेरे और एक अटूट वादा। अभिनव एक होनहार छात्र था, लेकिन आर्थिक तंगी उसके सपनों की बेड़ियाँ बनी हुई थीं। घर चलाने की पूरी ज़िम्मेदारी पल्लवी ने अपने कंधों पर ले ली थी। वह दिन भर सिलाई मशीन चलाती, पड़ोस की औरतों के कपड़े सिलती, और रात को अभिनव के नोट्स तैयार करने में उसकी मदद करती।

अध्याय 2: वह कड़वी रात और एक कठिन फैसला

वक्त बीतता गया, लेकिन सफलता जैसे अभिनव से लुका-छिपी खेल रही थी। तीन बार मेन्स (Mains) देने के बाद भी जब अंतिम सूची में नाम नहीं आया, तो अभिनव के भीतर का धैर्य टूटने लगा। गरीबी और असफलताओं ने उसे चिड़चिड़ा बना दिया था।

एक रात, मकान मालिक ने किराए के लिए काफी भला-बुरा कह दिया। अभिनव पहले से ही तनाव में था। जब पल्लवी ने उसे सांत्वना देने की कोशिश की, तो अभिनव का गुस्सा फूट पड़ा। उसने अनजाने में कह दिया—

“तुम्हारी यह सिलाई की आवाज़ और यह गरीबी मुझे पढ़ने नहीं देती! शायद तुम मेरी ज़िंदगी में न होती, तो मैं अब तक कहीं पहुँच गया होता। तुम मेरे लिए एक बोझ बन गई हो।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। पल्लवी की आँखों में आँसू नहीं आए, बल्कि एक ठंडी चमक भर गई। उसने उस रात कुछ नहीं कहा। लेकिन अंदर ही अंदर उसने फैसला कर लिया था कि अगर उसकी मौजूदगी अभिनव के सपनों में बाधा है, तो वह यह बाधा हटा देगी।

अगली सुबह, जब अभिनव सोकर उठा, तो मेज पर चाय नहीं थी। वहाँ एक पत्र रखा था: “मंजिल मिल जाए, तो याद करना। अब तुम पर कोई बोझ नहीं रहेगा।”

पल्लवी जा चुकी थी। अभिनव ने उसे हर जगह ढूँढा—बस स्टैंड, रिश्तेदार, पुराना शहर—लेकिन पल्लवी का कहीं पता नहीं चला। घर अब सिर्फ चार दीवारें रह गया था, जिसमें सिलाई मशीन की ‘चर-चर’ नहीं, बल्कि एक डरावनी खामोशी गूँजती थी।

अध्याय 3: पाँच साल का वनवास

पल्लवी के जाने के बाद अभिनव के पास खोने को कुछ नहीं बचा था। उसने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया। वह अब पढ़ता नहीं था, बल्कि किताबों को जीता था। उसने ट्यूशन पढ़ाकर अपना खर्च निकाला, लेकिन पल्लवी की कमी उसे हर पल कचोटती थी। उसे अहसास हुआ कि जिसे वह ‘बोझ’ कह रहा था, वही उसकी ढाल थी।

उधर पल्लवी के लिए दुनिया बहुत क्रूर थी। जब वह घर से निकली, तो उसके पास सिर्फ कुछ सौ रुपये थे। रिश्तेदारों ने उसे ‘पति को छोड़कर आई हुई औरत’ कहकर दुत्कारा। दो दिन भूखे रहने के बाद वह रेलवे स्टेशन पर बैठी थी। उसने देखा कि कुछ महिलाएँ सिर पर लाल कपड़ा बाँधकर भारी बोझ उठा रही हैं।

उसने अपनी कोमल हथेलियों को देखा जो कभी सुई पकड़ती थीं। उसने तय किया कि वह भी ‘कुली’ बनेगी। शुरू में लोगों ने मज़ाक उड़ाया—”यह मर्दों का काम है, तुम नहीं कर पाओगी।” पहले दिन जब उसने एक भारी सूटकेस उठाया, तो उसकी कमर झुक गई, पैर काँपने लगे। लेकिन उसने हार नहीं मानी। हर दिन वह भारी बोझ उठाती और रात को स्टेशन के वेटिंग रूम में सो जाती। उसके हाथों की त्वचा सख्त हो गई, रंग धूप में झुलस गया, लेकिन उसकी आँखों में अब भी वही स्वाभिमान था।

अध्याय 4: जिलाधिकारी की वापसी

पाँच साल बाद। शहर के रेलवे स्टेशन पर एक अजीब सी गहमागहमी थी। पूरे स्टेशन को साफ किया जा रहा था। पुलिस की टुकड़ियाँ तैनात थीं। खबर थी कि जिले के नए ‘जिलाधिकारी’ (DM) आज कार्यभार सँभालने आ रहे हैं।

राजधानी एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर 3 पर रुकी। एक रोबीली शख्सियत बाहर निकली। काले कोट में, आँखों पर चश्मा और चेहरे पर एक गंभीर ठहराव। यह अभिनव था। उसने अपनी कड़ी मेहनत से न केवल परीक्षा पास की थी, बल्कि वह एक बेहतरीन अफसर के रूप में उभरकर सामने आया था।

स्टेशन मास्टर और बड़े-बड़े अधिकारी हाथ जोड़कर उसके स्वागत में खड़े थे। अभिनव की नज़रें भीड़ में किसी को ढूँढ रही थीं। तभी एक कुली उसके पास आया। “साहब, सामान उठा दूँ?”

वह आवाज़… वह आवाज़ अभिनव के कानों में किसी बिजली की तरह कौंधी। उसने मुड़कर देखा। सामने लाल कुर्ते में एक महिला खड़ी थी। धूल से सना चेहरा, झुलसी हुई त्वचा, लेकिन वही गहरी आँखें।

“पल्लवी?” अभिनव के मुँह से बहुत धीरे से निकला।

पल्लवी के हाथ से सूटकेस छूट गया। पाँच साल का फासला एक पल में सिमट गया। आसपास के अधिकारी हैरान थे कि साहब एक महिला कुली को इस तरह क्यों देख रहे हैं। अभिनव की आँखों से आँसू बह निकले। उसने देखा कि उसकी पत्नी, जिसके लिए उसने कभी ‘बोझ’ शब्द का इस्तेमाल किया था, आज समाज का बोझ खुद अपने कंधों पर उठा रही थी।

अध्याय 5: प्रायश्चित और सम्मान

अभिनव ने बिना किसी संकोच के, भरी भीड़ के सामने पल्लवी के खुरदरे हाथों को अपने हाथों में ले लिया। “मुझे माफ कर दो पल्लवी। मैं अधिकारी तो बन गया, लेकिन इंसान बनने में देर कर दी।”

पल्लवी ने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया और कहा, “साहब, आप यहाँ के डीएम हैं। लोग देख रहे हैं। मेरा काम सामान उठाना है, आपका काम जिला चलाना।”

अभिनव ने वहीं खड़े होकर एक घोषणा की। उसने स्टेशन मास्टर को बुलाया और कहा, “यह महिला मेरी पत्नी है। मेरी सफलता की असली हकदार। आज से यह कोई बोझ नहीं उठाएगी।”

लेकिन पल्लवी ने सिर उठाकर कहा, “अभिनव, मैंने इन पाँच सालों में सीखा है कि मेहनत की रोटी का स्वाद क्या होता है। मैं तुम्हारे साथ चलूँगी, लेकिन तुम्हारी पत्नी बनकर, तुम्हारी पहचान पर पलने वाली परछाई बनकर नहीं। मुझे खुशी है कि तुम अपनी मंजिल तक पहुँच गए, क्योंकि उसी के लिए मैंने यह रास्ता चुना था।”

अभिनव ने पल्लवी का वह लाल कपड़ा (कुली का बिल्ला) अपने हाथों में लिया और उसे सम्मान से चूम लिया। उसने उसी दिन स्टेशन पर महिला कुलियों और कामगारों के लिए एक विशेष कल्याण योजना की नींव रखी।

अध्याय 6: एक नई सुबह

गाड़ी जब सरकारी बंगले की ओर बढ़ रही थी, तो अभिनव और पल्लवी के बीच सन्नाटा तो था, लेकिन वह पाँच साल पहले जैसा भारी नहीं था। उस सन्नाटे में सुकून था।

अभिनव ने बंगले में घुसते ही सबसे पहले पल्लवी के लिए एक सिलाई मशीन मँगवाई। उसने पल्लवी से कहा, “तुम जो चाहो वह करो, लेकिन अब हम साथ रहेंगे। तुम्हारी मेहनत ने मुझे कुर्सी दी है, और अब मेरी शक्ति तुम्हारी गरिमा की रक्षा करेगी।”

सूरज ढल रहा था, और उसकी नारंगी किरणें उन दोनों की परछाइयों को एक कर रही थीं। शहर के लोगों ने उस दिन न केवल एक नया डीएम देखा था, बल्कि एक ऐसा पति भी देखा था जिसने सफलता के शिखर पर पहुँचकर अपनी जड़ों को नहीं भुलाया।


कहानी का संदेश:

सफलता तब तक अधूरी है जब तक उसे बाँटने वाला अपना साथ न हो। और प्रेम केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सपनों के लिए खुद को मिटा देने का नाम भी है।