मेरी बहू ने मुझे सार्वजनिक रूप से बर्बाद करने के लिए वकील रखा — जज का एक सवाल…
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लखनऊ के गोमती नगर एक्सटेंशन की शामें शांत हैं, लेकिन मेरे जीवन में तूफान आया था। मेरा नाम वसंता पांडे है। उम्र 56 साल। मैं एक साधारण विधवा, तीन कमरों के फ्लैट में रहती हूं, सूती साड़ी पहनती हूं, छोटी सी बिंदी लगाती हूं। लोग मुझे देखकर सोचते हैं—एक अकेली महिला, बेटे का सहारा। पर मैंने 28 साल पंजाब नेशनल बैंक में सहायक प्रबंधक के तौर पर काम किया है। फर्जी दस्तावेज पहचानना, धोखाधड़ी सुलझाना, झूठे दावे पकड़ना—यही मेरी विशेषज्ञता रही है।
तीन साल पहले पति रामनाथ पांडे की मृत्यु हो गई। मधुमेह के कारण गुर्दे खराब हो गए थे। 18 महीने तक अस्पताल के चक्कर, दवाइयां, देखभाल—मैंने सब संभाला। मेरे पास एक बेटा है, अभिषेक, 34 साल का, आईटी कंपनी में काम करता है। अच्छा लड़का, लेकिन दुनियादारी कम समझता है।
पांच साल पहले अभिषेक की शादी दिल्ली की निशा मित्तल से हुई। पहली बार जब मिली, तो बहुत मीठा बोलती थी। “मम्मी जी, मम्मी जी” हर वक्त। मुझे लगा, अच्छी बहू मिल गई है। लेकिन कुछ महीनों में ही असलियत सामने आ गई। निशा को व्यायामशाला जाना पसंद था, नए कपड़े, इंटरनेट से खरीदारी, महिलाओं की मंडली—हर चीज़ में पैसे उड़ाती थी। अभिषेक की तनख्वाह अच्छी थी, पर खर्चे उससे भी ज्यादा।
संपत्ति का खेल शुरू
मैंने कभी कुछ नहीं कहा। सोचती थी, नई नवेली है, धीरे-धीरे समझ जाएगी। लेकिन एक दिन निशा ने कहा, “मम्मी जी, यह फ्लैट अभिषेक के नाम कर दीजिए ना। उसकी सुरक्षा के लिए।” मैंने मुस्कुरा कर टाल दिया, लेकिन दिमाग में घंटी बज गई। बैंक में इतने साल काम करने के बाद जानती थी—पहले प्यार से, फिर दबाव से, फिर धमकी से। उस रात सो नहीं पाई। पूजा घर में बैठी रही। अपनी स्टील की पेटी में सारे कागजात थे—फ्लैट की रजिस्ट्री, रामनाथ की वसीयत, बैंक के दस्तावेज। मैंने तय किया, अगर निशा ने दोबारा बात उठाई, तो मैं तैयार रहूंगी।
निशा ने बार-बार बात उठाई। पहले प्यार से, फिर रोज टोकाटाकी करके। “मम्मी जी, आजकल तो बेटे के नाम संपत्ति होती है ना।” “मम्मी जी, आप तो हमारी ही हैं।” “अगर आपको कुछ हो गया तो मुसीबत हो जाएगी।” मैं चुप रहती। मेरे पास एक चीज़ थी जो निशा के पास नहीं थी—धैर्य और एक पुराना फोन जिसमें आवाज रिकॉर्ड करने की सुविधा थी। अगली बार जब निशा ने संपत्ति की बात की, मैंने चुपके से फोन रिकॉर्ड पर रख दिया।
रिश्तों में दरार
निशा का व्यवहार बदलता गया। पहले “मम्मी जी” कहती थी, फिर सिर्फ “आप”, फिर कभी-कभी सीधे नाम से बुलाने लगी। खाना बनाते वक्त मदद मांगती थी, अब बंद कर दिया। कहती थी, “आप तो पुराने तरीके से बनाती हैं। मुझे आधुनिक तरीका पसंद है।” एक दिन मैंने अभिषेक के लिए गाजर का हलवा बनाया। निशा ने देखा, “मम्मी जी, इतना घी? अभिषेक की सेहत का ख्याल नहीं है आपको?” अभिषेक कुछ नहीं बोला, बस चुपचाप खा लिया। उसकी आंखों में झिझक थी।
धीरे-धीरे निशा अभिषेक को मुझसे दूर कर रही थी। पहले मां-बेटे के बीच दूरी, फिर जो चाहो करवाओ। मैं चुप रही। रसोई में खाना बनाती, अपने कमरे में रहती, दूरदर्शन देखती, और हर बात जो निशा कहती, अपनी डायरी में लिख लेती—तारीख और समय के साथ। बैंक में सिखाया गया था, लिखित प्रमाण सबसे जरूरी है।

अभिषेक के सामने माहौल बनाना
एक दिन निशा ने अभिषेक के सामने कहा, “मुझे आपकी मम्मी का तरीका समझ नहीं आता। मैं तो बस आपकी भलाई के लिए कहती हूं।” अभिषेक ने कहा, “मम्मी को बुरा नहीं लगा होगा।” निशा बोली, “लगा है। आज रसोई में मैंने कहा था कम नमक डालें तो ऐसे देखा जैसे मैंने कोई जुर्म कर दिया।” यह झूठ था, लेकिन निशा अभिषेक के सामने अपनी बात रख रही थी।
फिर निशा ने नया हथकंडा अपनाया—”मैं अपना व्यायामशाला खोलना चाहती हूं, आप उधार दिलवा देंगे ना?” अभिषेक चिंतित हुआ। “निशा, उधार, अभी तो घर का कर्ज भी चल रहा है।” निशा ने मेरी तरफ देखा, “मम्मी जी के पास तो इतना कुछ है। वो मदद कर सकती हैं।” मैंने कहा, “बेटा, मेरे पास सिर्फ मेरी पेंशन और थोड़ी बचत है।” निशा का चेहरा सख्त हो गया। “आप तो अपने बेटे की मदद भी नहीं करना चाहती।”
साजिश गहरी होती गई
अब निशा छोटी-छोटी बातों पर बहस करती। “आपके उठने की आवाज से हमारी नींद खराब हो जाती है।” “आवाज कम कीजिए, सिर दर्द होता है।” “आजकल कोई ऐसे नहीं बनाता, सेहत के लिए अच्छा खाना बनाइए।” हर काम में दखल, हर बात में टोकाटाकी, अभिषेक के सामने मुझे नीचा दिखाने की कोशिश।
एक दिन बालकनी में चाय पीते हुए अभिषेक आया, “मम्मी, आप ठीक हैं ना?” मैंने मुस्कुरा दिया, “हां बेटा, बिल्कुल ठीक हूं।” अभिषेक चला गया, पर मैं जानती थी, निशा उसके कान भर रही थी। फिर आया वो दिन जब निशा ने असली रंग दिखाया।
घर अलग करने की साजिश
दिवाली का त्यौहार था। मैंने पूरे घर की सफाई की, रंगोली बनाई, पकवान बनाए। अभिषेक के मित्र आए, निशा ने बहुत अच्छे से बात की। मैं रसोई में थी, तभी एक मित्र ने कहा, “वाह आंटी ने बहुत मेहनत की है।” निशा ने तुरंत कहा, “आजकल तो बाजार से भी अच्छा मिलता है। घर पर इतनी मेहनत करने की क्या जरूरत है?” मुझे अपमान महसूस हुआ, पर कुछ नहीं कहा।
रात को निशा ने अभिषेक से कहा, “मुझे लगता है हमें अलग रहना चाहिए। मम्मी जी के साथ रहना मुश्किल हो रहा है।” अभिषेक ने कहा, “मम्मी अकेली हैं, उनके पास अपना फ्लैट है, अपनी पेंशन है।” निशा बोली, “मैं नहीं रह सकती इस तरह। हर वक्त मुझे लगता है मैं बाहर वाली हूं।”
मित्र न्यायाधीश की सलाह
अगले दिन मैं अपने पुराने मित्र राजेंद्रनाथ से मिलने गई, जो सेवानिवृत्त न्यायाधीश थे। मैंने पूरी बात बताई। उन्होंने सलाह दी—”अपने सारे कागजात सुरक्षित रखिए, बैंक की तिजोरी में। हर बातचीत रिकॉर्ड करें। कोई भी दस्तावेज बिना पढ़े हस्ताक्षर मत कीजिए।” मैंने वैसा ही किया। सारे कागजात बैंक की तिजोरी में रख दिए।
आखिरी दांव — अदालत का सामना
निशा ने अगला कदम उठाया। एक शाम वह कमरे में आई, हाथ में कागज थे—संपत्ति हस्तांतरण का प्रारूप। मैंने कागज लिए, नजर डाली, और वापस कर दिए। “मुझे वकील से सलाह लेनी होगी।” निशा गुस्से में बाहर चली गई। उस रात अभिषेक से बोली, “तुम्हारी मम्मी को मुझ पर विश्वास नहीं है। मैं यहां नहीं रह सकती।”
फिर निशा ने एक नया खेल शुरू किया—मेरी छोटी-छोटी बातों को रिकॉर्ड करने लगी, अपने तरीके से तोड़-मरोड़ कर अभिषेक को बताती। अभिषेक बेचारा बीच में फंस गया था।
फिर निशा ने साफ-साफ कहा, “या तो आप फ्लैट अभिषेक के नाम करें या हम अलग रहने चले जाएंगे।” मैंने राजेंद्रनाथ को फोन किया, उन्होंने वकील का नंबर दिया। वकील ने सलाह दी, “हर बातचीत रिकॉर्ड करें, डायरी लिखें, गवाह तैयार रखें।”
पुलिस और समाज का सामना
एक सुबह अचानक मेरे घर पुलिस आ गई। “आपके खिलाफ मानसिक उत्पीड़न और दहेज उत्पीड़न का आरोप है।” मैं हक्की-बक्की रह गई। निशा बाहर खड़ी थी, रो रही थी, उसके माता-पिता चिल्ला रहे थे। पुलिस निरीक्षक ने कहा, “आपको थाने चलना होगा।” अभिषेक घर में नहीं था। मैं अकेली थी, पर डर नहीं लगा। मेरे पास सच था और सबूत भी।
थाने में पूछताछ हुई। मैंने कहा, “यह सब झूठ है। मेरी बहू मुझसे संपत्ति छीनने की कोशिश कर रही है।” पुलिस ने कहा, “आरोप दर्ज हो गया है, अब अदालत जाना होगा।” मुझे छोड़ दिया गया, पर पूरी सोसाइटी में खबर फैल गई।
अदालत में जज का सवाल
अदालत की तारीख आई। निशा अपने वकील के साथ आई, महंगी साड़ी, भारी श्रृंगार, माता-पिता, गवाह। अदालत कक्ष के बाहर पड़ोसी भी खड़े थे। मेरे वकील मिश्रा जी ने कहा, “घबराइए मत, सच आपके साथ है।”
न्यायाधीश ने निशा से पूछा, “आपके पास क्या सबूत है कि दहेज मांगा गया था?” निशा बोली, “मेरे माता-पिता गवाह हैं।” न्यायाधीश ने पूछा, “कोई लिखित प्रमाण?” निशा चुप रह गई।
फिर न्यायाधीश ने एक सीधा सवाल पूछा—”यह संपत्ति किसके नाम है?” निशा की वकील बोली, “अभिषेक पांडे के नाम होनी चाहिए।” न्यायाधीश ने कहा, “मैंने पूछा किसके नाम है?” निशा बोली, “मेरे पति के नाम है।” मेरे वकील ने संपत्ति की मूल रजिस्ट्री पेश की। “यह संपत्ति वसंता पांडे के नाम है। अभिषेक का इसमें कोई नाम नहीं है।”
न्यायाधीश ने कहा, “आप गलत जानकारी दे रही थीं।” वसीयत पेश की गई, जिसमें संपत्ति सिर्फ मेरे नाम थी। निशा का चेहरा सफेद पड़ गया।
सच की जीत
मिश्रा जी ने मेरी डायरी पेश की, रिकॉर्डिंग सुनाई। निशा की आवाज साफ सुनाई दी—”मम्मी जी फ्लैट अभिषेक के नाम करवा दीजिए।” न्यायाधीश ने कहा, “अगर कोई व्यक्ति अपने घर में अपनी सुरक्षा के लिए बातचीत रिकॉर्ड करता है तो यह कानूनी है।”
न्यायाधीश ने फैसला सुनाया—”यह मामला पूरी तरह असत्य और दुर्भावनापूर्ण है। निशा मित्तल ने झूठे आरोप लगाए हैं। मामला खारिज किया जाता है। निशा के खिलाफ जांच का आदेश। वसंता पांडे को पूरा अधिकार है जवाबी मामला दायर करें।”
समाज में सम्मान की वापसी
अभिषेक ने उसी दिन निशा को घर से बाहर निकाल दिया। मैंने जवाबी मामला दायर किया—मानहानि, झूठी शिकायत, संपत्ति हथियाने का प्रयास। अदालत ने निशा को दोषी पाया—6 महीने की सजा, ₹5 लाख जुर्माना, मुझे ₹1 लाख मुआवजा। सोसाइटी में लोग माफी मांगने लगे। राजेंद्रनाथ बोले, “आपने बहुत लोगों के लिए मिसाल कायम की है।”
अब मैं अपने घर में शांति से रहती हूं। अभिषेक मेरे साथ है, रिश्तों में सच्चाई लौट आई है। शाम को बालकनी में बैठकर चाय पीते हैं, बातें करते हैं। मैं अपनी डायरी खोलती हूं—हर पन्ना, हर तारीख, हर घटना सच का गवाह।
सीख और संदेश
मैं अपनी संपत्ति के लिए नहीं लड़ी, अपने अस्तित्व के लिए लड़ी। बुढ़ापा कोई कमजोरी नहीं है। उम्र सिर्फ एक संख्या है। असली ताकत अनुभव, धैर्य और सबूत में है। अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो, तो शेयर करें, कमेंट करें, और अपने अधिकारों को जानें।
सच्चाई और सबूत के साथ खड़े रहो—न्याय तुम्हारा साथ देगा।
जय हिंद।
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