पति की जान बचाने के लिए पत्नी ने मानी डॉक्टर की शर्त, सच सामने आया तो समाज शर्म से झुक गया”
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प्रारंभिक जीवन और खुशियों का दौर
दिल्ली की एक छोटी सी बस्ती में रहने वाली अनीता अपनी सादी जिंदगी में बहुत खुश थी। उसकी जिंदगी में संजय नाम का पति था, जो मेहनत मजदूरी करता था। दोनों मिलकर अपने छोटे-से घर का खर्च चलाते थे। उनके दो छोटे बच्चे थे, जो उनके जीवन का आधार थे। अनीता घर संभालती और संजय बाहर मजदूरी करता। दोनों मिलकर अपने बच्चों को अच्छी जिंदगी देने का सपना देखते थे।
उनकी जिंदगी बहुत आसान नहीं थी, लेकिन प्यार और भरोसे से भरी थी। अनीता अपने घर की हर छोटी-बड़ी जिम्मेदारी निभाती, और संजय अपने परिवार का सहारा बनता। छोटे-मोटे काम करके घर का खर्च चलाना उनके लिए सामान्य बात थी। लेकिन उनके जीवन में एक दिन ऐसा आया, जिसने उनके पूरे जीवन को बदल कर रख दिया।
संजय का अचानक बीमार होना
एक सुबह संजय अपने काम पर जाने के लिए तैयार हो रहा था। वह अपना बैग उठा ही रहा था कि अचानक उसके सीने में तेज दर्द हुआ। सांस लेने में कठिनाई होने लगी। वह जोर से कराहने लगा और अचानक बेहोश होकर गिर पड़ा। घर में हड़कंप मच गया। अनीता घबरा गई। बच्चों ने रोना शुरू कर दिया। उसने तुरंत पड़ोसियों को बुलाया और संजय को जल्दी से अस्पताल ले जाने का फैसला किया।
रास्ते में अनीता बार-बार संजय का हाथ पकड़कर रो रही थी। उसका दिल कह रहा था कि कुछ भी हो जाए, संजय को कुछ नहीं होना चाहिए। अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने उसकी जांच शुरू की। एक्सरे, ब्लड टेस्ट और अन्य जरूरी टेस्ट किए गए। रिपोर्ट आने पर डॉक्टर का चेहरा गंभीर हो गया।
डॉक्टर की रिपोर्ट और आर्थिक संकट
डॉक्टर ने कहा कि संजय की हालत बहुत गंभीर है। उसकी दिल की नसें ब्लॉक हो गई हैं। इलाज लंबा और महंगा होगा। कम से कम ₹15 लाख का खर्च आएगा। यह सुनकर अनीता का दिल बैठ गया। उसके पास इतनी रकम कहां से आएगी? उसके पास तो महीने का राशन भी मुश्किल से चलता था। संजय की मजदूरी से घर चलता था और वह घर पर सिलाई का काम करके थोड़ा बहुत कमाती थी।
उसने सोचा कि शायद घर बेच दे। उनके पास एक छोटा सा घर था, जो उनके गांव में था। अगले दिन वह बस पकड़कर गांव चली गई। वहां जाकर उसने घर बेचने की कोशिश की, लेकिन कोई भी 10 लाख से ज्यादा देने को तैयार नहीं था। घर की मरम्मत की जरूरत थी, इसलिए कीमत कम हो गई। निराश होकर वह वापस दिल्ली लौट आई।

अस्पताल में फिर से संकट और डॉक्टर का रहस्य
अस्पताल पहुंची तो संजय की हालत और बिगड़ रही थी। डॉक्टर कह रहे थे कि जल्दी से इलाज शुरू करना जरूरी है। अनीता अस्पताल के गलियारे में बैठी रो रही थी। उसके मन में बार-बार यही विचार आ रहे थे कि यदि संजय को कुछ हो गया तो उसकी जिंदगी कैसे चलेगी?
तभी एक वार्ड बॉय उसके पास आया और बोला कि डॉक्टर साहब ने उसे अपने कमरे में बुलाया है। अनीता ने अपने आंसू पोछे, खुद को संभाला और कांपते कदमों से डॉक्टर के कमरे की तरफ गई।
कमरे का दरवाजा खोलते ही उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। अंदर बैठा व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि उसका पुराना सहपाठी अमित था। वह वही अमित था, जिसने कोचिंग के दिनों में अनीता से प्यार किया था, लेकिन उसने कभी अपने दिल का इजहार नहीं किया।
अमित अब एक मशहूर डॉक्टर बन चुका था। उसने फाइल बंद की और गहरी सांस ली। फिर उसने कहा, “अनीता, मुझे पता है कि तुम्हारे पति की हालत बहुत गंभीर है। तुम्हें ₹15 लाख की जरूरत है, और मेरे पास इसका इंतजाम है।”
लेकिन उसकी शर्त थी—अमित ने मुस्कुराते हुए कहा, “तुम्हें मेरे साथ एक रात होटल में बितानी होगी। उसके बाद मैं तुम्हारे पति का पूरा इलाज करूंगा।”
शर्म और अपमान का संघर्ष
यह सुनकर अनीता का खून खौल उठा। उसके होंठ कांपने लगे। उसकी आंखों में गुस्सा और अपमान की आग जल उठी। उसने कहा, “अमित, तुम कितनी हिम्मत कर सकते हो? मैं शादीशुदा हूं। मैं कभी ऐसा नहीं कर सकती।”
अमित ने आराम से कुर्सी पर बैठते हुए कहा, “देखो अनीता, कोई जबरदस्ती नहीं है। फैसला तुम्हारे हाथ में है। अगर मना कर दो, तो अपने घर जाओ और अपने पति की मौत का इंतजार करो।”
अनीता का पूरा शरीर कांप रहा था। वह बाहर निकली और अस्पताल के एक कोने में बैठकर जोर-जोर से रोने लगी। उसके सामने दो रास्ते थे—एक, अपनी इज्जत और सम्मान को बनाए रखना; दूसरा, अपने पति की जान बचाने का प्रयास।
उस रात अनीता ने अपने जीवन का सबसे कठिन और दर्दनाक फैसला लिया। उसने अपने आप को मजबूरियों के हवाले कर दिया। वह रात भर करवटें बदलती रही, और हर बार उसकी आंखों के सामने संजय की मुस्कुराती तस्वीर आ जाती।
मजबूरी का फैसला और होटल का दर्द
अगली सुबह जब दिल्ली की सड़कें सूरज की किरणों से जगमगा रही थीं, अनीता का चेहरा फीका, डरा हुआ और थका हुआ था। अमित की कार उसे होटल के गेट तक लेकर आई। उसके पैर लड़खड़ा रहे थे, आंखों में आंसू थे, और दिल में तूफान मचा था।
उसने अपने आप से कहा, “मैं कोई पाप नहीं कर रही। मैं मजबूरी में हूं। अपने पति की जान बचाने के लिए यह सब कर रही हूं।”
कमरा नंबर 1027 का इंतजार कर रहा था। दरवाजा बंद हुआ और कमरे में सन्नाटा छा गया। अमित ने कहा, “डरो मत, अनीता। तुम्हारी यह हालत देखकर मुझे मज़ा आ रहा है क्योंकि कभी तुमने मेरी गरीबी का मजाक उड़ाया था। आज मैं चाहता हूं कि तुम्हें पता चले कि ताकत क्या होती है।”
अनीता ने सिर झुका लिया। आंखें बंद कर लीं। अगले कुछ घंटे उसके लिए जैसे सदियां बीत गईं। अमित ने उसका शरीर नहीं छुआ, लेकिन उसके शब्दों ने उसकी आत्मा को चोट पहुंचाई। वह ताने मारता रहा—”देखो, अनीता, तुम्हारी इज्जत कितनी सस्ती है। बस ₹15 लाख।”
सहना और संघर्ष
अनीता चुपचाप सहती रही, लेकिन उसके अंदर टूटती गई। उसने सोचा कि यह अपमान सहकर भी मैं संजय को बचा लूंगी। वह शाम को होटल से बाहर निकली और सीधे अस्पताल पहुंची। संजय का इलाज फिर से शुरू हुआ।
कुछ हफ्तों बाद संजय होश में आया और उसने कहा, “अनीता, तुम कितनी मजबूत हो। मुझे यकीन है कि तुमने ही पैसे का इंतजाम किया है।”
अनीता ने झूठ बोला, “हाँ, संजय, मैंने उधार ले लिया है।”
संजय ने उसकी आंखों में देखा और कहा, “तुम मेरी सबसे बड़ी दौलत हो, अनीता। तुम्हारे बिना मैं कुछ नहीं।” लेकिन उसकी आंखों में अंदर से दर्द था, और वह सोच रही थी कि उसने अपने पति को किस आग में जलाया है।
सच्चाई का खुलासा और समाज का सच
कुछ हफ्तों बाद संजय पूरी तरह ठीक होकर घर लौट आया। घर में खुशी का माहौल था, बच्चे खेल रहे थे, और सब कुछ सामान्य लग रहा था। लेकिन अनीता का दिल हर पल उस राज को दबाए रख रहा था।
एक दिन वह सुबह थी, जब संजय चाय पी रहा था और बच्चे नाश्ता कर रहे थे। तभी बाहर एक चमकदार कार रुकी। उसमें से निकला वही डॉक्टर अमित।
अमित ने सीधे घर आकर कहा, “संजय जी, मुझे पता नहीं था कि आपकी पत्नी से मुझे इतना प्यार है। मैं चाहता हूं कि आप उसे तलाक दे दें, ताकि मैं उससे शादी कर सकूं।”
संजय का चेहरा लाल हो गया। उसकी आंखें गुस्से से जल उठीं। उसने कहा, “यह क्या बकवास है? तुम कौन हो यहां आकर ऐसी बातें करने वाले?”
अमित ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैंने तुम्हारे इलाज का खर्चा उठाया है। लेकिन यह सब मैंने मुफ्त में नहीं किया। तुम्हारी पत्नी से वादा लिया था कि वह मेरे साथ एक रात बिताएगी।”
संजय का गुस्सा फूट पड़ा। उसने कहा, “मेरी पत्नी के बारे में एक शब्द मत कहना।”
अमित ने कहा, “मैं तुम्हें सच बताता हूं। मैंने ही तुम्हारे इलाज का खर्च किया है।”
संजय का गुस्सा और दर्द दोनों फूट पड़े। उसने अमित का कॉलर पकड़ लिया और चिल्लाया, “मेरी पत्नी के बारे में कोई बात मत करो।”
अनीता बीच में आई और गिड़गिड़ाई, “संजय, यह सब मेरी मजबूरी थी। मैंने तुम्हारी जान बचाने के लिए यह सब किया।”
संजय ने उसकी आंखों में देखा और कहा, “क्या तुमने मुझे धोखा दिया? क्या तुमने मेरी जान बचाने के लिए मेरी इज्जत बेच दी?”
अनीता फूट-फूट कर रोने लगी। उसने कहा, “संजय, मैंने अपनी मर्यादा नहीं तोड़ी। मैंने सिर्फ तुम्हारी जान बचाई है।”
नई शुरुआत और समाज का सच
अंत में, समाज ने अनीता का साथ दिया। पंचायत ने माना कि उसकी मजबूरी थी और उसने इंसानियत का धर्म निभाया। मोहल्ले के लोग उसकी साहस और त्याग की प्रशंसा करने लगे।
संजय ने अपनी पत्नी का हाथ थामा और कहा, “अनीता, तुमने मेरी जिंदगी बचाई है। मैं तुम्हारे भरोसे को कभी नहीं तोड़ूंगा।”
अनीता ने सोचा कि सही मायने में जीत तो तब है जब इंसान अपने कर्मों से साबित करता है कि उसकी मजबूरी उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी ताकत है।
निष्कर्ष
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