SP Madam Aam Kapron Mein Bazaar Aayi | Sub Inspector Ne Jo Kiya, Anjaam Soch Se Bahar Tha

वर्दी का कर्ज: एसपी रिया सिंह की जंग

अध्याय 1: सादे लिबास में छिपा सच

रामपुर जिला मुख्यालय का कमरा नंबर 101। बाहर बोर्ड पर लिखा था – रिया सिंह, आईपीएस, पुलिस अधीक्षक (एसपी)। अंदर रिया फाइलों के ढेर में दबी थीं, लेकिन उनका ध्यान कागजों से ज्यादा बाहर की उन कहानियों पर था जो दफ्तर की फाइलों में कभी दर्ज नहीं होतीं।

तीन दिन पहले ही उन्होंने चार्ज संभाला था। मातहत अफसरों ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि “सब चंगा सी” (सब ठीक है)। लेकिन रिया जानती थीं कि सरकारी गाड़ी के काले शीशों के पीछे से शहर कभी असली रूप में नजर नहीं आता।

शाम के 5:00 बज रहे थे। आसमान में बादलों का डेरा था। रिया ने अपनी वर्दी उतारी, बालों को सादगी से बांधा और एक पुरानी घड़ी पहन ली। उन्होंने अपने अर्दली शंभू से कहा, “मैं टहलने जा रही हूँ, किसी गाड़ी की जरूरत नहीं है।”

ऑटो रिक्शा में बैठकर रिया सदर बाजार पहुँचीं। यह रामपुर का सबसे व्यस्त इलाका था। बारिश के बाद की मिट्टी की सोंधी खुशबू और बाजार का शोर… रिया को सब कुछ बहुत करीब से महसूस हो रहा था। तभी उनकी नजर ‘राम भरोसे’ के पानी-पूरी के ठेले पर पड़ी। वह एक कोना पकड़कर चुपचाप खाने लगीं।

अध्याय 2: कानून का भक्षक

अभी रिया दूसरी पानी-पूरी ही खा पाई थीं कि माहौल अचानक बदल गया। एक सब-इंस्पेक्टर, जिसका नाम मीरा सिंह था, अपने तीन सिपाहियों के साथ वहाँ पहुँची। उसकी चाल में वर्दी का घमंड साफ झलक रहा था।

“ओए राम भरोसे! निकाल आज का हफ्ता,” मीरा ने चिल्लाकर कहा।

राम भरोसे ने हाथ जोड़ लिए, “मैडम, आज बारिश थी, बोनी भी ठीक से नहीं हुई। घर में बच्ची बीमार है, उसकी दवा लेनी है।”

मीरा सिंह का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। “कानून सिखाएगा मुझे? हफ्ता तो फिक्स है, चाहे कमाई हो या न हो!” उसने झटके से राम भरोसे का ठेला पलट दिया। सारा सामान कीचड़ में मिल गया। राम भरोसे बिलख उठा।

रिया के भीतर का खून उबल उठा। वह भीड़ से निकलकर आगे आईं। “एक्सक्यूज मी ऑफिसर! आप किस कानून के तहत इनसे वसूली कर रही हैं?”

मीरा सिंह ने एक आम लड़की समझकर रिया को ऊपर से नीचे देखा। “तू कौन होती है पूछने वाली? बड़ी आई वकील! चलती बन यहाँ से।”

रिया शांत रहीं, “मैं एक आम शहरी हूँ और यह पूछना मेरा हक है। इंडियन पैनल कोड में कहाँ लिखा है कि पुलिस हफ्ता वसूलेगी?”

मीरा सिंह ने आपा खो दिया और एक जोरदार थप्पड़ रिया के गाल पर जड़ दिया। “ये है मेरा कानून का सेक्शन! अब दफा हो जा यहाँ से।”

बाजार में सन्नाटा छा गया। लोग कानाफूसी करने लगे, “बेचारी लड़की, पुलिस से उलझने की क्या जरूरत थी?”

अध्याय 3: पहचान की ताकत

रिया के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उन्होंने धीरे से अपना हाथ पर्स में डाला और एक कार्ड निकाला। वह कोई मामूली कार्ड नहीं था। उस पर अशोक स्तंभ अंकित था।

“अब गौर से देख लो यह क्या है,” रिया की आवाज में वज्र जैसी कठोरता थी।

मीरा सिंह के हाथ-पांव कांपने लगे। कार्ड पर लिखा था – रिया सिंह, आईपीएस, एसएसपी रामपुर

हॉल में जैसे बिजली कौंध गई हो। मीरा सिंह के चेहरे का रंग उड़ गया। “मैम… मैम… मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मुझे लगा कि आप…” वह रिया के कदमों में गिर पड़ी।

रिया ने उसे झटक दिया। “तुमने मुझे नहीं पहचाना, इसलिए थप्पड़ मारा। अगर पहचान लेती तो सैल्यूट करती। यही तुम्हारी बीमारी है। तुम वर्दी की इज्जत नहीं करती, तुम सिर्फ रैंक से डरती हो। तुम जैसी पुलिस वाली इस महकमे पर कलंक है!”

रिया ने तुरंत कंट्रोल रूम फोन किया। कुछ ही मिनटों में पीसीआर वैन और एसएचओ वहाँ पहुँच गए। पूरे बाजार के सामने रिया ने मीरा सिंह और उसके तीनों सिपाहियों को सस्पेंड कर दिया।

“राम भरोसे जी,” रिया ने उस गरीब दुकानदार की तरफ हाथ बढ़ाया, “आपके नुकसान की भरपाई सरकार करेगी। और आज के बाद कोई भी पुलिस वाला आपसे एक रुपया भी मांगे, तो सीधा मेरे ऑफिस आना। मेरा दरवाजा आपके लिए हमेशा खुला है।”

अध्याय 4: सिस्टम का दबाव

अगले दिन सुबह, रिया की मेज पर फोन की घंटियां रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। विधायक रामनारायण तिवारी का फोन आया।

“एसपी साहिबा, आप नई हैं। मीरा सिंह बच्ची है, नादान है। उसे माफ कर दीजिए, महकमे का मोराल डाउन हो जाएगा,” विधायक ने चिकनी-चुपड़ी बातें कीं।

रिया ने दो टूक जवाब दिया, “तिवारी जी, वर्दी पहनकर गरीब को लूटना नादानी नहीं, गुनाह है। गुनहगार को सजा मिलेगी, चाहे वह कोई भी हो।”

रिया समझ गई थीं कि यह लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती। उन्होंने पुरानी फाइलें खंगालीं और इंस्पेक्टर शमशेर सिंह को बुलाया, जिन्हें ईमानदारी की वजह से साइडलाइन कर दिया गया था।

“शमशेर सिंह, मुझे आपकी जरूरत है। क्या आप इस कचरे को साफ करने में मेरा साथ देंगे?” रिया ने पूछा।

शमशेर की आँखों में चमक लौट आई। “मैम, बरसों से इस दिन का इंतजार था।”

अध्याय 5: जंग का आगाज

रिया और शमशेर ने मिलकर एक ‘एंटी-करप्शन हेल्पलाइन’ जारी की। रामपुर के लोगों ने पहली बार महसूस किया कि उनकी आवाज सुनी जा रही है। एक-एक करके उन चौकियों और थानों पर छापेमारी की गई जहाँ वसूली का धंधा चलता था।

राम भरोसे को डराने की कोशिश की गई, उसे झूठा बयान देने के लिए धमकाया गया, लेकिन रिया की टीम ने उसे सुरक्षा दी।

जांच कमेटी की रिपोर्ट आई। मीरा सिंह और उसके साथियों को न केवल सस्पेंड किया गया, बल्कि उन्हें सेवा से बर्खास्त (Dismiss) करने की सिफारिश की गई। यह रामपुर के पुलिस इतिहास में पहली बार था जब एक उच्च अधिकारी ने अपनी ही फोर्स के अंदर के भ्रष्टाचार पर इतना कड़ा प्रहार किया था।

उपसंहार: नई सुबह

महीनों बाद, रिया फिर से उसी सदर बाजार से गुजरीं। इस बार वह सरकारी गाड़ी में थीं। जैसे ही गाड़ी राम भरोसे के ठेले के पास से निकली, उसने मुस्कुराकर और सिर झुकाकर रिया का अभिवादन किया। उसके पास अब अपनी दुकान थी और चेहरे पर कोई खौफ नहीं था।

रिया ने खिड़की से बाहर देखा। रामपुर की सड़कों पर अब पुलिस का डर नहीं, बल्कि कानून का सम्मान था। उन्होंने अपने गाल पर पड़े उस थप्पड़ के निशान को याद किया—वह अब दर्द नहीं देता था, बल्कि उन्हें उनके कर्तव्य की याद दिलाता था।

रिया सिंह ने सच में अपनी वर्दी का कर्ज चुका दिया था। रामपुर में अब कानून का रास्ता वर्दी के रौब का नहीं, बल्कि इंसाफ के वकार (गरिमा) का था।

समाप्त