…ंडे पानी की सच्चाई थी जो अब उसकी रूह तक पहुंच चुकी थी। वही अहंकार, वही क्रूरता, अब उसकी अपनी ही सांसों को काट रही थी। गोवा के समंदर की लहरें शांत हो चुकी थीं, लेकिन मौलाना शाकिर के भीतर एक ऐसा तूफान उठ चुका था जो सारी उम्र नहीं थमने वाला था।
अस्पताल में जब वह होश में आया, शरीर पर कपकंपी थी, आंखों से आंसू बह रहे थे। पहली बार उसने खुद को इतना कमजोर, इतना नग़रूर महसूस किया। मोबाइल की स्क्रीन पर उसके अपने पुराने पोस्ट चमक रहे थे— “जिंदगी जियो, अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा करो।” पर अब उसे समझ आया कि वह किस नेमत का मजाक उड़ाता रहा।
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वह उठा, कांपते हाथों से फोन उठाया और वाटी का नंबर मिलाया। आवाज टूटी हुई थी, “मां… अब्बा… कैसे हैं?” उधर से सिसकियों की आवाज आई। वाटी रोते हुए बोली, “साहब… दो दिन पहले ठंड से उनकी तबियत बिगड़ गई… अब्बा जी नहीं रहे… और मां जी भी बहुत कमजोर हैं।”
शाकिर का दिल जैसे रुक गया। उसकी आंखों के सामने वह ड्रम, वह ठंडी भांप, वह “या अल्लाह रहम फरमा” की आवाज गूंज उठी। उसने सिर पकड़ा और फूट-फूट कर रो पड़ा। पहली बार उसके होंठों से निकला— “या अल्लाह, मैंने क्या किया?”

वह उसी रात पहली फ्लाइट से गांव लौटा। घर के आंगन में सन्नाटा था, रोशनी मंद पड़ी थी। कोठरी में गया तो मां जी दीवार के सहारे बैठी थीं, आंखें आधी खुली, होंठों पर वही दुआ थी — “रब मेरे बेटे को हिदायत दे।”
शाकिर उनके पैरों पर गिर पड़ा। “मां, मुझे माफ़ कर दो… मैं अंधा था… मैंने तुम पर जुल्म किया…” लेकिन मां की आंखों में अब दुनिया की रौशनी नहीं थी। बस उनके चेहरे पर एक सुकून था — जैसे उन्होंने अपने बेटे की तौबा सुन ली हो।
गांव के लोग अगले दिन मस्जिद में इकट्ठा थे। वही मौलाना शाकिर, जो कल तक नेकी का पैकर कहलाता था, आज सफेद कपड़ों में सिर झुकाए बैठा था। आंखों में नींद नहीं, दिल में सुकून नहीं। नमाज के बाद वह मिम्बर पर चढ़ा और कांपती आवाज़ में बोला —
“मैं वह गुनहगार हूं जिसने अपने मां-बाप को दुख दिया। आज मैं तुम सबके सामने एतराफ करता हूं — मैंने अल्लाह की सबसे बड़ी नेमत को ठुकराया। मेरे मां-बाप की दुआ ही मेरी असली इज्जत थी, और मैंने वही खो दी।”
मस्जिद में सन्नाटा छा गया। किसी ने देखा, उसकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। उसने कहा, “अगर तुम्हारे घर में मां-बाप हैं, तो समझो जन्नत तुम्हारे कदमों में है। उन्हें कभी मत रुलाना — वरना एक दिन तुम्हारा भी समंदर तुम्हें निगल जाएगा।”
उस दिन के बाद गांव ने मौलाना शाकिर को कभी उसी शान में नहीं देखा। वह मस्जिद की सफाई करता, गरीबों में खाना बांटता, और हर नमाज के बाद उसी कोठरी में बैठकर अपने मां-बाप की कब्र के पास तिलावत करता।
कहते हैं, जब भी सर्दी की पहली हवा चलती, गांव वाले देखते कि शाकिर उस ड्रम के पास बैठा होता, आंखें बंद, होंठों पर बस एक ही जुमला —
“या अल्लाह, मेरे मां-बाप को जन्नत अता फरमा… और मुझे उनकी माफी नसीब कर।”
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