एक साधारण लड़का, असाधारण दिल

राजेश ज्यादा बोलने वालों में नहीं था।
उसके चेहरे पर सादगी और आंखों में जिम्मेदारी थी।

वह एक रेस्टोरेंट में वेटर का काम करता था।
सुबह से रात तक ट्रे उठाना, मुस्कुराकर सर्व करना, और आख़िर में बर्तन तक सहेजना — यही उसकी दिनचर्या थी।

उसकी अपनी कोई बड़ी चाहत नहीं थी।
बस जिंदगी ठीक चलती रहे — यही काफी था।

प्रिया के सपने

प्रिया उससे बिल्कुल अलग थी।

तेज दिमाग, बड़े सपने और एक साफ सोच —
वह “किसी की पत्नी” बनकर नहीं, अपने नाम से पहचानी जाना चाहती थी।

दोनों की शादी साधारण तरीके से हुई।
ना फिल्मी प्यार, ना बड़ी कहानी।

शादी के बाद वही छोटा कमरा, वही सीमित खर्च, वही संघर्ष।

लेकिन शाम को दोनों साथ बैठते, चाय पीते और भविष्य की बातें करते।

“मैं अफसर बनना चाहती हूं,”
प्रिया कहती।

राजेश हर बार मुस्कुराता,
“बनोगी… जरूर बनोगी।”

एक फैसला जिसने सब बदल दिया

खर्च बढ़ रहे थे।
कोचिंग, किताबें, किराया, राशन — सब भारी पड़ रहा था।

एक रात राजेश देर तक हिसाब देखता रहा।
फिर बोला,

“हम दोनों में से एक को रुकना होगा… और वो मैं रहूंगा।”

प्रिया ने मना किया, पर राजेश तय कर चुका था।

उसने अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी थी —
उसने अपना सपना उसे दे दिया था।

सपना पूरा हुआ

सालों की मेहनत रंग लाई।

प्रिया का चयन हो गया।
वह एसडीएम बनी।

उस दिन राजेश की आंखों में गर्व था।
उसे लगा — उसका त्याग सफल हो गया।

घर बड़ा हुआ।
जरूरतें कम बोझिल लगीं।

सब ठीक लग रहा था…

लेकिन जिंदगी सीधी रेखा नहीं होती।

बदलाव

ब्लॉक में नया अधिकारी आया — विक्रम।

स्मार्ट, प्रभावशाली, बातों में तेज।

ऑफिस मीटिंग्स बढ़ीं, बातचीत बढ़ी, नजदीकियां भी।

राजेश को शुरू में कुछ महसूस नहीं हुआ।
उसे प्रिया पर भरोसा था।

फिर प्रिया बदलने लगी।

घर देर से आना
फोन कम उठाना
लहजा ठंडा होना

वो शाम

उस रात होटल में भीड़ थी।

राजेश वीआईपी टेबल सर्व कर रहा था।

जैसे ही वह टेबल पर पहुंचा —
उसकी सांस थम गई।

प्रिया सामने बैठी थी।
विक्रम उसके बहुत करीब।

दोनों हंस रहे थे। सहज, खुलकर।

प्रिया ने उसे देखा —
लेकिन चेहरा नहीं बदला।

राजेश चुपचाप लौट गया।

उस रात उसे समझ आया —
हालात सुधरने से रिश्ते नहीं सुधरते।

टूटन

धीरे-धीरे ताने शुरू हुए।

“तुम समझ नहीं सकते।”
“तुम मेरी बराबरी नहीं कर सकते।”
“आज जो हूं अपने दम पर हूं।”

आखिर एक दिन प्रिया चली गई।

ना बड़ा झगड़ा
ना ड्रामा
बस एक खामोश विदाई

राजेश अकेला रह गया।

गिरकर उठना

कुछ दिन वह सिर्फ जिंदा रहा।

फिर एक रात उसने खुद से पूछा —
“क्या त्याग करना कमजोरी था?”

अगले दिन उसने पुरानी किताबें निकालीं।

सुबह काम
रात पढ़ाई

लोग ताने मारते —
“अफसर पत्नी छोड़ गई।”

वह चुप रहता।

अब वह टूट नहीं रहा था,
खुद को बना रहा था।

नया राजेश

सालों की मेहनत के बाद चयन हुआ।

पुलिस सेवा।

कोई जश्न नहीं।
बस आईने में खुद को देखकर हल्की मुस्कान।

समय के साथ वह ईमानदार अधिकारी बन गया।

और फिर एक दिन पोस्टिंग मिली —
इंदौर में, एसपी के रूप में।

उसी शहर में जहां उसने सब खोया था।

फाइल

एक दिन जमीन घोटाले की फाइल आई।

नाम थे —
विक्रम
और कुछ दस्तावेजों पर प्रिया के हस्ताक्षर।

राजेश ने गहरी सांस ली।

यह बदला नहीं था।
यह कानून था।

जांच शुरू हुई।
सबूत मिले।

नोटिस भेजे गए।

आमना-सामना

प्रिया सामने खड़ी थी —
अब उसकी आंखों में आत्मविश्वास नहीं, डर था।

राजेश ने कुछ निजी नहीं कहा।
बस फाइल की ओर इशारा किया।

कानूनी कार्रवाई हुई।
विक्रम निलंबित।
प्रिया भी दोषी पाई गई।

आखिरी मुलाकात

जेल से छूटने के बाद प्रिया उसके घर आई।

आंखों में आंसू, आवाज कांपती हुई —
“अब मेरे पास तुम्हारे अलावा कोई नहीं।”

राजेश ने शांत नजरों से देखा।

“जब तुम गई थी तब भी मैं अकेला था।”

वह बोली, “मैं गलत थी।”

राजेश ने धीरे कहा,
“और आज मैं सही के साथ हूं।”

“गलत के लिए खड़ा होना मेरी वर्दी के खिलाफ है… और मेरी जिंदगी के भी।”

दरवाजा बंद हो गया।

असली जीत

राजेश अपनी कुर्सी पर लौटा।
नई फाइल खोली।

अब उसके दिल में ना गुस्सा था,
ना बदला।

सिर्फ आत्मसम्मान।

उसे समझ आ गया था —
प्यार बड़ा हो सकता है,
लेकिन आत्मसम्मान उससे भी बड़ा होता है।

सीख

त्याग कमजोरी नहीं,
गलत इंसान के लिए त्याग करना कमजोरी है।

और जब इंसान अपने लिए खड़ा हो जाता है,
तो वही उसकी सबसे बड़ी जीत बनती है।